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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

राम रतणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।
बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 318 ॥
दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ ।
पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥ 319 ॥
दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।
राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥ 320 ॥
जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत ।
दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥ 321 ॥
ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक।
तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥ 322 ॥
ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।
भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥ 323 ॥
ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।
ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ 324 ॥
राता माता राम का, मतवाला मैमंत ।
दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ 325 ॥
दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास ।
तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ 326 ॥
रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ ।
दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ 327 ॥
तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ ।
जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥ 328 ॥
आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि ।
दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥ 329 ॥

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