भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 754, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिस्थिति बहुत ख़राब हो चुकी थी। प्रजातन्त्रवादी सेना दो विरोधी दलों में
विभाजित हो गयी। एक दल था, आयरिश प्रजातन्त्रवादी सेना का जो पूर्ण स्वतन्त्रता
के पक्ष में न था और दूसरा आयरिश फ़्री स्टेट दल था, जो सन्धि की स्वतन्त्रता
से ही सन्तुष्ट था। मोर्चेबन्दी हो गयी थी। मैंने इस गृहयुद्ध को रोकने का भरसक
प्रयत्न किया। सभी दलों के पास मारा-मारा फिरा। दोनों दलों में समझौता करने के
लिए कोशिशें की गईं। पर सब व्यर्थ हुईं। अन्त में चुनाव के सम्बन्ध में यह तय
हुआ कि यह दोनों दल एक-दूसरे का विरोध न कर, एक हों, सिनफिन दल के
नाम से चुनाव में भाग लें और चुनाव के बाद फिर से मन्त्रिमण्डल क़ायम करें।
यह समझौता दोनों दलों के प्रतिनिधि श्री एमन डी. वेलेरा तथा माईकेल कालिन्स
में हुआ था। माईकेल फ़्रीस्टेट के प्रतिनिधि थे। उनका व्यवहार बड़ा विचित्र था।
वे शीघ्रातिशीघ्र गृहयुद्ध प्रारम्भ करना चाहते थे और इन्हीं कारणों से यह समझौता
कुछ सफल न हुआ।
एक दिन एकाएक समाचार मिला कि फ़्रीस्टेट वालों ने अंग्रेज़ों की सहायता
से रिपब्लिकन (प्रजातन्त्रवादी) सेना कोर्ट से निकाल देने के लिए तोपें ला चढ़ायी
हैं। गृहयुद्ध का श्रीगणेश हो गया। मुझे भी रिपब्लिकन सेना का साथ देना पड़ा।
गृहयुद्ध का वेदनाजनक विवरण लिखने की इच्छा नहीं। इससे आयरलैण्ड को इतनी
अधिक हानि हुई, जितनी शायद अंग्रेज़ों के विरुद्ध वर्षों लड़ते रहने पर भी न हुई
थी। इस युद्ध में श्री लियमलिंच, श्री डिन्नी लेसी, श्री जैटी केली, श्री स्पर्की ग्रीन
आदि कितने ही वीरों के प्राण गये। इसी गृहयुद्ध में श्री रीयन, श्री पेड्डी, श्री
मेकडोनोह आदि कितने सुन्दर वीर रणचण्डी की सहचारियों डाकिनी पिशाचिनी
आदि को निज रक्त मांस से तृप्त करते हुए उसी युद्ध में संसार मंच से उठ गये।
वे आयरलैण्ड के वीर त्यागी, सच्चे और निस्स्वार्थ योद्धा थे। उन पर हमारा देश
जितना गर्व कर सके, थोड़ा है।
1923 के बसन्त में श्री लियमलिंच की मृत्यु हो जाने पर शार्टरफ़ोर्ड काउण्टी
में होने वाली सन्धि कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित होने के विचार से हम अपने कई मित्रों
के साथ चल दिये। हम मैलेरी पहुँचे। वहाँ पर जब हम खेतों से निकलकर एक
सड़क पार कर रहे थे, तीनों ओर से गोलियों की वर्षा होने लगी। भागते-भागते
पहाड़ी पर चढ़ जाना पड़ा। दो दिनों तक पहाड़ियों पर ही रहना पड़ा क्योंकि फ़्रीस्टेट
की सेना उस ज़िले को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए वहाँ एक बड़ी तादाद में पड़ी
थी। बाद में किसी प्रकार अरहलो की घाटी में मेरे छिपने लायक एक स्थान मिल
गया। यद्यपि भूख और नींद बहुत सता रही थी, फिर भी उसमें छिपकर सो गया।
उठ कर सेनाओं के चलने का शब्द सुनकर खन्दक में से सिर निकालकर देखा
तो फ़्रीस्टेट के सैनिक बन्दूकें तानकर घेरे खड़े थे। कोई चारा न था। आत्मसमर्पण
कर दिया।
748 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़