सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ।
जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥ 330 ॥
दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर।
सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥ 331 ॥
लांबी रस
दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ।
पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥ 332 ॥
चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ।
ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥ 333 ॥
दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ।
पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥ 334 ॥
दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ।
मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥ 335 ॥
उज्जवल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास।
पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥ 336 ॥
नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत।
तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥ 337 ॥
पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार।
दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥ 338 ॥
नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक।
दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक॥ 339 ॥
परिचय महात्म
परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै।
मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥ 340 ॥
परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 341 ॥
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