सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश।
भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥ 206 ॥
दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौलाइ ॥ 207 ॥
दादू वाणी ब्रह्म की, अनुभै घट परकास।
राम अकेला रहि गया, शब्द निरंजन पास ॥ 208 ॥
जे क बहूँ समझै आत्मा, तौ दृढ़ गह राखै मूल।
दादू सेझा राम रस, अमृत काया कूल ॥ 209 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥ 210 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 211 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 212 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 213 ॥
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुने, सबै दिशा कर नैन ॥ 214 ॥
सबै दिसा पग सीस हैं, सबै दिसा मन चैन।
सबै दिसा सन्मुख रहै, सबै दिसा अंग ऐन ॥ 215 ॥
बिन श्रवणहुँ सब कुछ सुनै, बिन नैनहुँ सब देखै।
बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यहु दादू अचरज पेखै ॥ 216 ॥
सब अंग सब ही ठौर सब, सर्वंगी सब सार।
कहै गहै देखै सुनै, दादू सब दीदार ॥ 217 ॥
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