सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6
सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ ।
दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 5 ॥
जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई ।
तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥ 6 ॥
केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही ।
दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥ 7 ॥
जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ ।
दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥ 8 ॥
वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि ।
दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥ 9 ॥
पीव पिछान
हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा ।
दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥ 10 ॥
‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ ।’
कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 11 ॥
अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण ।
अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥ 12 ॥
पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि ।
दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 13 ॥
गूं गे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ ।
त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 14 ॥
दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध ।
वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥ 15 ॥
दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार ।
गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥ 16 ॥
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