सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ।
दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ 342 ॥
परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग।
काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ 343 ॥
परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 344 ॥
परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार।
दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ 345 ॥
अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ।
काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ 346 ॥
सजीवन
दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ।
जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ 347 ॥
मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास।
पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 348 ॥
तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल।
दादू माखण ह्रै गया, काहू का स्थूल ॥ 349 ॥
दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि।
मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ 350 ॥
दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक।
राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ 351 ॥
दादू झूठा जीव है, गढ़िया गोविन्द बैन।
मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ 352 ॥
सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार।
दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 353 ॥
- 102 -
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
चतुर्थो परिचय का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 4 ॥ साखी 353 ॥
दादूराम
राम
सत्यराम
- 103 -
जरणा का अंग
www.dadooram.org
अथ जरणा का अंग ५
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
जरणा का स्वरूप
को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।
गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ।। 2 ।।
जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।
रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ।। 3 ।।
दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ।। 4 ।।
- 104 -
श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5
दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ।
दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ 5 ॥
कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने।
दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ 6 ॥
दादू मन हीं मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ 7 ॥
जरणा करने की विधि
लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ।
कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ 8 ॥
सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ।
कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ 9 ॥
सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया।
दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ 10 ॥
सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा।
दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ 11 ॥
सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला।
दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ 12 ॥
सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास।
दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ 13 ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै।
दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ 14 ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ।
दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ 15 ॥
अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै।
दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ 16 ॥
- 105 -
श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5
अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि।
दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ 17 ॥
साधु महिमा
जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ 18 ॥
जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ 19 ॥
जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै।
दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ 20 ॥
जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत।
दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ 21 ॥
जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव।
जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ 22 ॥
जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं।
जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ 23 ॥
जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख।
जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ 24 ॥
जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार।
जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ 25 ॥
जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार।
जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ 26 ॥
जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार।
जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ 27 ॥
दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 28 ॥
- 106 -
श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5
दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।
जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ 29 ॥
दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।
जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ 30 ॥
परमेश्वर की दयालुता
दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण ।
औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ 31 ॥
सतगुरु अगम बात जानने के लिए विनय करते हैं
दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध ?
मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ 32 ॥
धारणा
पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास ।
चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ 33 ॥
चौदह तीनों लोक सब, ढूंगे श्वासै श्वास ।
दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ 34 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पांचवां जरणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 5 ॥ साखी 34 ॥
- 107 -
हैरान का अंग
अथ हैरान का अंग ६
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
रतन एक बहु पारिखू, सब मिल करैं विचार ।
गूं गे गहिले बावरे, दादू वार न पार ॥ 2 ॥
अनेक मतवादी
केते पारिख जौहरी, पंडित ज्ञाता ध्यान ।
जाण्या जाइ न जानिए, का कहि कथिये ज्ञान ॥ 3 ॥
केते पारिख पच मुये, कीमत कही न जाइ ।
दादू सब हैरान हैं, गूँगे का गुड़ खाइ ॥ 4 ॥
- 108 -
श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6
सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ ।
दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 5 ॥
जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई ।
तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥ 6 ॥
केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही ।
दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥ 7 ॥
जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ ।
दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥ 8 ॥
वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि ।
दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥ 9 ॥
पीव पिछान
हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा ।
दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥ 10 ॥
‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ ।’
कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 11 ॥
अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण ।
अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥ 12 ॥
पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि ।
दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 13 ॥
गूं गे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ ।
त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 14 ॥
दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध ।
वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥ 15 ॥
दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार ।
गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥ 16 ॥
- 109 -
श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6
सकल शिरोमणि नाम है, तूं है तैसा नांहि।
दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 17 ॥
दादू केते कह गये, अंत न आवै ओर ।
हमहूँ कहते जात हैं, केते कहसी होर ॥ 18 ॥
दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ, उस बलिये की बात ।
क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥ 19 ॥
दादू केते चल गये, थाके बहुत सुजान।
बातों नाम न नीकले, दादू सब हैरान ॥ 20 ॥
ना कहीं दिट्ठा ना सुण्या, ना कोई आखणहार।
ना कोई उत्थों थी फिऱ्या, ना उर वार न पार ॥ 21 ॥
परमार्थ स्वरूप
नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ।
नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 22 ॥
न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ।
दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥ 23 ॥
एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक।
यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥ 24 ॥
देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान।
वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥ 25 ॥
पतिव्रत निष्काम
दादू करणहार जे कुछ किया, सोई हौं कर जाण।
जे तूं चतुर सयाना जानराइ, तो याही परमाण ॥ 26 ॥
दादू जिन मोहनि बाजी रची, सो तुम्ह पूछो जाइ।
अनेक एक तैं क्यों किये, साहिब कहि समझाइ ॥ 27 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
- 110 -
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छठा हैरान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 6 ॥ साखी 27 ॥
दादूराम
सत्यराम
- 111 -
अथ लै का अंग ७
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
लय का स्वरूप लक्षण
दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ ।
जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥ 2 ॥
दादू जे नर प्राणी लै गता, सोई गत ह्वै जाइ ।
जे नर प्राणी लै रता, सो सहजैं रहै समाइ ॥ 3 ॥
सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ ।
आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥ 4 ॥
- 112 -
श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ ।
जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥
अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई ।
दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥
लै लगाने की विधि
ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ ।
दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥
अगम संस्कार
पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ ।
दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥
अध्यात्म
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥
दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण ।
विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥
सूक्ष्म मार्ग
किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ ।
दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥
शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ ।
चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥
दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार ।
मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥
- 113 -
श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
लय
राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै ।
दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥
राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ।
दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥
रस रंग
सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा।
दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥
अध्यात्म
दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।
तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥
अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ।
जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥
दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।
सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥
सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन ।
लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥
सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥
दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ ।
यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥
दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल ।
यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥
दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर ।
सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥
- 114 -
श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
दादू एक सुरति सौं सब रहें, पंचों उनमनि लाग।
यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥ 27 ॥
दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग।
अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहबा संग ॥ 28 ॥
सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन।
सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥ 29 ॥
सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग।
दादू पीवैं राम रस, रहें निरंजन लाग ॥ 30 ॥
सूक्ष्म सौंज
दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ।
जहाँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाइ ॥ 31 ॥
विनती
दादू ज्यों वै बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवै राम ॥ 32 ॥
अध्यात्म
सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण।
गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥ 33 ॥
लय
परआतम सो आत्मा, ज्यों जल उदक समान।
तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावै पद निर्वाण ॥ 34 ॥
मन ही सौं मन सेविये, ज्यों जल जलहि समाइ।
आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 35 ॥
छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ।
दादू ऐसे मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 36 ॥
यों मन तजै शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ।
दादू बिसरै देखतां, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥ 37 ॥
- 115 -
श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ ।
जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥ 38 ॥
तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ ।
दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 39 ॥
एक मना लागा रहै, अंत मिलेगा सोइ ।
दादू जाके मन बसै, ताको दर्शन होइ ॥ 40 ॥
दादू निबहै त्यौं चलै, धीरे धीरज मांहि ।
परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 41 ॥
लय
जब मन मृतक ह्वै रहै, इन्द्री बल भागा ।
काया के सब गुण तजै, निरंजन लागा ॥ 42 ॥
आदि अंत मधि एक रस, टूटै नहीं धागा ।
दादू ऐकै रह गया, तब जाणी जागा ॥ 43 ॥
जब लग सेवग तन धरै, तब लग दूसर आहि ।
एकमेक ह्वै मिलि रहै, तो रस पीवन तैं जाइ ॥ 44 ॥
ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।
ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 45 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सातवां लै का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 7 ॥ साखी 45 ॥
- 116 -
निष्कर्म पतिव्रता
का अंग
www.dadooram.org
अथ निष्कर्मी पतिव्रता का अंग ८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
एक तुम्हारे आसरे, दादू इहि विश्वास ।
राम भरोसा तोर है, नहिं करणी की आस ।। 2 ।।
रहणी राजस ऊपजै, करणी आपा होइ ।
सबथैं दादू निर्मला, सुमिरण लागा सोइ ।। 3 ।।
दादू मन अपना लै लीन कर, करणी सब जंजाल ।
साधू सहजैं निर्मला, आपा मेट संभाल ।। 4 ।।
- 117 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
दादू सिद्धि हमारे सांइयां, करामात करतार ।
ऋद्धि हमारे राम है, आगम अलख अपार ॥ 5 ॥
गोविन्द गोसांई तुम्हीं आमचे गुरु, तुम्हे अमचां ज्ञान ।
तुम्हे अमचे देव, तुम्हे अमचा ध्यान ॥ 6 ॥
तुम्हीं आमची पूजा, तुम्हीं आमची पाती ।
तुम्हीं आमचा तीर्थ, तुम्हीं आमची जाती ॥ 7 ॥
तुम्हीं आमचा नाद, तुम्हीं आमचा भेद ।
तुम्हीं आमचा पुराण, तुम्हीं आमचा वेद ॥ 8 ॥
तुम्हीं आमची युक्ति, तुम्हीं आमचा योग ।
तुम्हीं आमचा वैराग्य, तुम्हीं आमचा भोग ॥ 9 ॥
तुम्हीं आमची जीवनी, तुम्हीं आमचा जप ।
तुम्हीं आमचा साधन, तुम्हीं आमचा तप ॥ 10 ॥
तुम्हीं आमचा शील, तुम्हीं आमचा संतोष ।
तुम्हीं आमची मुक्ति, तुम्हीं आमचा मोक्ष ॥ 11 ॥
तुम्हीं आमचा शिव, तुम्हीं आमची शक्ति।
तुम्हीं आमचा आगम, तुम्हीं आमची उक्ति ॥ 12 ॥
तूं सत्य तूं अविगत तूं अपरंपार, तूं निराकार तुम्हचा नाम ।
दादू चा विश्राम, देहु देहु अवलम्बन राम ॥ 13 ॥
दादू राम कहूँ ते जोड़बा, राम कहूँ ते साखि ।
राम कहूँ ते गाइबा, राम कहूँ ते राखि ॥ 14 ॥
दादू कुल हमारे केशवा, सगा तो सिरजनहार ।
जाति हमारी जगद्गुरू, परमेश्वर परिवार ॥ 15 ॥
दादू एक सगा संसार में, जिन हम सिरजे सोइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, और न दूजा कोइ ॥ 16 ॥
- 118 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
स्मरण नाम निःसंशय
सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ ।
दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ 17 ॥
पतिव्रत
साहिब मिल्या तो सब मिले, भेंटे भँटा होइ ।
साहिब रह्या तो सब रहे, नहीं तो नाहीं कोइ ॥ 18 ॥
दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन।
मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥ 19 ॥
दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और।
कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ 20 ॥
दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ।
हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥ 21 ॥
दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ।
गहिला लोग न जाणही, पच पच आपा खोइ ॥ 22 ॥
दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर।
दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ 23 ॥
निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ।
दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ 24 ॥
साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ।
दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ 25 ॥
मन चित मनसा पलक मैं, सांई दूर न होइ।
निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥ 26 ॥
कथनी बिना करणी
जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज।
निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥ 27 ॥
- 119 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
सुन्दरी विलाप
जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार।
दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥
दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव।
सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥
यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ।
दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥
पतिव्रता निष्काम
साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि।
मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥
आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ।
आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥
आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ।
आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥
पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव।
ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥
सुन्दरी विलाप
दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ।
सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥
दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार।
सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥
पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि।
अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥
आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार।
हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥
- 120 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ।
दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥
सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान।
जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥
दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै।
सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥
साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै।
दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥
पतिव्रत
दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक।
ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव।
अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ।
साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम।
सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥
नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ।
दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥
आन लग्न व्यभिचार
पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ।
जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥
दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ।
ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥
- 121 -