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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 504 में से

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पृष्ठ 93

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया।
दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥ 239 ॥
दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया।
जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥ 240 ॥
दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न।
अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥ 241 ॥
आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ।
साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥ 242 ॥
राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ।
मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥ 243 ॥
लांबी भक्ति अगाध
दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी।
सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥ 244 ॥
दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध।
इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥ 245 ॥
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥ 246 ॥
दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि।
इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥ 247 ॥
दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान।
इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥ 248 ॥
सेवा अखंडित
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ।
अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥ 249 ॥
दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि।
पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥ 250 ॥

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