सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
मध्य
दादू पखा पखी संसार सब, निर्पख विरला कोइ ।
सोई निर्पख होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ॥ 62 ॥
अपने अपने पंथ की, सब को कहै बढाइ ।
तातैं दादू एक सौं, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 63 ॥
दादू द्वै पख दूर कर, निर्पख निर्मल नांव ।
आपा मेटै हरि भजै, ताकी मैं बलि जांव ॥ 64 ॥
संजीवन
दादू तज संसार सब, रहै निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागै कोइ ॥ 65 ॥
मत्सर ईर्ष्या
कलियुग कूकर कलमुँहा, उठ-उठ लागै धाइ ।
दादू क्यों करि छूटिये, कलियुग बड़ी बलाइ ॥ 66 ॥
संसार का त्याग
काला मुँह संसार का, नीले कीये पाँव ।
दादू तीन तलाक दे, भावै तीधर जाव ॥ 67 ॥
दादू भावहीन जे पृथ्वी, दया विहूणा देश ।
भक्ति नहीं भगवंत की, तहँ कैसा प्रवेश ॥ 68 ॥
जे बोलैं तो चुप कहैं, चुप तो कहैं पुकार ।
दादू क्यों कर छूटिये, ऐसा है संसार ॥ 69 ॥
न जाणूं, हाँजी, चुप गहि, मेट अग्नि की झाल ।
सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 70 ॥
पंथ चलैं ते प्राणिया, तेता कुल व्यवहार ।
निर्पख साधु सो सही, जिनके एक अधार ॥ 71 ॥
दादू पंथों पड़ गये, बपुरे बारह बाट ।
इनके संग न जाइये, उलटा अविगत घाट ॥ 72 ॥
- 203 -
श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16
आशय विश्राम
दादू जागे को आया कहैं, सूते को कहैं जाइ ।
आवन जाना झूठ है, जहाँ का तहाँ समाइ ॥ 73 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सोलहवां मध्य का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 16 ॥ साखी 73 ॥
- 204 -
सारग्राही
का
अंग
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अथ सारग्राही का अंग १७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
दादू साधु गुण गहै, औगुण तजै विकार ।
मानसरोवर हंस ज्यूं, छाड़ि नीर, गहि सार ।। 2 ।।
हंस गियानी सो भला, अन्तर राखे एक।
विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ।। 3 ।।
पहली न्यारा मन करै, पीछे सहज शरीर ।
दादू हंस विचार सौं, न्यारा किया नीर ।। 4 ।।
- 205 -
श्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17
आपै आप प्रकाशिया, निर्मल ज्ञान अनन्त ।
क्षीर नीर न्यारा किया, दादू भज भगवंत ॥ 5 ॥
क्षीर नीर का संत जन, न्याव नबेरैं आइ ।
दादू साधु हंस बिन, भेल सभेले जाइ ॥ 6 ॥
दादू मन हंसा मोती चुणै, कंकर दिया डार ।
सतगुरु कह समझाइया, पाया भेद विचार ॥ 7 ॥
दादू हंस मोती चुणै, मानसरोवर जाइ ।
बगुला छीलर बापुड़ा, चुण चुण मछली खाइ ॥ 8 ॥
दादू हंस मोती चुगैं, मानसरोवर न्हाइ ।
फिर फिर बैसैं बापुड़ा, काग करंकां आइ ॥ 9 ॥
दादू हंस परखिये, उत्तम करणी चाल ।
बगुला बैसे ध्यान धर, प्रत्यक्ष कहिये काल ॥ 10 ॥
उज्ज्वल करणी हंस है, मैली करणी काग ।
मध्यम करणी छाड़ि सब, दादू उत्तम भाग ॥ 11 ॥
दादू निर्मल करणी साधु की, मैली सब संसार ।
मैली मध्यम ह्वै गये, निर्मल सिरजनहार ॥ 12 ॥
दादू करणी ऊपर जाति है, दूजा सोच निवार ।
मैली मध्यम ह्वै गये, उज्ज्वल ऊँच विचार ॥ 13 ॥
उज्ज्वल करणी राम है, दादू दूजा धंध ।
का कहिये समझै नहीं, चारों लोचन अंध ॥ 14 ॥
दादू गऊ बच्छ का ज्ञान गहि, दूध रहै ल्यौ लाइ ।
सींग पूंछ पग परिहरै, स्तन हि लागै धाइ ॥ 15 ॥
दादू काम गाय के दूध सौं, हाड़ चाम सौं नांहि ।
इहिं विधि अमृत पीजिये, साधु के मुख मांहि ॥ 16 ॥
- 206 -
श्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17
स्मरण नाम
दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नाहिं।
लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥ 17 ॥
जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ।
दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥ 18 ॥
दादू साध सबै कर देखना, असाध न दीसै कोइ।
जिहिं के हिरदै हरि नहीं, तिहिं तन टोटा होइ ॥ 19 ॥
साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ।
दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥ 20 ॥
जब परम पदार्थ पाइये, तब कंकर दिया डार।
दादू साचा सो मिले, तब कूड़ा काज निवार ॥ 21 ॥
जब जीवन-मूरी पाइये, तब मरबा कौन बिसाहि।
दादू अमृत छाड़ कर, कौन हलाहल खाहि ॥ 22 ॥
जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ।
दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥ 23 ॥
जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं, निशि तहँ दिनकर नाहिं।
दादू ऐकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥ 24 ॥
दादू ऐकै घोड़े चढ चलै, दूजा कोतिल होइ।
दुहुँ घोड़ों चढ बैसतां, पार न पहुंता कोइ ॥ 25 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सत्रहवां सारग्राही का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 17 ॥ साखी 25 ॥
- 207 -
विचार
का
अंग
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अथ विचार का अंग १८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
ज्ञान परिचय
दादू जल में गगन, गगन में जल है, पुनि वै गगन निरालं ।
ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ।। 2 ।।
ज्यों दर्पण में मुख देखिये, पानी में प्रतिबिम्ब ।
ऐसे आत्मराम है, दादू सब ही संग ।। 3 ।।
- 208 -
श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
सांच
जब दर्पण मांहि देखिये, तब अपना सूझै आप।
दर्पण बिन सूझै नहीं, दादू पुन्य रु पाप ॥ 4 ॥
ज्ञान परिचय
जीयें तेल तिलनि में, जीयें गंध फूलनि।
जीयें माखणु खीर में, ईयें रब्ब रूहनि ॥ 5 ॥
ईयें रब्ब रूहनि में, जीयें रूह रगनि।
जीयें जेरो सूर मां, ठंडो चन्द्र बसंनि ॥ 6 ॥
दादू जिन यहु दिल मंदिर किया, दिल मंदिर में सोइ।
दिल मांही दिलदार है, और न दूजा कोइ ॥ 7 ॥
मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥ 8 ॥
विरक्तता
दादू नाल कमल जल ऊपजै, क्यों जुदा जल मांहि?
चंद हि हित चित प्रीतड़ी, यो जल सेती नांहि ॥ 9 ॥
दादू एक विचार सौं, सब तैं न्यारा होइ।
मांहि है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोइ ॥ 10 ॥
दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि।
जहँ मन नांही सो नहीं, जहाँ मन चेतन सो आहि ॥ 11 ॥
विचार
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार।
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥ 12 ॥
दादू इक निर्गुण इक गुणमयी, सब घट ये द्वै ज्ञान।
काया का माया मिले, आतम ब्रह्म समान ॥ 13 ॥
दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ।
आचारी सब जग भव्या, विचारी विरला कोइ ॥ 14 ॥
- 209 -
श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
दादू घट में सुख आनन्द है, तब सब ठाहर होइ ।
घट में सुख आनन्द बिन, सुखी न देख्या कोइ ॥ 15 ॥
विरक्तता
काया लोक अनन्त सब, घट में भारी भीर ।
जहाँ जाइ तहाँ संग सब, दरिया पैली तीर ॥ 16 ॥
काया माया ह्वै रही, जोधा बहु बलवंत ।
दादू दुस्तर क्यों तिरै, काया लोक अनंत ॥ 17 ॥
मोटी माया तज गये, सूक्ष्म लिये जाइ ।
दादू को छूटै नहीं, माया बड़ी बलाइ ॥ 18 ॥
दादू सूक्ष्म मांहिले, तिनका कीजे त्याग ।
सब तज राता राम सौं, दादू यहु वैराग ॥ 19 ॥
गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ ।
दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥ 20 ॥
पिंड मुक्ति सब को करै, प्राण मुक्ति नहीं होइ ।
प्राण मुक्ति सतगुरु करै, दादू विरला कोइ ॥ 21 ॥
शिष्य जिज्ञासा
दादू क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तम क्यों जाइ ?
क्यों सब छूटैं देह गुण ? सतगुरु कहि समझाइ ॥ 22 ॥
उत्तर
मांही थैं मन काढ कर, ले राखै निज ठौर ।
दादू भूलै देह गुण, बिसर जाइ सब और ॥ 23 ॥
नाम भुलावै देह गुण, जीव दशा सब जाइ ।
दादू छाड़ै नाम को, तो फिर लागै आइ ॥ 24 ॥
दादू दिन दिन राता राम सौं, दिन दिन अधिक स्नेह ।
दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥ 25 ॥
- 210 -
श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
दादू दिन दिन भूलै देह गुण, दिन दिन इंद्रिय नाश।
दिन दिन मन मनसा मरै, दिन दिन होइ प्रकाश ॥ 26 ॥
सजीवन
देह रहै संसार में, जीव राम के पास।
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 27 ॥
काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 28 ॥
काया मांही भय घणा, सब गुण व्यापैं आइ।
दादू निर्भय घर किया, रहे नूर में जाइ ॥ 29 ॥
खड्ग धार विष ना मरै, कोइ गुण व्यापै नांहि।
राम रहै त्यों जन रहै, काल झाल जल मांहि ॥ 30 ॥
विचार
सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक।
मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥ 31 ॥
मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अहर्निशि एकै ध्यान।
पर उपकारी प्राणिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥ 32 ॥
उभय असभाव
दादू मैं नाहीं तब नाम क्या, कहा कहावै आप?
साधो ! कहो विचार कर, मेटहु तन की ताप ॥ 33 ॥
जब समझ्या तब सुरझिया, उलट समाना सोइ।
कछु कहावै जब लगै, तब लग समझ न होइ ॥ 34 ॥
जब समझ्या तब सुरझिया, गुरुमुख ज्ञान अलेख।
ऊर्ध्व कमल में आरसी, फिर कर आपा देख ॥ 35 ॥
दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार।
आपा सुरझे सुरझिया, यहु गुरु ज्ञान विचार ॥ 36 ॥
- 211 -
श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार।
दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ्या सार ॥ 37 ॥
दादू जिहिं बरियां यहु सब भया, सो कुछ करो विचार।
काजी पंडित बावरे, क्या लिख बांधे भार ॥ 38 ॥
दादू जब यहु मनहि मन मिल्या, तब कुछ पाया भेद।
दादू लेकर लाइये, क्या पढ़ मरिये वेद ॥ 39 ॥
पाणी पावक, पावक पाणी, जाणै नहीं अजाण।
आदि रु अंत विचार कर, दादू जाण सुजाण ॥ 40 ॥
सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ।
दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥ 41 ॥
मीठा खारा, खारा मीठा, जाने नहीं गँवार।
आदि अंत गुण देखकर, दादू किया विचार ॥ 42 ॥
कोमल कठिन, कठिन है कोमल, मूरख मर्म न बूझै।
आदि रु अंत विचार कर, दादू सब कुछ सूझै ॥ 43 ॥
पहली प्राण विचार कर, पीछे पग दीजे।
आदि अंत गुण देख कर, दादू कुछ कीजे ॥ 44 ॥
पहली प्राण विचार कर, पीछे चलिये साथ।
आदि अंत गुण देखकर, दादू घाली हाथ ॥ 45 ॥
पहली प्राण विचार कर, पीछे कुछ कहिये।
आदि अंत गुण देखकर, दादू निज गहिये ॥ 46 ॥
पहली प्राण विचार कर, पीछे आवै जाइ।
आदि अंत गुण देख कर, दादू रहै समाइ ॥ 47 ॥
दादू सोच करै सो सूरमा, कर सोचै सो कूर।
कर सोच्यां मुख श्याम है, सोच कियां मुख नूर ॥ 48 ॥
- 212 -
श्री दादूवाणी-विचार का अंग 18
जो मति पीछे ऊपजै, सो मति पहली होइ।
कबहुं न होवै जीव दुखी, दादू सुखिया सोइ ॥ 49 ॥
आदि अन्त गाहन किया, माया ब्रह्म विचार।
जहँ का तहँ ले दे धऱ्या, दादू देत न बार ॥ 50 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
अठरहवां विचार काअंग सम्पूर्ण ।। अंग 18 ।। साखी 50 ।।
- 213 -
अथ विश्वास का अंग १९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू सहजैं सहजैं होइगा, जे कुछ रचिया राम ।
काहे को कलपै मरै, दुःखी होत बेकाम ॥ 2 ॥
सांई किया सो ह्वै रह्या, जे कुछ करै सो होइ ।
कर्ता करै सो होत है, काहे कलपै कोइ ॥ 3 ॥
दादू कहै जे तैं किया सो ह्वै रह्या, जे तूं करै सो होइ ।
करण करावण एक तूं, दूजा नांहीं कोइ ॥ 4 ॥
- 214 -
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।
दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥ 5 ॥
दादू स्वर्ग भुवन पाताल मधि, आदि अंत सब सृष्ट ।
सिरज सबन को देत है, सोई हमारा इष्ट ॥ 6 ॥
दादू करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।
सब काहू की करत है, सो दादू का मिंत ॥ 7 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, साहिब का विश्वास ।
सेवक सिरजनहार का, करे कौन की आस ? 8 ॥
शर्म न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।
दादू मारग मिहर का, बिरला बूझै कोइ ॥ 9 ॥
दादू उद्यम औगुण को नहीं, जे कर जाणै कोइ ।
उद्यम में आनन्द है, जे सांई सेती होइ ॥ 10 ॥
दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।
अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥ 11 ॥
पूरक पूरा पास है, नाहीं दूर, गँवार ।
सब जानत हैं, बावरे ! देबे को हुसियार ॥ 12 ॥
दादू चिन्ता राम को, समर्थ सब जाणै ।
दादू राम संभाल ले, चिंता जनि आणै ॥ 13 ॥
दादू चिन्ता कियां कुछ नहीं, चिंता जीव को खाइ ।
होना था सो ह्वै रह्या, जाना है सो जाइ ॥ 14 ॥
प्रतिपाल
दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।
जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥ 15 ॥
दादू समर्थ संगी संग रहै, विकट घाट घट भीर ।
सो सांई सूं गहगही, जनि भूलै मन बीर ॥ 16 ॥
- 215 -
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
गोविन्द के गुण चिंत कर, नैन, बैन, पग, शीश।
जिन मुख दिया कान, कर प्राणनाथ जगदीश ॥ 17 ॥
तन मन सौंज सँवार सब, राखै बिसवा बीस।
सो साहिब सुमिरै नहीं, दादू भान हदीस ॥ 18 ॥
दादू सो साहब जनि विसरै, जिन घट दिया जीव।
गर्भवास में राखिया, पालै पोषै पीव ॥ 19 ॥
दादू राजिक रिजक लिये खड़ा, देवे हाथों हाथ।
पूरक पूरा पास है, सदा हमारे साथ ॥ 20 ॥
हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्वास।
दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥ 21 ॥
दादू सांई सबन को, सेवक ह्वै सुख देइ।
अया मूढ मति जीव की, तो भी नाम न लेइ ॥ 22 ॥
दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरथ।
सोई सेवक ह्वै रह्या, जहाँ सकल पसारैं हत्थ ॥ 23 ॥
समर्थ साक्षीभूत
धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत।
सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥ 24 ॥
दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल।
कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥ 25 ॥
विश्वास
दादू छाजन भोजन सहज में, संइयाँ देइ सो लेइ।
तातैं अधिका और कुछ, सो तूं कांई करेइ ॥ 26 ॥
दादू टूका सहज का, संतोषी जन खाइ।
मृतक भोजन, गुरुमुखी काहे कलपै जाइ ॥ 27 ॥
दादू भाड़ा देह का, तेता सहज विचार।
जेता हरि बिच अंतरा, तेता सबै निवार ॥ 28 ॥
- 216 -
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद ।
संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥ 29 ॥
परमेश्वर के भाव का, एक कणूँका खाइ ।
दादू जेता पाप था, भ्रम कर्म सब जाइ ॥ 30 ॥
दादू कौण पकावै, कौण पीसै, जहाँ तहाँ सीधा ही दीसै ॥ 31 ॥
दादू जे कुछ खुसी खुदाइ की, होवेगा सोई ।
पच पच कोई जनि मरै, सुन लीज्यो लोई ॥ 32 ॥
दादू छूट खुदाइ कहीं को नांही, फिरिहो पृथ्वी सारी ।
दूजी दहन दूर कर बौरै, साधू शब्द विचारी ॥ 33 ॥
दादू बिना राम कहीं को नांही, फिरिहो देश विदेसा ।
दूजी दहन दूर कर बौरै, सुनि यहु साधु संदेशा ॥ 34 ॥
दादू सिदक सबूरी साच गह, साबित राख यकीन ।
साहिब सौं दिल लाइ रहु, मुरदा ह्वै मसकीन ॥ 35 ॥
दादू अनवांछित टूका खात हैं, मर्महि लागा मन ।
नाम निरंजन लेत हैं, यों निर्मल साधु जन ॥ 36 ॥
अनबांछा आगे पड़े, खिरा विचार रू खाइ ।
दादू फिरै न तोड़ता, तरुवर ताक न जाइ ॥ 37 ॥
अनबांछा आगे पड़े, पीछे लेइ उठाइ ।
दादू के सिर दोष यहु, जे कुछ राम रजाइ ॥ 38 ॥
अनबांछी अजगैब की, रोजी गगन गिरास ।
दादू सत करि लीजिये, सो सांई के पास ॥ 39 ॥
कर्त्ता कसौटी
मीठे का सब मीठा लागै, भावै विष भर देइ ।
दादू कड़वा ना कहै, अमृत कर कर लेइ ॥ 40 ॥
- 217 -
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
विपति भली हरि नाम सौं, काया कसौटी दुख ।
राम बिना किस काम का, दादू संपति सुख ॥ 41 ॥
विश्वास संतोष
दादू एक बेसास बिन, जियरा डावांडोल ।
निकट निधि दुःख पाइये, चिंतामणि अमोल ॥ 42 ॥
दादू बिन बेसासी जीयरा, चंचल नांही ठौर ।
निश्चय निश्चल ना रहे, कछू और की और ॥ 43 ॥
दादू होना था सो है रह्या, स्वर्ग न बांछी धाइ ।
नरक कनै थी ना डरी, हुआ सो होसी आइ ॥ 44 ॥
दादू होना था सो है रह्या, जनि बांछे सुख दुःख ।
सुख मांगे दुख आइसी, पै पीव न बिसारी मुख ॥ 45 ॥
दादू होना था सो है रह्या, जे कुछ किया पीव ।
पल बधै न छिन घटै, ऐसी जानी जीव ॥ 46 ॥
दादू होना था सो है रह्या, और न होवै आइ ।
लेना था सो ले रह्या, और न लिया जाइ ॥ 47 ॥
ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।
साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥ 48 ॥
पतिव्रता निष्काम
ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ ।
दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥ 49 ॥
ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात ।
दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥ 50 ॥
दादू करणहार जे कुछ किया, सो बुरा न कहना जाइ ।
सोई सेवक संत जन, रहबा राम रजाइ ॥ 51 ॥
- 218 -
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19
विश्वास-संतोष
दादू कर्त्ता हम नहीं, कर्त्ता औरै कोइ।
कर्त्ता है सो करेगा, तूं जनि कर्त्ता होइ ॥ 52 ॥
हरि भरोसा
काशी तज मगहर गया, कबीर भरोसे राम।
सैंदेही सांई मिल्या, दादू पूरे काम ॥ 53 ॥
दादू रोजी राम है, राजिक रिजक हमार।
दादू उस प्रसाद सौं, पोष्या सब परिवार ॥ 54 ॥
पंच संतोषे एक सौं, मन मतिवाला मांहि।
दादू भागी भूख सब, दूजा भावै नांहि ॥ 55 ॥
दादू साहिब मेरे कापड़े, साहिब मेरा खाण।
साहिब सिर का ताज है, साहिब पिंड प्राण ॥ 56 ॥
विनती
सांई सत संतोष दे, भाव भक्ति विश्वास।
सिदक सबूरी साँच दे, माँगे दादू दास ॥ 57 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
उन्नीसवां विश्वास का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 19 ॥ साखी 57 ॥
- 219 -
पीव पहिचान
का
अंग
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अथ पीव पहिचान का अंग २०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
सारों के सिर देखिये, उस पर कोई नांहि ।
दादू ज्ञान विचार कर, सो राख्या मन मांहि ।। 2 ।।
सब लालों सिर लाल है, सब खूबों सिर खूब ।
सब पाकों सिर पाक है, दादू का महबूब ।। 3 ।।
परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वंदनम् ।। 4 ।।
- 220 -
श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20
ना वह जामै ना मरै, ना आवै गर्भवास ।
दादू ऊंधे मुख नहीं, नरक कुंड दस मास ॥ 17 ॥
कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ ।
पूरण निश्चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥ 18 ॥
उपजै विनशै गुण धरै, यहु माया का रूप ।
दादू देखत थिर नहीं, क्षण छांहीं क्षण धूप ॥ 19 ॥
जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि ।
अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥ 20 ॥
शिष्य जिज्ञासा
जे यहु कर्ता जीव था, संकट क्यों आया ?
कर्मों के वश क्यों भया, क्यों आप बंधाया ? 21 ॥
उत्तर जीव लक्षण
दादू कृत्रिम काल वश, बंध्या गुण मांही ।
उपजै विनशै देखतां, यहु कर्त्ता नांही ॥ 22 ॥
जाती नूर अल्लाह का, सिफाती अरवाह ।
सिफाती सिजदा करै, जाती बेपरवाह ॥ 23 ॥
खंड खंड निज ना भया, इकलस एकै नूर ।
ज्यों था त्यों ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 24 ॥
परम तेज प्रकाश है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 25 ॥
परम तेज परापरं, परम ज्योति परमेश्वरं ।
स्वयं ब्रह्म सदई सदा, दादू अविचल स्थिरं ॥ 26 ॥
अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि ।
जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥ 27 ॥
सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार ।
दादू विनशै देखतां, झूठा सब आकार ॥ 28 ॥
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