ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥
आत्मज्ञका वर्णन —
उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत ।
परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥
जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस ।
वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥
घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे ।
जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥
नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका ।
वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥
शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव ।
मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥
जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर ।
जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥
मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर ।
वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव ।
फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥
हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल ।
शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥
ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके ।
देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ ।
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