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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 504 में से

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पृष्ठ 98

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति
प्राण खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन ।
शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥ 294 ॥
चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन ।
नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥ 295 ॥
पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार ।
खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥ 296 ॥
नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज ।
ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥ 297 ॥
पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ ।
आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥ 298 ॥
अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ ।
दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥ 299 ॥
दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा ।
आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥ 300 ॥
प्राण पवन मन मगन है, संगी सदा निवासा ।
परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥ 301 ॥
दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि ।
पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥ 302 ॥
प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये ।
पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौँ कहिये ॥ 303 ॥
पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये ।
दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥ 304 ॥
दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्ष्म जैसा अंग ।
पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥ 305 ॥

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