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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
सब जग छेली, काल कसाई, कर्द लिये कंठ काटै ।
पंच तत्त्व की पंच पंसुरी, खंड-खंड कर बांटै ॥ 41 ॥
काल झाल में जग जलै, भाज न निकसै कोइ ।
दादू शरणैं साच के, अभय अमर पद होइ ॥ 42 ॥
सब जग सूता नींद भर, जागै नाहीं कोइ ।
आगे पीछे देखिये, प्रत्यक्ष परलै होइ ॥ 43 ॥
आसक्ति मोह
ये सज्जन दुर्जन भये, अंत काल की बार ।
दादू इनमें को नहीं, विपति बटावनहार ॥ 44 ॥
संगी सज्जन आपणां, साथी सिरजनहार ।
दादू दूजा को नहीं, इहि कलि इहि संसार ॥ 45 ॥
काल चितावणी
ये दिन बीते चल गये, वे दिन आये धाइ ।
राम नाम बिन जीव को, काल गरासै जाइ ॥ 46 ॥
जे उपज्या सो विनश है, जे दीसै सो जाइ ।
दादू निर्गुण राम जप, निश्चल चित्त लगाइ ॥ 47 ॥
जे उपज्या सो विनश है, कोई थिर न रहाइ ।
दादू बारी आपणी, जे दीसै सो जाइ ॥ 48 ॥
दादू सब जग मर मर जात है, अमर उपावणहार ।
रहता रमता राम है, बहता सब संसार ॥ 49 ॥
संजीवन
दादू कोई थिर नहीं, यहु सब आवै जाइ ।
अमर पुरुष आपै रहै, कै साधु लयौ लाइ ॥ 50 ॥
काल चितावणी
यहु जग जाता देखकर, दादू करी पुकार ।
घड़ी महूरत चालनां, राखै सिरजनहार ॥ 51 ॥

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू विषै सुख मांहि खेलतां, काल पहुँचा आइ।
उपजै विनशै देखतां, यहु जग यों ही जाइ ॥ 52 ॥
राम नाम बिन जीव जे, केते मुये अकाल।
मीच बिना जे मरत हैं, तातैं दादू साल ॥ 53 ॥
कठोरता
सर्प सिंह हस्ती घणा, राक्षस भूत प्रेत।
तिस वन में दादू पड़या, चेतै नहीं अचेत ॥ 54 ॥
पूत पिता थैं बीछुट्या, भूलि पड़या किस ठौर।
मरै नहिं उर फाट कर, दादू बड़ा कठोर ॥ 55 ॥
काल चेतावनी
जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै, आयु घटै तन छीजै।
अंतकाल दिन आइ पहुंता, दादू ढील न कीजै ॥ 56 ॥
दादू अवसर चल गया, बरियाँ गई बिहाइ।
कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥ 57 ॥
दादू गाफिल है रह्या, गहिला हुवा गँवार।
सो दिन चित्त न आवई, सोवै पांव पसार ॥ 58 ॥
दादू काल हमारा कर गहै, दिन दिन खैंचत जाइ।
अजहुं जीव जागै नहीं, सोवत गई बिहाइ ॥ 59 ॥
सूता आवै सूता जाइ, सूता खेले सूता खाइ।
सूता लेवै सूता देवै, दादू सूता जाइ ॥ 60 ॥
दादू देखत ही भया, श्याम वर्ण तैं सेत।
तन मन यौवन सब गया, अजहुँ न हरि सौं हेत ॥ 61 ॥
दादू झूठे के घर देख कर, झूठे पूछे जाइ।
झूठे झूठा बोलते, रहे मसाणों आइ ॥ 62 ॥

  • 253 -

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू प्राण पयाना कर गया, माटी धरी मसाण ।
जालणहारे देखकर, चेतैं नहीं अजाण ॥ 63 ॥
दादू केई जाले केई जालिये, केई जालण जांहि ।
केई जालन की करैं, दादू जीवन नांहि ॥ 64 ॥
केई गाड़े केई गाड़िये, केई गाडण जांहि ।
केई गाड़ण की करैं, दादू जीवन नांहिं ॥ 65 ॥
दादू कहै-उठ रे प्राणी जाग जीव, अपना सजन संभाल ।
गाफिल नींद न कीजिये, आइ पहुंचा काल ॥ 66 ॥
समर्थ का शरणा तजै, गहै आन की औट ।
दादू बलवंत काल की, क्यों कर बंचै चोट ॥ 67 ॥
सजीव
अविनाशी के आसरे, अजरावर की ओट ।
दादू शरणैं सांच के, कदे न लागै चोट ॥ 68 ॥
काल चेतावनी
मूसा भागा मरण तैं, जहाँ जाइ तहाँ गोर ।
दादू स्वर्ग पयाल में, कठिन काल का शोर ॥ 69 ॥
सब मुख मांही काल के, मांड्या माया जाल ।
दादू गोर मसाण में, झंखे स्वर्ग पयाल ॥ 70 ॥
दादू मड़ा मसाण का, केता करै डफान ।
मृतक मुर्दा गोर का, बहुत करै अभिमान ॥ 71 ॥
राजा राणा राव मैं, मैं खानों सिर खान ।
माया मोह पसारै एता, सब धरती आसमान ॥ 72 ॥
पंच तत्त्व का पूतला, यहु पिंड सँवारा ।
मंदिर माटी मांस का, बिनशत नहिं बारा ॥ 73 ॥
हाड़ चाम का पिंजरा, बिच बोलणहारा ।
दादू तामें पैस कर, बहुत किया पसारा ॥ 74 ॥

  • 254 -

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया।
दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥
माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा।
दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥
बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं।
दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥
चित्त कपटी
दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल।
साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥
काल चितावणी
मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल।
जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥
दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ।
प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥
दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि।
यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥
दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव।
माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥
दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज।
सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥
केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त।
दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥
दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल।
हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥
दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।
सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥

  • 255 -

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
चंद, सूर, धर, पवन, जल, ब्रह्मांड खंड प्रवेश।
सो काल डरै करतार तैं, जै जै तुम आदेश ॥ 87 ॥
पवना, पानी, धरती, अंबर, विनशै रवि, शशि, तारा।
पंत तत्त्व सब माया विनशै, मानुष कहा विचारा ॥ 88 ॥
दादू विनशैं तेज के, माटी के किस मांहि।
अमर उपावणहार है, दूजा कोई नांहि ॥ 89 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करैं कमाइ।
दादू सब संसार में, क्यों हि गह्या न जाइ ॥ 90 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यों होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 91 ॥
स्वकीयमित्र शत्रुता
मन ही मांही ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि।
साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 92 ॥
आपै मारै आपको, आप आप को खाइ।
आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥ 93 ॥
आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा।
साहिब राखणहारा है, सो हितू हमारा ॥ 94 ॥
अग्नि रूप पुरुष इक कहहिं, संगति देह सहज ही दहहिं।
दीसे माणस प्रत्यक्ष काल, ज्यों कर त्यों कर दादू टाल ॥ 95 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पच्चीसवां कलि का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 25 ।। साखी 95 ।।

  • 256 -

सजीवन का अंग
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अथ सजीवन का अंग २६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।
गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥ 2 ॥
नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै ।
दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥ 3 ॥
साधु जन की वासना, शब्द रहै संसार ।
दादू आतम ले मिलै, अमर उपावनहार ॥ 4 ॥

  • 257 -

श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार ।
दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥
जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ ।
दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥
अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ ।
दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥
जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।
उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥
दया विनती
दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि ।
सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥
सजीवन
काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद ।
लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥
प्रश्न
कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड ।
कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥
अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे ।
दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥
रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।
दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥
दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ ।
भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥
मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख ।
दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥

  • 258 -

श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवन मरण
जीवित मिले सो जीवते, मूये मिल मर जाइ ।
दादू दोन्यों देखकर, जहाँ जानैं तहँ लाइ ॥ 16 ॥
सजीवन
दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।
दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥ 17 ॥
रहते सेती लाग रहु, तो अजरावर होइ ।
दादू देख विचार कर, जुदा न जीवै कोइ ॥ 18 ॥
जेती करणी काल की, तेती परिहर प्राण ।
दादू आतमराम सौं, जे तूं खरा सुजाण ॥ 19 ॥
विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ ।
जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 20 ॥
दादू सब ही मर रहे, जीवै नांही कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 21 ॥
देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 22 ॥
काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 23 ॥
दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 24 ॥
जागहु लागहु राम सौं, रैन बिहानी जाइ ।
सुमिर सनेही आपणा, दादू काल न खाइ ॥ 25 ॥
दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार ।
जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥ 26 ॥
मरै तो पावै पीव को, जीवत बंचै काल ।
दादू निर्भय नाम ले, दोनों हाथ दयाल ॥ 27 ॥

  • 259 -

श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
दादू मरणे को चला, सजीवन के साथ ।
दादू लाहा मूल सौं, दोनों आये हाथ ॥ 28 ॥
करुणा
दादू जाता देखिये, लाहा मूल गँवाइ ।
साहिब की गति अगम है, सो कुछ लखी न जाइ ॥ 29 ॥
सजीवन
साहिब मिलै तो जीविये, नहीं तो जीवै नांहि ।
भावै अनंत उपाय कर, दादू मूवों मांहि ॥ 30 ॥
सजीविन साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ ।
दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 31 ॥
दिन दिन लहुड़े होंहि सब, कहैं मोटा होता जाइ ।
दादू दिन दिन ते बढ़ें, जे रहैं राम ल्यौ लाइ ॥ 32 ॥
न जाणूं हाँजी, चुप गह, मेट अग्नि की झाल ।
सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 33 ॥
जीवन मुक्ति
दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुक्ता होइ ।
जीवित काटै कर्म सब, मुक्ति कहावै सोइ ॥ 34 ॥
दादू जीवित ही दुस्तर तिरे, जीवित लंघे पार ।
जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥ 35 ॥
जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम ।
जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥ 36 ॥
जीवित पाया प्रेम रस, जीवित पिया अघाइ ।
जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाइ ॥ 37 ॥
जीवित भागे भ्रम सब, छूटे कर्म अनेक।
जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥ 38 ॥

  • 260 -

श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवित मेला ना भया, जीवित परस न होइ।
जीवित जगपति ना मिले, दादू बूड़े सोइ ॥ 39 ॥
जीवित दुस्तर ना तिरे, जीवित न लंघे पार।
जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार ॥ 40 ॥
जीवित प्रकट ना भया, जीवित परिचय नांहि।
जीवित न पाया पीव को, बूड़े भवजल मांहि ॥ 41 ॥
जीवित पद पाया नहीं, जीवित मिले न जाइ।
जीवित जे छूटे नहीं, दादू गये विलाइ ॥ 42 ॥
दादू छूटे जीवतां, मूवाँ छूटे नांहि।
मूवाँ पीछे छूटिये, तो सब आये उस मांहि ॥ 43 ॥
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे मेला।
मूवाँ पीछे अमर अभय पद, दादू भूले गहिला ॥ 44 ॥
मूवाँ पीछे वैकुंठ वासा, मूवाँ स्वर्ग पठावैं।
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, दादू जग बोरावैं ॥ 45 ॥
मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं।
मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 46 ॥
मूवाँ पीछे भक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे सेवा।
मूवाँ पीछे संयम राखैं, दादू दोजख देवा ॥ 47 ॥
सजीवन
दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ?
रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास ॥ 48 ॥
साहिब मारे ते मुये, कोई जीवै नांहि।
साहिब राखे ते रहे, दादू निज घर मांहि ॥ 49 ॥
जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥ 50 ॥

  • 261 -

श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरू-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छब्बीसवां सजीवन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 26 ॥ साखी 50 ॥

दादूराम
सत्यराम

  • 262 -

पारिख
का
अंग
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अथ पारिख का अंग २७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
साधुत्व परीक्षा
दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर?
जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥ 2 ॥
दादू साधु परखिये, अन्तर आतम देख ।
मन मांहि माया रहै, कै आपै आप अलेख ॥ 3 ॥
दादू मन की देख कर, पीछे धरिये नांव ।
अन्तरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 4 ॥

  • 263 -

श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
यहु परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि ।
अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 5 ॥
दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।
बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 6 ॥
दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।
खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 7 ॥
दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाइ सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 8 ॥
घट की भान अनीति सब, मन की मेट उपाध ।
दादू परिहर पंच की, राम कहैं ते साध ॥ 9 ॥
अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे ।
दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 10 ॥
दादू दूजा कहबे को रह्या, अन्तर डारा धोइ ।
ऊपर की ये सब कहैं, मांहि न देखै कोइ ॥ 11 ॥
दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।
मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥ 12 ॥
दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव ।
अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 13 ॥
जग जन विपरीत
तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार ।
दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥ 14 ॥
काया के सब गुण बँधे, चौरासी लख जीव ।
दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥ 15 ॥
काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनन्त अपार ।
दादू काया वश करै, निरंजन निराकार ॥ 16 ॥

  • 264 -

श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक।
काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 17 ॥
नरबिड़ रूप पशु
मति बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशु समान।
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥ 18 ॥
सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव।
ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥ 19 ॥
करतूती कर्म
दादू बँध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान।
दादू दोनों देखिये, दूजा नांही आन ॥ 20 ॥
कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म।
जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥ 21 ॥
पारिख अपारिख
काचा उछलै ऊफणै, काया हाँडी मांहि।
दादू पाका मिल रहै, जीव ब्रह्म द्वै नांहि ॥ 22 ॥
दादू बाँधे सुर नवाये बाजैं, एह्वा शोध रु लीज्यो।
राम स्नेही साधु हाथे, वेगा मोकल दीज्यो ॥ 23 ॥
प्राण जौहरी पारिखु, मन खोटा ले आवै।
खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 24 ॥
सांच
श्रवणां हैं, नैनां नहीं, तातैं खोटा खाहिं।
ज्ञान विचार न उपजै, साच झूठ समझाहिं ॥ 25 ॥
सांच
दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार।
साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥ 26 ॥

  • 265 -

श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
साचे को साचा कहै, झूठे को झूठा।
दादू दुविधा को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥ 27 ॥
पारिख अपारिख
दादू हीरे को कंकर कहैं, मूरख लोग अजान।
दादू हीरा हाथ ले, परखैं साधु सुजान ॥ 28 ॥
हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार।
पाया पारख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 29 ॥
अंधे हीरा परखिया, किया कौडी मोल।
दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 30 ॥
सगुरा निगुरा
सगुरा निगुरा परखिये, साध कहैं सब कोइ।
सगुरा साचा, निगुरा झूठा, साहिब के दर होइ ॥ 31 ॥
सगुरा सत संयम रहै, सन्मुख सिरजनहार।
निगुरा लोभी लालची, भूंचै विषय विकार ॥ 32 ॥
कर्त्ता कसौटी
खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ।
साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥ 33 ॥
पारिख अपारिख
खोटा खरा कर देवै पारिख, तो कैसे बन आवै।
खरे खोटा का न्याय नबेरे, साहिब के मन भावै ॥ 34 ॥
दादू जिन्हें ज्यों कही, तिन्हें त्यों मानी, ज्ञान विचार न कीन्हा।
खोटा खरा जीव परख न जानै, झूठ सच करि लीन्हा ॥ 35 ॥
कर्त्ता कसौटी
जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर-घर आहि।
दादू महँगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥ 36 ॥

  • 266 -

श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ।
दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥ 37 ॥
दादू राम कसै सेवक खरा, कदे न मोड़ै अंग।
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक संग ॥ 38 ॥
दादू कस कस लीजिये, यहु ताते परिमान।
खोटा गाँठ न बाँधिये, साहिब के दीवान ॥ 39 ॥
खरी कसौटी पीव की, कोई बिरला पहुँचनहार।
जे पहुँचे ते ऊबरे, ताइ किये तत सार ॥ 40 ॥
दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी।
काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥ 41 ॥
दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ।
साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥ 42 ॥
दादू ठग आमेर में, साधौं सौं कहियो।
हम शरणाई राम की, तुम नीके रहियो ॥ 43 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सत्ताईसवां पारिख कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 27 ॥ साखी 43 ॥

  • 267 -

उपजन का अंग
अथ उपजन का अंग २८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
विचार
दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ ।
राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्रै जाइ ।। 2 ।।
आपा नाहीं बल मिटै, त्रिविध तिमिर नहिं कोइ ।
दादू यहु गुण ब्रह्म का, शून्य समाना सोइ ।। 3 ।।

  • 268 -

श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
उपजन
दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ।
गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥
द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार।
एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥
दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान।
चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥
आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट।
दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि।
दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार।
दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥
दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव।
सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥
निन्दा
जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि।
दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥
उपजन
पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार।
दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार।
सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
परिचय जिज्ञासा उपदेश
पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ ।
दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ ॥ 15 ॥
दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद ।
औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद ॥ 16 ॥
दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होइ ।
जैसा है तैसा कहै, दादू विरला कोइ ॥ 17 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
अट्ठाईसवां उपजन काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 28 ॥ साखी 17 ॥

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दया निर्वैरता का अंग
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अथ दया निर्वैरता का अंग २९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
सारमत
आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार ।
निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥
दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार ।
दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥

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