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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण
तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक ।
आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥ 152 ॥
दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणै जाप ।
एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥ 153 ॥
दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।
निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥ 154 ॥
जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।
आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 155 ॥
तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका ।
आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥
आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का ।
दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥ 156 ॥
परिचय अंग
चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक।
ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥ 157 ॥
ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ ।
ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥ 158 ॥
घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण ।
ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥ 159 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी
दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥ 160 ॥
नाम पारिख लक्षण
अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ ।
दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥ 161 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
लै लक्षण सहज
छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ।
दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥
सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ।
दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥
राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ।
मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥
जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और।
देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥
पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण।
दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण।
जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम।
आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥
नख शिख स्मरण
कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ।
मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥
नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप।
अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥
अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि।
सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥
दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम।
चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥
दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत।
अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।
सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 174 ॥
हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति ।
दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डी है राति ॥ 175 ॥
दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम ।
करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥ 176 ॥
सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम ।
दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥ 177 ॥
दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ ।
श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥ 178 ॥
साध महिमा
आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान ।
दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥ 179 ॥
राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।
दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥ 180 ॥
जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।
दादू दोन्यूं इकट्ठे, अरस परस विश्राम ॥ 181 ॥
दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।
साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥ 182 ॥
दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।
तो दिल ही माँहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥ 183 ॥
साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।
दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥ 184 ॥
सत्संग महात्म
दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।
सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥ 185 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस।
यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥ 186 ॥
मीठे मांही राखिये, सो काहे न मीठा होइ।
दादू मीठा हाथ ले, रस पीवै सब कोइ ॥ 187 ॥
सत्संगति-कुसंगति
मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा।
दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥ 188 ॥
साध महिमा महात्म्य
मीठै मीठे कर लिये, मीठा मांही बाहि।
दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाहि ॥ 189 ॥
राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव।
सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥ 190 ॥
पारिख अपारिख
हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार।
पाया पारिख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 191 ॥
अंधे हीरा परखिया, कीया कौड़ी मोल।
दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 192 ॥
साध महिमा
मीरां कीया महर सौं, परदे थैं लापर्द।
राखि लिया दीदार में, दादू भूला दर्द ॥ 193 ॥
दादू नैन बिन देखबा, अंग बिन पेखबा,
रसन बिन बोलबा ब्रह्म सेती।
श्रवण बिन सुनबा, चरण बिन चालबा,
चित्त बिन चिन्तबा, सहज एती ॥ 194 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
पतिव्रत
दादू देख्या एक मन, सो मन सब ही मांहि।
तिहि मन सौं मन मानिया, दूजा भावै नांहि ॥ 195 ॥
पुरुष प्रकाशी
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 196 ॥
पतिव्रत
दादू दिल अरवाह का, सो अपणा ईमान।
सोई साबित राखिये, जहँ देखै रहमान ॥ 197 ॥
अल्लह आप ईमान है, दादू के दिल मांहि।
सोई साबित राखिये, दूजा कोई नांहि ॥ 198 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करै कमाइ।
दादू सब संसार में, क्योंहि गह्या न जाइ ॥ 199 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 200 ॥
काया सूक्ष्म कर मिलै, ऐसा कोई एक।
दादू आत्म ले मिलैं, ऐसे बहुत अनेक ॥ 201 ॥
सुन्दरी सुहाग
आडा आत्म तन धरै, आप रहै ता मांहि।
आपण खेलै आप सौं, जीवन सेती नांहि ॥ 202 ॥
अध्यात्म
दादू अनभै थैं आनन्द भया, पाया निर्गुण नांव।
निश्चल निर्मल निर्वाण पद, अगम अगोचर ठांव ॥ 203 ॥
दादू अनभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ।
अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥ 204 ॥
जो कुछ बेद कुरान थैं, अगम अगोचर बात।
सो अनभै साचा कहै, यहु दादू अकह कहात ॥ 205 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश।
भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥ 206 ॥
दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौलाइ ॥ 207 ॥
दादू वाणी ब्रह्म की, अनुभै घट परकास।
राम अकेला रहि गया, शब्द निरंजन पास ॥ 208 ॥
जे क बहूँ समझै आत्मा, तौ दृढ़ गह राखै मूल।
दादू सेझा राम रस, अमृत काया कूल ॥ 209 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥ 210 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 211 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 212 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 213 ॥
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुने, सबै दिशा कर नैन ॥ 214 ॥
सबै दिसा पग सीस हैं, सबै दिसा मन चैन।
सबै दिसा सन्मुख रहै, सबै दिसा अंग ऐन ॥ 215 ॥
बिन श्रवणहुँ सब कुछ सुनै, बिन नैनहुँ सब देखै।
बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यहु दादू अचरज पेखै ॥ 216 ॥
सब अंग सब ही ठौर सब, सर्वंगी सब सार।
कहै गहै देखै सुनै, दादू सब दीदार ॥ 217 ॥

  • 90 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
कहै सब ठौर, गहै सब ठौर, रहै सब ठौर, जोति परवाने ।
नैन सब ठौर, बैन सब ठौर, ऐन सब ठौर, सोई भल जाने ॥
सीस सब ठौर, श्रवण सब ठौर, चरण सब ठौर, कोई यहु माने ।
अंग सब ठौर, संग सब ठौर, सबै सब ठौर, दादू ध्याने ॥ 218 ॥
तेज ही कहना, तेज ही गहना, तेज ही रहना सारे ।
तेज ही बैना, तेज ही नैना, तेज ही ऐन हमारे ।
तेज ही मेला, तेज ही खेला, तेज अकेला, तेज ही तेज सँवारे ।
तेज ही लेवे, तेज ही देवे, तेज ही खेवे, तेज ही दादू तारे ॥ 219 ॥
नूर हि का धर, नूर हि का घर, नूर हि का वर मेरा ।
नूर हि मेला, नूर हि खेला, नूर अकेला, नूर हि मंझ बसेरा ।
नूर हि का अंग, नूर हि का संग, नूर हि का रंग मेरा ।
नूर हि राता, नूर हि माता, नूर हि खाता दादू तेरा ॥ 220 ॥
सूक्ष्म सौंज अर्चा बन्दगी
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं ।
तहँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं ॥ 221 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ खालिक भरपूरं ।
आली नूर अल्लाह का, खिदमतगार हजूरं ॥ 222 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ देख्या करतारं ।
तहँ सेवक सेवा करै, अनन्त कला रवि सारं ॥ 223 ॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ निरंजन वासं ।
तहँ जन तेरा एक पग, तेज पुंज प्रकाशं ॥ 224 ॥
दादू तेज कमल दिल नूर का, तहाँ राम रहमानं ।
तहँ कर सेवा बंदगी, जे तूँ चतुर सयानं ॥ 225 ॥
तहाँ हजूरी बंदगी, नूरी दिल में होइ ।
तहँ दादू सिजदा करै, जहाँ न देखै कोइ ॥ 226 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू देही मांहि दोइ दिल, इक खाकी इक नूर।
खाकी दिल सूझै नहीं, नूरी मंझि हजूर ॥ 227 ॥
नमाज सिजदा
दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥ 228 ॥
दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥ 229 ॥
दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥ 230 ॥
दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक राहिबा ध्यानं ।
आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥ 231 ॥
दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि ।
साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥ 232 ॥
साधु महिमा महात्म
अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे ।
दादू पसे तिनके, अल्लह गाल्हाये ॥ 233 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥ 234 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥ 235 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, लुड़ींदा आहीन ।
दादू पसे तिन्न के, असां खबर दीन ॥ 236 ॥
अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाह्रीन ।
दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥ 237 ॥
रस प्रेम प्याला
प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया ।
दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥ 238 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया।
दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥ 239 ॥
दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया।
जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥ 240 ॥
दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न।
अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥ 241 ॥
आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ।
साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥ 242 ॥
राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ।
मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥ 243 ॥
लांबी भक्ति अगाध
दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी।
सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥ 244 ॥
दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध।
इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥ 245 ॥
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥ 246 ॥
दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि।
इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥ 247 ॥
दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान।
इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥ 248 ॥
सेवा अखंडित
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ।
अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥ 249 ॥
दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि।
पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥ 250 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै।
सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥ 251 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ।
तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥ 252 ॥
दादू जे साहिब मानै नहीं, तऊ न छाडूं सेव।
इहि अवलंबन जीजिये, साहिब अलख अभेव ॥ 253 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बन्दगी
आदि अंति आगे रहे, एक अनुपम देव।
निराकार निज निर्मला, कोई न जाणे भेव ॥ 254 ॥
अविनासी अपरंपरा, वार वार नहीं छेव।
सो तूँ दादू देखि ले, उर अंतर कर सेव ॥ 255 ॥
दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट।
सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥ 256 ॥
घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव।
अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥ 257 ॥
भ्रम विध्वंस
पूजनहारे पास हैं, देही माहिं देव।
दादू ताकौं छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥ 258 ॥
परिचय
दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि।
उलट समाना आप में, सो सुख कतहूँ नाहिं ॥ 259 ॥
दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव।
उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥ 260 ॥
परगट खेलैं पीव सौं, अगम अगोचर ठांव।
एक पलक का देखना, जीवण मरण का नांव ॥ 261 ॥

  • 94 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
आत्म मांही राम है, पूजा ताकी होइ ।
सेवा वंदन आरती, साध करें सब कोइ ॥ 262 ॥
परिचै सेवा आरती, परिचै भोग लगाइ ।
दादू उस प्रसाद की, महिमा कही न जाइ ॥ 263 ॥
मांहि निरंजन देव है, मांहि सेवा होइ ।
मांहि उतारै आरती, दादू सेवक सोइ ॥ 264 ॥
दादू मांहि कीजै आरती, मांहि पूजा होइ ।
मांहि सतगुरू सेविये, बूझै विरला कोइ ॥ 265 ॥
संत उतारैं आरती, तन मन मंगलचार ।
दादू बलि बलि वारणैं, तुम पर सिरजनहार ॥ 266 ॥
दादू अविचल आरती, जुग-जुग देव अनन्त ।
सदा अखंडित एक रस, सकल उतारैं संत ॥ 267 ॥
॥ सौंज मंत्र ॥
सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोष स्थान, मूल मंत्र, मन माला,
गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता,ध्यान धोवती, काया कलश, प्रेम
जल, मनसामंदिर,निरंजन देव, आत्मा पाती, पुहुप प्रीति, चेतनाचंदन, नवधा
नाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण, शब्द घंटा, आनन्द आरती, दया
प्रसाद, अनन्य एक-दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट्गुण
ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फल दर्शन, अभि अन्तर
सदा निरन्तर सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्मा उपदेश, अंतर्गति पूजा ॥268 ॥
पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।
दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥ 269 ॥
सूक्ष्म सौंज
सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।
दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥ 270 क ॥

  • 95 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे।
ऐसेअन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥ 270 ख ॥
ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और।
यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥ 271 ॥
जहाँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि।
दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥ 272 ॥
दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार।
तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 273 ॥
तेज पुंज “को बिलसना”, मिलि खेलैं इक ठांव।
भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥ 274 ॥
अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ।
तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥ 275 ॥
सुन्दरी सुहाग
मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव।
सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥ 276 ॥
ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज।
दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥ 277 ॥
प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ।
दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥ 278 ॥
अर्चना भक्ति
दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ।
तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥ 279 ॥
भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ।
दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥ 280 ॥
देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा।
सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥ 281 ॥

  • 96 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
जीव पियारे राम को, पाती पंच चढ़ाइ।
तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥ 282 ॥
अध्यात्म ध्यान
शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि।
मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥ 283 ॥
दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर।
जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥ 284 ॥
दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि।
निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥ 285 ॥
मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि।
दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 286 ॥
दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ।
मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन-नाथ ॥ 287 ॥
दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण।
यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥ 288 ॥
दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान।
सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥ 289 ॥
दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ।
समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥ 290 ॥
दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तैं भक्ति समान।
प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥ 291 ॥
दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन।
मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥ 292 ॥
जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ।
जहाँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥ 293 ॥

  • 97 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति
प्राण खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन ।
शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥ 294 ॥
चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन ।
नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥ 295 ॥
पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार ।
खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥ 296 ॥
नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज ।
ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥ 297 ॥
पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ ।
आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥ 298 ॥
अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ ।
दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥ 299 ॥
दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा ।
आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥ 300 ॥
प्राण पवन मन मगन है, संगी सदा निवासा ।
परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥ 301 ॥
दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि ।
पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥ 302 ॥
प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये ।
पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौँ कहिये ॥ 303 ॥
पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये ।
दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥ 304 ॥
दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्ष्म जैसा अंग ।
पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥ 305 ॥

  • 98 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि।
ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥ 306 ॥
दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर।
ऐसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥ 307 ॥
दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख।
नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक॥ 308 ॥
दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ।
डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥ 309 ॥
फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि।
सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 310 ॥
दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सौं पाइ।
हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥ 311 ॥
टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ।
परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥ 312 ॥
दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ।
लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥ 313 ॥
बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल।
बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥ 314 ॥
दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ।
अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥ 315 ॥
पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग।
ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥ 316 ॥
निकट निरंजन लाग रघु, जब लग अलख अभेव।
दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 317 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

राम रतणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।
बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 318 ॥
दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ ।
पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥ 319 ॥
दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।
राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥ 320 ॥
जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत ।
दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥ 321 ॥
ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक।
तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥ 322 ॥
ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।
भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥ 323 ॥
ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।
ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ 324 ॥
राता माता राम का, मतवाला मैमंत ।
दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ 325 ॥
दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास ।
तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ 326 ॥
रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ ।
दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ 327 ॥
तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ ।
जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥ 328 ॥
आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि ।
दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥ 329 ॥

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ।
जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥ 330 ॥
दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर।
सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥ 331 ॥
लांबी रस
दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ।
पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥ 332 ॥
चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ।
ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥ 333 ॥
दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ।
पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥ 334 ॥
दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ।
मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥ 335 ॥
उज्जवल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास।
पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥ 336 ॥
नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत।
तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥ 337 ॥
पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार।
दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥ 338 ॥
नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक।
दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक॥ 339 ॥
परिचय महात्म
परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै।
मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥ 340 ॥
परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 341 ॥

  • 101 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ।
दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ 342 ॥
परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग।
काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ 343 ॥
परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 344 ॥
परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार।
दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ 345 ॥
अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ।
काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ 346 ॥
सजीवन
दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ।
जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ 347 ॥
मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास।
पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 348 ॥
तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल।
दादू माखण ह्रै गया, काहू का स्थूल ॥ 349 ॥
दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि।
मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ 350 ॥
दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक।
राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ 351 ॥
दादू झूठा जीव है, गढ़िया गोविन्द बैन।
मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ 352 ॥
सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार।
दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 353 ॥

  • 102 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
चतुर्थो परिचय का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 4 ॥ साखी 353 ॥
दादूराम
राम
सत्यराम

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जरणा का अंग
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अथ जरणा का अंग ५
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
जरणा का स्वरूप
को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।
गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ।। 2 ।।
जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।
रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ।। 3 ।।
दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ।। 4 ।।

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