सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
जीव पियारे राम को, पाती पंच चढ़ाइ।
तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥ 282 ॥
अध्यात्म ध्यान
शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि।
मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥ 283 ॥
दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर।
जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥ 284 ॥
दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि।
निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥ 285 ॥
मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि।
दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 286 ॥
दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ।
मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन-नाथ ॥ 287 ॥
दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण।
यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥ 288 ॥
दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान।
सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥ 289 ॥
दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ।
समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥ 290 ॥
दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तैं भक्ति समान।
प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥ 291 ॥
दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन।
मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥ 292 ॥
जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ।
जहाँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥ 293 ॥
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