भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 753, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआप यह कल्पना करने का साहस करते हैं कि उस वीर ने एक ब्रिटिश गवर्नर
जनरल को मारने का प्रयत्न करते हुए केवल इसीलिए प्राण दे दिये कि उस गवर्नर
के स्थान पर कोई नया ब्रिटिश गवर्नर आ जाये।
“मैं अपने उन वीर सैनिकों की ओर संकेत करते हुए आपसे अनुरोध करूँगा
कि आप हमारे उसी 'अलेहदगी' तथा पूर्ण स्वतन्त्रता को ही अपना आदर्श
बनाये रहें।”
मैं और श्री हागन जिस किसी तरह बन पड़ा, पासपोर्ट लेकर अमेरिका चले
गये। वहाँ बहुत से परिचित अथवा अपरिचित मित्रों से भेंट हुई। शिकागो में अपने
भाई-बहन से भी मिला। खूब सैर की। सभी मित्रों ने खूब स्वागत किया। पर
सभी सुखी रहने पर भी आयरलैण्ड की चिन्ताजनक स्थिति से हर समय घबराये
रहते। नित्य नये झगड़ों के समाचार आते। मेरी 'गृहयुद्ध' सम्बन्धी भविष्यवाणी
ठीक होने लगी।
मार्च के शुरू में समाचार मिला, लिम्मर्क में मोर्चेबन्दी हो गयी। सन्धि के
समर्थक तथा विरोधी दो विभिन्न दलों में विभाजित हो गये हैं। मैं समझ गया कि
अब युद्ध किसी भी क्षण छिड़ सकता है। शीघ्र ही मुझे तार द्वारा बुलाया गया। मेरे
और हागन के सामने फिर वही धनाभाव तथा पासपोर्ट की असुविधा आ उपस्थित
हुई। कुछ मित्रों की सहायता से एक जहाज़ पर हम भरती हो गये। हमें कोयले
झोंकने का काम दिया गया। कुछ घण्टे कठिन परिश्रम भी किया, पर जहाज़ के
चलने में केवल एक घण्टा ही शेष था कि जहाज़ के किसी अधिकारी को सहसा
हागन पर सन्देह हो गया और गरीब पर नाम धाम, जाति, देश तथा इस काम का
पहले के अनुभव सम्बन्धी प्रश्नों की बौछार होने लगी। परिणामस्वरूप वह नीचे
उतार दिये गये। अब मैं क्या करूँ? इतने घण्टे का परिश्रम भी व्यर्थ गया और इस
समय उतरना भी असम्भव! श्री हागन को भी मैं ऐसी दशा में न छोड़ सकता था।
न जेब में पैसा, न किसी मित्र की आशा। अन्त में यही निश्चय किया कि उन्हें
छोड़कर मुझे नहीं जाना चाहिए। अब प्रश्न यह था कि जहाज़ से उतरूँ तो कैसे?
द्वार की ओर भागा! वहाँ एक अधिकारी महोदय खड़े थे – मिन्नत की कि किनारे
पर एक ज़रूरी कार्य है। अभी पाँच मिनट में आता हूँ। गरीब मज़दूर समझ वे दयार्द्र
हो उठे, मुझे उतर जाने दिया। इस प्रकार जहाज़ से उतर तो गया पर हमारी सारी
पूँजी वहीं रह गयी। हमने अपना सारा धन व्यय करके जो बन्दूकें खरीदी थीं, जहाज़
में ही रह गईं। पर मजबूरी थी। उसका तो कोई उपाय भी न था।
इसके बाद भी जहाज़ पाने के प्रयत्न में हमें कई बार निराश होना पड़ा। पर
अन्त में एक जहाज़ मिला और अप्रैल के आरम्भ में हम आयरलैण्ड पहुँचे। बन्दरगाह
में पहुँचते ही समाचार मिला कि मेरी श्रीमती अकेले ही नहीं बल्कि एक सुपुत्र
सहित घर में मेरी बड़ी प्रतीक्षा कर रही हैं।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 747