अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें138 चन्द्रशेखर आजाद
थे, फिर आर्यसमाज से प्रभावित हुए और अन्त में वह समाजवाद की ओर
उन्मुख हुए। उन्होंने पारिवारिक तथा वातावरण से प्राप्त रूढ़ियों से
सम्बन्ध विच्छेद कर लिया, जो उनकी निरन्तर प्रगतिशीलता का सूचक है,
किन्तु उनकी यह प्रगतिशीलता सर्जनात्मक थी। प्रगतिशीलता के नाम
पर पश्चिम का अन्धानुकरण उन्होंने कभी नहीं किया; उच्चचरित्यता एवं
संस्कृति के अन्य उज्ज्वल पक्षों को उन्होंने अपने से कभी भिन्न नहीं होने
दिया। उनके जीवन की विभिन्न घटनाएं इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। उनकी
यह प्रगतिशीलता भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों को भी अपने साथ
लेकर चली थी। इस प्रकार वह सामयिक अपेक्षाओं के अनुरूप कल्याण-
कारी प्रगतिशीलता के समर्थक थे। उनके जीवन में उदार परम्पराओं तथा
देशहित के अनुरूप प्रगतिशीलता का एक अद्भुत समन्वय परिलक्षित होता
है।
आदर्श नेतृत्व :
अपना क्रान्तिकारी जीवन आजाद ने श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
नेतृत्व में प्रारम्भ किया था। काकोरी काण्ड के बाद यह क्रान्तिकारी दल
छिन्न-भिन्न हो गया था। उन्होंने नए सिरे से क्रान्तिकारी दल का संगठन
करने का प्रयत्न किया और संयोग से उन्हें राजगुरु, भगतसिंह आदि जैसे
साथी मिले। सबने मिलकर 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना'
बनाई। सभी साथी आजाद की योग्यता से प्रभावित थे, अतः उन्हें ही इस
नये दल का नेता—कमाण्डर-इन-चीफ—बनाया गया। दल के नेता के रूप
में उनका उत्तरदायित्व और भी बढ़ गया। इस पद की गरिमा को आजाद
ने बनाए रखा।
सर्वप्रथम दल के नेता को स्वयं को अनुशासित रखना पड़ता है। इसी
तथ्य को दृष्टि में रखकर आजाद ने अपने आचरण एवं अनुशासन को ऐसा
बनाए रखा, जिसके माध्यम से उन्होंने दल के सदस्यों के लिए एक आदर्श
प्रस्तुत किया। वह दल की छोटी-छोटी बातों पर भी बड़ी सावधानी से
ध्यान देते, क्योंकि इन छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने पर आगे वाले
समय में भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है