अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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सामने श्रद्धा से झुक जाते थे। आज़ाद वास्तव में घूरती के लाल थे, ऐसे
लाल, जिन्होंने अपने आलोक से दुनिया को एक नया प्रकाश दिखाया।
चरित्र-बल के प्रतीक
आज़ाद एक सच्चे देशभक्त थे। उनके लिए मातृभूमि की स्वतन्त्रता
ही एकमात्र लक्ष्य बन गई थी। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
उन्होंने जीवन के सभी सुखों एवं भोगों का परित्याग कर दिया था। वह
संस्कृत के विद्यार्थी रह चुके थे, फलतः उन्होंने गीता का भी अध्ययन किया
होगा। इसलिए उन्होंने कदाचित् गीता से यह शिक्षा ग्रहण की थी कि
'विषय-वासनाओं के ध्यान से आसक्ति, आसक्ति से काम, काम से क्रोध,
क्रोध से अज्ञान, अज्ञान से स्मृति विभ्रम, स्मृति विभ्रम से बुद्धिनाश तथा
बुद्धिनाश से सर्वथापतन निश्चित होता है', अर्थात् किसी भी लक्ष्य को
प्राप्त करने के लिए विषयों से दूर रहना नितान्त आवश्यक है। इसीलिए
आज़ाद के जीवन में एक प्रशंसनीय चरित्रबल के दर्शन होते हैं। उनका चरित्र
एक आदर्श है। वह प्रत्येक स्त्री में अपनी माँ के दर्शन करते थे। इस विषय
में उनके दल के कुछ अन्य सहयोगियों के विचार उनसे कुछ भिन्न थे।
कुछ साथी स्त्रियों के प्रेम के चक्कर में दल को हानि पहुँचा चुके थे। इस-
लिए आज़ाद अपने साथियों को इन सब से दूर ही रहने की सलाह देते
थे। उनकी इस आदर्श सच्चरित्रता के विषय में श्री धीरेन्द्र ने लिखा है—
"चन्द्रशेखर आज़ाद के जीवन का सबसे उजागर पक्ष था महिलाओं के
विषय में उनका रवैया। वह सदा उनसे दूर रहते थे। उनका अपना शरीर
बहुत सुन्दर था। निरन्तर कड़े परिश्रम एवं व्यायाम करके उन्होंने उसे
ढाला था। इसलिए एक दो बार कुछ ऐसी घटनाएँ भी हो गईं कि
सौन्दर्य प्रेमियों ने उन्हें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया। किन्तु
वह स्पष्ट यही कहा करते थे कि एक क्रान्तिकारी एक ही समय में दो
चीज़ों से प्रेम नहीं कर सकता। वह अपने देश से प्रेम करे या किसी सुन्दरी
से। देश से प्रेम करना है तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना पड़ेगा।
इनके दिलों दुर्बलताओं के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं है।..."
कई साथी स्त्री देख कर शिकार हो जाते थे। उनके कारण दल