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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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144 चन्द्रशेखर आजाद
ध्यान रखना।"
इन मर्मस्पर्शी शब्दों में आजाद का एक नया रूप—एक भावुक मित्र
का रूप—हमारे सामने आता है। वास्तव में दुनियादारी का निर्वाह करने
के लिए महान आत्माएँ चाहे बाहर से वज्र के समान कठोर क्यों न लगें,
किन्तु उनका हृदय फूल से भी कोमल होता है। यही उक्ति हमारे चरित्र-
नायक चन्द्रशेखर आजाद पर भी चरितार्थ होती है।
उनके मित्र-प्रेम की एक ऐसी ही घटना का उल्लेख श्री वीरेन्द्र ने
किया है। यह घटना असेम्बली में बम विस्फोट के एक-दो दिन बाद की
है। इसके बाद समाचार-पत्रों में भगतसिंह का चित्र छपा था, जिसे देख-
कर आजाद का मित्र-प्रेम आँखों से बह निकला था। श्री वीरेन्द्र के ही
शब्दों में—
"भगतसिंह के लिए आजाद के मन में कितना प्रेम था इसका अनुमान
एक और घटना से लगाया जा सकता है। जिस दिन भगतसिंह ने असेम्बली
में बम फेंका था आजाद उस दिन आगरा में थे। जब उन्होंने समाचार-
पत्रों में भगतसिंह का चित्र देखा तो उसे सामने रखकर देर तक उसकी
ओर देखते रहे और फिर उनकी आँखों में आँसुओं की धारा बहने लगी।
यह पहला अवसर था जब किसी ने उनकी आँखों में आँसू देखे। परन्तु
आजाद अनुभव करते थे कि भगतसिंह ने भारी बलिदान दिया है। अब
वह वापस नहीं आयेगा और आजाद की और उसकी मुलाकात शायद
इस जीवन में न हो सके। इस विचार ने उन्हें कुछ परेशान कर दिया और
वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध में यह समझा जाता था कि उसका दिल पत्थर
का है, अन्ततः पिघल गया। परन्तु यह कोई दुर्बलता नहीं थी —

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आजाद भी एक बूटा की ओट में हो गए। दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। इतने में आजाद ने मुझे आदेश दिया कि मैं यहाँ से चला जाऊँ।
वह स्वयं लड़ते-लड़ते वहीं शहीद हो गए। किन्तु उन्होंने अपने एक साथी
की जान बचा ली।"
स्वयं मिटकर भी मित्र की प्राणरक्षा करने का यह उदाहरण निश्चय
ही अपने-आपमें एक आदर्श है, जिसकी सामान्य व्यक्तियों से आशा करना
केवल कल्पना ही होगी।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल तथा भगतसिंह को जेलों से मुक्त कराने
के प्रयास भी उनके मित्र-प्रेम के ही परिचायक हैं। इस प्रकार चन्द्रशेखर
आजाद जहाँ एक ओर एक अद्वितीय क्रान्तिकारी, अदम्य साहसी, श्रेष्ठ
नेतृत्व-शक्ति से युक्त, चरित्रबल के प्रतीक तथा प्रगतिशील विचारों वाले
राजनीतिक चिन्तक हैं, वहीं दूसरी ओर वह एक आदर्श मित्र के रूप में
हमारे सामने आते हैं।
देश-प्रेम के पर्याय :

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असहयोग आन्दोलन की समाप्ति पर वह क्रान्तिकारी संगठन 'हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गए। यहीं से उनके हृदय में
अंकुरित देश-प्रेम के नन्हे पौधे को पल्लवित होकर विशाल वृक्ष बनने का
अवसर प्राप्त हुआ।
अब उनके सामने एक ही लक्ष्य था, देश को विदेशियों के बन्धन से
मुक्त कराना। उन्होंने जो भी कार्य किया—चाहे वह डकैती हो, ठगी हो,
हिंसा हो या क्रान्तिकारी दलों का संगठन हो सब कुछ अपने इसी लक्ष्य को
ध्यान में रखकर किया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने जीवन
के सभी सुखों को तिलाञ्जलि दे दी और दुःखों का आलिंगन किया।
अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में वह संसार के अन्य सुखों को
बाधक समझते थे। इसीलिए वह अपने अन्य साथियों को भी इनसे दूर
रहने का परामर्श देते थे। उनका स्पष्ट उद्घोष था—
"देश से प्रेम करना है, तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना
पड़ेगा। इसमें किसी दूसरे से प्रेम करने के लिए तनिक भी स्थान नहीं
है।"
'देश-प्रेम के लिए सर्वस्व बलिदान करने का यह उद्घोष उनके जीवन
का सैद्धान्तिक पहलू मात्र नहीं था, अपितु, उनके जीवन का क्रिया-
व्यवहार था। उदाहरणस्वरूप उनके जीवन की एक घटना को लिया
सकता है। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी जी ने उन्हें दो सौ रुपये दिये थे, त
वह इस पैसे को अपने माता-पिता के लिए भिजवा दें, क्योंकि उन
हालत इतनी दयनीय हो गई थी कि भूखों मर रहे थे। किन्तु आजा-
वह रुपया दल के सदस्यों पर खर्च कर दिया। "क्या वह पैसा तुमने अ
घर भिजवा दिया?" विद्यार्थी जी द्वारा पूछे जाने पर आजाद ने उत्तर
दिया—
"मेरे माता-पिता को तो फिर भी कभी-न-कभी कुछ खाने को मि
जाता है, किन्तु मेरी पार्टी के कई ऐसे युवक हैं, जिन्हें कई बार बिल्कुल ही
भूखे रहना पड़ता है। मेरे माता-पिता वृद्ध हैं। मर भी गए तो देश क
कोई हानि नहीं होगी किन्तु मेरी पार्टी का कोई युवक भूख से तड़पकर मर
गया तो यह हमारे लिए बहुत शर्म की बात होगी और देश को इससे

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बहुत बड़ी हानि होगी।"
अपने देश के लिए इस प्रकार की अलौकिक एवं अद्वितीय न्यौछावर
कर देने की भावना—इससे बढ़कर देश-प्रेम की परिभाषा और क्या
हो सकती है। अपने इन शब्दों को उन्होंने अक्षरशः चरितार्थ करते हुए अपने
प्राणों को भी बलिदान करके सिद्ध किया, वास्तव में चन्द्रशेखर 'आजाद'
देश-प्रेम के पर्याय बन गए हैं।

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