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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 504 में से

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पृष्ठ 105

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5
दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ।
दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ 5 ॥
कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने।
दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ 6 ॥
दादू मन हीं मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ 7 ॥
जरणा करने की विधि
लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ।
कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ 8 ॥
सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ।
कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ 9 ॥
सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया।
दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ 10 ॥
सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा।
दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ 11 ॥
सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला।
दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ 12 ॥
सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास।
दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ 13 ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै।
दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ 14 ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ।
दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ 15 ॥
अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै।
दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ 16 ॥

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