अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
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126 चन्द्रशेखर आजाद
थे। साण्डर्स वध के समय जब आजाद ने मुझे लाहौर बुलाया, तो मुझे
यह देखकर विस्मय हुआ कि आजाद पर भगतसिंह का जादू चल गया।
और 'पण्डितजी' अब कच्चा अण्डा सीधा मुंह पर तोड़कर ही गटक रहे
हैं। मैंने हैरानी से पूछा, "पण्डितजी! यह क्या?" आजाद बोले, "अण्डे
में कोई हर्ज नहीं है। वैज्ञानिकों ने उसे फल जैसा ही बताया है।" यह तर्क
भगतसिंह का ही था, जिसे आजाद दोहरा रहे थे। मैंने बड़ी गम्भीरता
से कहा—"बिल्कुल ठीक पण्डितजी! अण्डा फल है; तो मुर्गी पेड़ के
सिवा कुछ नहीं हो सकती। मैं भला कब उसे छोड़ूँगा?" भगतसिंह खिल-
खिलाकर हंस पड़े—"वास्तव में कैलाश तुम अच्छे तर्कशास्त्री हो सकते
हो। भला पण्डितजी! देखिये····।" आजाद बीच में ही बिगड़कर बोले—
"चल बे, एक तो हमें अण्डा खिला रहा है, और ऊपर से बातें बना रहा
है····।"
• एक बार भगतसिंह ने आजाद से कहा था
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128 चन्द्रशेखर आजाद
सिनेमा देखते पकड़ा जाएगा और अकाल मारा जाएगा। इसके उत्तर
में भगतसिंह ने कहा कि उसे (आजाद को) मारना भी पुलिस के लिए
आसान नहीं होगा, क्योकि इतनी मोटी गर्दन को फाँसी पर लटकाने के
लिए पुलिस को रस्सा भी नहीं मिल पायेगा। एक रस्से से काम भी
नहीं चलेगा; दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी—एक गले के लिए; एक पेट के
लिए। इस पर आजाद ने अपने पिस्तौल पर हाथ रखते हुए कहा था,
इसके होते हुए कौन माई का लाल है, जो मुझे गिरफ्तार कर सके।"
• एक बार कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी थी कि क्रान्तिकारी दल
बिखर चुका है, इसलिए उन्हें भागकर रूस चला जाना चाहिए, क्योकि
पकड़े जाने पर उनके लिए फाँसी निश्चित थी। यह सुनकर आजाद ने
कहा था—"रूस-फूस की बातें मेरे साथ मत करो। मेरा शरीर भारत की
मिट्टी से बना है और मैं भारत की आजादी के लिए शत्रु से लड़ते-लड़ते
इसी देश की धरती पर मरकर इसकी धूल में मिल जाऊँगा।"
• एक बार आजाद अपने साथियो—भवानीसिंह, रामचन्द्र, मास्टर
छत्रबिहारीलाल, विश्वम्भर दयाल आदि के साथ लैंसडाउन गए हुए थे
और पहाड़ियो पर उन्हें निशाना लगाने का प्रशिक्षण दे रहे थे। इतने
में साथियों ने उनका (आजाद का) निशाना देखने की इच्छा व्यक्त की
क्योकि उनका निशाना अचूक था। आजाद ने उनकी इच्छा को मान
लिया। साथियो ने किसी पेड़ के एक पत्ते पर निशाना लगाने को कहा।
आजाद ने निशाना लगाया और पाँच गोलियाँ चला दीं, किन्तु पत्ता नहीं
गिरा। साथियों को बड़ी निराशा हुई और उन्होंने समझ लिया कि निशाना
चूक गया। अन्त में पत्ता तोड़ा गया, उसमें पाँचों गोलियों के अलग-
अलग पाँच छिद्र बने हुए थे। यह देखकर उनके साथी उनकी प्रशंसा किए
बिना नहीं रह सके।
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128 चन्द्रशेखर आजाद
सिनेमा देखते पकड़ा जाएगा और अकाल मारा जाएगा। इसके उत्तर
में भगतसिंह ने कहा कि उसे (आजाद को) मारना भी पुलिस के लिए
आसान नहीं होगा, क्योंकि इतनी मोटी गर्दन को फाँसी पर लटकाने के
लिए पुलिस को रस्सा भी नहीं 'मिल पायेगा। एक रस्से से काम भी
नहीं चलेगा; दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी—एक गले के लिए; एक पेट के
लिए। इस पर आजाद ने अपने पिस्तौल पर हाथ रखते हुए कहा था,
इसके होते हुए कौन माई का लाल है, जो मुझे गिरफ्तार कर सके।"
• एक बार कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी थी कि क्रान्तिकारी दल
बिखर चुका है, इसलिए उन्हें भागकर रूस चला जाना चाहिए, क्योंकि
पकड़े जाने पर उनके लिए फाँसी निश्चित थी। यह सुनकर आजाद
कहा था—"रूस-फूस की बातें मेरे साथ मत करो। मेरा शरीर भारत क
मिट्टी से बना है और मैं वतन की आजादी के लिए शत्रु से लड़ते-लड़ते
इसी देश की धरती पर मरकर इसकी धूल में मिल जाऊँगा।"
• एक बार आजाद अपने साथियों—भवानीसिंह, रामचन्द्र, मास्टर
छैलविहारीलाल, विश्वम्भर दयाल आदि के साथ लेंसडाउन गए हुए थे
और पहाड़ियों पर उन्हें निशाना लगाने का प्रशिक्षण दे रहे थे। इनमें
से साथियों ने उनका (आजाद का) निशाना देखने की इच्छा व्यक्त की,
क्योंकि उनका निशाना अचूक था। आजाद ने उनकी इच्छा को मान
लिया। साथियों ने किसी पेड़ के एक पत्ते पर निशाना लगाने को कहा।
आजाद ने निशाना लगाया और पाँच गोलियाँ चला दीं, किन्तु पत्ता नहीं
गिरा। साथियों को बड़ी निराशा हुई और उन्होंने समझ लिया कि निशाना
चूक गया। अन्त में पत्ता तोड़ा गया; उसमें पाँचों गोलियों की अलग-
अलग पाँच छिद्र बने हुए थे। यह देखकर उनके साथी उनकी प्रशंसा किए
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130 चन्द्रशेखर आजाद
शिक्षा देने के लिए किसी पाठशाला में भेजने में भी असमर्थ थे। दल के
सन्दर्भ में उनकी इसी निर्धन पारिवारिक स्थिति का वर्णन करते हुए
भगवानदास ने लिखा है—
"आजाद के साथियो यानी उनके नेतृत्व में काम करने वालो में शायद
ही किसी को उनसे कम स्कूली शिक्षा मिली होगी। शायद ही कोई उनसे
अधिक गरीबी की हालत में उत्पन्न हुआ होगा। उनके साथ उनके पिता,
भाई या किसी अन्य सम्बन्धी की देशभक्ति, त्याग, तपस्या, वीरता या
अन्य किसी प्रकार के बड़प्पन की छाया भी नही लगी हुई थी।"
इसी विषय में श्री मन्मथनाथ गुप्त ने भी लिखा है—
"इनके पिता पं० सीताराम बहुत मामूली नौकरी करते थे, इसलिए
अंग्रेजी पढ़ने का कोई प्रश्न ही नहीं उठा। आजाद संस्कृत पढ़ने के लिए
काशी भेजे गए... ब्राह्मण विद्यार्थी थे इस कारण खाने-पीने तथा रहने
की मामूली व्यवस्था हो गई। काशी में धार्मिक लोगों की ओर से संस्कृत
छात्रों के लिए छात्र निवास तथा क्षेत्र खुले हुए थे। कभी-कभी लोटा-
कम्बल ऐसी चीजें भी बँटती रहती थीं। कभी-कभी कुछ दक्षिणा भी
मिलती थी।"
इन विद्वानों की उपर्युक्त पंक्तियों से आजाद के परिवार की तथा उन
परिस्थितियों की, जिनका सामना उन्हें अपने बाल्यकाल में तथा अध्ययन
के दिनों में करना पड़ा था, स्पष्ट अभिव्यक्ति हो जाती है। किन्तु आजाद
ने सिद्ध कर दिखाया कि इस प्रकार की स्कूली शिक्षा ही सब कुछ नहीं
है। व्यक्ति की पारिवारिक स्थिति चाहे कितनी ही दयनीय क्यों न हो
और चाहे उसे वर्षों की शिक्षा न मिली हो, इससे उसकी अपनी जन्मजात
योग्यता छिपी नहीं रह सकती। इनके न होने पर भी व्यक्ति अपनी
योग्यता के बल पर उन्नति के चरम शिखर पर पहुँच सकता है, एक
आदर्श प्रस्तुत कर सकता है, जिसके आगे बड़े-बड़े धनवानों एवं सुशिक्षितों
को नतमस्तक हो जाना पड़ता है। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए श्री
मन्मथनाथ गुप्त ने आजाद के विषय में लिखा है—
• "अवश्य चन्द्रशेखर आजाद कम पढ़े-लिखे, केवल स्थूल साहित्य के
दृष्टि से ही थे, पर उनके पढ़े हुए पुस्तकों का सार ग्रहण करने..."
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132 चन्द्रशेखर आज़ाद
सामने श्रद्धा से झुक जाते थे। आज़ाद वास्तव में घूरती के लाल थे, ऐसे
लाल, जिन्होंने अपने आलोक से दुनिया को एक नया प्रकाश दिखाया।
चरित्र-बल के प्रतीक
आज़ाद एक सच्चे देशभक्त थे। उनके लिए मातृभूमि की स्वतन्त्रता
ही एकमात्र लक्ष्य बन गई थी। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
उन्होंने जीवन के सभी सुखों एवं भोगों का परित्याग कर दिया था। वह
संस्कृत के विद्यार्थी रह चुके थे, फलतः उन्होंने गीता का भी अध्ययन किया
होगा। इसलिए उन्होंने कदाचित् गीता से यह शिक्षा ग्रहण की थी कि
'विषय-वासनाओं के ध्यान से आसक्ति, आसक्ति से काम, काम से क्रोध,
क्रोध से अज्ञान, अज्ञान से स्मृति विभ्रम, स्मृति विभ्रम से बुद्धिनाश तथा
बुद्धिनाश से सर्वथापतन निश्चित होता है', अर्थात् किसी भी लक्ष्य को
प्राप्त करने के लिए विषयों से दूर रहना नितान्त आवश्यक है। इसीलिए
आज़ाद के जीवन में एक प्रशंसनीय चरित्रबल के दर्शन होते हैं। उनका चरित्र
एक आदर्श है। वह प्रत्येक स्त्री में अपनी माँ के दर्शन करते थे। इस विषय
में उनके दल के कुछ अन्य सहयोगियों के विचार उनसे कुछ भिन्न थे।
कुछ साथी स्त्रियों के प्रेम के चक्कर में दल को हानि पहुँचा चुके थे। इस-
लिए आज़ाद अपने साथियों को इन सब से दूर ही रहने की सलाह देते
थे। उनकी इस आदर्श सच्चरित्रता के विषय में श्री धीरेन्द्र ने लिखा है—
"चन्द्रशेखर आज़ाद के जीवन का सबसे उजागर पक्ष था महिलाओं के
विषय में उनका रवैया। वह सदा उनसे दूर रहते थे। उनका अपना शरीर
बहुत सुन्दर था। निरन्तर कड़े परिश्रम एवं व्यायाम करके उन्होंने उसे
ढाला था। इसलिए एक दो बार कुछ ऐसी घटनाएँ भी हो गईं कि
सौन्दर्य प्रेमियों ने उन्हें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया। किन्तु
वह स्पष्ट यही कहा करते थे कि एक क्रान्तिकारी एक ही समय में दो
चीज़ों से प्रेम नहीं कर सकता। वह अपने देश से प्रेम करे या किसी सुन्दरी
से। देश से प्रेम करना है तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना पड़ेगा।
इनके दिलों दुर्बलताओं के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं है।..."
कई साथी स्त्री देख कर शिकार हो जाते थे। उनके कारण दल
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136 चन्द्रशेखर आजाद
कि वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहे तथा सच्चरित्रता एवं नारी-सम्मान
के वह प्रवल समर्थक थे। आजाद में हुए इन परिवर्तनों का उल्लेख श्री
भगवानदास ने निम्नलिखित शब्दों में किया है—
"हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मध्यभारत की एक छोटी-सी
रियासत अलीराजपुर के एक गाँव में एक कट्टर ब्राह्मण के घर आजाद
का जन्म हुआ था, जिसे यदि जात-पाँति, छुआछूत और नारी के प्रति
तेरहवीं सदी की मनोवृत्ति वाला कहा जाए, तो अनुचित नहीं होगा और
फिर इस वातावरण से प्रगति करते-करते वह बीसवीं सदी के तृतीय दशक
के भारतीय क्रान्तिकारियों की अग्र पंक्ति के नेता बने। दस-बारह वर्ष
की आयु में कट्टर ब्राह्मण के रूप में संस्कृत पढ़ने के लिए घर से भागक
काशी पहुँचे। वह राष्ट्रीय लहर में रमे, सत्याग्रह किया, बेंतों की सजा
पाई और क्रान्तिकारियों में शामिल हुए। अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल
के नेतृत्व में उनके विचारों में आर्यसमाजीपन आया और छुआछूत, मूर्ति
पूजा आदि को वह निगार समझने लगे। बाद में भगतसिंह आदि के
संसर्ग से धीरे-धीरे उन्होंने समाजवादोन्मुख धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया
और भारतीय समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनानी हुए। निश्चय
ही एक कट्टर ब्राह्मणवादी बालक से अग्रपंक्ति के क्रान्तिकारी प्रगतिशील
नौजवान नेता के विकास की प्रगति के अनेक स्तर बहुत थोड़े समय में
आजाद ने पार किए। स्त्रियों के सम्बन्ध में आजाद अपने व्यक्तिगत जीवन
में तो सदा एक मँस्टिक ब्रह्मचारी ही रहे। पहले वह दल में स्त्रियों के प्रवेश
के विरुद्ध ही थे और इसलिए वे कि उनके नेतृत्व के पूर्व यही परम्परा
थी, परन्तु बाद में उनके ही नेतृत्व में स्त्रियों ने दल में काम किया और
खूब अच्छी तरह किया। "नारी नरक की खान" वाली मनोवृत्ति से नारी
को एक सक्रिय क्रान्तिकारिणी, समान सहयोगिनी के रूप में मानने के बीच
की सभी मनोदशाएँ आजाद में समय-समय पर रही होंगी, यह स्पष्ट है।
अन्तिम दिनों में आजाद बड़े उत्साह से दल की सभी स्त्री सदस्यों को
गोली चलाना, निशाना मारना आदि सिखाते थे। दल से सहानुभूति
रखने वाले व्यक्तियों के घर की स्त्रियों को भी वह इसके लिए उत्साहित
करते थे। तथा क्रान्तिकारी कार्यों में अपने पति का सक्रिय सहयोग करने
चन्द्रशेखर आजाद
के लिए उन्हें बार-बार तरह-तरह की प्रेरणा देते थे।—स्त्रियों से उनका
व्यवहार बड़ा सरल और आत्मीयतापूर्ण होता था। यह सब होते हुए भी
इस बात के घोर शत्रु थे कि कोई दल का सदस्य स्त्रियों के प्रति अनुचित
रूप में आकृष्ट हो, किसी प्रकार की यौन कमजोरी तो उनके लिए असह्य
थी। परन्तु पति-पत्नी दोनों क्रान्तिकारी कार्यों में लगें, इससे अधिक
अभीष्ट बात उनके लिए और कोई नहीं थी।"
यही नहीं भगतसिंह के प्रगतिशील विचारों से प्रभावित होकर उनके
खान-पान में भी परिवर्तन आ गया था। पारिवारिक संस्कारों से विशुद्ध
शाकाहारी ब्राह्मण होने पर भी अब वह अण्डे का सेवन करने लगे थे। इस
विषय में भी श्री भगवानदास ने उनके जीवन की एक घटना का उल्लेख
करते हुए लिखा है—
"खान-पान के सम्बन्ध में भी आजाद अपने व्यक्तिगत संस्कारों से
एक शाकाहारी ब्राह्मण ही थे। उनका छुआछूत का भूत पण्डित रामप्रसाद
'बिस्मिल' के नेतृत्व में काम करने के समय ही उतर गया था। एच० एस०
आर० ए० नेता के रूप में वह मांस आदि खाने के विरुद्ध तर्क विशेष नहीं
करते थे, मगर वह उन्हें अच्छा नहीं लगता था। शिकार वह खूब खेलते
थे, मगर स्वयं मांस नहीं खाते थे। राजा साहब नजिदाबाद के यहाँ मैं
तो शिकार भी करता था, और मुसलमानों का मांस भी खाता था, इस पर
वह मुझसे कुछ नाराज भी हुए थे। भगतसिंह उन्हें श्रमियों और क्षत्रियों
जैसे काम करने वालों के लिए मांस खाने की अभीष्टता, उपयोगिता और
नीतिमत्ता पर लेक्चर झाड़कर अक्सर चिढ़ाया करते थे। साण्डर्स वध के
समय जब आजाद ने मुझे लाहौर बुलाया तो मुझे यह देखकर विस्मय
हुआ कि आजाद पर भगतसिंह का जादू चल गया और पण्डितजी अध-
कच्चा अण्डा सीधा मुंह पर फोड़कर ही गटक रहे हैं। मैंने हैरानी से
पूछा—'प
138 चन्द्रशेखर आजाद
थे, फिर आर्यसमाज से प्रभावित हुए और अन्त में वह समाजवाद की ओर
उन्मुख हुए। उन्होंने पारिवारिक तथा वातावरण से प्राप्त रूढ़ियों से
सम्बन्ध विच्छेद कर लिया, जो उनकी निरन्तर प्रगतिशीलता का सूचक है,
किन्तु उनकी यह प्रगतिशीलता सर्जनात्मक थी। प्रगतिशीलता के नाम
पर पश्चिम का अन्धानुकरण उन्होंने कभी नहीं किया; उच्चचरित्यता एवं
संस्कृति के अन्य उज्ज्वल पक्षों को उन्होंने अपने से कभी भिन्न नहीं होने
दिया। उनके जीवन की विभिन्न घटनाएं इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। उनकी
यह प्रगतिशीलता भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों को भी अपने साथ
लेकर चली थी। इस प्रकार वह सामयिक अपेक्षाओं के अनुरूप कल्याण-
कारी प्रगतिशीलता के समर्थक थे। उनके जीवन में उदार परम्पराओं तथा
देशहित के अनुरूप प्रगतिशीलता का एक अद्भुत समन्वय परिलक्षित होता
है।
आदर्श नेतृत्व :
अपना क्रान्तिकारी जीवन आजाद ने श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
नेतृत्व में प्रारम्भ किया था। काकोरी काण्ड के बाद यह क्रान्तिकारी दल
छिन्न-भिन्न हो गया था। उन्होंने नए सिरे से क्रान्तिकारी दल का संगठन
करने का प्रयत्न किया और संयोग से उन्हें राजगुरु, भगतसिंह आदि जैसे
साथी मिले। सबने मिलकर 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना'
बनाई। सभी साथी आजाद की योग्यता से प्रभावित थे, अतः उन्हें ही इस
नये दल का नेता—कमाण्डर-इन-चीफ—बनाया गया। दल के नेता के रूप
में उनका उत्तरदायित्व और भी बढ़ गया। इस पद की गरिमा को आजाद
ने बनाए रखा।
सर्वप्रथम दल के नेता को स्वयं को अनुशासित रखना पड़ता है। इसी
तथ्य को दृष्टि में रखकर आजाद ने अपने आचरण एवं अनुशासन को ऐसा
बनाए रखा, जिसके माध्यम से उन्होंने दल के सदस्यों के लिए एक आदर्श
प्रस्तुत किया। वह दल की छोटी-छोटी बातों पर भी बड़ी सावधानी से
ध्यान देते, क्योंकि इन छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने पर आगे वाले
समय में भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है
चन्द्रशेखर आजाद 139
नेता थे, अतः दल के सारे पैसों को अपने पास रखते थे, ताकि उनका अप-
व्यय न हो। वैसे ही दल के पास सदा पैसे की कमी बनी रहती थी। अतः
आजाद एक-एक पैसे को बहुत सोच-समझकर खर्च करते थे। इस विषय
में वीरेन्द्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं—
"अपने खर्चों के विषय में भी आजाद बहुत सचेत थे। उनका दृष्टि-
कोण यह था कि जो भी रुपया मिलता है, वह लोग उन्हें इसलिए देते हैं
कि यह क्रान्तिकारी युवक अपना सारा समय देश के लिए लगाते हैं और
कोई काम नहीं कर सकते। इसलिए उनके गुजारे के लिए इधर-उधर से
रुपया मिल जाता है। यह किसी प्रकार की फिजूलखर्ची पर नहीं लगाना
चाहिए। चूँकि आजाद पार्टी के नेता थे। अतः रुपया भी वह अपने पास
ही रखते थे। स्वयं ही अपने साथियों में बाँटते थे। आज के हालात तो
कुछ और हैं। कोई जमाना था, विशेषतः जिन दिनों लाहौर में साण्डर्स की
हत्या हुई थी या विधान सभा में बम फेंका गया था, उन दिनों आजाद हर
साथी को चार आने प्रतिदिन दिया करते थे। किन्तु उनके कुछ साथी ऐसे
भी थे यशपालसिंह जैसे, जिन्हें सिनेमा देखने का शौक था। वह आजाद से
पैसे माँगते तो आजाद उन्हें साफ इन्कार कर देते। कह देते जो कुछ रुपया
तुम्हें देते हैं इसे तुम्हें अपने खून से वापस करना होगा। सिनेमा की
बर्बादी एक क्रान्तिकारी के लिए उचित नहीं है।
एक नेता के लिए इस प्रकार का आदर्श दलीय अनुशासन आवश्यक
भी है। इसलिए वह सदा अपने मित्र साथियों को सुरा, सुन्दरी एवं धूम्र-
पान से दूर रहने की सलाह देते थे। और स्वयं इन सबसे पूर्णतया दूर
रहते थे।
यह सच है कि आजाद एक निर्धन परिवार में उत्पन्न हुए थे और
उन्होंने कोई समुचित शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी, किन्तु उनमें नेतृत्व की
एक जन्मजात प्रतिभा थी। उनके इसी गुण के कारण उनके दल में कभी
उनके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई गई तथा दल आदर्श रूप से निरन्तर
कार्य करता रहा। उनके इस कुशल नेतृत्व की प्रशंसा तथा उनके दृढ़ व्यक्तित्व
पर प्रकाश डालते हुए इस दल के सदस्य रह चुके श्री सत्यभक्त ने
लिखा है—
140 चन्द्रशेखर आजाद
"आजाद के साथियों यानी उनके नेतृत्व में काम करने वालों में शायद
ही किसी को उनसे कम स्कूली शिक्षा मिली होगी। शायद ही कोई उनसे
अधिक गरीबी की हालत में उत्पन्न हुआ होगा। उनके साथ उनके पिता,
भाई या अन्य किसी सम्बन्धी की देशभक्ति, त्याग और तपस्या या अन्य
किसी प्रकार के बड़प्पन की छाया भी नहीं लगी हुई थी। अमर शहीद
भगतसिंह आदि अपने साथियों में उन्होंने नेता का पद पुस्तकीय ज्ञान पर
आधारित थोथे बड़प्पन पर ही नहीं, व्यावहारिक सूझ-बूझ, अदम्य साहस
और सर्वोपरि अपने साथियों की सुख-सुविधा की हार्दिक स्नेहपूर्ण चिन्ता
रखकर और गाढ़े समय में कुशल नेतृत्व प्रदान करके ही पाया। अपने
साथियों और सम्पर्क में आने वालों के जीवन में केवल एक राजनीतिक
मुख्य के रूप में ही नहीं, एक व्यक्तिगत भावमुख्य के रूप में घर कर लेने
के अपने गुण विशेष में ही आजाद की सफलता निहित थी। उनके अकृत्रिम
स्नेहपूर्ण व्यक्तिगत व्यवहार ने ही उन्हें साथियों का प्रिय नेता बना दिया
और उनके हृदय में अपने लिए ऐसा विश्वास उत्पन्न कर दिया कि वे
उनके संकेत मात्र पर प्राण देने के लिए तैयार रहा करते थे। दल में
आजाद के नेतृत्व को स्वीकार करने के सम्बन्ध में कभी कोई झंझट या
झगड़ा नहीं हुआ। यह बात आजाद की प्रशंसा की तो है ही साथ ही उन
साथियों की सच्चाई, लगन, निरभिमानता को भी यह भली-भाँति व्यक्त
करती है, जो विद्या, बुद्धि, त्याग और बलिदान कर सकने की अपनी
तत्परता में किसी प्रकार भी कम न थे।"
वस्तुतः आजाद के ही कुशल नेतृत्व का यह परिणाम था कि दल के
अन्य सभी सदस्य उनसे अधिक शिक्षित एवं अपने घरों से अच्छी आर्थिक
स्थिति वाले होने पर भी दल में एकता के सूत्र में बँधे हुए थे।
वन में शेर का कोई भी संस्कार या राज्याभिषेक नहीं किया जाता
फिर भी वह अपने स्वयं के विक्रम से वन का राजा बन जाता है और
मृगेन्द्र कहा जाता है, इसी प्रकार पारिवारिक अथवा अन्य किसी प्रकार
की पृष्ठभूमि न होने पर आजाद अपनी योग्यता के बल पर क्रान्तिकारियों
के दल के नेता बने और क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में उन्होंने एक
सर्वथा नवीन अध्याय की रचना की।
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142 चन्द्रशेखर आजाद
को जब वह माँ से मिलने गए थे और सोए हुए थे, तो पुलिस पहुँच गई
थी। इस बार पुलिस का सामना गोलियों से किया गया। गोलियाँ समाप्त
हो जाने पर वह अपने मित्र के साथ छत पर चले गए और छत पर रखी
ईंटों से पुलिस की गोलियों का सामना करने लगे। उनका साथी मारा
गया, किन्तु आजाद स्वयं एक से दूसरी छत पर कूदते हुए पुलिस के चक्र-
व्यूह से बाहर निकल गए।
काकोरी काण्ड के बाद उनके विरुद्ध प्रमाण जुटाने के लिए एक पुलिस
अधिकारी विशेष रूप से लगाया गया था। वह सदा उनका पीछा किया
करता था। आजाद उनसे तंग आ गए। तब एक दिन वह किसी बात की
परवाह किए बिना सीधे उसके पास जा धमके और उसके सीने से रिवाल्वर
सटा दिया। उनके इस साहस को देखकर पुलिस अधिकारी के हाथों के
तोते उड़ गए, उसने फिर उनका पीछा न करने की कसम खाई और तब
आजाद ने उसे छोड़ दिया।
कई बार वह भेष बदलकर पुलिस एवं गुप्तचरों के जाल से निकले।
भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल से छुड़ाने की योजना भी
उन्होंने बनाई थी, जो दुर्भाग्य से सफल न हो सकी और 1929 में
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयत्न किया था, जो सफल न हो
सका।
समग्र प्रकार आजाद का इन जीवन ही साहसिक कार्यों से भरा हुआ
था और अन्त में साहस के साथ पुलिस का सामना करते हुए वीरगति को
प्राप्त हुए। उनमें साहस की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वस्तुतः
वह सचमुच आजाद थे, मृत्यु का भय तो उन्हें छू भी नहीं गया था। वह
सदा मृत्यु का सामना करने को तत्पर रहते थे। उनका यही कहना था कि
बंदूक की गोलियों का सामना करने को तैयार रहते थे, वह आजाद थे,
आजादी न रहने पर विकल्प में मृत्यु ही उन्हें अभीष्ट थी। उनके इस
अदम्य साहस की ओर संकेत करते हुए मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"...सोलह सत्रह वर्षों से साम्राज्यप्रसाद सबक युद्ध, अजीब-अजीब
परिस्थितियों में भी, कहना चाहिए बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थितियों में—
करते जा रहे थे। इस आठ वर्षों से उन्होंने क्रान्ति का कार्य अपना रक्त