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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
दीपक दृष्टि पतंग ज्यों, यों भ्रमि जले जनि कोई रे ॥ 1 ॥
जिह्वा स्वारथ आपने, ज्यूं मीन मरे तज नीरो रे।
मांहैं जाल न जाणियो, तातैं उपनों दुःख शरीरो रे ॥ 2 ॥
स्वादैं ही संकट पर्यो देखत ही नर अंधो रे।
मूरख मूठी छाड़ि दे, होइ रह्यो निर्बंधो रे ॥ 3 ॥
मान सिखावणि माहरी, तू हरि भज मूल न हारी रे।
सुख सागर सोई सेविये, जन दादू राम सँभारी रे ॥ 4 ॥
इति राग सिन्दूरा सम्पूर्ण ॥ 10 ॥ पद 8 ॥

  • 407 -

अथ राग देवगांधार ११
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल
शरण तुम्हारी आइ परे ।
जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥
कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे ।
कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥
कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े ।
कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥
अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे ।
हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥

  • 408 -

श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11
255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल
बौरी ! तूँ बार बार बौरानी।
सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥
चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो ।
सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥
तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी।
इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥
प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी।
निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥
पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै।
दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥
256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल
मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो,
सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥
जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो।
कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥
कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो।
दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥
इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥

  • 409 -

अथ राग (कल्हेरौ) कालिंगड़ा 12
(गायन समय प्रभात 3 से 6)
257. (गुजराती) विनती। रंग ताल
वाल्हा, हूँ ताहरी, तूँ माहरो नाथ ।
तुम सौं पहली प्रीतड़ी, पूरबलो साथ ॥ टेक ॥
वाल्हा मैं तूँ म्हारो ओलखियो रे, राखिस तूँनें हृदा मंझारि ।
हूँ पामूं पीव आपणों रे, त्रिभुवन दाता देव मुरारि ॥ 1 ॥
वाल्हा मन माहरो मन मांही राखिस, आत्म एक निरंजन देव ।
चित मांहैं चित सदा निरंतर, येणी पेरे तुम्हारी सेव ॥ 2 ॥
वाल्हा भाव भक्ति हरि भजन तुम्हारो, प्रेमें पूरि कँवल विगास।
अभि-अंतर आनन्द अविनाशी, दादू नी एह्रैं पूरवी आस ॥ 3 ॥

  • 410 -

श्री दादूवाणी-राग कलिंगड़ा 12
258. (गुजराती) उपदेश चेतावनी। वर्ण भिन्नताल
वारीवार कहूँ रे गहिला, राम राम कांइ विसाऱ्यो रे ।
जनम अमोलक पामियो, एह्वो रतन कांई हाऱ्यो रे ॥ टेक ॥
विषया बाह्यो नें तहँ धायो, कीधो नहिं मारो वाऱ्यो रे ।
माया धन जोई नें भूल्यो, सर्वस येणें हाऱ्यो रे ॥ 1 ॥
गर्भवास देह दमतो प्राणी, आश्रम तेह संभाऱ्यो रे ।
दादू रे जन राम भणीजे, नहिं तो जथा विधि हाऱ्यो रे ॥ 2 ॥
इति राग कालिंगडा सम्पूर्णः ॥ 12 ॥ 2 पद ॥

  • 411 -

राग परजिया
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अथ राग परजिया (परज) 13
(गायन समय रात्रि 3 से 6)
259. परिचय । खेमटा ताल
नूर रह्या भरपूर, अमी रस पीजिये,
रस मांही रस होइ, लाहा लीजिये ॥ टेक ॥
प्रकट तेज अनन्त, पार नहिं पाइये ।
झिलमिल झिलमिल होइ, तहाँ मन लाइये ॥ 1 ॥
सहजैं सदा प्रकाश, ज्योति जल पूरिया ।
तहाँ रहें निज दास, सेवक सूरिया ॥ 2 ॥
सुख सागर वार न पार, हमारा वास है ।
हंस रहें ता मांहिं, दादू दास है ॥ 3 ॥
इति राग परजिया सम्पूर्णः ॥ 13 ॥ पद 1 ॥

  • 412 -

राग भवानी
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अथ राग भांणमली (भवानी) 14
(गायन समय मध्यरात्रि, राग मंजरी मतानुसार)
260. (गुजराती) विनती । कौव्वाली ताल
मारा वाल्हा रे ! तारे शरणि रहेश ।
बीनतड़ी वाल्हा नें कहतां, अनंत सुख लहेश ॥ टेक ॥
स्वामी तणों हूँ संग न मेलूं, बिनतड़ी कहेश ।
हूँ अबला तूँ बलवंत राजा, तारा बना वहेश ॥ 1 ॥
संग रहूँ तां सब सुख पामूं, अंतर थैं दहेश ।
दादू ऊपर दया करीनें, आवो एणढ़ वेश ॥ 2 ॥

  • 413 -

श्री दादूवाणी-राग भवानी 14

२६१. (गुजराती) जलद त्रिताल
चरण देखाड़ तो प्रमाण ।
स्वामी माहरे नैणें निरखूं, मांगू येज मान ॥ टेक ॥
जोवूं तुझनें आशा मुझनें, लागूं येज ध्यान ।
वाहलो मारो मलो रे सहिये, आवे केवल ज्ञान ॥ 1 ॥
जेणी पेरें हूँ देखूं तुझने, मुझनें आलो जाण ।
पीव तणी हूँ पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥ 2 ॥
२६२. (गुजराती) जलद त्रिताल
ते हरि मलू मारो नाथ !
जोवा ने मारो तन तपे, केवी पेरें पामूं साथ ॥ टेक ॥
ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, ऊभी करूं विलाप ।
स्वामी मारो नैणें निरखूं, ते तणों मनें ताप ॥ 1 ॥
एक वार घर आवे वाहला, नव मेलूं कर हाथ।
ये वीनती सांभल स्वामी, दादू तारो दास ॥ 2 ॥
२६३. रंगताल
ते केम पामिये रे, दुर्लभ जे आधार।
ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥ टेक ॥
केवी पेरें कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार ।
मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥ 1 ॥
संभान्यो आवे रे वाहला, वेला ये अवार।
विरहणी विलाप करे, तेम दादू मन विचार ॥ 2 ॥
इति राग भांणमली सम्पूर्णः ॥ 14 ॥ पद 4 ॥

  • 414 -

राग सारंग
अथ राग सारंग 15
(गायन समय मध्य दिन)
264. गुरु ज्ञान सूर । फख्ता ताल
हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै ।
वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ।। टेक ।।
भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै ।
रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ।। 1 ।।
क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै ।
प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ।। 2 ।।
ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै ।
परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ।। 3 ।।

  • 415 -

श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल
तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥
हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥
हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥
तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥
266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल
माया संसार की सब झूठी ।
मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥
जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी ।
हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥
ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती ।
दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥
267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल
ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥
संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही ।
राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥
तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई ।
आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥
सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा।
जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥
भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै ।
जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥

  • 416 -

श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
२6४. परिचय उपदेश । त्रिताल
चल-चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो,
श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥ टेक ॥
तन नाहीं जहाँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये ।
शब्द नहीं जहाँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥ 1 ॥
पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये ।
चन्द नहीं जहाँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥ 2 ॥
तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये ।
तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥ 3 ॥
इति राग सारंग सम्पूर्णः ॥ 15 ॥ पद 5 ॥

  • 417 -

अथ राग टोडी (तोडी) 16
(गायन समय दिन 6 से 12)
269. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल
सो तत सहजैं सुषमन कहणा,
साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ।। टेक ।।
प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ।। 1 ।।
मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ।। 2 ।।
अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ।। 3 ।।
सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ।। 4 ।।
270. नाम महिमा । राज मृंगाक ताल
नाँव रे नाँव रे, नाँव रे नाँव रे,

  • 418 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
सकल शिरोमणि नाँव रे, मै बलिहारी जाँव रे ॥ टेक ॥
दुस्तर तारै, पार उतारै, नरक निवारै नाँव रे ॥ 1 ॥
तारणहारा, भवजल पारा, निरमल सारा नाँव रे ॥ 2 ॥
नूर दिखावै, तेज मिलावै, ज्योति जगावै नाँव रे ॥ 3 ॥
सब कुछ दाता, अमृत राता, दादू माता नाँव रे ॥ 4 ॥
271. केवल विनती । राज विद्याधर ताल
राइ रे राइ रे, सकल भुवनपति राइ रे,
अमृत देहु अघाइ रे राइ ॥ टेक ॥
प्रगट राता, प्रगट माता, प्रगट नूर दिखाइ रेराइ ॥ 1 ॥
सुस्थिर ज्ञाना, सुस्थिर ध्याना, सुस्थिर तेज मिलाइ रेराइ ॥ 2 ॥
अविचल मेला, अविचल खेला, अविचल ज्योति समाइ रे राइ ॥ 3 ॥
निहचल बैना, निहचल नैना, दादू बलि बलि जाइ रे राइ ॥ 4 ॥
272. रसिक अवस्था । सवारी ताल
हरि रस माते मगन भये ।
सुमिर सुमिर भये मतवाले, जामण मरण सब भूल गये ॥ टेक ॥
निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं, आन न दूजा भाव धरैं ।
सहजैं सदा राम रंग राते, मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥ 1 ॥
गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगैं संत जना ।
और अनेक देहु दत्त आगै, आन न भावै राम बिना ॥ 2 ॥
इक टग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैं ।
दादू मगन रहैं रस माते, ऐसे हरि के जन जीवैं ॥ 3 ॥
273. (गुजराती) केवल विनती । सवारी ताल
ते मैं कीधेला राम ! जे तैं वाज्या ते ।

  • 419 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।।
साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो।
सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।।
आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो।
अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।।
राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो।
पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।।
274. विरह विनती । त्रिताल
कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो।
डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।।
मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो।
जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।।
ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो।
प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।।
निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो।
दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।।
275. केवल विनती । त्रिताल
तूँ साचा साहिब मेरा ।
कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।।
तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला।
दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।।
मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा।
खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।।
मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।

  • 420 -

दादू द्वारे दीन पुकारे, काहे न दर्शन लहिये ॥ 3 ॥
276. उपदेश चेतावनी । मकरंद ताल
कुछ चेति रे कहि क्या आया ।
इन में बैठा फूल कर, तैं देखी माया ॥ टेक ॥
तूँ जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देख भुलाया ।
आज काल चल जावै देही, ऐसी सुन्दर काया ॥ 1 ॥
राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया ।
दादू हरि की सेवा कीजे, सुन्दर साज मिलाया ॥ 2 ॥
277. मकरंद ताल
नेटि रे माटी में मिलना, मोड़ मोड़ देह काहे को चलना ॥ टेक ॥
काहे को अपना मन डुलावै, यहु तन अपना नीका धरना ।
कोटि वर्ष तूँ काहे न जीवै, विचार देख आगै है मरना ॥ 1 ॥
काहे न अपनी बाट सँवारै, संजम रहना, सुमिरण करणा ।
गहिला ! दादू गर्व न कीजे, यहु संसार पँच दिन भरणा ॥ 2 ॥
278. ब्रह्मयोग ताल
जाइ रे तन जाइ रे ।
जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥ टेक ॥
नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे ।
सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥ 1 ॥
जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे ।
छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥ 2 ॥
प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे ।
जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥ 3 ॥

  • 421 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
279. त्रिताल
काहे रे बक मूल गँवावै, राम के नाम भलें सचु पावै ॥ टेक ॥
वाद विवाद न कीजे लोई, वाद विवाद न हरि रस होई ।
मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं, मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥ 1 ॥
हार जीत सौं हरि रस जाई, समझि देख मेरे मन भाई!
मूल न छाड़ी दादू बौरै, जनि भूलै तूँ बकबे औरै ॥ 2 ॥
२४०. (फारसी) त्रिताल
हुशियार हाकिम न्याव है, सांई के दीवान।
कुल का हिसाब होगा, समझ मुसलमान ॥ टेक ॥
नीयत नेकी सालिकां, रास्ता ईमान।
इखलास अंदर आपणे, रखणां सुबहान ॥ 1 ॥
हुक्म हाजिर होइ बाबा, मुसल्लम महरबान।
अक्ल सेती आपमां, शोध लेहु सुजान ॥ 2 ॥
हक सौं हजूरी हूँणां, देखणां कर ज्ञान।
दोस्त दाना दीन का, मनणां फरमान ॥ 3 ॥
गुस्सा हैवानी दूर कर, छाड़ दे अभिमान।
दुई दरोगां नांहिं खुशियाँ, दादू लेहु पिछान ॥ 4 ॥
२४1. साधु प्रति उपदेश (गुजराती) । ललित ताल
निर्पख रहणा, राम राम कहणा,
काम क्रोध में देह न दहणा ॥ टेक ॥
जेणें मारग संसार जाइला, तेणें प्राणी आप बहाइला ॥ 1 ॥
जे जे करणी जगत करीला, सो करणी संत दूर धरीला ॥ 2 ॥
जेणें पंथैं लोक राता, तेणें पंथैं साधु न जाता ॥ 3 ॥
राम नाम दादू ऐसें कहिये, राम रमत रामहि मिल रहिये ॥ 4 ॥

  • 422 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
282. भेष बिडंबन । ललित ताल
हम पाया, हम पाया रे भाई । भेष बनाय ऐसी मन आई ॥ टेक ॥
भीतर का यहु भेद न जानै, कहै सुहागिनी क्यों मन मानै ॥ 1 ॥
अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं, भई सुहागिनी लोगन मांहीं ॥ 2 ॥
सांई स्वप्नै कबहुँ न आवै, कहबा ऐसे महल बुलावै ॥ 3 ॥
इन बातन मोहि अचरज आवै, पटम किये कैसे पीव पावै ॥ 4 ॥
दादू सुहागिनी ऐसे कोई, आपा मेट राम रत होई ॥ 5 ॥
283. आत्म समता । उत्सव ताल
ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अंतर नहीं कीजे ॥ टेक ॥
जैसे आतम आपा लेखै, जीव जंतु ऐसे कर पेखै ॥ 1 ॥
एक राम ऐसे कर जानै, आपा पर अंतर नहिं आनै ॥ 2 ॥
सब घट आतम एक विचारे, राम सनेही प्राण हमारे ॥ 3 ॥
दादू साची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई ॥ 4 ॥
284. नाम समता । उत्सव ताल
माधइयो-माधइयो मीठो री माइ, माहवो-माहवो भेटियो आइ ॥ टेक ॥
कान्हइयो-कान्हइयो करता जाइ, केशवो केशवो केशवो धाइ ॥ 1 ॥
भूधरो भूधरो भूधरो भाइ, रमैयो रमैयो रह्यो समाइ ॥ 2 ॥
नरहरि नरहरि नरहरि राइ, गोविन्दो गोविन्दो दादू गाइ ॥ 3 ॥
285. समता । बसंत ताल
एकही एकै भया आनंद, एकही एकै भागे द्वन्द ॥ टेक ॥
एकही एकै एक समान, एकही एकै पद निर्वान ॥ 1 ॥
एकही एकै त्रिभुवन सार, एकही एकै अगम अपार ॥ 2 ॥
एकही एकै निर्भय होइ, एकही एकै काल न कोइ ॥ 3 ॥
एकही एकै घट प्रकास, एकही एकै निरंजन वास ॥ 4 ॥

  • 423 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
एकही एकै आपहि आप, एकही एकै माइ न बाप ॥ 5 ॥
एकही एकै सहज स्वरूप, एकही एकै भये अनूप ॥ 6 ॥
एकही एकै अनत न जाइ, एकही एकै रह्या समाइ ॥ 7 ॥
एकही एकै भये लै लीन, एकही एकै दादू दीन ॥ 8 ॥
286. विनती । वसंत ताल
आदि है आदि अनादि मेरा, संसार सागर भक्ति भेरा ।
आदि है अंत है, अंत है आदि है, बिड़द तेरा ॥ टेक ॥
काल है झाल है, झाल है काल है, राखिले राखिले प्राण घेरा ।
जीव का जन्म का, जन्म का जीव का, आपही आपले भांन झेरा ॥ 1 ॥
मर्म का कर्म का, कर्म का मर्म का, आइबा जाइबा मेट फेरा ।
तार ले पार ले, पार ले तार ले, जीव सौं शिव है निकट नेरा ॥ 2 ॥
आत्मा राम है, राम है आत्मा, ज्योति है युक्ति सौं करो मेला ।
तेज है सेज है, सेज है तेज है, एक रस दादू खेल खेला ॥ 3 ॥
287. परिचय । कोकिल ताल
सुन्दर राम राया ।
परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥ टेक ॥
अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया ।
निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥ 1 ॥
गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा ।
अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥ 2 ॥
परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा ।
परम पुंज परापरं, दादू निज दासा ॥ 3 ॥

  • 424 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
२४४. परिचय पराभक्ति । कोकिल ताल
अखिल भाव अखिल भक्ति, अखिल नाम देवा।
अखिल प्रेम अखिल प्रीति,अखिल सुरति सेवा ।। टेक ।।
अखिल अंग अखिल संग, अखिल रंग रामा।
अखिला रत अखिला मत, अखिला निज नामा ।। 1 ।।
अखिल ज्ञान अखिल ध्यान, अखिल आनन्द कीजे।
अखिला लय अखिला में, अखिला रस पीजे ।। 2 ।।
अखिल मगन अखिल मुदित, अखिल गलित सांई।
अखिल दर्श अखिल पर्श, दादू तुम मांहीं ।। 3 ।।
इति राग टोडी सम्पूर्णः ।। 16 ।। पद 20 ।।

  • 425 -

अथ राग हुसेनी बंगाल 17
(गायन समय पहर दिन चढ़े, चंद्रोदय ग्रन्थ के मतानुसार)
२४9. (फारसी) अनन्यता । त्रिताल
है दाना है दाना, दिलदार मेरे कान्हा।
तूँ ही मेरे जान जिगर, यार मेरे खाना ॥ टेक॥
तूँ ही मेरे मादर पिदर, आलम बेगाना।
साहिब शिरताज मेरे, तूँ ही सुलताना ॥ 1 ॥
दोस्त दिल तूँ ही मेरे, किसका खिल खाना।
नूर चश्म जिंद मेरे, तूँ ही रहमाना ॥ 2 ॥
एकै असनाव मेरे, तूँ ही हम जाना।
जानिबा अजीज मेरे, खूब खजाना ॥ 3 ॥
नेक नजर मेहर मीरां, बंदा मैं तेरा।

  • 426 -