सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

चन्द्रशेखर आजाद 115

दी। वह रुपया देना नहीं चाहता था। उसने सोचा था, पुलिस आजाद के
पीछे लगी रहती है। वह स्वयं तो रुपया माँगने के लिए आएँगे नहीं, किसी
को भेजेंगे तो टाल दूंगा। फिर क्यों न रुपए को हड़प लिया जाए?
तिवारी बोला—"तुम तो आजाद को अच्छी तरह जानते हो। वह
वचन को भंग करने वाले को कभी क्षमा नहीं करते, भलाई इसी में है कि
तुम रुपए मुझे दे दो।"
प्रेस के मालिक ने कहा—'पूरे रुपए तो मेरे पास नहीं हैं, केवल दो
हजार हैं, यदि चाहो तो मैं इस समय दो हजार दे सकता हूँ।"
तिवारी ने सोचा कि भागते भूत की लंगोटी ही सही! मुफ्त के ही
दो हजार क्या कम हैं? वह बोला—
"अच्छी बात है, दो हजार ही लाओ। मैं किसी तरह आजाद को मना
लूँगा।"
प्रेस के मालिक ने दो हजार रुपए तिवारी को दे दिए, उसने सोचा
यदि दो हजार दे देने से बला टल जाए तो क्या बुरा है? फिर भी छ:
हजार रुपए तो अपनी जेब में ही रहेंगे।
तिवारी रुपया लेकर चला गया। वह उसी दिन झाँसी जाकर आजाद
से मिला। उसने आजाद से कहा—"मैं प्रेस के मालिक से बात कर आया
हूँ। वह 23 फरवरी को ठीक दस बजे दिन में कम्पनी बाग में लाइब्रेरी के
सामने वाले पेड़ के नीचे जो नाले के पास है, आपसे मिलेगा और आपको
रुपए दे देगा।

116 · चन्द्रशेखर आजाद
साथ कम्पनी बाग में पहुँच गए और नाले से लगे हुए वृक्ष के नीचे बैठकर
प्रेस के मालिक की प्रतीक्षा करने लगे।
अभी कुछ ही देर हुई थी कि पुलिस के आदमी दिखाई पड़े। आजाद
ने अपने साथी से कहा- "लगता है मेरे यहाँ पहुँचने की सूचना पुलिस को
मिल गई है। पुलिस मुझे घेरे- इससे पहले ही तुम यहाँ से चले जाओ।"
क्रान्तिकारी साथी आजाद को छोड़कर जाना नहीं चाहता था। पर
उन्होंने उसे चले जाने के लिए विवश कर दिया। वह एक आदमी की साइ-
किल छीनकर उस पर बैठकर चला गया।
साथी के जाने के कुछ ही देर बाद पुलिस कप्तान नाट बाबर पुलिस
दल के साथ पेड़ के पास आ पहुँचा। उसके साथ पुलिस विभाग का इन्स-
पेक्टर विश्वेश्वरसिंह भी था।
नाट बाबर दूर से ही चेतावनी के स्वर में बोला- "आत्म-समर्पण
कर दो नहीं तो गोली मार दी जाएगी।"
आजाद उठकर खड़े हो गए। उन्होंने नाट बाबर की बात का उत्तर
गोली से दिया। गोली उसकी कलाई में लगी। कलाई की हड्डी टूटी तो
नहीं, पर सचक गई।
फिर तो पुलिस की ओर से गोलियाँ चलने लगीं। आजाद पेड़ की
ओट में खड़े होकर अपनी रक्षा करने लगे। पुलिस की गोलियों का उत्तर
गोलियों से देने लगे।
...आजाद बड़ी वीरता से पुलिस दल का सामना कर रहे थे। पुलिस
के लोग संख्या में अधिक थे, फिर भी वे आजाद के साहस को विचलित
नहीं कर पा रहे थे। दुर्भाग्य से गोलियाँ समाप्त हो गई-केवल एक गोली
बच गई-अन्तिम गोली!
आजाद ने अपनी पिस्तौल कनपटी पर ले जाकर उस अन्तिम गोली
को अपनी कनपटी पर चला दिया। गोली इस पार से उस पार निकल गई।
आजाद धरती की गोद में गिरते ही निष्प्राण हो गए।
श्री द्रवित हृदय ने अपनी इस पुस्तक के दो शब्द में लिखा है-
'मैंने आजाद के बलिदान का जो दृश्य देखा था, वह आज भी मेरी
आँखों के सामने चमकता है, उससे मुझे प्रेरणा मिलती है, उत्साह मिलता

चन्द्रशेखर आजाद 117
है। मैंने उनके बलिदान से लेकर आज तक उनके सम्बन्ध में बार-बार पढ़ा,
तथ्यों का संग्रह किया। 'अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद' उसी का परिणाम
है। मैं कह सकता हूँ कि इसमें जो बातें लिखी गई हैं, वे साधार एवं तथ्य-
पूर्ण हैं।"
स्पष्ट है कि श्री व्यथित हृदय ने अपनी पुस्तक की सामग्री की सत्यता
का दावा किया है, किन्तु पुस्तक में आजाद की वीरगति को प्राप्त होने की
तिथि 23 मार्च (अथवा 23 फरवरी) 1931 लिखी हुई है, जो सर्वथा
असत्य है, क्योंकि 23 मार्च, 1931 अमर शहीद भगतसिंह, राजगुरू तथा
सुखदेव का बलिदान दिवस है, न कि आजाद का।
सुखदेवराज इस घटना से कुछ समय पूर्व तक आजाद के साथ ही थे।
उनके अनुसार घटना का विवरण इस प्रकार है—
“27 फरवरी प्रातः जलपान करने के बाद जब मैं अपनी साइकिल से
चला तो भैया आजाद रास्ते में ही मिल गए। हम दोनों बातें करते-करते
पार्क की तरफ बढ़ चले। भैया मुझसे पूछ रहे थे कि चूंकि मैं बर्मा हो आया
हूँ, क्या मैं बता सकता हूँ कि कुछ लोग बर्मा के रास्ते देश से बाहर जा
सकते हैं। इस सन्दर्भ में मुझे जो जानकारी थी मैंने उन्हें दी। हम दोनों
बातें करते-करते पार्क में पहुँच गए। वहाँ एक व्यक्ति पुल के ऊपर बैठा
दातून कर रहा था। उसने आजाद को घूरना शुरू कर दिया। उसकी आँखें
देखकर आजाद को कुछ सन्देह हुआ। उन्होंने मुझसे उल्लेख किया। मैंने फिर
उस व्यक्ति की ओर देखा, किन्तु उसने अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया।

118 चन्द्रशेखर आजाद
गोरे के कन्धे में। दोनों ओर से गोलियां चलनी शुरू हो गईं। एक गोली
आजाद के दाएं बाजू को चीरती हुई उनके फेफड़े में आ लगी। फिर भी
वह गोली चलाते रहे। अफसर की कलाई टूट गई। उसने अपने प्राण बचाने
के लिए अपनी मोटर में भागने का प्रयास किया। आजाद लहूलुहान हो चुके
थे, फिर भी उन्होंने अपनी गोली से मोटर का टायर पन्चर कर दिया।
इस पर वह गोरा और उसके साथी एक वृक्ष के पीछे जा छिपे।
आजाद भी एक वृक्ष की ओट में हो गए। दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। इतने में आजाद ने मुझे आदेश दिया कि मैं वहां से चला जाऊं। वह
स्वयं लड़ते-लड़ते वहां शहीद हो गए। किन्तु उन्होंने अपने एक साथी की
जान बचा ली। आजाद का शव भूमि पर पड़ा था, किन्तु किसी पुलिस को
उनके निकट जाने का साहस नहीं होता था। अन्ततः उसी गोरे अफसर ने
एक सिपाही से कहा कि वह उसकी लाश पर तनिक दूर खड़ा होकर गोली
चलाए...।"
सुखदेवराज के इस वर्णन को भी अनेक लेखकों ने विश्वसनीय नहीं
माना है। अनेक पुस्तकों के अनुसार स्वयं सुखदेव ही पुलिस का आदमी था।
यशपाल के अनुसार वीरभद्र तिवारी द्वारा मुखबिरी की कहानी सुखदेवराज
ने ही गढ़ी थी। सुखदेवराज पर इस आधार पर भी सन्देह की पुष्टि होती
है कि गोलियां चलते समय वह आजाद के साथ ही था, जबकि उसे कोई
गोली नहीं लगी और पुलिस की नजरों से वह सुरक्षित कैसे भाग गया?
क्या पुलिस ने उस पर जान-बूझकर गोली नहीं चलाई।
इस विषय पर श्री मन्मथनाथ गुप्त की यह शंका उचित लगती है—
"...यशपाल के अनुसार दल तोड़ दिया गया था, केन्द्रीय समिति तितर-
बितर कर दी गई थी, पर यह पूछा जा सकता है कि उस भयंकर दिन
इलाहाबाद में इतने क्रान्तिकारियों का जमघट क्यों था? यशपाल वहां थे,
पाण्डेय वर्मा थे, सुखदेवराज थे, वीरभद्र था...प्रश्न उठता है कि किसने
विश्वासघात किया... कितने ही आदमी थे जो अकेले या मिलकर ऐसा
विश्वासघात कर सकते थे। इस मामले में मुझे याद है कि इलाहाबाद में
आजाद की शहादत की अर्द्धशताब्दी के दिन मौजूद व्यक्तियों में से एक ने
बिना कुछ सोचे मेरे सामने कहा कि यदि मैं मुंह खोलूं, तो बहुतों के (

अल्फ्रेड पार्क (प्रयाग) का ऐतिहासिक द्वन्द्व-युद्ध एवं अमर बलिदान उपसंहार

चन्द्रशेखर आजाद
घूरते नजर आएँगे।
"...प्रमाणों से जाहिर है कि वीरभद्र जो यशपाल के अनुसार डबल
खुफिया था, उसके अलावा बहुत से ऐसे लोग थे, जो आजाद और धन्वन्तरि
की ख्याति से जलते थे। वे आजाद को अपने उत्थान के मार्ग में रोड़ा
समझते थे।"
सत्य चाहे जो भी रहा हो, इतना तो निश्चित है कि चन्द्रशेखर आजाद
यहाँ पुलिस वालों से टक्कर लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन सब
षड्यन्त्रों से उनके त्याग, बलिदान तथा भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में
उनके महनीय योगदान में कोई अन्तर नहीं पड़ता। और बहादुरों के
रक्तपात से क्रान्तिकारियों की लालिमा और भी बढ़ती है।

120 चन्द्रशेखर आजाद
पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा श्रीमती कमला नेहरू ने भी भाग लिया। लोगों
ने अपने प्रिय दिवंगत क्रान्तिकारी को श्रद्धांजलियाँ अर्पित कीं। प्रसिद्ध
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल की धर्मपत्नी भी इस सभा में उपस्थित थीं।
आजाद को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई श्रीमती सान्याल ने कहा
था—
"खुदीराम बोस की भस्मी को लोगों ने ताबीज में रखकर अपने
बच्चों को पहनाया, ताकि उनके बालक भी खुदीराम बोस की तरह वीर
बन सकें। मैं इसी भावना से आजाद की राख की चुटकी लेने आई हूँ।"
इस पर लोगों ने उस भस्मी को अपने माथे पर लगाया। बड़ी मुश्किल
से थोड़ी-सी भस्मी बची, जो त्रिवेणी में बहा दी गई।
अब भारतीय जनता के पास भारत माता के इस अद्वितीय सपूत की
केवल यादें ही शेष थीं। वह पार्क जहाँ आजाद वीरगति को प्राप्त हुए थे,
एक पवित्र भूमि बन चुकी थी। वह पेड़ जिसकी ओट से आजाद ने गोलियाँ
चलाई थीं, एक पवित्र वस्तु; आराध्य की मूर्ति बन चुका था। लोगों ने
उसकी पूजा करनी प्रारम्भ कर दी थी; उस पर अपनी पवित्र श्रद्धा के
प्रतीक फूल-पत्ते चढ़ाने शुरू कर दिए थे, किन्तु अंग्रेजों को यह सहन नहीं
हुआ, अतः उन्होंने वह पेड़ भी कटवा डाला, ताकि आजाद का कोई भी
स्मृति सूचक चिह्न शेष न रहे। इस प्रकार से किसी की स्मृति के भौतिक
चिह्नों को नष्ट करने पर उसकी स्मृति नष्ट नहीं होती। आजाद भारतीयों
के दिलों में बस गए थे, और तब तक बसे रहेंगे जब तक भारतभूमि का
अस्तित्व रहेगा। आजाद की मृत्यु से भारतवर्ष से एक श्रेष्ठ वीर; एक
सच्चा देशभक्त देश से उठ गया था। इसके साथ ही क्रान्तिकारियों के एक
युग का भी अन्त हो गया।

नवम अध्याय
आज़ाद के जीवन के कुछ प्रेरक एवं
स्मरणीय प्रसंग
धीरे-धीरे धुआँ देकर दीर्घकाल तक जलने से प्रचण्ड आलोक के साथ
एक क्षण में जलकर बुझ जाना अच्छा है। वीर चन्द्रशेखर आजाद ने भी
इसी उक्ति को अपने जीवन में चरितार्थ किया। उन्होंने अपने जीवन के
केवल 25 वसन्तों में ही भारतीय इतिहास में अपना एक अद्वितीय स्थान
बनाया।
यों तो चन्द्रशेखर आजाद का अशेष जीवन एक प्रेरक प्रसंग है, जिससे
देशवासियों को त्याग-भावना, देशप्रेम, निर्भीकता आदि शिक्षाएँ प्राप्त
होती हैं। फिर भी उनके जीवन में कुछ ऐसे प्रेरक दृष्टान्त मिलते हैं, जिनसे
प्रत्येक मनुष्य उनके विषय में कुछ सोचने के लिए बाध्य हो जाता है। उनके
हृदय में मातृभूमि के लिए अपने पूर्ण यौवन में समस्त सुख-सुविधाओं तथा
भोगों आदि का परित्याग करके वीरगति प्राप्त करने वाले इस अद्भुत
व्यक्तित्व के लिए अनायास ही श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है। अनेक
विद्वान लेखकों ने आज़ाद के जीवन के प्रेरक प्रसंगों का अपनी पुस्तकों में
वर्णन किया है। इन्हीं में से कुछ प्रसंग यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

The provided image is entirely blank (solid white) and does not contain any visible text or content to transcribe.

Please re-upload or provide the correct image page so that it can be accurately transcribed line by line.

चन्द्रशेखर आजाद 123
कर दिया, जो राजा पर भी निगरानी रखता था। एक बार राजा और
प्रभुदयाल बाग में बैठे हुए थे। सहसा आजाद वहाँ पहुँच गए। राजा
साहब को उनके इस तरह आने-जाने से बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उनके
सम्मान में उठ खड़े हुए और इनके मुँह से निकल पड़ा—"पण्डितजी महा-
राज पधारिए।"
पास में बैठा प्रभुदयाल भी उठ खड़ा हुआ। राजा ने आजाद को
बैठने के लिए कहा। तभी प्रभुदयाल बोल उठा—"पण्डितजी कौन हैं?"
"बहुत बड़े ज्योतिषी हैं।" राजा साहब ने कहा।
इस पर प्रभुदयाल ने उनका नाम जानना चाहा। राजा साहब
जरा घबरा गए। आजाद उनकी घबराहट को समझ गए और तपाक
से बोल उठे—"किशनलाल।"
इस प्रकार उन्होंने परिस्थिति को बिगड़ने से संभाल लिया।
राजगुरु कुछ रंगीन स्वभाव के व्यक्ति थे। एक बार उन्हें एक सुन्दर
कैलेण्डर मिला, जिसमें किसी सुन्दर स्त्री का चित्र था। उन्होंने वह कैलेण्डर
बम के कारखाने की दीवार पर टाँग दिया। आजाद ने उसे देखा तो टुकड़े-
टुकड़े कर फेंक डाला। थोड़ी देर बाद राजगुरु ने चित्र की यह दुर्दशा देखी
तो टुकड़े उठा लिए और आजाद से पूछा—"यह किसने किया?"
"मैंने किया," आजाद बोले।
"आपने इस सुन्दर चित्र को क्यों फाड़ा?"
"क्योंकि यह सुन्दर था।"
"क्या इसके मायने यह हैं कि जो कुछ भी सुन्दर है, उसे आप नष्ट
कर देंगे?"
"हाँ, कर दूँगा।"
"क्या आप ताजमहल को तोड़ डालेंगे?"
"हाँ, तोड़ डालूँगा।"
इस समय आजाद गुस्से में थे; गुस्से में व्यक्ति क्या-क्या कह जाता
उसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता। ऐसा ही आजाद के साथ भी हुआ
था। थोड़ी ही देर में उनका गुस्सा शान्त हो गया। एक घण्टे बाद उन्होंने
देखा कि राजगुरु कुछ कर रहे हैं—एक ओर हजार की और

The provided image is completely blank (solid white) and does not contain any visible text, diagrams, or content to transcribe.

Please re-upload or check the intended page image so I can provide the line-by-line transcription for you.

An exact, line-by-line transcription of the Hindi text from page 126:

126 चन्द्रशेखर आजाद
थे। साण्डर्स वध के समय जब आजाद ने मुझे लाहौर बुलाया, तो मुझे
यह देखकर विस्मय हुआ कि आजाद पर भगतसिंह का जादू चल गया।
और 'पण्डितजी' अब कच्चा अण्डा सीधा मुंह पर तोड़कर ही गटक रहे
हैं। मैंने हैरानी से पूछा, "पण्डितजी! यह क्या?" आजाद बोले, "अण्डे
में कोई हर्ज नहीं है। वैज्ञानिकों ने उसे फल जैसा ही बताया है।" यह तर्क
भगतसिंह का ही था, जिसे आजाद दोहरा रहे थे। मैंने बड़ी गम्भीरता
से कहा—"बिल्कुल ठीक पण्डितजी! अण्डा फल है; तो मुर्गी पेड़ के
सिवा कुछ नहीं हो सकती। मैं भला कब उसे छोड़ूँगा?" भगतसिंह खिल-
खिलाकर हंस पड़े—"वास्तव में कैलाश तुम अच्छे तर्कशास्त्री हो सकते
हो। भला पण्डितजी! देखिये····।" आजाद बीच में ही बिगड़कर बोले—
"चल बे, एक तो हमें अण्डा खिला रहा है, और ऊपर से बातें बना रहा
है····।"
• एक बार भगतसिंह ने आजाद से कहा था

The provided image is completely blank and contains no text or visible content to transcribe. Please upload a clear image of the page you would like transcribed.

128 चन्द्रशेखर आजाद

सिनेमा देखते पकड़ा जाएगा और अकाल मारा जाएगा। इसके उत्तर
में भगतसिंह ने कहा कि उसे (आजाद को) मारना भी पुलिस के लिए
आसान नहीं होगा, क्योकि इतनी मोटी गर्दन को फाँसी पर लटकाने के
लिए पुलिस को रस्सा भी नहीं मिल पायेगा। एक रस्से से काम भी
नहीं चलेगा; दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी—एक गले के लिए; एक पेट के
लिए। इस पर आजाद ने अपने पिस्तौल पर हाथ रखते हुए कहा था,
इसके होते हुए कौन माई का लाल है, जो मुझे गिरफ्तार कर सके।"
• एक बार कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी थी कि क्रान्तिकारी दल
बिखर चुका है, इसलिए उन्हें भागकर रूस चला जाना चाहिए, क्योकि
पकड़े जाने पर उनके लिए फाँसी निश्चित थी। यह सुनकर आजाद ने
कहा था—"रूस-फूस की बातें मेरे साथ मत करो। मेरा शरीर भारत की
मिट्टी से बना है और मैं भारत की आजादी के लिए शत्रु से लड़ते-लड़ते
इसी देश की धरती पर मरकर इसकी धूल में मिल जाऊँगा।"
• एक बार आजाद अपने साथियो—भवानीसिंह, रामचन्द्र, मास्टर
छत्रबिहारीलाल, विश्वम्भर दयाल आदि के साथ लैंसडाउन गए हुए थे
और पहाड़ियो पर उन्हें निशाना लगाने का प्रशिक्षण दे रहे थे। इतने
में साथियों ने उनका (आजाद का) निशाना देखने की इच्छा व्यक्त की
क्योकि उनका निशाना अचूक था। आजाद ने उनकी इच्छा को मान
लिया। साथियो ने किसी पेड़ के एक पत्ते पर निशाना लगाने को कहा।
आजाद ने निशाना लगाया और पाँच गोलियाँ चला दीं, किन्तु पत्ता नहीं
गिरा। साथियों को बड़ी निराशा हुई और उन्होंने समझ लिया कि निशाना
चूक गया। अन्त में पत्ता तोड़ा गया, उसमें पाँचों गोलियों के अलग-
अलग पाँच छिद्र बने हुए थे। यह देखकर उनके साथी उनकी प्रशंसा किए
बिना नहीं रह सके।

The provided image is completely blank (solid white) and does not contain any text, diagrams, or content to transcribe.

128 चन्द्रशेखर आजाद
सिनेमा देखते पकड़ा जाएगा और अकाल मारा जाएगा। इसके उत्तर
में भगतसिंह ने कहा कि उसे (आजाद को) मारना भी पुलिस के लिए
आसान नहीं होगा, क्योंकि इतनी मोटी गर्दन को फाँसी पर लटकाने के
लिए पुलिस को रस्सा भी नहीं 'मिल पायेगा। एक रस्से से काम भी
नहीं चलेगा; दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी—एक गले के लिए; एक पेट के
लिए। इस पर आजाद ने अपने पिस्तौल पर हाथ रखते हुए कहा था,
इसके होते हुए कौन माई का लाल है, जो मुझे गिरफ्तार कर सके।"
• एक बार कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी थी कि क्रान्तिकारी दल
बिखर चुका है, इसलिए उन्हें भागकर रूस चला जाना चाहिए, क्योंकि
पकड़े जाने पर उनके लिए फाँसी निश्चित थी। यह सुनकर आजाद
कहा था—"रूस-फूस की बातें मेरे साथ मत करो। मेरा शरीर भारत क
मिट्टी से बना है और मैं वतन की आजादी के लिए शत्रु से लड़ते-लड़ते
इसी देश की धरती पर मरकर इसकी धूल में मिल जाऊँगा।"
• एक बार आजाद अपने साथियों—भवानीसिंह, रामचन्द्र, मास्टर
छैलविहारीलाल, विश्वम्भर दयाल आदि के साथ लेंसडाउन गए हुए थे
और पहाड़ियों पर उन्हें निशाना लगाने का प्रशिक्षण दे रहे थे। इनमें
से साथियों ने उनका (आजाद का) निशाना देखने की इच्छा व्यक्त की,
क्योंकि उनका निशाना अचूक था। आजाद ने उनकी इच्छा को मान
लिया। साथियों ने किसी पेड़ के एक पत्ते पर निशाना लगाने को कहा।
आजाद ने निशाना लगाया और पाँच गोलियाँ चला दीं, किन्तु पत्ता नहीं
गिरा। साथियों को बड़ी निराशा हुई और उन्होंने समझ लिया कि निशाना
चूक गया। अन्त में पत्ता तोड़ा गया; उसमें पाँचों गोलियों की अलग-
अलग पाँच छिद्र बने हुए थे। यह देखकर उनके साथी उनकी प्रशंसा किए

The provided image appears to be entirely blank/white, and there is no visible text to transcribe.

If you intended to upload a specific document, page, or photograph relating to the Revolutionary Freedom Struggle or Ancient Indic Agriculture, please re-upload or provide the correct image file.

130 चन्द्रशेखर आजाद
शिक्षा देने के लिए किसी पाठशाला में भेजने में भी असमर्थ थे। दल के
सन्दर्भ में उनकी इसी निर्धन पारिवारिक स्थिति का वर्णन करते हुए
भगवानदास ने लिखा है—
"आजाद के साथियो यानी उनके नेतृत्व में काम करने वालो में शायद
ही किसी को उनसे कम स्कूली शिक्षा मिली होगी। शायद ही कोई उनसे
अधिक गरीबी की हालत में उत्पन्न हुआ होगा। उनके साथ उनके पिता,
भाई या किसी अन्य सम्बन्धी की देशभक्ति, त्याग, तपस्या, वीरता या
अन्य किसी प्रकार के बड़प्पन की छाया भी नही लगी हुई थी।"
इसी विषय में श्री मन्मथनाथ गुप्त ने भी लिखा है—
"इनके पिता पं० सीताराम बहुत मामूली नौकरी करते थे, इसलिए
अंग्रेजी पढ़ने का कोई प्रश्न ही नहीं उठा। आजाद संस्कृत पढ़ने के लिए
काशी भेजे गए... ब्राह्मण विद्यार्थी थे इस कारण खाने-पीने तथा रहने
की मामूली व्यवस्था हो गई। काशी में धार्मिक लोगों की ओर से संस्कृत
छात्रों के लिए छात्र निवास तथा क्षेत्र खुले हुए थे। कभी-कभी लोटा-
कम्बल ऐसी चीजें भी बँटती रहती थीं। कभी-कभी कुछ दक्षिणा भी
मिलती थी।"
इन विद्वानों की उपर्युक्त पंक्तियों से आजाद के परिवार की तथा उन
परिस्थितियों की, जिनका सामना उन्हें अपने बाल्यकाल में तथा अध्ययन
के दिनों में करना पड़ा था, स्पष्ट अभिव्यक्ति हो जाती है। किन्तु आजाद
ने सिद्ध कर दिखाया कि इस प्रकार की स्कूली शिक्षा ही सब कुछ नहीं
है। व्यक्ति की पारिवारिक स्थिति चाहे कितनी ही दयनीय क्यों न हो
और चाहे उसे वर्षों की शिक्षा न मिली हो, इससे उसकी अपनी जन्मजात
योग्यता छिपी नहीं रह सकती। इनके न होने पर भी व्यक्ति अपनी
योग्यता के बल पर उन्नति के चरम शिखर पर पहुँच सकता है, एक
आदर्श प्रस्तुत कर सकता है, जिसके आगे बड़े-बड़े धनवानों एवं सुशिक्षितों
को नतमस्तक हो जाना पड़ता है। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए श्री
मन्मथनाथ गुप्त ने आजाद के विषय में लिखा है—
• "अवश्य चन्द्रशेखर आजाद कम पढ़े-लिखे, केवल स्थूल साहित्य के
दृष्टि से ही थे, पर उनके पढ़े हुए पुस्तकों का सार ग्रहण करने..."

The provided image is completely blank and contains no text or visible content to transcribe.

132 चन्द्रशेखर आज़ाद
सामने श्रद्धा से झुक जाते थे। आज़ाद वास्तव में घूरती के लाल थे, ऐसे
लाल, जिन्होंने अपने आलोक से दुनिया को एक नया प्रकाश दिखाया।
चरित्र-बल के प्रतीक
आज़ाद एक सच्चे देशभक्त थे। उनके लिए मातृभूमि की स्वतन्त्रता
ही एकमात्र लक्ष्य बन गई थी। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
उन्होंने जीवन के सभी सुखों एवं भोगों का परित्याग कर दिया था। वह
संस्कृत के विद्यार्थी रह चुके थे, फलतः उन्होंने गीता का भी अध्ययन किया
होगा। इसलिए उन्होंने कदाचित् गीता से यह शिक्षा ग्रहण की थी कि
'विषय-वासनाओं के ध्यान से आसक्ति, आसक्ति से काम, काम से क्रोध,
क्रोध से अज्ञान, अज्ञान से स्मृति विभ्रम, स्मृति विभ्रम से बुद्धिनाश तथा
बुद्धिनाश से सर्वथापतन निश्चित होता है', अर्थात् किसी भी लक्ष्य को
प्राप्त करने के लिए विषयों से दूर रहना नितान्त आवश्यक है। इसीलिए
आज़ाद के जीवन में एक प्रशंसनीय चरित्रबल के दर्शन होते हैं। उनका चरित्र
एक आदर्श है। वह प्रत्येक स्त्री में अपनी माँ के दर्शन करते थे। इस विषय
में उनके दल के कुछ अन्य सहयोगियों के विचार उनसे कुछ भिन्न थे।
कुछ साथी स्त्रियों के प्रेम के चक्कर में दल को हानि पहुँचा चुके थे। इस-
लिए आज़ाद अपने साथियों को इन सब से दूर ही रहने की सलाह देते
थे। उनकी इस आदर्श सच्चरित्रता के विषय में श्री धीरेन्द्र ने लिखा है—
"चन्द्रशेखर आज़ाद के जीवन का सबसे उजागर पक्ष था महिलाओं के
विषय में उनका रवैया। वह सदा उनसे दूर रहते थे। उनका अपना शरीर
बहुत सुन्दर था। निरन्तर कड़े परिश्रम एवं व्यायाम करके उन्होंने उसे
ढाला था। इसलिए एक दो बार कुछ ऐसी घटनाएँ भी हो गईं कि
सौन्दर्य प्रेमियों ने उन्हें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया। किन्तु
वह स्पष्ट यही कहा करते थे कि एक क्रान्तिकारी एक ही समय में दो
चीज़ों से प्रेम नहीं कर सकता। वह अपने देश से प्रेम करे या किसी सुन्दरी
से। देश से प्रेम करना है तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना पड़ेगा।
इनके दिलों दुर्बलताओं के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं है।..."
कई साथी स्त्री देख कर शिकार हो जाते थे। उनके कारण दल