अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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कि वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहे तथा सच्चरित्रता एवं नारी-सम्मान
के वह प्रवल समर्थक थे। आजाद में हुए इन परिवर्तनों का उल्लेख श्री
भगवानदास ने निम्नलिखित शब्दों में किया है—
"हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मध्यभारत की एक छोटी-सी
रियासत अलीराजपुर के एक गाँव में एक कट्टर ब्राह्मण के घर आजाद
का जन्म हुआ था, जिसे यदि जात-पाँति, छुआछूत और नारी के प्रति
तेरहवीं सदी की मनोवृत्ति वाला कहा जाए, तो अनुचित नहीं होगा और
फिर इस वातावरण से प्रगति करते-करते वह बीसवीं सदी के तृतीय दशक
के भारतीय क्रान्तिकारियों की अग्र पंक्ति के नेता बने। दस-बारह वर्ष
की आयु में कट्टर ब्राह्मण के रूप में संस्कृत पढ़ने के लिए घर से भागक
काशी पहुँचे। वह राष्ट्रीय लहर में रमे, सत्याग्रह किया, बेंतों की सजा
पाई और क्रान्तिकारियों में शामिल हुए। अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल
के नेतृत्व में उनके विचारों में आर्यसमाजीपन आया और छुआछूत, मूर्ति
पूजा आदि को वह निगार समझने लगे। बाद में भगतसिंह आदि के
संसर्ग से धीरे-धीरे उन्होंने समाजवादोन्मुख धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया
और भारतीय समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनानी हुए। निश्चय
ही एक कट्टर ब्राह्मणवादी बालक से अग्रपंक्ति के क्रान्तिकारी प्रगतिशील
नौजवान नेता के विकास की प्रगति के अनेक स्तर बहुत थोड़े समय में
आजाद ने पार किए। स्त्रियों के सम्बन्ध में आजाद अपने व्यक्तिगत जीवन
में तो सदा एक मँस्टिक ब्रह्मचारी ही रहे। पहले वह दल में स्त्रियों के प्रवेश
के विरुद्ध ही थे और इसलिए वे कि उनके नेतृत्व के पूर्व यही परम्परा
थी, परन्तु बाद में उनके ही नेतृत्व में स्त्रियों ने दल में काम किया और
खूब अच्छी तरह किया। "नारी नरक की खान" वाली मनोवृत्ति से नारी
को एक सक्रिय क्रान्तिकारिणी, समान सहयोगिनी के रूप में मानने के बीच
की सभी मनोदशाएँ आजाद में समय-समय पर रही होंगी, यह स्पष्ट है।
अन्तिम दिनों में आजाद बड़े उत्साह से दल की सभी स्त्री सदस्यों को
गोली चलाना, निशाना मारना आदि सिखाते थे। दल से सहानुभूति
रखने वाले व्यक्तियों के घर की स्त्रियों को भी वह इसके लिए उत्साहित
करते थे। तथा क्रान्तिकारी कार्यों में अपने पति का सक्रिय सहयोग करने