अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें142 चन्द्रशेखर आजाद
को जब वह माँ से मिलने गए थे और सोए हुए थे, तो पुलिस पहुँच गई
थी। इस बार पुलिस का सामना गोलियों से किया गया। गोलियाँ समाप्त
हो जाने पर वह अपने मित्र के साथ छत पर चले गए और छत पर रखी
ईंटों से पुलिस की गोलियों का सामना करने लगे। उनका साथी मारा
गया, किन्तु आजाद स्वयं एक से दूसरी छत पर कूदते हुए पुलिस के चक्र-
व्यूह से बाहर निकल गए।
काकोरी काण्ड के बाद उनके विरुद्ध प्रमाण जुटाने के लिए एक पुलिस
अधिकारी विशेष रूप से लगाया गया था। वह सदा उनका पीछा किया
करता था। आजाद उनसे तंग आ गए। तब एक दिन वह किसी बात की
परवाह किए बिना सीधे उसके पास जा धमके और उसके सीने से रिवाल्वर
सटा दिया। उनके इस साहस को देखकर पुलिस अधिकारी के हाथों के
तोते उड़ गए, उसने फिर उनका पीछा न करने की कसम खाई और तब
आजाद ने उसे छोड़ दिया।
कई बार वह भेष बदलकर पुलिस एवं गुप्तचरों के जाल से निकले।
भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल से छुड़ाने की योजना भी
उन्होंने बनाई थी, जो दुर्भाग्य से सफल न हो सकी और 1929 में
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयत्न किया था, जो सफल न हो
सका।
समग्र प्रकार आजाद का इन जीवन ही साहसिक कार्यों से भरा हुआ
था और अन्त में साहस के साथ पुलिस का सामना करते हुए वीरगति को
प्राप्त हुए। उनमें साहस की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वस्तुतः
वह सचमुच आजाद थे, मृत्यु का भय तो उन्हें छू भी नहीं गया था। वह
सदा मृत्यु का सामना करने को तत्पर रहते थे। उनका यही कहना था कि
बंदूक की गोलियों का सामना करने को तैयार रहते थे, वह आजाद थे,
आजादी न रहने पर विकल्प में मृत्यु ही उन्हें अभीष्ट थी। उनके इस
अदम्य साहस की ओर संकेत करते हुए मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"...सोलह सत्रह वर्षों से साम्राज्यप्रसाद सबक युद्ध, अजीब-अजीब
परिस्थितियों में भी, कहना चाहिए बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थितियों में—
करते जा रहे थे। इस आठ वर्षों से उन्होंने क्रान्ति का कार्य अपना रक्त