सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

२४८ भारत में अंग्रेज़ी राज
पैदावार पर फूलते फलते थे। उनकी संख्या पाँच लाख से ऊपर
अनुमान की जाती थी।"*
किन्तु महाराजा बनारस आस पास के राजाओं में सब से
अधिक धनवान मशहूर था।
सन् १७७६ में अवध के नवाब ने बनारस का इलाक़ा कम्पनी
के नाम कर दिया। कम्पनी ने अपनी ओर से एक नई सनद जारी
करके बलवन्तसिंह के पुत्र चेतसिंह को पिता के तमाम अधिकार दे
दिए। एक अंग्रेज़ रेज़ीडेन्ट बनारस के दरबार में रहने लगा
और महाराजा चेतसिंह की शुमार अंग्रेज़ कम्पनी के मित्रों में
होने लगी।
अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों में लड़ाई छिड़ी। वारन हेस्टिंग्स ने
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की] महाराजा चेतसिंह को पाँच लाख रुपए सालाना
[हाशिया: महाराजा बनारस] खर्च पर अपने यहाँ तीन पलटनें रखने का हुकुम
[हाशिया: से छेड़ छाड़] दिया। चेतसिंह की प्रजा उससे सन्तुष्ट थी।
उसे इस सेना की कोई ज़रूरत न थी। पाँच
लाख सालाना का ख़र्च भी उसके लिए बहुत अधिक था। उसने
एतराज़ किया, किन्तु कोई सुनाई न हुई। अन्त में उसे वारन
हेस्टिंग्स की आज्ञा माननी पड़ी। तारीफ़ यह कि इन पलटनों के

  • "Bulwant Singh was an excellent ruler; . . . his people were
    happy, and the country prosperous, . . . the peasantry fearless of unjust
    exaction or personal wrong, cultivated their fields like gardens, and throve
    on the fruits of their unwearied industry. Their numbers were estimated at
    more than half a million, . . ."—Torrens' Empire in Asia, p. 124.

The provided image is completely blank and contains no visible text or content to transcribe.

काशी नरेश राजा चेतसिंह
[ By the courtesy of the curator, Victoria Memorial, Calcutta. ]

वारन हेस्टिंग्स २४६
अफ़सरों का अंगरेज़ होना और कम्पनी का उन पर अधिकार
रहना ज़रूरी था।
दो साल बाद महाराजा चेतसिंह को हुकुम मिला कि इसी
प्रकार एक पलटन सवारों की भी अपने यहाँ रक्खो। इस बार
उसने इनकार कर दिया। वारन हेस्टिंग्स केवल बहाना ढूंढ रहा
था। उसने फ़ौरन सेना सहित बनारस पर चढ़ाई की। चेतसिंह
ने आगे बढ़ कर बक्सर में वारन हेस्टिंग्स से भेंट की और
अपनी अधीनता प्रकट करने के लिए अपनी पगड़ी उतार कर
वारन हेस्टिंग्स के पैरों पर रख दी। फिर भी वारन हेस्टिंग्स
न रुका। उसने सीधे बनारस पहुँच कर चेतसिंह के महल को
घेर लिया और रेजिडेन्ट को आज्ञा दी कि चेतसिंह को क़ैद कर
लिया जावे।
बनारस की प्रजा इस अंधेर को देख कर भड़क उठी। वहाँ के
लोगों में अभी जान बाक़ी थी। वे कम्पनी की सेना पर टूट पड़े।
तुरन्त तमाम अंगरेज़ सिपाही एक एक कर क़त्ल कर डाले गए।
बदला लेने के लिए अब और अधिक सेना भेजी गई। ख़ूब घमासान
युद्ध हुआ।
रात को चेतसिंह के कुछ नौकरों ने जब यह देखा कि बनारस
का क़िला शत्रु के हाथों में पड़ने वाला है तो अपनी पगड़ियों की
रस्सी बना कर उसके ज़रिए महाराजा चेतसिंह को महल की एक
खिड़की से नीचे उतार दिया। गंगा के उस पार रामनगर के क़िले
में चेतसिंह का मुख्य ख़ज़ाना था। चेतसिंह अपनी माता और

२५० भारत में अंगरेज़ी राज
रानी समेत भाग कर वहाँ पहुँचा। अन्त में रामनगर का क़िला
भी जीत लिया गया और चेतसिंह ने एक गृहविहीन बटोही
की तरह वहाँ से भागकर ग्वालियर की रियासत में अपने शेष
दिन बिताए।
हेस्टिंग्स ने फ़ौरन उसकी जगह उसी कुल के एक १६ साल के
लड़के को बनारस की गद्दी पर बैठा दिया।
[बनारस की लूट] कम्पनी का ख़िराज बढ़ा कर बीस लाख रुपए
[और बरबादी] सालाना कर दिया गया। नए महाराजा के
अनेक अधिकार छीन कर रेजिडेण्ट को दे दिए गए। शासन प्रणाली
और राज कर्मचारियों में अनेक उलट फेर हुए। प्रजा पर अब नित्य
नए अत्याचार होने लगे। दुखित और बे सरदार की प्रजा ने नए
अमलदारों और उनके अत्याचारों के विरुद्ध बार बार विद्रोह किया
और सत्याग्रह किए, किन्तु अन्त को 'जिसकी लाठी उसकी भैंस।'
लूट खसोट और नई अमलदारी का नतीजा यह हुआ कि "थोड़े
दिन पहले जहाँ सुख और शान्ति विराजमान थी वहाँ अब दुख
और असन्तोष ने उसकी जगह ले ली।" दो साल बाद जब वारन
हेस्टिंग्स फिर बनारस गया तो उसे तमाम नगर उजड़ा हुआ
दिखाई दिया।* आबादी घटते घटते सन् १८२२ में केवल दो लाख
रह गई।

  • "Misery and distraction took the place which had recently been
    occupied by comfort and content . . . two years later, when Hastings
    revisited the scene . . . he found it one of desolation."—Torrens'
    Empire in Asia. p. 125.

वारन हेस्टिंग्स २५१
किन्तु इंगलिस्तान से धन की माँग बढ़ती गई। वारन हेस्टिंग्स
की व्यक्तिगत धन पिपासा भी बनारस की लूट
अवध की बेगमों से शान्त न हो सकी। बनारस से लौटते ही उसने
पर अत्याचार अवध की ओर दृष्टि डाली। बनारस का हाल
हमने इंगलिस्तान की पार्लिमेट के मेम्बर, इतिहास लेखक टॉरेन्स
की पुस्तक “इम्पायर इन एशिया” से लिया है। अवध की कहीं
अधिक दुखमय कहानी भी ठीक टॉरेन्स ही के शब्दों में नीचे बयान
की जाती है। अनेक बार ही कम्पनी की ओर से बड़ी बड़ी रक़में
बिना किसी कारण अवध के नवाब से माँगी जा चुकी थीं और
जबरन् वसूल की जा चुकी थीं, किन्तु इस बार—
“नवाब आसफ़ुद्दौला ने अपनी निर्धनता की बिना पर माफ़ी चाही और
इस निर्धनता का एक कारण यह बताया कि मुझे अपने यहाँ की 'सब्सिडीयरी'
सेना के खर्च के लिए एक बड़ी रक़म हर साल कम्पनी को देनी पड़ती है।
निस्सन्देह यह कारण सच्चा था। इसके बाद इस डर से कि कहीं (बनारस
की तरह) गवर्नर जनरल लखनऊ न आ धमके, आसफ़ुद्दौला स्वयं
हेस्टिंग्स से मिलने और अपनी स्थिति समझाने के लिए आगे बढ़ा। चुनार
के क़िले के अन्दर दोनों में बातचीत हुई। वहाँ एक ऐसी याद रखने योग्य
तदबीर निकाली गई, जिससे कलकत्ते का ख़ज़ाना भर जावे और लखनऊ
का ख़ज़ाना ख़ाली भी न करना पड़े। लॉर्ड मैकॉले ने लिखा है—'तदबीर
केवल यह थी कि गवर्नर जनरल और नवाब वज़ीर दोनों मिलकर एक तीसरे
शख़्स को लूटें, और जिस तीसरे शख़्स को लूटने का उन्होंने निश्चय किया,
वह इन दोनों लूटने वालों में से एक की माँ थी।' समझा जाता था कि

२५२ भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब शुजाउद्दौला मरते समय अपनी माँ और अपनी विधवा बेगम दोनों
को बड़े बड़े ख़ज़ाने दे गया है। फ़ैज़ाबाद के महल भी वह उन्हीं के नाम
कर गया था, और ये दोनों बेगमें अपने अनेक सम्बन्धियों, बाँदियों और
नौकरों के साथ अपने इन्हीं प्यारे महलों में रहती थीं। इस धूर्तता की राय
देने वाला माननीय गवरनर जनरल था । आसफ़ुद्दौला सुनकर शर्म से काँप
उठा । x x x अन्त को x x x सौदा पक्का हो गया और दोनों अलग
अलग अपनी अपनी ओर से इस दग़ाबाज़ी की ज़ाब्तापूरी में लग गए । तय
हुआ कि x x x फ़ैज़ाबाद में रहने वाली कुम्हलाई हुई औरतों के सर यह
इलज़ाम मढ़ा जावे कि तुम अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ चेतसिंह के साथ साज़िश
कर रही हो । यदि किसी तरह यह साज़िश साबित की जा सके तो फिर
बेगमों को हर तरह का दण्ड देना या उनके धन की ज़ब्ती जायज़ ठहराई जा
सकेगी; इसलिए साबित करना ज़रूरी था और साबित भी बाज़ाब्ता तरीक़े
से करना । जब लोगों को पता चला कि अंगरेज़ क्या चाहते हैं, तो झूठे
गवाह खड़े हो गए x x x बेगमों की तरफ़ से न कोई जवाबदेही करने वाला
था और न कोई वकालत करने वाला x x x । अब पेश्तर इसके कि बेगमों
के महल के फाटकों को तोड़कर अंगरेज़ी सेना भीतर घुस सके, केवल एक
कठिनाई और बाक़ी थी—लोकाचार और शिष्टता के एक रेशमी बन्धन को
तोड़ना ज़रूरी था। वह बन्धन यह था कि शुजाउद्दौला मरते समय अपने
इन सम्बन्धियों को अंगरेज़ सरकार की ख़ास संरक्षता में छोड़ गया था,
और गो कि अब स्थिति बदल चुकी थी, किन्तु उस समय अंगरेज़ सरकार
ने यह ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी । x x x सर एल्लाहजाह इम्पे पहले
भी कई ऐसी कठिनाइयों के मौक़े पर काम दे चुका था । इस संकट के समय

वारन हेस्टिंग्स २५३
वह फिर वारन हेस्टिंग्स का दोस्त साबित हुआ । x x x अपनी पालकी में
बैठकर ग़ैर ईसाई कहारों की डॉक लगवाकर उनके कन्धों पर सर एलाइज़ाह
इम्पे कलकत्ते से लखनऊ रवाना हुआ; x x x एक माननीय वाइसराय की
आज्ञा पर उस वाइसराय को डकैती में मदद देने के लिए ईसाई चीफ़ जस्टिस
को पूरी तेज़ी के साथ अपने कन्धों पर ले जाने में ग़ैर-ईसाई हिन्दुओं का
उपयोग किया गया । रूहानी अन्धकार में डूबी हुई जनता को यूरोपियन
व्यवहार और यूरोपियन सदाचार की श्रेष्ठता का इससे बढ़कर और क्या सबूत
मिल सकता था ? अवध की राजधानी में पहुँच कर चीफ़ जस्टिस ने बहुत से
हलफ़नामे लिए, जिनमें बेगमों पर यह इलज़ाम लगाया गया कि वे चेतसिंह
के न्याय्य मालिकों यानी कम्पनी के विरुद्ध उस फ़रज़ी साज़िश में चेतसिंह
से मिली हुई थीं । सर एलाइज़ाह ने न हलफ़नामे पढ़े, न किसी से पढ़वाकर
सुने । वे एक ऐसी ज़बान में थे जिसे इम्पे समझता तक न था और न उसके
पास इतना समय था कि किसी दूसरे से तरजुमा करवाने का इन्तज़ार
करता । एशिया के अन्दर इंगलिस्तान के प्रधान न्यायाधीश की हैसियत से
उसने हलफ़नामे लिए और 'अपने उच्च अधिकार के इस घृणित दुरुपयोग'
को पूरा कर फिर पालकी में बैठ कलकत्ते लौट आया । x x x फ़ैज़ाबाद के
महलों को अंगरेज़ी सेना ने घेर लिया । बेगमों से कहा गया कि आप क़ैदी
हैं और अपने तमाम ज़ेवर, सोना, चाँदी और जवाहरात दे दीजिए । जब
बेगमों ने इनकार किया तो महल की शरीफ़ औरतों को भूखों मारा गया और
उनके नौकरों को बड़ी बड़ी यातनाएँ दी गईं । बेगमें जब इन लोगों के रोने
चीख़ने की आवाज़ों को न सह सकीं तो उन्होंने पिटारों पर पिटारे और
ख़ज़ानों पर ख़ज़ाने देना शुरू किया, यहाँ तक कि कुल लूट की क़ीमत का

२५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अन्दाज़ा एक करोड़ बीस लाख किया गया। जब तक यह रक़म पूरी न हुई
तब तक उन अभागे नौकरों और बाँदियों को रिहा न किया गया। उस
भयंकर काण्ड का यह सब केवल एक ढाँचा है। जिन जिन बातों से इस चित्र
(ढाँचे) में सच्चे रंग भरे जा सकते हैं उन सब पर आज विस्मृति (काल)
ने परदा डाल दिया है, जो अब किसी तरह हटाया नहीं जा सकता।” ꕤ

  • " Asafuddoula pleaded poverty, and named, with some truth.. that
    amongst its causes was the annual contribution he was obliged to pay for
    the maintenance of the subsidiary force. Dreading a visit from the Viceroy,
    he went to meet him; and at the fortress of Chunar the negotiations took
    place which resulted in the memorable device for replenishing the exchequer
    of Calcutta without exhausting that of Lucknow. 'It was,' says Lord
    Macaulay, 'simply this, that the Governor-General and the Nawab-Vizier
    should join to rob a third party, and the third party whom they determined to
    rob was the parent of one of the robbers.' The mother and the widow of the
    late Vizier were supposed to have derived, under his will, vast treasures.
    They dwelt with a numerous retinue at the favourite palace of Fyzabad, which
    he had bequeathed to them. Asafuddoula shrank in shame from the villainy
    suggested by his Right Honourable Accomplice. . . The confederates, having
    ratified the bargain, parted, and each went his way to prepare the formalities
    of fraud. A conspiracy to aid Chait Singh in his resistance to intolerable
    exaction was to be imputed to the withered women who dwelt at Fyzabad.
    If such a breach of friendship could be proved, it would justify any penalty
    or forfeiture; therefore it must be proved and proved in a regular respectable
    way. When it was known what was wanted, false witnesses rose up. . . .
    against the undefended Princesses of Oudh, . . . no advocate . . . .
    Still there was a difficulty: a silken cord of conventional decency had to
    be snapped before the palace gates of the Begums could be forced open by
    English troops. The dying Vizier had placed these members of his family
    under the special protection of the British Government, and for reasons
    apparently good at the time, but good no longer, that Government had
    accepted the trust . . . . Not for the first time Sir Elijah Impey proved

वारन हेस्टिंग्स २५५
इसके बाद टोरेन्स बयान करता है कि किस प्रकार इन समस्त
अत्याचारों ने, अवध के नवाब पर कम्पनी की आए दिन की माँगों
ने, और वहाँ के राजशासन में अंगरेज़ों के नित्य हस्तक्षेप ने मिलकर
आसफुद्दौला को मिटा डाला, अवध निवासियों की हिम्मतों को
कुचल कर ख़ाक कर दिया और उत्तरीय भारत के उस हरे भरे
बाग़ को थोड़े ही दिनों में इधर से उधर तक वीरान कर डाला।
himself to be a friend in need. . . . Sir Elijah got into palanquin, and
posted to Lucknow, by relays of pagan bearers;--for were not pagans made
to bear Christian Chief Justice on their shoulders, when at full speed to aid
in the Commission of robbery at the command of a Right Honourable
Viceroy? What could more clearly prove to a soul-darkened population
the superiority of European manners and morals? Arrived in the capital
of Oudh, the Chief Justice took a number of affidavits which accused the
Begums of complicity with Chait Singh, in his supposed conspiracy against
his lawful masters, the Company. Sir Elijah did not read the affidavits, or
hear them read. They were in a dilect he did not understand, and he had
not time to wait for an interpreter. So he took them as Chief Magistrate
of England in the East; and this "scandalous prostitution of his high
authority" being completed, he got into his palanquin again, and returned to
Calcutta. . . . The farce concluded, tragic scenes began. The palace
of Fyzabad was surrounded by English troops. The princesses were told
that they were captives, and required to deliver up their gold and jewels.
On their refusal, their ladies were subjected to semi-starvation and their
servants to torture. Unable to endure their groans and tears, the Begums
gave up casket after casket, and store after store, until the sum of spoil was
reckoned at £s 12,00,000. Then, and not till then, their wretched menials
were let go. Such are the bare outlines of the dreadful tale. Over
all that could furnish forth the true coloring of the picture, the veil of
oblivion has fallen, and it can not now be raised. . . Asafuddoula
. . . lost influence and power. . . . the desolation that overspread
the country, . . ."--Torren's Empire in Asia, pp. 126-128.

२५६ भारत में अंगरेज़ी राज
उन दिनों कम्पनी के प्रायः सब अंगरेज़ मुलाज़िम कम्पनी
भारत से हेस्टिंग्स के लाभ के साथ साथ अपने व्यक्तिगत लाभ का
की कमाई भी ख़ासा ख़याल रखते थे। वारन हेस्टिंग्स को
भी अपनी हर राजनैतिक चाल में इस बात का
पूरा पूरा विचार रहता था। नज़रानौं और रिश्वतों का बाज़ार
चारों ओर गरम था। इतिहास लेखक जे० टालबॉयज़ व्हीलर
लिखता है :—
“हेस्टिंग्स ने क़बूल किया कि उसने सन् १७८२ में आसफ़ुद्दौला से
१० लाख रुपए लिए। इससे अनुमान होता है कि सन् १७७३ में उसने
इतनी ही रक़म शुजाउद्दौला से लेकर चुपके से जेब में डाल ली थी। जिन
कर्मचारियों को कुछ भी राजनैतिक तजरुबा है, उन्हें इसमें कोई शक नहीं हो
सकता कि यदि इससे पहले आसफ़ुद्दौला के बाप शुजाउद्दौला ने इतनी ही
रक़म हेस्टिंग्स को न दी होती और हेस्टिंग्स ने मंज़ूर न कर ली होती तो
आसफ़ुद्दौला हरगिज़ दस लाख रुपए हेस्टिंग्स की नज़र न करता।”*
कलकत्ता कौन्सिल की ११ अप्रैल सन् १७७५ की काररवाई की
रिपोर्ट में दर्ज है कि अपनी गवर्नरी के केवल पहले तीन साल के
अन्दर वारन हेस्टिंग्स इन ज़रियों से “चालीस लाख रुपए से

  • “ Hastings acknowledged to having taken a hundred thousand pounds
    from Asafuddoula in 1782. The inference follows that in 1773 he received
    a like sum from Shujauddoula and silently pocketed the money. Officers of
    any political experiences would be satisfied that Asafuddoula would never
    have offered the hundred thousad pounds to Hastings, unless a like sum had
    been previously offered by his father, Shujauddoula, and accepted by
    Hastings.”—J. Talboys Wheeler in his Short History of India, etc.

ऊपर” कमा चुका था। वास्तव में हेस्टिंग्स के ख़िलाफ़ नन्दकुमार
की शिकायतें झूठी न थीं। हमें यह भी याद रखना चाहिये कि डेढ़
सौ साल पहले भारत के अन्दर चालीस लाख रुपए की उतनी
क़ीमत थी जितनी आज आठ करोड़ की, और ‘चालीस लाख’ के
आदमी उन दिनों इंगलिस्तान में इतने ही कम थे जितने आठ
करोड़ के आज दिन भारत में।
वारन हेस्टिंग्स जिस तरह रिश्वतें लेता था उसी तरह देता
[हाशिया: कम्पनी के] और दिलवाता भी था। उसके अनेक छोटे और
[हाशिया: कर्मचारियों द्वारा] बड़े काले और गोरे दलाल कम्पनी की अमलदारी
[हाशिया: देश व्यापी लूट] भर में तमाम महकमों के अन्दर फैले हुए थे, जो
देशी नरेशों और भारतीय प्रजा दोनों को तरह
तरह से लूटते थे और उन पर तरह तरह के अत्याचार करते थे।
कोलब्रुक नामक अंगरेज़ ने २८ जुलाई सन् १७८८ को एक
पत्र भारत से इंगलिस्तान अपने पिता के नाम भेजा, जिसमें उसने
लिखा :—
“मिस्टर हेस्टिंग्स ने इस देश को ऐसे कलक्टरों और जजों से भर दिया
है, जिनके सामने एक मात्र लक्ष्य धन कमाना है। ज्योंही ये गिद्ध मुल्क
के ऊपर छोड़े गए, उन्होंने कहीं कोई बहाना निकाल कर और कहीं बिना
किसी बहाने के देशवासियों को लूटना शुरू कर दिया। × × × जज लोग
मुक़दमे का फ़ैसला उसके हक़ में करते हैं जो उन्हें सबसे ज़्यादा रुपए देता
है। और चोर निर्विघ्न डाके डालने के बदले में बाज़ाब्ता सालियाना अदा
करते हैं।”
१७

२५८ भारत में अंगरेज़ी राज
आगे चलकर कोलब्रुक लिखता है :—
“वारन हेस्टिंग्स की कूटनीति और उसके निर्लज्ज
गोरखपुर के विश्वासघात का प्रभाव केवल राजाओं और बड़े लोगों
अत्याचार पर ही नहीं पड़ा । ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ छीन लेना,
बेगमों को लूटना, रुहेलों को निर्वंश कर डालना, ये सब भूले जा सकते हैं,
किन्तु जो अत्याचार उसने गोरखपुर में किए वे सदा के लिए ब्रिटिश जाति
के नाम पर एक कलङ्क रहेंगे ।”*
गोरखपुर के इन अत्याचारों के विषय में जेम्स मिल लिखता है
कि सन् १७७८ में वारन हेस्टिंग्स ने अपने एक अफ़सर करनल
हैनेवे को कम्पनी की नौकरी से निकाल कर अवध के नवाब के यहाँ
भेज दिया। नवाब पर ज़ोर देकर बहराइच और गोरखपुर के
ज़िलों का दीवानी और फ़ौजी शासन करनल हैनेवे को दिलवा
दिया गया । मिल लिखता है कि—“यह तमाम इलाक़ा नवाब के
शासन में खूब खुशहाल था, किन्तु करनल हैनेवे के अत्याचारों के
कारण तीन साल के अन्दर यह तमाम इलाक़ा वीरान हो गया ।”

  • "It was Mr. Hastings who filled the country with collectors and
    judges who adopted one pursuit- a fortune. These harpies were no sooner
    let loose upon the country, than they plundered the inhabitants with or
    without pretences. . . . Justice was dealt out to the highest bidders by
    the Judges, and thieves paid a regular revenue to rob with impunity. . . .
    "Nor did his crooked politics and shamless breach of faith affect none
    but the princes and great men; the deposition of zemindars, the plundering
    of Begums, the extermination of the Rohillas may be forgotten, but the
    cruelties acted in Gorukhpore will for ever be quoted to the dishonor of the
    British name."—Colebrooke in a private letter to his father, dated 28th
    July, 1788.

वारन हेस्टिंग्स २५६
लिखा है कि—"हैनेवे ने कोई लगान नियत न कर रक्खा था, बल्कि
जिस समय जिस ज़मींदार या रय्यत से जितना चाहता था, अपने
कलक्टरों द्वारा वसूल कर लेता था । इलाक़े भर के अन्दर जो लोग
अदा करने में असमर्थ होते थे उन्हें आम तौर पर क़ैद और कोड़ों
की सज़ा दी जाती थी। लोग अपने घर बार और गाँव छोड़ छोड़
कर निकल गए । बहुतों को इतना दिक़ किया गया कि उन्हें अपने
बच्चे तक बेच देने पड़े।"*
मिल लिखता है कि कम्पनी का एक मुलाज़िम कप्तान एडवर्ड्स
सन् १७८० में इस इलाक़े को देखने के लिए गया । उसने देखा कि
देश के बहुत कम हिस्से में खेती की गई थी, आबादी बहुत कम
रह गई थी और जो इने गिने आदमी उस इलाक़े में रह गए थे वे
अत्यन्त दुखी दिखाई देते थे। मिल यह भी लिखता है कि जिस
समय कर्नल हैनेवे ने नवाब के यहाँ जाकर नौकरी की, उस समय
हैनेवे के ज़िम्मे क़र्ज़ा था, किन्तु तीन साल के अन्दर क़र्ज़ा
अदा करने के बाद उसके पास क़रीब ४५,००,००० रुपए नक़द
मौजूद थे।
नवाब ने इन अत्याचारों की ख़बर सुनकर सन् १७८१ में

  • ". . . . . the country, from a very flourishing state . . . had
    been reduced to misery and desolation; that taxes were levied, not according
    to any fixed rule, but according to the pleasure of the Collector; that
    imprisonments and scourgings, for enforcing payment, were common in
    every part of the country; that emigrations of the people were frequent;
    and that many of them were so distressed as to be under the necessity of
    selling their children."—Mill, Book v, Chapter 8.

२६० भारत में अंगरेज़ी राज
कर्नल हैनेवे को बरख़ास्त कर दिया। इसके बाद जब नवाब को
मालूम हुआ कि हेस्टिंग्स फिर कर्नल हैनेवे को मेरे सिर मढ़ने
की तजवीज़ कर रहा है तो नवाब ने हेस्टिंग्स को लिख दिया
कि—"मैं हज़रत मोहम्मद की क़सम खाता हूँ कि यदि आपने
मेरे यहाँ किसी काम पर भी कर्नल हैनेवे को नियुक्त किया तो मैं
सल्तनत छोड़कर निकल जाऊँगा।”*
दुर्भाग्यवश उस समय के कम्पनी के शासन का कोई सच्चा और
विस्तृत इतिहास किसी भारतवासी के हाथ का लिखा हुआ मौजूद
नहीं है।
अब हम फिर कोलब्रुक के पत्र की ओर आते हैं। हमें
[लगान का बढ़ाया] याद रखना चाहिए कि कम्पनी ही इस समय
[जाना] सारे बंगाल, बिहार और उड़ीसा की प्रजा से
लगान वसूल करती थी। यह लगान जिस
हिसाब से वसूल किया जाता था, उसके विषय में कोलब्रुक
लिखता है :—
"जिस पद्धति के अनुसार इस देश के अन्दर अंगरेज़ी इलाक़ों का शासन
किया जा रहा है उससे प्रजा की खुशहाली पर बुरा असर पड़ा है। × × ×
नमक और अफ़ीम के ठेक़ों का या उन तरीक़ों का जिनसे कम्पनी की
तिजारती पूँजी जमा की जाती है ज़िक्र छोड़कर, मैं केवल ज़मीन के लगान
का ज़िक्र करता हूँ। ज़मीन का लगान जहाँ तक बढ़ाया जा सकता था, बढ़ा
दिया गया है। मुग़ल सरकार के अधीन कोई ज़मींदार अपनी ज़मींदारी की


  • Mill, Book v, Chapter, 8.

वारन हेस्टिंग्स २६१
आमदनी का आधा भी सरकार को न देता था और छोटी ज़मींदारियों से तो
इससे भी कहीं कम लिया जाता था। इसके अलावा ज़मींदारों को कुछ रक़म
बतौर पेनशन के अपने हिसाब में जमा कर लेने की इजाज़त थी, या उसकी
जगह उन्हें कुछ ज़मीनें माफ़़ी में मिल जाती थीं। इसके विपरीत कम्पनी के
अधीन ज़मींदार के पास अपने यहाँ की आमदनी का केवल दस फ़ी सदी रहने
दिया जाता है। × × × प्रजा के साथ जिस तरह का बर्ताव किया जा रहा
है, उससे वे सदा याद रक्खेंगे कि कभी किसी भी विजेता ने अपनी किसी
पराजित जाति के कन्धों पर इससे भारी जुआ नहीं रक्खा।”*
वारन हेस्टिंग्स के अत्याचारों की अनेक संगीन शिकायतें
[वारन हेस्टिंग्स पर] इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के कुछ मेम्बरों के पास
[मुक़दमा] पहुँचीं। पार्लिमेण्ट में कुछ न्यायप्रेमी मेम्बर भी
मौजूद थे। इनकी ओर से पार्लिमेण्ट के सामने
वारन हेस्टिंग्स पर रिश्वतख़ोरी और अनेक अन्य घोर अन्यायों के


* "The system upon which the British dominions have been governed
in the East, has affected the happiness of the people . . . . not to mention
monopolies of salt and opium, or the principles upon which the Company's
investment has been provided, I may confine myself to the stretching the
land rents to the utmost sum they can produce. A proprietor of an estate
under the Mogul Government, seldom paid half of the produce of his estate,
and in small properties much less ; he was further allowed to take credit for
a certain sum by way of pension or held rent-free lands in lieu there of.
Under the Company, a landholder is allowed ten per cent of net produce
as his share. . . . .
"The treatment of the people has been such as will make them remem-
ber the yoke as the heaviest that ever conquerors put upon the necks of
conquered nations."—Colebrooke in the above letter.

२६२ भारत में अंगरेज़ी राज
विषय में मुक़दमा चलाया गया। सुप्रसिद्ध विद्वान एडमएड बर्क
ने अपनी अमर वक्तृताओं में कम्पनी और वारन हेस्टिंग्स के उन
दिनों के कलुषित कृत्यों की ख़ूब पोल खोली। इन वक्तृताओं का
पढ़ना ब्रिटिश भारतीय इतिहास के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए आवश्यक
है। सात साल तक मुक़दमा चलता रहा, किन्तु वास्तव में
इंगलिस्तान के सामने प्रश्न न्याय अन्याय का न था। प्रश्न था अंग-
रेज़ क़ौम के हित और अंगरेज़ क़ौम के राज का। वारन हेस्टिंग्स ने
जो कुछ किया था, अपनी क़ौम के हित के लिए और भारत में
अंगरेज़ी राज को मज़बूत करने के लिए किया था। इसलिए अन्त
में ब्रिटिश पार्लिमेण्ट ने उसे सब इलज़ामों से साफ़ बरी कर दिया।
इस तमाम मुक़दमे में वारन हेस्टिंग्स के क़रीब १० लाख रुपए
ख़र्च हुए, जो निस्सन्देह उसकी भारत की कमाई का केवल एक
हिस्सा था। कम्पनी के मालिकों ने फ़ौरन हरजाने के तौर पर
आइन्दा २८ साल तक के लिए चालीस हज़ार रुपए सालाना वारन
हेस्टिंग्स को देने का वादा किया, जिसमें से अधिकांश उन्होंने उसी
समय पेशगी अदा कर दिया। हेस्टिंग्स इससे कई गुना अधिक
कम्पनी को लाभ पहुँचा चुका था।
सर एलाइजाह इम्पे पर भी “रिश्वतें लेने, अन्याय करने, झूठी
गवाहियाँ बनाने, झूठे हलफ़नामे तसदीक़ करने”* इत्यादि का
* "Gross corruption, positive injustice, . . . . intentional violation
of the Acts under which he held his powers, . . . . having suborned
evidence and given to falsehood the sanctity of an affidavit"—Impeachment
of Sir Elijah Impey, December 12th, 1787

वारन हेस्टिंग्स २६३
मुक़दमा चलाया गया । किन्तु अन्त में इंगलिस्तान के शासकों ने
यह कहकर कि “उसके जुर्मों का केवल प्रगट हो जाना ही काफ़ी
है” उसे साफ़ छोड़ दिया ।
भारत में श्रंगरेज़ी राज की जड़ें इस प्रकार पक्की की गईं ।

आठवाँ अध्याय
पहला मराठा युद्ध
छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के क़रीब ७५ साल के अन्दर १८वीं
सदी के मध्य में मराठों की सत्ता अपनो शिखर
मराठा मण्डल को पहुँच चुकी थी । मुग़ल साम्राज्य उस समय
अत्यन्त जर्जर हालत में था और दो सौ साल से ऊपर के उस
पुराने साम्राज्य के खंडहरों में से उत्पन्न होकर मराठों का साम्राज्य
एक बार समस्त भारत पर फैलता हुआ मालूम होता था । स्वयं
दिल्ली और दिल्ली का सम्राट दोनों मराठों के हाथों में थे । रघुनाथ
राव की मराठा सेना राजधानी से आगे बढ़ कर लाहौर विजय कर
चुकी थी और पराजित अफ़ग़ान सेना को अटक के पार भगा कर
पंजाब का सूबा मराठा साम्राज्य में शामिल कर चुकी थी ।
बालाजी बाजीराव पेशवा की मसनद पर था । शिवाजी के

छत्रपति शिवाजी
old painting in the Bibliotheque Nationale, Pari
"Rise of the Christian Power in India"