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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 230

डालनेसे वस्त्रपर दृष्टि । दीखती सभी सूतकी सृष्टि ।
वहां है नहीं दूसरी गोष्टि । सूतके बिना ॥ १०० ॥
ऐसा प्रतीत जो है करता । अनुभव ऐसा जहां होता ।
वही समबुद्धि कहलाता । नहीं अन्य ॥ १ ॥
होता है वह तीर्थ-राज समान । उसके दर्शनसे हो समाधान ।
होता संगसे ब्रह्मभावका ज्ञान । अनिच्छुको भी ॥ २ ॥
धर्मका सारथ्य करती है उसकी गोष्टि । महा-सिद्धिको जन्म देती उसकी दृष्टि ।
स्वर्गादि सुखकी करना है नव-सृष्टि । खेल है उसको ॥ ३ ॥
यदि कोई सहज स्मरता । देते हैं वे अपनी योग्यता ।
उनकी प्रशंसा स्वभावता । देती शुभ-लाभ ॥ ४ ॥
योगी युञ्जीत सततम् आत्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
कभी अस्त न होगा ऐसे । देखा अद्वैत दिवससे ।
आप रहता है अपनेसे । अखंडित ॥ ५ ॥
इस दृष्टिसे वह विवेकी है । अर्जुन जो एकाकी रहता है ।
त्रिभुवनमें वही होनेसे है । सहज अपरिग्रही ॥ ६ ॥
ऐसे हैं जो असाधारण । प्राप्त पुरुषके लक्षण ।
सर्वज्ञताके ही कारण । श्री कृष्ण कहता ॥ ७ ॥
यह है ज्ञानियोंका बाप । सबकी दृष्टिका है दीप ।
उसका समर्थ संकल्प । रचता विश्वको ॥ ८ ॥
हाटमें है जो प्रणवके । वस्त्र बना शब्द-ब्रह्मके ।
लपेट न सका उसके । यशसे छोटा बड़ा ॥ ९ ॥
उसकी है अंगकी कांतिसे । प्रकाशते रवि-शशि ऐसे ।
विश्व क्या उसके प्रकाशसे । ओझल है पार्थ ॥ ११० ॥

इच्छा संग्रहको छोड़ चित्तको करके वश ।
आत्मामें ही सदा लीन रहा एकांत भावसे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी १६२