भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
हैदर अली
[ एम० एम० डी० एल० टी० कृत फ्रेंच पुस्तक के अंगरेज़ी
संस्करण "हिस्ट्री आफ़ हैदरशाह" से ]
This page appears to be entirely blank and contains no readable text.
हैदरअली ३३५
ख़र्च और ज़ुरमाने के तौर पर एक बहुत बड़ी रक़म अंगरेज़ों ने
हैदरअली को भेंट की और यह तय हुआ कि भविष्य में यदि
कोई तीसरा हैदरअली पर हमला करेगा तो अंगरेज़ हैदरअली की
मदद करेंगे और यदि कोई अंगरेज़ों पर हमला करेगा तो हैदरअली
उनको मदद करेगा ।
दूसरे सुलहनामे में, जो हैदरअली और मोहम्मदअली के
[हैदरअली और] दरम्यान था, यह तय हुआ कि मोहम्मदअली
[अरकाट के नवाब] अरकाट का नवाब बना रहे; किन्तु आइन्दा
[में सन्धि] से अरकाट का नवाब मैसूर का सामन्त समझा
जावे, छै लाख रुपए सालाना बतौर ख़िराज
मैसूर दरबार को अदा किया करे, और पहले साल का ख़िराज
पेशगी इसी समय अदा किया जावे ।
दोनों सन्धियों के पालन की ज़िम्मेदारी अंगरेज़ों ने अपने
ऊपर ली और इन सब बातों के अलावा हैदरअली के एक जहाज़
के बदले में, जो उन्होंने युद्ध के शुरू में धोखे से बम्बई में ले लिया
था, अंगरेज़ों ने एक नया युद्ध का जहाज़ पचास तोपों सहित हैदर
को भेंट करने का वादा किया ।
इस युद्ध ने साबित कर दिया कि हैदर की वीरता, उसका
युद्ध कौशल और उसकी उदारता तीनों ही ऊँचे दर्जे की थीं और
अंगरेज़ किसी तरह भी उसके मुक़ाबले में न ठहर सकते थे ।
दक्खिनी भारत में अंगरेज़ों की अब काफ़ी दुर्दशा हो चुकी
३३६ भारत में अंगरेज़ी राज
थी। एक फ़्रांसीसी इतिहास लेखक लिखता है कि इस विजय के
[मद्रास क़िले के] अवसर पर हैदर ने अंगरेज़ों से कहकर मद्रास
[फाटक पर एक] के सेण्ट जॉर्ज क़िले के सदर फाटक पर एक चित्र
[चित्र] बनवाया, जिसमें हैदर एक शामियाने के नीचे
तोपों के ढेर के ऊपर बैठा हुआ है, पीछे की ओर
सेण्ट जॉर्ज का क़िला है जिसकी फ़सील पर गवर्नर और उसकी
कौन्सिल के सब अंगरेज़ मेम्बर दोज़ानू बैठे हुए हैदर की ओर
अपने हाथ बढ़ा रहे हैं। अंगरेज़ दूत डूप्रे और बौशियर दोनों हैदर
के सामने ज़मीन पर दोज़ानू बैठे हैं। डूप्रे के नाक की जगह हाथी
की सी सूँड बनी हुई है, हैदर उसकी सूँड को पकड़े हुए है और
उसमें से अशरफ़ियाँ हैदर के सामने खनाखन ज़मीन पर गिर रही हैं।
दूसरी ओर पराजित अंगरेज़ सेनापति जनरल स्मिथ सन्धि पत्र
हाथ में लिए हुए अपने हाथ से अपनी तलवार के दो टुकड़े कर
रहा है।
इस सन्धि का यहाँ तक असर हुआ कि इंगलिस्तान में उसकी
[कम्पनी के हिस्सों] ख़बर पहुँचते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्सों
[की दर का गिरना] की दर एकदम गिर कर ४० फ़ी सदी रह गई।
युद्ध के दिनों में ही जैसे जैसे हैदर और टीपू की
विजयों की ख़बरें इंगलिस्तान पहुँचती जाती थीं, कम्पनी के हिस्सों
की दर गिरती जाती थी। इस पर डाइरेक्टरों ने बार बार मद्रास
के अधिकारियों पर ज़ोर दिया कि हैदर के साथ सुलह कर ली
जावे। किन्तु अब सुलह हो जाने पर उन्हीं डाइरेक्टरों ने मद्रास
हैदरअली ३३७
के गवर्नर को लिखा कि जिस तरीक़े से आपने सन्धि की है
उससे—
"आपने हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों के लिए यह समझने की
बुनियाद डाल दी है कि वे जब उनका जी चाहे बेखटके कम्पनी की हतक कर
सकते हैं।"
दोनों सन्धि पत्रों पर कम्पनी की मोहरें लग चुकी थीं, किन्तु
इसके बाद से ही अंगरेज़ों ने सन्धि को तोड़ने के मौक़े ढूंढ़ने शुरू
कर दिए।
थोड़े दिनों बाद मराठों ने चौथी बार मैसूर पर हमला किया।
[हाशिया: मराठों का मैसूर पर हमला और अंगरेज़ों का सन्धि को तोड़ना] हैदर ने सन्धि की शर्तों के अनुसार अंगरेज़ों से
मदद चाही। ऐन मौक़े पर मद्रास कौन्सिल ने
मदद देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर
हैदर ने कुछ धन और अपना कुछ इलाक़ा
मराठों को देकर उनसे पीछा छुड़ाया। किन्तु
अंगरेज़ों की नीयत का उसे पता चल गया।
इसके बाद हैदर ने कुर्ग के राजा को, जो पहले मैसूर का
बाजगुज़ार रह चुका था और अब बाग़ी हो गया था, युद्ध द्वारा
फिर से अपने अधीन किया।
हैदर को अपना जो इलाक़ा मराठों को देना पड़ गया था वह
उसकी नज़रों में खटक रहा था। वह पूना दरबार की अवस्था की
पूरी ख़बर रखता था। जब उसे पेशवा नारायणराव की हत्या और
राघोबा और अंगरेज़ों की साज़िशों की ख़बर मिली तो उसने इस
२२
३३८ भारत में अंगरेज़ी राज
इलाक़े को मराठों से वापस लेने के लिए अपने बेटे टीपू को सेना
सहित भेजा। टीपू ने वह सारा इलाक़ा फिर मराठों से विजय कर
लिया। इसके बाद सन् १७७८ में छै साल के लिए मराठों और
हैदर में सन्धि हो गई।
अंगरेज़ों और हैदर के दरमियान जो सन्धि हुई थी उसका
उल्लंघन हैदर पर मराठों के हमले के समय अंगरेज़ कर ही चुके थे।
दूसरी सन्धि मोहम्मदअली और हैदर के दरमियान थी। उसके
पालन की ज़िम्मेदारी भी अंगरेज़ों ने अपने ऊपर ली थी। किन्तु
मोहम्मदअली का अंगरेज़ों के पंजे से निकल कर मैसूर का
बाजगुज़ार हो जाना अंगरेज़ों के लिए बहुत बुरा था। इसलिए
सन्धि के बाद उन्होंने अपने वादे को पूरा करने के बजाय नवाब
मोहम्मदअली को हैदरअली के ख़िलाफ़ भड़काए रक्खा। मैसूर
की अन्य सामन्त रियासतों को भी उन्होंने अब हैदरअली के
ख़िलाफ़ भड़काना शुरू किया। इनमें एक छोटी सी रियासत
चित्तलद्रुग की थी। अंगरेज़ों ने वहाँ के राजा को भड़काकर उससे
हैदर के ख़िलाफ़ बगावत करवा दी। हैदर ने चित्तलद्रुग पर हमला
करके राजा को फिर से अपने अधीन कर लिया। इस लड़ाई में ही
हैदर ने अंगरेज़ों की बेवफ़ाई का पूरा परिचय पाकर खुले एलान कर
दिया कि मैं अंगरेज़ी इलाक़े पर हमला करने वाला हूँ। उसने फिर
एक बार दक्खिन के अन्दर मुग़ल दरबार के मुख्य नायब निज़ाम
से मदद की प्रार्थना की। निज़ाम ने फिर मदद का वादा किया
और फिर दूसरी बार ऐन मौक़े पर हैदर के साथ दग़ा की।
हैदरअली ३३६
अब वह समय आया जब कि नाना फड़नवीस ने अंगरेज़ों की
चालों और उनसे देश की हानि को अच्छी तरह
हैदर और नाना समझ कर सन् १७८० में अपना एक दूत
फड़नवीस में गणेशराव हैदर के पास मेल करने के लिए भेजा ।
अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ हैदर को भी अंगरेज़ों के चरित्र का काफ़ी अनुभव
सन्धि हो चुका था । हैदर और नाना फड़नवीस दोनों
में ख़ास समझौता हो गया । 'चौथ' की उस रक़म को, जो मैसूर
दरबार से पेशवा दरबार को मिला करती थी और जिस पर
मराठों और हैदर में अनेक बार झगड़े हो चुके थे, आइन्दा के लिए
नाना ने बहुत कम कर दिया । हैदर का जो इलाक़ा पहले मराठों ने
ले लिया था और हाल में टीपू ने मराठों से विजय किया था उसे
पेशवा दरबार ने हैदर ही का इलाक़ा स्वीकार कर लिया, और
हैदर ने मराठों से वादा किया कि अंगरेज़ों को हिन्दोस्तान से बाहर
निकालने में मैं आप लोगों की पूरी मदद करूँगा ।
अंगरेज़ों को जब इस सन्धि का पता चला और मालूम हुआ
कि हैदर अंगरेज़ी इलाक़े पर फिर से हमला करने की तैयारी कर
रहा है तो उन्होंने मद्रास से एक दूसरे के बाद दो दूत दोबारा
सन्धि करने के लिए हैदर के दरबार में भेजे । किन्तु हैदर अंगरेज़ों
को पूरी तरह समझ चुका था, उसने स्वीकार न किया । अंगरेज़
दूत ग्रे को उसने अंगरेज़ों की दग़ाबाज़ी पर लानत मलामत की और
अपने यहाँ उसके साथ वह सलूक किया जो एक राजदूत के साथ
नहीं, बल्कि किसी जासूस के साथ किया जाता है ।
३४० भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब मोहम्मदअली अंगरेज़ों के ख़ास मददगारों में से था।
[हाशिया: हैदरअली का] अंगरेज़ों के बहकाने से मोहम्मदअली ने हैदर
[हाशिया: करनाटक विजय] अली के साथ सन्धि के पालन करने से इनकार
[हाशिया: करना] कर दिया। करनाटक के मामले में अंगरेज़
बराबर दख़ल देते रहते थे, जिसकी वजह से करनाटक की प्रजा
अत्यन्त दुखी और असन्तुष्ट थी। हैदरअली अपनी सेना सहित
जुलाई सन् १७८० में सब से पहले करनाटक की ओर बढ़ा।
करनाटक के क़िलों की रक्षा के लिए जगह जगह कम्पनी की सेनाएँ
नियुक्त थीं। यह सब सेनाएँ कर्नल कॉस्बी के अधीन थीं।
हैदरअली ने पहले की तरह अपनी सेना के कई हिस्से किए और
एक हिस्सा अपने अधीन, दूसरा अपने बड़े बेटे टीपू के, तीसरा
टीपू के छोटे भाई करीम साहब के और बाक़ी छोटे बड़े दस्ते
अन्य योग्य हिन्दू और मुसलमान सेनापतियों के अधीन करनाटक
के अनेक क़िलों को विजय करने के लिए अलग अलग दिशाओं
में रवाना कर दिए। करनाटक की दुखी प्रजा ने बड़े हर्ष के
साथ हर जगह हैदर का स्वागत किया। कर्नल कॉस्बी और
नवाब मोहम्मदअली की सेनाओं से जगह जगह हैदर की
लड़ाइयाँ हुईं, जिनमें अंगरेज़ों को हार पर हार खानी पड़ी। नवाब
मोहम्मदअली और उसके अंगरेज़ साथी हैदर की बढ़ती हुई बाढ़
को न रोक सके। क़िले पर क़िला और इलाक़े पर इलाक़ा हैदर के
हाथों में आता चला गया। इनमें एक मुख्य महमूद बन्दर का
क़िला था जिसे अब पोर्टो नोवो कहते हैं। महमूद बन्दर उन दिनों
हैदरअली ३४१
भारत की विदेशी तिजारत का एक ज़बरदस्त केन्द्र था। दूर दूर
के व्यापारी वहाँ पर जमा होते थे और करोड़ों रुपए का माल
महमूद बन्दर की मण्डियों में भरा रहता था। अंगरेज़ी सेना
महमूद बन्दर की रक्षा के लिए मौजूद थी। करीम साहब ने सेना
सहित महमूद बन्दर पर हमला करके उसे अंगरेज़ी सेना से विजय
किया। क़िले और नगर पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ से करोड़ों
का माल लाकर अपने बाप के सामनें पेश किया। इसी तरह की
अनेक विजय टीपू और दूसरे सेनापतियों ने कीं। यहाँ तक कि
स्वयं हैदरअली की सेना बढ़ते बढ़ते करनाटक की राजधानी
अरकाट के निकट जा पहुँची और नवाब मोहम्मद अली को भाग
कर मद्रास में पनाह लेनी पड़ी।
१० अगस्त सन् १७८० को हैदर के कुछ सवार बढ़ते बढ़ते
मद्रास के निकट फिर सेण्ट टामस की पहाड़ी
[हैदरअली फिर] पर जा पहुँचे। हैदर की मुख्य सेना अभी तक
[मद्रास की ओर] करनाटक की राजधानी के आसपास थी, तब
भी मद्रास फिर ख़तरे में था। दो बड़ी सेनाएँ हैदर को परास्त
करने के लिए तैयार की गईं। इनमें पहली जनरल मनरो के अधीन
मद्रास से रवाना हुई और दूसरी कर्नल बेली के अधीन गुण्टूर से
राजधानी अरकाट की ओर चली। इनके अलावा तीन नई सेनाएँ
गुण्टूर, पुदुडुचरी और त्रिचन्नपल्ली में तैयार की गईं।
हैदर ने सबसे पहले टीपू को कर्नल बेली के मुक़ाबले के लिए
गुण्टूर की ओर रवाना किया। मार्ग में १० सितम्बर सन् १७८०
३४२ भारत में अंगरेज़ी राज
को पूरिमपाक में टीपू और करनल बेली की सेनाओं में लड़ाई
पूरिमपाक की हुई। जनरल मनरो ने अपना एक दस्ता बेली
लड़ाई की सहायता के लिए भेजा। उधर हैदर भी
रातों रात चल कर टीपू की सहायता के लिए
आ पहुँचा। मैदान ख़ूब गरम हुआ, टीपू की सेना ने सामने और
पीछे दोनों ओर से अंगरेज़ी सेना पर हमला करके और उनके बीच
में घुसकर अंगरेज़ी सेना का संहार शुरू किया। यहाँ तक कि
अंगरेज़ी सेना का तोपखाना बेकार हो गया। अन्त में उनके
तोपख़ाने में आग लग गई और अंगरेज़ी सेना को बुरी तरह हार
खानी पड़ी। लिखा है कि इस लड़ाई में कम्पनी के हज़ारों भारतीय
सिपाहियों के अलावा सात सौ अंगरेज़ मारे गए और दो हज़ार
को जिनमें स्वयं करनल बेली और सर डेविड बेयर्ड जैसे अफ़सर
शामिल थे हैदर ने गिरफ़्तार कर लिया। अंगरेज़ों के लिए
पूरिमपाक की हार अत्यन्त अशुभसूचक और लज्जाजनक थी।
हैदर ने अपनी राजधानी श्रीरङ्गपट्टन में दरियादौलत नामक बाग़
की दीवारों पर इस लड़ाई का एक विशाल सुन्दर चित्र खिंचवाया
जो अभी तक मौजूद है।
जनरल मनरो इस समय अपनी सेना सहित गञ्जी स्थान में
ठहरा हुआ था। विजयी हैदर ने गुण्टूर की
अरकाट की विजय अंगरेज़ी सेना को ख़त्म करके गञ्जी की ओर रुख़
किया। हैदर अभी गञ्जी से कुछ मील दूर ही था कि करनल बेली
की पराजय का हाल सुनकर और हैदर के सवारों को अपनी ओर
टीपू की सैन्य यात्रा
इस यात्रा और पोलिलूर के संग्राम के शेष चित्र
जिल्द के अन्त में पाकेट में हैं
[ सुपरिन्टेण्डेण्ट गवर्नमेण्ट गार्डन्स मैसूर की कृपा द्वारा, दरिया दौलत बाग़
के तत्कालीन चित्र से ]
This page is completely blank and contains no text to transcribe.
हैदरअली ३४३
बढ़ते हुए देख कर जनरल मनरो का साहस टूट गया । उसे हैदर
के मुक़ाबले की हिम्मत न हो सकी । उसने अपनी तोपें और तमाम
भारी सामान गञ्जी के एक बड़े भारी तालाब में फेंक दिया और
स्वयं अपनी सेना सहित पीछे हटकर मद्रास में पनाह ली। हैदर
ने पहले गञ्जी में पड़ाव किया, आसपास के कुछ क़िलों को फ़तह
किया और फिर उस तमाम इलाक़े के शासन और रक्षा का
उचित प्रबन्ध कर पीछे लौटकर राजधानी अरकाट का मोहासरा
शुरू कर दिया ।
तीन महीने तक अरकाट का मोहासरा जारी रहा। इस
मोहासरे में दोनों ओर काफ़ी जानें [**] । हैदर का दामाद सय्यद
हाफ़िज़ अली ख़ाँ भी अरकाट ही के मैदान में काम आया । अन्त
में हैदरअली की सेना ने अरकाट के क़िले और नगर दोनों पर
क़ब्ज़ा कर लिया ।
विजय के सबेरे हैदरअली ने अरकाट के बाज़ारों और गलियों
[हैदरअली की] में एलान करवा दिया कि नगर निवासियों के
[उदारता] जान माल पर कोई किसी तरह का हमला न
करे, कोई किसी ग़रीब को किसी तरह का कष्ट
न दे और मैसूर की सेना का कोई सिपाही न किसी के धन को
हाथ लगावे और न किसी स्त्री की ओर आँख उठाकर देखे।
अरकाट के बचे हुए अंगरेज़ों को उसने अपनी गारद के साथ
हिफ़ाज़त से मद्रास भिजवा दिया। अपने एक आदमी मीर सादिक़
- Colonel W. Miles' History of Hyder, p. 395.
३४४ भारत में अंगरेज़ी राज
को शहर और उसके आसपास के इलाके का सूबेदार नियुक्त कर
दिया। शहर के अधिकांश कर्मचारियों को अपने अपने ओहदों पर
बहाल रक्खा और क़िले की मरम्मत तथा रक्षा और नगर के
शासन का उचित प्रबन्ध कर दिया।
हैदर की विजयों की एक विशेषता यह थी कि वह जिन
इलाकों को फ़तह करता था वहाँ के क़िलों की मरम्मत, हिफ़ाज़त
और शासन का प्रबन्ध करके आगे बढ़ता था। हैदर हर जगह
इस बात का ख़ास इन्तज़ाम रखता था कि उसके सिपाही प्रजा
के ऊपर किसी तरह का अत्याचार न करें। वह अक्सर विजय
के बाद ग़रीबों, साधुओं और धार्मिक संस्थाओं में धन तक़सीम
किया करता था। यही व्यवहार हैदर के अन्य सेनापतियों का
होता था।
जिन अनेक स्थानों और क़िलों को अरकाट की विजय से
[पार्श्व-शीर्षक: हैदर अली और टीपू] पहले और उसके बाद, हैदर की सेना ने अंगरेज़ी
[पार्श्व-शीर्षक: की अनेक विजय] सेना से एक दूसरे के बाद विजय किया उन
सब का बयान यहाँ कर सकना नामुमकिन है।
हैदर के सेनापति मीर मुइउद्दीन ने दस दिन के मोहासरे के
बाद चितोर के क़िले को फ़तह किया और फिर चन्दरगिरि
के क़िले को जीत कर नवाब मोहम्मदअली के भाई अब्दुलवहाब
ख़ाँ को क़ैद किया। टीपू ने एक महीने के अन्दर महीमण्डलगढ़,
कैलाशगढ़, सातगढ़ इत्यादि अनेक मज़बूत क़िले फ़तह किए।
टीपू हर जगह अपने बाप के समान क़िले की पराजित सेना से
[Page Header: हैदरअली ३४५]
हथियार रखवा कर उन्हें आज़ाद छोड़ देता था और प्रजा के
जान माल और उनकी स्त्रियों के सतीत्व की रक्षा का पूरा
प्रबन्ध कर देता था।* आम्बूरगढ़ का क़िला टीपू ने वहाँ के अंगरेज़
क़िलेदार और उसकी सेना से १५ दिन के मोहासरे के बाद विजय
किया। इसी प्रकार हैदर के दूसरे सेनापतियों ने अन्य अनेक क़िलों
और इलाक़ों को विजय किया।
गवरनर जनरल वारन हेस्टिंग्स करनल बेली की सेना के
[उप-शीर्षक: अंगरेज़ों की घबराहट] सर्वनाश, जनरल मनरो की भगदड़ और हैदर
की अपूर्व विजयों के समाचार सुन कर घबरा
गया। बंगाल में [उस] समय भयंकर दुष्काल
पड़ा हुआ था। लिखा है कि प्लासी से उस समय तक यानी
अंगरेज़ी राज के शुरू के बीस साल के अन्दर बंगाल की आबादी
घटते घटते ८० लाख से ६० लाख रह गई थी।† तिस पर भी
वारन हेस्टिंग्स ने इन समाचारों को सुनकर अकाल पीड़ित बंगाल
के ख़ज़ाने से १५ लाख रुपए नक़द और सर आयर कूट के अधीन
एक बहुत बड़ी सेना मय तोपख़ाने के बंगाल से मद्रास के लिए
रवाना की। यह सेना ५ नवम्बर सन् १७८१ को मद्रास पहुँची।
मद्रास में नवाब मोहम्मदअली ने सर आयर कूट के सामने अपनी
तबाही का रोना रोया। मोहम्मदअली के पास अभी तक धन
मौजूद था, नई सेना के ख़र्च के लिए कूट ने दो लाख पैगोडा मानी
[Footnotes]
- Ibid p. 409.
† History of Hyder, By M. M. D. L. T., p. 162.
३४६ भारत में अंगरेज़ी राज
क़रीब सात लाख रुपए मोहम्मदअली से और वसूल किए। तीन
महीने तक सर आयर कूट मद्रास में रह कर हैदरअली से लड़ने की
केवल तैयारी करता रहा। उसके बाद वह अपनी विशाल सेना सहित
हैदरअली के मुक़ाबले के लिए बढ़ा। हैदरअली उस समय मद्रास के
नीचे के बन्दरगाहों और क़िलों को फ़तह कर रहा था। दो बार
जनरल कूट अपनी विशाल सेना लेकर हैदरअली के मुक़ाबले के लिए
बढ़ा। दोनों बार कई कई जगह कूट और हैदरअली की सेनाओं में
संग्राम हुए। किन्तु दोनों बार जनरल कूट को बेहद नुक़सान
उठाकर मद्रास लौट आना पड़ा। इस बीच और अधिक सेना
बंगाल से कूट की मदद के लिए भेजी गई। अन्त में तीसरी बार
जनरल कूट हैदरअली के मुक़ाबले के लिए बढ़ा। इस बार आरनी की
प्रसिद्ध लड़ाई में हार खाकर और लाचार होकर सितम्बर सन् १७८२
में सर आयर कूट को अपनी जान बचाकर बंगाल लौट जाना पड़ा।
इस तमाम समय में हैदरअली की सेना क़िलों पर क़िले और इलाकों
पर इलाक़े विजय करती बढ़ी चली आ रही थी और कहीं पर भी
अंगरेज़ी सेना हैदरअली की उमड़ती हुई बाढ़ को न रोक सकी।
इन तमाम लड़ाइयों में दो छोटी सी, किन्तु मनोरंजक घटनाएँ
बयान करने के क़ाबिल हैं।
पहली घटना तरकाटपल्ली की है। तरकाटपल्ली एक छोटा सा
क़िला था, जिस पर हैदरअली की सेना ने
दो मनोरंजक क़ब्ज़ा कर लिया था। त्रिचनपल्ली से अंगरेज़ों
घटनाएँ ने अपनी सेना का एक दस्ता इस क़िले पर
हैदरअली ३४७
क़ब्ज़ा करने के लिए भेजा। अकस्मात् उसी दिन रात को तंजोर
से एक दूसरा अंगरेज़ी दस्ता उसी क़िले पर क़ब्ज़ा करने के लिए
रवाना हुआ। ये दोनों अंगरेज़ी दस्ते दो ओर से क़िले की फ़सील
पर चढ़ने लगे। दोनों को एक दूसरे का पता न था। क़िला टीपू
के क़ब्ज़े में था, किन्तु टीपू उस समय अपनी सेना सहित क़िले
से कुछ दूर था। क़िले के अन्दर बहुत थोड़े से हिन्दोस्तानी थे।
इस अचानक हमले का पता लगते ही वे लोग क़िले के और भीतर
के हिस्से में चले गए। वे शायद टीपू के इन्तज़ार में थे। रात की
अँधियारी में एक ओर के अंगरेज़ी दस्ते ने फ़सील के ऊपर चढ़
कर गोलियाँ चलाईं। दूसरी ओर के अंगरेज़ी दस्ते ने समझा कि
यह गोलियाँ क़िले वाले चला रहे हैं। उन्होंने जवाब में आवाज़ के
निशाने पर गोलियों की बौछार शुरू की। दस मिनट से ऊपर
तक दोनों ओर से गोलाबारी होती रही। एकाएक जब एक ओर
के किसी अंगरेज़ की आवाज़ दूसरी ओर के किसी अंगरेज़ के
कानों तक पहुँची तो दोनों को मालूम हुआ कि वे आपस ही में
गोलियाँ चला रहे थे। उस समय तक कम्पनी के क़रीब सात सौ
सिपाही अंगरेज़ी गोलियों के शिकार हो चुके थे। अगले दिन
सुबह को जब टीपू ने तरकाटपल्ली पहुँच कर इस घटना का हाल
सुना तो उसे बड़ी हँसी आई।
दूसरी घटना मनियारगुडी की है। मनियारगुडी के क़िले की
सेना एक दिन रात को रसद आदि जमा करने के लिए आस पास
के इलाक़े में गई हुई थी। अंगरेज़ी सेना ने मौक़ा पाकर उसी रात
३४८ भारत में अंगरेज़ी राज
को अचानक क़िले पर हमला किया। केवल नायक, बीस सिपाही
और कुछ स्त्रियाँ क़िले में रह गई थीं। अंगरेज़ी सेना के हमले की
ख़बर पाकर नायक ने क़िले का फाटक बन्द करवा दिया, बड़े बड़े
पत्थर अँधेरे में क़िले की फ़सील पर रखवा दिए और स्त्रियों ने
बहुत सा गोबर और पानी घोलकर बड़े बड़े बरतनों में खौलाना
शुरू किया। जिस समय अंगरेज़ी सिपाही दीवारों पर चढ़ने लगे,
स्त्रियों ने चिल्ला कर पत्थर नीचे की ओर लुढ़का दिए और
खौलता हुआ गोबर का पानी अंगरेज़ी सेना के सर पर डालना
शुरू किया। भीतर के बीस सिपाहियों ने भी अपनी बन्दूकों का
उचित उपयोग किया। अं... सिपाहियों को एक बार घबरा कर
नीचे उतर आना पड़ा। इतने में क़िले की वह सेना जो बाहर गई
हुई थी, आवाज़ सुन कर क़िले की ओर लपकी। अंगरेज़ी सेना के
बचे हुए आदमियों को जान बचा कर भाग जाना पड़ा।
एक बार साफ़ मालूम होता था कि हैदरअली दक्खिन भारत
से अंगरेज़ों को निकाल कर बाहर कर देगा।
[हाशिया: हैदरअली की] नाना फड़नवीस पूना में बैठा हुआ यह सब
[हाशिया: अचानक मृत्यु] सुसमाचार सुन रहा था और इन्हीं आशाओं
के आधार पर सालबाई के सन्धि पत्र पर दस्तख़त करने से इनकार
कर रहा था। जिस समय गायकवाड़, सींधिया और भोंसले तीन
तीन ज़बरदस्त मराठा नरेश मराठा मण्डल और अपने देश दोनों के
साथ विश्वासघात कर चुके थे, और निज़ामुलमुल्क भी अंगरेज़ों
की चालों में फँस चुका था, उस समय इन विदेशियों के विरुद्ध
हैदरअली ३४६
नाना फड़नवीस की समस्त आशाओं का आधार केवल वीर हैदर
अली था । यदि हैदरअली एक बार मद्रास प्रान्त से अंगरेज़ों को
निकाल सकता तो निस्सन्दह नाना फड़नवीस मराठा मण्डल को
मज़बूत करके उत्तर में अंगरेज़ों के साथ फिर से युद्ध शुरू कर
देता । उत्तरी भारत में अंगरेज़ अपने अनेक दुश्मन पैदा कर चुके
थे और इस हालत में नाना को सफलता प्राप्त होने की भी बहुत
बड़ी सम्भावना थी । किन्तु मालूम होता है कि भारतवासियों के
अनेक पापों के प्रायश्चित और सच्ची भारतीय आत्मा के विकास के
लिए अभी इस देश का विदेशी शासन के अग्नि स्नान में से निकलना
आवश्यक था । ठीक उस समय जब कि वीर हैदरअली इलाक़ों पर
इलाक़े और गढ़ों पर गढ़ विजय करता हुआ बढ़ा चला जा रहा
था, जब कि भारत के अन्दर स्वतन्त्रता और परतन्त्रता के इस द्वन्द
को एशिया और यूरोप की समस्त जागरूक शक्तियाँ ध्यान से देख
रही थीं, जब कि हैदरअली का नाम सुनकर भारत के अंगरेज़ चौंक
पड़ते थे और इंगलिस्तान में कम्पनी के हिस्सों की दर धड़ाधड़
गिर रही थी, अचानक छै दिसम्बर सन् १७८२ की रात को अरकाट
के क़िले में हैदरअली की मृत्यु हो गई । हैदरअली की मृत्यु ने नाना
फड़नवीस की आशाओं को चूर चूर कर दिया और लाचार होकर
उसने सालबाई की सन्धि पर दस्तख़त कर दिए । अंगरेज़ों के लिए
हैदरअली की मृत्यु वास्तव में एक बहुत बड़ी बरकत साबित हुई ।
आरनी की विजय के बाद हैदरअली की कमर में एक फोड़ा
निकला, जिसके कारण उसे अरकाट लौट आना पड़ा । यह फोड़ा
३५० भारत में अंगरेज़ी राज
ही हैदरअली की मौत का पैग़ाम साबित हुआ। जब हैदरअली को
अपने रोग के असाध्य होने का पता लगा, उसने अपने तमाम
मन्त्रियों और सरदारों को बुलाकर राज्य के कार्य के विषय में
अन्तिम आदेश दिए। एक सेना पाँच हज़ार सवारों की उसने
मद्रास की ओर रवाना की। अपनी विशाल सेना के हर सिपाही
और मुलाज़िम को एक एक महीने की तनख़ाह बतौर इनाम के
दिलवाई और टीपू को, जो उस समय एक दूसरे मैदान में था,
बुलवा भेजा।
हैदरअली की आयु उस समय साठ साल से कुछ ऊपर थी।
डर था कि हैदरअली की मृत्यु के समाचार से
हैदरअली के हिन्दू उसकी विजयी सेना का उत्साह न टूट जावे।
मंत्री हैदरअली के दोनों मुख्य मंत्री हिन्दू थे जिनके
नाम पूर्णिया और कृष्णाराव थे। इन दोनों वफ़ादार मन्त्रियों ने
हैदरअली की मृत्यु को बड़ी होशियारी के साथ उस समय तक
शत्रु और अपनी सेना दोनों से छिपाए रक्खा जिस समय तक कि
हैदरअली के बड़े बेटे फ़तहअली टीपू ने अरकाट में पहुँच कर अपने
बाप की जगह न ले ली। टीपू के आने पर सुलतान हैदरअली
का शव मैसूर की राजधानी श्रीरङ्गपट्टन भेजा गया, जहाँ बड़े
समारोह के साथ उसे लाल बाग़ में दफ़न किया गया, और
टीपू ने पिता की क़ब्र के ऊपर एक सुन्दर और आलीशान
समाधि बनवाई।
टीपू अपने बाप के समान वीर, किन्तु अभी नातजरुबेकार था।