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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

दिये जाने से कुछ घण्टे पहले ही उनसे मिले थे। यह थे प्राणनाथ मेहता, भगतसिंह
के मित्र और वकील। उन्होंने मुझे बताया :
“उन दिनों मैं डायरी रखता था (अपने काम के लिए भी मुझे इसकी ज़रूरत
होती थी)। बदक़िस्मती से 1947 में पार्टिशन के वक़्त मुझे लाहौर छोड़ना पड़ा,
मेरे काग़ज़ात वहीं रह गये, कुछ पता नहीं उनका क्या हुआ।
“बहरहाल डायरियाँ तो खो गयी हैं, मगर उन दिनों की घटनाओं ने मेरे दिमाग़
पर इतनी गहरी छाप छोड़ी है कि उसे न वक़्त मिटा सका है, न कोई दूसरी
घटनाएँ...
“23 मार्च, 1931 को मुझे वह किताब मिल गयी, जो भगतसिंह ने मँगवायी
थी। मैं उससे मिलने गया। जेल के गेट पर मुझे बताया गया कि भगतसिंह और
उसके दोस्तों ने किसी से भी मिलने से इन्कार कर दिया है। वजह यह थी कि
जेल के अधिकारियों ने क़रीबी रिश्तेदारों को छोड़कर और किसी से मिलने पर
पाबन्दी लगा दी थी। इसके विरोध में भगतसिंह और उसके साथियों ने कहा कि
वे किसी से भी नहीं मिलेंगे।
“कुछ करना चाहिए था। मैं जेल के अधिकारियों से मिलने गया। उनमें एक
मि. पुरी नेक इन्सान निकला। उसने मुझे सलाह दी कि तीन क़ैदियों के वकील
के नाते मैं अर्जी दूँ कि मुझे उनकी आख़िरी इच्छा लिखने के लिए उनसे मिलना
है। फिर उसने मुझे भगतसिंह की कालकोठरी में ही उससे मिलने की इजाज़त दे
दी। थोड़ी देर बाद राजगुरू और सुखदेव को भी वहाँ लाया गया।
“उस वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि लाहौर जेल के इन तीन क़ैदियों से यह
मेरी आख़िरी मुलाक़ात है, कि दो घण्टे बाद इन्हें फाँसी दे दी जायेगी।
“भगतसिंह ने मुझसे पूछा कि मैं किताब लाया हूँ या नहीं। मैंने उसे किताब
दी, तो वह बड़ा खुश हुआ। किताब लेते हुए बोला : ‘आज रात को ही इसे ख़त्म
कर दूँगा, इससे पहले कि वे...’ उस बेचारे को क्या पता था कि वह किताब आख़िर
तक कभी नहीं पढ़ पायेगा।”
मैंने प्राणनाथ मेहता से पूछा कि उन्हें उस किताब का नाम याद है, जो वह
भगतसिंह के लिए ले गये थे। उनका जवाब था : “सच पूछें, तो मुझे याद नहीं
कि यह लेनिन के बारे में किताब थी, या लेनिन की। एक छोटी-सी किताब थी।
..अगले दिन जेल के सन्तरी ने मुझे बताया कि जब भगतसिंह को लिवाने आये थे,
तो वह यह किताब पढ़ रहा था। बाद में भगतसिंह मेरे लिए जो चीज़ें छोड़ गये
थे, उनके साथ मुझे वह किताब भी मिली।”
“शायद उसी सन्तरी ने,” मेहता ने आगे कहा, “भगतसिंह के रिश्तेदारों को
उनके अन्तिम क्षणों के बारे में बताया।”
वीरेन्द्र सिन्धू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतसिंह प्राणनाथ मेहता की
698 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

लायी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, जब दरवाज़ा खुला। दहलीज पर अफ़सर खड़ा
था।
“‘सरदार जी,’ उसने कहा। ‘फाँसी लगाने का हुक्म आ गया है। तैयार हो
जाइये।’
“भगतसिंह के दायें हाथ में किताब थी, उससे नज़रें उठाये बिना ही उन्होंने
बायाँ हाथ उठाकर कहा : ‘ठहरिये। यहाँ एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल
रहा है।’
“कुछ पंक्तियाँ और पढ़कर उन्होंने किताब एक तरफ़ रख दी और उठ खड़े
हुए बोले : ‘चलिए!’”
भगतसिंह के क्रान्तिकारी दल में से एक और कर्मठ क्रान्तिकारी निकला, जो
आगे चलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना। यह थे अजय कुमार
घोष।
‘भगतसिंह और उनके साथी’ नामक पुस्तक में अजय घोष ने लिखा कि
भगतसिंह भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अल्पांश के लिए एक उल्का पिण्ड की
तरह चमके और लुप्त होने से पहले वह लाखों लोगों के लिए एक नये भारत की
आत्मा और आशाओं का प्रतीक बन गये, उन लोगों के लिए, जिन्हें मृत्यु का डर
नहीं था, जो साम्राज्यवादी अंकुश को उतार फेंकने और अपने महान देश में एक
स्वतन्त्र राज्य का भवन खड़ा करने के लिए कृतसंकल्प थे।
भगतसिंह और उनके साथियों जैसे निडर क्रान्तिकारियों का बलिदान व्यर्थ नहीं
था। उनके दल के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मुट्ठीभर नौजवान
क्रान्ति नहीं ला सकते, कि बड़े धीरज और परिश्रम के साथ जनसाधारण के बीच
काम करना चाहिए, लोगों को संघर्ष के लिए संगठित करना चाहिए, ठोस
कार्यनीतियाँ तैयार करना, उन पर अमल करना तथा लोगों को सत्ता के अन्तिम
संघर्ष की ओर ले जाना चाहिए।
(1981)
टिप्पणियाँ

  1. अ. व. राइकोव, ‘भगतसिंह और उनकी विचारधारात्मक धरोहर’, ‘नरोदी आज़ीइ ई
    आफ्रीकी’ (‘एशिया और अफ्रीका के जनगण’), अंक 1, 1971 (रूसी में)
  2. ल.व. मित्रोखिन, ‘लेनिन के बारे में भारत’, ‘नाऊका’ (‘विज्ञान’) प्रकाशन, मास्को, 1971,
    पृष्ठ 124-130 (रूसी में)
  3. M. Windmiller and G.D. Overstreet, Communism in India, Berkley, 1959, p. 240
  4. पूरा पत्र परिशिष्ट में देखें
  5. J. Sanyal, Sardar Bhagat Singh, Lahore, 1930, p. 104
    सान्याल की पुस्तक पर औपनिवेशिक अधिकारियों ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। उल्लेखनीय है
    शहीदएआज़म की जेल नोटबुक / 699

कि भगतसिंह और उनके साथियों के बारे में पुस्तकों, कविताओं और उनकी रक्षा की अपीलों
का निषिद्ध साहित्य की सूची में विशेष स्थान था। अमेरिकी शोधकर्ता एन. जेरल्ड बैरियर
की पुस्तक में सोलह ऐसे प्रकाशन गिनाये गये हैं (देखें : N. Gerald Barrier, Banned
Controversial Literature and Political Control in British India, 1907-1947, pps.
224-225 )
6. टॉमस जैफ़रसन (1743-1828) – अमेरिकी राजनेता, 1801-1809 में संयुक्त राज्य
अमेरिका के राष्ट्रपति
7. ज्याँ जाक रूसो (1712-1778) – फ्रांसीसी दार्शनिक और प्रबोधक
8. टॉमस पेन (1737-1809) – अमेरिकी और ब्रिटिश सामाजिक एवं राजनीतिक नेता,
प्रबोधकों के क्रान्तिकारी पक्ष के प्रतिनिधि
9. पैट्रिक हेनरी (1736-1799) – अमेरिकी राजनीतिज्ञ और वक्ता
10. कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स, ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र’, 1847-1848 (का.
मार्क्स, फ़्रे. एंगेल्स, संकलित रचनाएँ, तीन खण्डों में, हिन्दी संस्करण, मास्को, प्रगति प्रकाशन,
खण्ड 1, भाग 1, 1978, पृष्ठ 152-153)
11. फ्रे. एंगेल्स, ‘जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति’, 1851-1852 (का. मार्क्स, फ्रे. एंगेल्स,
संकलित रचनाएँ, तीन खण्डों में, खण्ड 1, भाग 2, 1978, पृष्ठ 103)
12. व्ला. इ. लेनिन, ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार काउट्स्की’, 1918 (व्ला. इ. लेनिन, संकलित
रचनाएँ, दस खण्डों में, खण्ड 8, 1984, पृष्ठ 88
13. व्ला. इ. लेनिन, ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार काउट्स्की’, 1918 (व्ला. इ. लेनिन, संकलित
रचनाएँ, दस खण्डों में, खण्ड 8, 1984, पृष्ठ 137)
14. J. Sanyal, Sardar Bhagat Singh, Lahore, 1930, p. 104
15. Ibid., p. 103. वीरेन्द्र सिन्धू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतसिंह रूसी क्रान्ति को,
उसने जो रास्ते तय किये थे और जो नतीजे हासिल किये थे, उनको समझ पाने के लिए रात
दिन प्रयास करते रहे
16. N. K. Singh, The impact of the Marxist ideas on Indian Revolutionary
Movement after the October Revolution, Mitteilgen des Institus fur
Orientforschung, BD. XVII, H. 2, 1971, S. 248
17. G. Deol, The Ghadarites and Shaheed Bhagat Singh, Peoples Path, March 1968
18. S.S. Josh, Baba Sohan Singh Bhakna, New Delhi, 1970, pp. 61 and 62
19. Peoples Path, June 1968, p. 17
20. N. K. Singh, The Impact of the Marxist Ideas on Indian Revolutionary
Movement after the October Revolution., p. 247
21. Ibid., p. 71
22. B. Hardas, Armed Struggle for Freedom, Poona, 1958. pp. 383-389
23. M. N. Gupta, History of the Indion Revolutionary Movement, Bombay-New
Delhi, 1972, p. 132
24. इस भूमिका का सारांश ‘लिंक’ ने 24 अगस्त, 1969 के अंक में छापा था।
25. Baba Prithvi Singh Azad, In Lenin's Land, New Delhi, 1978, pp. 29, 32 and 35
26. Bejoy Kumar Sinha, the New Man in The Soviet Union, Peoples Publishing
House, New Delhi, 1971, p. 2
700 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

खण्ड तीन
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम
(आयरलैण्ड के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी डॉन ब्रीन की आत्मकथा
‘माई फ़ाइट फ़ॉर आयरिश फ़्रीडम’ का हिन्दी अनुवाद)
अनुवादक
भगतसिंह

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प्रथम परिच्छेद
पूर्वेतिहास
उस समय ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में ‘आयरिश-होम रूल-बिल’ पास हो चुका था।
उसे क्रियात्मक रूप देने में अंग्रेज़ तो आनाकानी करते ही थे, उत्तर-आयरिश
निवासी औरेंज वालों ने भी घोषणा कर दी कि उस बिल का व्यवहार किया गया
और डबलिन में आयरिश पार्लियामेण्ट खड़ी कर दी गयी तो वे उसका हर तरह
से विरोध करेंगे, यहाँ तक कि शस्त्रों के प्रयोग से भी न झेंपेंगे। अंग्रेज़ टोरी दल
की सहायता से उन लोगों ने, इसी उद्देश्य से, अपने स्वेच्छा-सेवकों को पूर्णरूप से
संगठित तथा शस्त्रों से सुसज्जित करना भी शुरू कर दिया। उनको देखते ही
आयरिश देशभक्तों के हृदय में भी अपना स्वेच्छा-सेवक संघ बनाने की प्रबल इच्छा
जागृत हो उठी। उन्होंने इसके लिए देशवासियों से अपील की और आयरिश लोगों
ने भी पूरी तत्परता दिखायी।
गत महायुद्ध के छिड़ते समय आयरलैण्ड में तीन सैनिक-संघ विद्यमान थे।
एक तो पूर्वोक्त उत्तर निवासी औरेंज वालों का, दूसरा आयरिश देशभक्तों का
आयरिश रिपब्लिकन (प्रजातन्त्र) स्वेच्छा-सेवक-संघ और तीसरा ब्रिटिश सेना
(British Party of Occupation); आयरिश लोगों का नेतृत्व तथा प्रतिनिधित्व
पार्लियामेण्ट के सदस्य जॉन रैडमाण्ड तथा उनके अनुयायियों के हाथ में था। यह
कट्टर देशभक्त तो थे परन्तु महायुद्ध के छिड़ते ही उन्होंने अंग्रेज़ों का पक्ष ले लिया।
औरेंज वालों ने भी अंग्रेज़ों की पूर्ण रूप से सहायता की और उधर आयरिश
स्वेच्छा-सेवक-संघ में मतभेद हो गया। बहुत से लोग जाकर ब्रिटिश सेना में भरती
हो गये। उस समय बहुत थोड़े ऐसे बचे जिन्हें कि अंग्रेज़ों के ‘छोटी जातियों के
स्वत्वों तथा सन्धिपत्रों की पवित्रता की रक्षा के लिए युद्ध में सम्मिलित होना’ आदि
मधुर वाक्य पथभ्रष्ट न कर सके। वे ऐसे वीर थे जिनका एकमात्र आदर्श, अविचल
विश्वास और अटल आशा केवल स्वतन्त्रता-प्राप्ति थी।
मैं 1914 में टिप्रेरी नगर से चार मील की दूरी पर स्थित डोनोहिल गाँव के
स्वेच्छा-सेवकों में सम्मिलित हुआ था। उन थोड़े लोगों में, जिन्होंने उस समय भी
आयरलैण्ड माता का अंचल छोड़ना स्वीकार न किया था, हमारा छोटा-सा दल भी
था। सैनिक-फण्ड में सहायता देने तथा भरती के विरोध करने के कारण पुलिस
की दया-दृष्टि मुझ पर पड़ी और मुझे भी वह उस समय कहीं-कहीं पाये जाने
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 703

वाले भयंकर जन्तु, सिनफिनर, समझने लगी। बाद में उन्होंने अपार कृपा कर मुझे
'हत्यारों के राजा' की बहुत ऊँची पदवी प्रदान कर दी थी। हम लोग सप्ताह में
एक-दो बार जंगल में एकत्रित होकर कवायद तथा रिवाल्वर चलाने आदि का
अभ्यास करते और अवसर पाते ही जहाँ कहीं से बन पड़ता रिवाल्वर उड़ाने में भी
न चूकते थे।
1916 के ईस्टर विद्रोह की निष्फलता का हमारे कार्यक्रम पर बहुत प्रभाव
पड़ा। देशभर का संगठन छिन्न-भिन्न हो गया और सरकार ने उसे गैर-क़ानूनी
घोषित कर दिया। परन्तु जो लोग उस समय पुलिस की क्रूर दृष्टि से बच
निकले, उन्होंने शीघ्र ही डबलिन में दो गुप्त समितियाँ स्थापित कर लीं और
संगठन कार्य प्रारम्भ कर दिया। हमें भी अपना कार्य गुप्त रूप से ही करना पड़ा।
हमारी संख्या भी बहुत कम हो गयी। एक बार तो यहाँ तक नौबत आयी कि
केवल हम तीन ही व्यक्ति शेष रह गये। तो भी मैं और मेरे सहकारी श्री
सीनट्रीसी (Sean Treasy) बड़ी तत्परता से कार्य करते रहे। धीरे-धीरे हमारी
संख्या तेरह तक पहुँच गयी। वे सभी बड़े दृढ़-प्रतिज्ञ, अदम्य साहसी तथा
निर्भीक देशभक्त थे। हम चुपचाप उनका शिक्षण करते रहे। उनको ड्रिल तथा
रिवाल्वर आदि का अभ्यास कराया जाता। साधारणतया हम अंग्रेज़ सैनिकों की
पुस्तकों के आधार पर ही सब अभ्यास किया करते, कभी-कभी एकदम भोले
दर्शक बनकर अंग्रेज़ सैनिकों का ड्रिल और परेड आदि देखा करते और बड़ी
भूलें कर जाते। परन्तु हमारी तत्परता उन सब असुविधाओं पर विजय पाती। 1917
तक इसी तरह कार्य चलता गया। सन् 1917 के अगस्त में फिर हमने
खुल्लमखुल्ला परेड कर दी। श्री एमन डी. वैलरा (Emon de Valera) का जोकि
अभी-अभी लुईस जेल से छूट कर आये थे, टिपेरी नगर की एक सार्वजनिक
सभा में भाषण हुआ। उस समय हम यूनीफार्म (वर्दी) पहनकर, रायफ़लों के
स्थान पर लाठियाँ उठाकर उनके शरीर-रक्षक बने थे। हमारे साहस को देखकर
शत्रु शायद इतने चकित न होंगे जितने कि हमारे मित्र। जनसाधारण की दृष्टि में
उस दिन हमने तीन प्रकार से सरकारी आज्ञाओं का उल्लंघन किया। पहले तो
वर्दी पहनना मना था। दूसरे मार्चिंग करते हुए चलना भी बन्द किया जा चुका था
और अभी कुछ दिन पहले लोगों का लाठी उठाना भी निषेध कर दिया गया था।
इसलिए उस दिन नियमानुसार समिति की सभा न बुलाकर, एक लम्बा-चौड़ा
प्रस्ताव पास किये बिना ही, जो हमने ऐसा कर दिया था, यह मित्र-मण्डली के
लिए असह्य हो उठा। सिनफिन लोगों के सार्वजनिक विभाग ने हमें जी भरकर
कोसा, परन्तु चुपचाप सब सहन करते रहे और अपने कार्य में जुटे रहे।
उधर शत्रुओं ने भी कोई कसर उठा न रखी। मेरे तथा श्री ट्रीसी के वारण्ट
निकाले गये। पर हमें सम्राट का आतिथ्य एकदम अस्वीकार था, अतः हम
704 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

इधर-उधर मित्रों के घरों में दिन बिताने लगे। यदि उस समय के जेलों को
विद्रोह-विश्वविद्यालय (University of the Rebels) कहें तो अनुचित न होगा।
बहुत-से लोग वहीं से ड्रिल तथा बम बनाने की शिक्षा पाकर आते थे। श्री ट्रीसी
को उस समय दो वर्ष कारागार मिला, जिसमें से बाद में सोलह महीने घटा दिये
गये थे। उन दिनों कोर्ट में भी खूब दिल्लगी रहती। अभियुक्त गवाहियों के समय
या तो समाचारपत्र पढ़ने में इस तरह जुट जाते मानो किसी क्लब में बैठे हैं, अथवा
मधुर संगीत अलापते हुए उसे संगीत विद्यालय बना देते। जेल में कैदियों के साथ
किये जाने वाले दुर्व्यवहार के कारण श्री ट्रीसी तथा अन्य राजनीतिक कैदियों ने
अनशन शुरू कर दिया। परन्तु सरकार के दिल पर तब तक कोई प्रभाव न हुआ,
जब तक कि एक कैदी कमाण्डेण्ट टाम आशि, बलपूर्वक भोजन खिलाने के प्रयत्न
में परलोक न सिधार गये, और समस्त देश में क्रोध की आग न भड़क उठी। इस
तरह के बलिदानों से जब लोगों में बहुत उत्तेजना फैली तब कहीं सरकार समझौते
पर राजी हुई और तभी हमारे राजनीतिक कैदियों को सांग्रामिक बन्दी (War
Prisoners) माना गया। आदत से मजबूर ब्रिटिश सरकार ने सन्धि की शर्तें फिर
तोड़ डालीं और श्री ट्रीसी को फिर अनशन शुरू करना पड़ा। परन्तु बाद में वे शीघ्र
ही छोड़ दिये गये।
इधर परिस्थिति अनुकूल होने के कारण हमारा सैनिक संगठन 1916 से भी
अधिक सुदृढ़ तथा सुविस्तृत हो गया। श्री सीन ट्रीसी ने आते ही इस बात पर ज़ोर
देना शुरू किया कि अब हमें सब कार्य खुल्लम-खुल्ला करना चाहिए। यह ध्यान
में रखना चाहिए कि शस्त्रों आदि के रखने का बहुत प्रबल निषेध किया गया था,
अतः हमें गुप्त उपायों से ही शस्त्र-संग्रह करना पड़ता था। बल्कि ड्रिल तथा
संगठन-कार्य भी गुप्त ही रूप से करना पड़ता था, परन्तु ट्रीसी महोदय के आग्रह
से जब हमारा काम खुल्लम-खुल्ला शुरू हुआ, तो वे बेचारे फिर पकड़े गये। यह
1918 की बात है। महायुद्ध में अंग्रेज़ मुँह की खा रहे थे। जर्मनों का सबसे बड़ा
आक्रमण तथा अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी पराजय उसी समय हुई थी। उस समय अंग्रेज़ों
ने आयरलैण्ड में ज़बरदस्ती सेना भरती करने की बात पर ज़ोर दिया। उनकी
चिल्ल-पों सुनकर और तैयारियाँ देखकर समस्त देश में हो-हल्ला मच गया।
स्वेच्छा-सेवक-संघ के सदस्यों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ने लगी। हमारे पास कमी
केवल शस्त्रों की थी। उसके लिए हमारे कार्यकर्ताओं ने उन लोगों की सूची तैयार
कर ली जिनके पास शस्त्र रहते थे। हम रात्रि में उन लोगों के घरों में चले जाते,
और वे चुपचाप अपने शस्त्र हमारे सुपुर्द कर देते। कुछ एक ने तो हमें निमन्त्रण देकर
बुला भेजा। हमें इस कार्य में किसी भी विशेष रुकावट व बाधा का सामना नहीं
करना पड़ा। पीछे अंग्रेज़ों ने सभी लोगों से शस्त्र लौटाने शुरू कर दिये, परन्तु हमने
बड़ी तत्परता से अपना कार्य जारी रखा।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 705

ज़बरदस्ती की जाने वाली भरती के विरोध में हम युद्ध की तैयारियाँ करने
लगे। उधर स्त्रियों तथा बालकों के भी संघ स्थापित हो गये, जो हर समय हमें
सहायता देने को तैयार रहते थे। हमने नक़ली लड़ाइयाँ लड़नी भी शुरू कर दीं।
हमने कई बार टिप्रेरी नगर पर आक्रमण करने तथा उसकी रक्षा करने का अभिनय
किया और फिर कई सड़कों तथा बाज़ारों को फ़ौजी क्षेत्र (Military Area) घोषित
कर दिया, जहाँ पर कि अंग्रेज़ों के जाने का भी निषेध कर दिया जाता था। ऐसे
अवसरों पर हम रायफ़लें आदि नहीं ले जाते थे क्योंकि उनके छिन जाने की
आशंका थी। परन्तु मेरे जैसे कई व्यक्ति विशेष कारणों से अपना रिवाल्वर हर समय
अपने पास रखते थे। सरकार को अपनी बात पर व्यवहार करने का साहस ही न
हुआ और धीरे-धीरे उसका यह विचार ढीला होने लगा। उसके इस विचार के ढीला
होते ही हमारा संगठन भी ढीला होने लगा। वे लोग, जो युद्ध क्षेत्र की भीषणता तथा
मोर्चों की भयंकरता से त्रस्त हो उठे थे, और वहाँ से बचने मात्र के विचार से ही
हमारे संघ में आ मिले थे, अब हमें छोड़कर चलते बने। पीछे थोड़े ही व्यक्ति बच
रहे परन्तु वे बड़े दृढ़ थे।
उधर बेचारे सीन ट्रीसी डन्डल्क जेल में अनशन का मज़ा लूट रहे थे। पर
हमारी दयालु सरकार को उनकी किंचित मात्र भी चिन्ता न हुई। हम समझ गये कि
सरकार उन्हें भूखों मरने देना चाहती है। हमें शीघ्र ही कुछ न कुछ करने की
आवश्यकता महसूस हुई। मुझे बड़ी दूर की सूझी। क्यों न एक सिपाही को धर
पकड़ें और उसे अनशन व्रत का मज़ा उठाने को विवश करें? सभी साथियों ने मेरे
दिमाग़ की खूब दाद दी और इसे क्रियात्मक रूप देने की चिन्ता करने लगे परन्तु
आयरिश प्रजातन्त्र भ्रातृमण्डल (Irish Republican Brotherhood) के लोगों ने
हमारी योजना को सफल न होने दिया। हमने भी उनसे अपना सम्बन्ध तोड़ लिया।
जुलाई 1918 में ट्रीसी छूट आये। प्रजा तथा संगठन के सम्बन्ध में इस बार वे
बड़ी-बड़ी योजनाएँ सोचकर आये। परन्तु मुझे प्रचार तथा संगठन का पूरा अनुभव
हो चुका था। मैं इन शुष्क कार्यों में सिर फोड़ने की बजाय युद्ध छेड़ने की चिन्ता
में था। मैंने अपना यह मन्तव्य उसके सामने रखा। पर उन्होंने ज़िद की और इस
कारण हम अपने ही मतानुसार अलग कार्य करने लगे।
दूसरा परिच्छेद
विद्रोह-भवन (कुटी)
श्री सीन ट्रीसी अपने संगठन कार्य में जुट गये और मैंने श्री पैट्रिकक्योह के साथ
बम फ़ैक्टरी बना ली। हम दोनों में आवश्यक तथा अनावश्यक बातों पर खींचातानी
706 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हो जाती और श्री ट्रीसी आकर हमारी सुलह करवाया करते थे। फ़ैक्टरी शब्द बहुत
बड़ा है। 'बम फ़ैक्टरी' सुनते ही पाठक क्रुप (Krupp) आदि किसी भारी कारख़ाने
की कल्पना न करने लगें। वह एक साधारण ग्रामीण कुटिया थी। हमारा सामान भी
मामूली ही था। साधारण गन पाउडर (बारूद) बनाना तो आसान काम है ही, हम
बम भी ऐसे सादा-से ही बना लेते थे, जिन्हें फेंकने से पहले पलीता लगाने की
आवश्यकता हुआ करती। हमें जहाँ से भी जिस किसी तरह के कारतूस मिल जाते;
ले लेते और फिर उन्हें स्वेच्छानुसार भर लेते। मेरा और पैट्रिक का झगड़ा इस बात
पर भी हो जाता कि उसमें सिक्के की चार अथवा आठ गोलियाँ डाली जायें।
शस्त्र-संग्रह का हमारा कार्य भी उसी तरह जारी रहा। शत्रु से मेरी पहले मुठभेड़
तभी हुई, जब एक रात को हम अपने शस्त्र-संग्रह सम्बन्धी एक छापे से लौट रहे
थे। हम लोग टिपेरी से घर जा रहे थे कि मेरी साइकिल की हवा निकल गयी।
मैं अपने साथियों को आगे चलने को कह स्वयं उसे पम्प से भरने लगा। सामने
ही पुलिस की बैरक थी। जब मैं उठा तो मैंने अनुभव किया कि कोई व्यक्ति मुझे
पकड़कर खींच रहा है। मुड़ा तो एक पुलिसमैन को खड़ा पाया। मेरे हाथ में ताला
तोड़ने की एक सलाख थी। उसकी शक्ति की आज़माइश उस दिन उसी के सिर
पर की। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और फिर मैंने अपना रिवाल्वर सँभालकर शेष
सिपाहियों के सामने तान दिया और बोल उठा – “हाथ उठा लो, वरना अभी
ठिकाने लगाता हूँ।” (हाथ उठा दो के मायने अधीनता स्वीकार करना होता था)
स्वाभाविक निर्भीकता के कारण वे लोग वहीं खड़े रह गये और मैं लौटकर दूसरे
रास्ते से फ़ैक्टरी में जा पहुँचा।
एक दिन मैं कुएँ पर पानी खींच रहा था, कि एकाएक धमाके का शब्द सुनायी
दिया। देखा तो हमारी फ़ैक्टरी (कारख़ाना) की छत आकाश में उड़ी जा रही थी
और कुटिया में आग लग रही थी। मैं घबराया कि बेचारे क्योह का क्या हुआ
होगा,और उन्हें बेसुध पड़ा पाया। उन्हें उठाकर निकटवर्ती नदी के तट पर ले गया
और डोल से उनके मुँह पर पानी डालने लगा। थोड़ी ही देर बाद उन्हें सामने खड़ा
पाया, “बेवक़ूफ़, गधे, नालायक, क्या तुम मुझे इस तरह डुबो डालोगे?”
आदि-आदि न जाने क्या-क्या मधुर वाक्य उच्चारण करते हुए वे मुझ पर घूँसा तानने
लगे। तब फ़ैक्टरी की चिन्ता न कर हम ख़ूब हँसे। पर यह हम पर एक वज्रपात
ही हुआ था। कई दिन बाद तक बड़ी चिन्ता रही। हम दोनों एकदम दरिद्र हो गये
थे। हमारे पास एक भी पैसा न था। घर वाले का घर तैयार करा देने की अलग
चिन्ता थी। सभी साथियों ने मिलकर उसकी छत बना डाली और फिर तो वह
कुटिया बड़ी अच्छी दिखने लगी। कुछ देर बाद पुलिस ने भी इस बेचारी कुटिया
पर मनमाना अत्याचार कर हमारा बदला निकालने की चेष्टा की थी। कुछ दिनों
बाद हमने घर बदल लिया। दूसरे घर में हमारी दशा पहले से भी बड़ी शोचनीय
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 707

रही। हमें दो कम्बल भी माँगकर उधार लेने पड़े और नीचे के लिए घास ही काफ़ी
समझी गयी। कई कई दिन तक अल्पाहार का अभ्यास भी करना पड़ा। साधारणतया
उबले हुए चावलों पर ही गुज़ारा करना पड़ता। सबसे बड़ी मुश्किल तो चूहों के
कारण थी। वे कम्बख़्त आफ़त के परकाले थे। कभी-कभी रात को आँख खुलती
तो क्या देखते कि सिर के बालों में चूहा फँसा हुआ है। जब कभी मैं उन्हें भगाने
पर उतारू होता, तो झट 'विश्व प्रेमी' ट्रीसी महोदय अत्यन्त गम्भीरता से उपदेश
झाड़ने लगते, “देखो भाई, तुम्हें तो सुख मिलेगा नहीं, इन्हें तो मन की मौज़ करने
दो। ज़रा कष्ट भी हो तो शान्ति से सहन करो।” हमें भी कहना पड़ता, “अरे भाई!
सिपाहियों ने ही नाकों दम कर रखा है। यदि ये भले हों जो हमें अपने हाल पर
छोड़ दें।” इसी तरह दिन कट रहे थे।
बाद में क्योह महाशय भी चले गये। उनके स्थान पर एक तरुण श्री सीन हागन
आ गये। फिर उनका और मेरा बहुत घनिष्ट सम्बन्ध रहा। उपरोक्त दोनों सीन और
मैं, एक दूसरे को इतना प्यार करते थे कि विभिन्न शरीरों के रहने पर भी हम में
एक ही आत्मा का अस्तित्व मान लिया जाता जो अनुचित न होता। बाद में श्री
राबिन्सन भी आ मिले। वे भी हम तीनों के साथ घुल-मिलकर एक हो गये। हमारी
आशाएँ, हमारा आदर्श, हमारे जीवनों का उद्देश्य वही एकमात्र आयरिश स्वतन्त्रता
की प्राप्ति थी। हम केवल आयरलैण्ड के लिए जीते थे। हम बैठे-बैठे घण्टों भावी
स्वातन्त्र्य युद्ध की कल्पनाएँ किया करते थे। भावी महान स्वतन्त्र आयरलैण्ड की
बातें सोच-सोचकर हमें कितना आनन्द होता, हम उसकी कल्पना मात्र से पुलकित
हो उठते थे।
कुछ दिनों बाद हमें उपरोक्त घर ख़ाली कर देने का नोटिस दे दिया गया। क्या
करते; साधारण किरायेदारों के अधिकार भी तो हमें प्राप्त न थे। चुपचाप घर छोड़
देना पड़ा। हम लोग श्री हागन के एक बन्धु के फार्म में जा टिके पुलिस की नज़र
से हम यहाँ भी न बच पाये। उन्होंने उसे कलई खाना का नाम दे दिया था। हमारी
आर्थिक दशा बड़ी शोचनीय थी। वैयक्तिक आवश्यकताएँ तो हम जैसे बन पड़ती,
पूरी कर ही लेते परन्तु बाहर आने-जाने में बड़ी असुविधा होती। एक बार मुझे और
श्री ट्रीसी को डबलिन तक (110 मील) बाइसिकलों पर ही जाना पड़ा। हमारे पास
भाड़ा नहीं था। रविवार सायंकाल के 6 बजे अपनी एक सभा में बुलाये गये थे और
सोमवार को प्रातः 8 बजे हमें डबलिन पहुँचना ज़रूरी था। तो भी हम डबलिन ठीक
समय पर पहुँच गये। आगामी शनिवार तक हमें वहीं ठहरना पड़ा। उधर शनिवार
को सायंकाल अध्यक्ष समिति की एक बैठक उसी दिन होने वाली थी, वहाँ पर
भी हमारा पहुँचना बहुत ज़रूरी था। अतः 6 रिवाल्वर, 500 कारतूस और एक दर्जन
बम लेकर हम दोनों वहाँ से चल दिये और ठीक समय पर टिप्रेरी आ पहुँचे।
महायुद्ध का अन्त हो गया था। शस्त्र छोड़ दिये जा चुके थे। एक सप्ताह बाद
708 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

घोषणा कर दी गयी कि आयरलैण्ड का चिर-स्थगित चुनाव दिसम्बर में होगा। वहाँ
युद्ध के दिनों में यह चुनाव न हुआ था। इस अन्तर में लोगों के भाव बहुत बदल
गये थे। उनका इंग्लैण्ड तथा पार्लियामेण्ट पर कोई विश्वास न रहा था। वे जानते
थे कि आयरलैण्ड के अल्पसंख्यक सदस्यों की वहाँ के नक़्क़ारखाने में कोई नहीं
सुनता। वे अपने सदस्यों को वहाँ भेजना व्यर्थ समझते थे। ख़ैर! अब के चुनाव के
लिए सिनफिनर उम्मीदवार खड़े किये गये ताकि वे पार्लियामेण्ट का बहिष्कार कर
दें। कुछ महीने खूब ज़ोर रहा। हम लोग भी अपना कार्य छोड़कर सिनफिनर
उम्मीदवारों की सफलता के लिए प्रयत्न करने लगे। बड़े-बड़े वक्ताओं ने देशभर
में जीवन संचारित कर दिया। देश में खूब जागृति थी, बड़ा जोश था। 105 में से
73 सिनफिनर उम्मीदवार सफल हुए, जिन्होंने ब्रिटिश पार्लियामेण्ट तक न जाकर
डबलिन में प्रजातान्त्रिक देश पार्लियामेण्ट स्थापित कर ली। उस पार्लियामेण्ट की
पहली बैठक 21 जनवरी, 1919 को हुई। उस दिन उन्होंने स्वतन्त्रता की घोषणा
की तथा अन्य स्वतन्त्र जातियों के नाम मैत्री के सन्देश भेजे। ठीक उसी दिन हमारे
छोटे से दल ने एक बड़ा भारी कार्य कर दिया। वह 'सोलोहैडबेग घटना' के नाम
से प्रसिद्ध है। उसका ब्यौरा अगले परिच्छेद में दिया जायेगा। बात यह थी कि
उपरोक्त चुनाव के कारण हमारा कार्य बहुत ढीला पड़ गया था। बहुत-से कार्यकर्ता
अब योद्धा अथवा सैनिक न रहकर राजनीतिज्ञ बन गये। दिनोंदिन अपने सैनिकों को
ढीला होता देखकर, हमने उन्हें ज़ोर-शोर से कार्य में जुटा देने का निश्चय किया।
कई बार मैंने इस बारे में श्री ट्रीसी से परामर्श भी किया। आख़िर वह अवसर भी
मिल ही गया, जिस दिन कि हमने अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ कर दिया।


तीसरा परिच्छेद
विस्फोटक की लूट,
आज़ादी की जंग का श्रीगणेश

जनवरी, 1919 के आरम्भ में हमें पता चला कि सोलोहैडबेग की खान की तरफ़
सरकारी विस्फोटक पदार्थ भेजे जायेंगे। मैंने तुरन्त ट्रीसी से जाकर कहा कि अब
चिर-प्रतीक्षित स्वातन्त्र्य-युद्ध को प्रगतिशील करने का समय आ पहुँचा है, और यह
बड़ा सुन्दर अवसर है जिसका सदुपयोग करने में हमें चूकना न चाहिए। मैं तब यह
भूला न था कि हमारे सैनिकों की संख्या बहुत ही कम थी और हमें महान
शक्तिशाली शत्रु से सामना करना था। परन्तु यह भी विश्वास था कि युद्ध छिड़ते

आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 709

ही हमारी संख्या बढ़ने लगेगी और कार्य होते देख युवक हमारे आसपास आ एकत्र
होंगे। गनीमी युद्ध (Guerilla Warfare) में संख्या के बजाय दृढ़ता तथा गुणों का
आधिक्य आवश्यक तथा लाभकारी होता है। प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। सबने मिलकर
यही निश्चय किया कि उस दिन पहरेदार सिपाहियों को निशस्त्र कर विस्फोटक
पदार्थ छीन लिए जायें। घात का स्थान भी निश्चित कर लिया गया। सोलोहैडबेग,
टिप्रेरी नगर से लगभग 2) मील की दूरी पर है। लिम्मर्क जंक्शन वहाँ से एक मील
के लगभग होगा। उसे चारों ओर से कुटिया, बाड़े आदि घेरे हुए थे, परन्तु डोबोहिल
के अतिरिक्त और कोई गाँव निकट नहीं था, और वह भी 1) मील की दूरी पर
था। खान की ओर जाने वाली सड़क के दोनों ओर खाइयाँ थीं और उनमें झाड़ियाँ
उग रही थीं। दुर्भाग्यवश हमें निश्चित तिथि का पता न लग सका। हम समझते थे
कि विस्फोटक की गाड़ी 16 जनवरी को आयेगी परन्तु वह 21 जनवरी तक न
आ पाई। हम पाँचों दिन बिल्कुल तैयार घात के स्थान पर बैठे रहते और दो-दो बजे
तक प्रतीक्षा करके उठ जाते। तीन दिनों के बाद आठ के अतिरिक्त सभी साथियों
को घर लौटा दिया। बाक़ी हम 9 व्यक्ति बड़ी सतर्कता से प्रातः ही अपने स्थानों
पर जा बैठते। उन दिनों पुलिस बहुत सशंक रहती थी। अतः हमें इस बात का विशेष
ध्यान रखना पड़ता कि हमारी कार्यवाही से किसी को किंचित मात्र भी सन्देह न
होने पाये, वरना सब खेल बिगड़ जायेगा। सभी मित्र मेरे घर में ठहरते और प्रातः
4 बजे मेरी माँ सबके लिए भोजन पकाती। 5 बजे उन्होंने एकाएक घोषणा कर दी
कि “अगर आज तुम काम पर नहीं जाओगे तो कल के भोजन का भी स्वयं ही
कहीं प्रबन्ध कर लेना।”
आख़िर 21 जनवरी 1919 का सुदिन आ पहुँचा। उसी दिन हमारे देश ने
प्रजातन्त्र शासन की स्थापना कर स्वतन्त्रता की घोषणा की थी। उसी दिन स्वतन्त्र
जातियों के नाम मैत्री का सन्देश भेजा था। इसी दिन आयरिश प्रजातन्त्र पार्लियामेण्ट
का प्रथम सम्मेलन हुआ था। हम आज भी नित्य की तरह अपनी जगह पर जाकर
बैठ गये। प्रतीक्षा के शान्तिदायक कितने ही घण्टे न जाने क्या-क्या सोचते हुए बिता
चुके थे। उस दिन डबलिन में होने वाली उपरोक्त महान घटना पर बातचीत करते
हुए कितना आनन्द अनुभव कर रहे थे। यह सोचकर कि आज की घटना से समस्त
संसार के सामने आयरलैण्ड भी उन्नत-शिर होकर खड़ा हो पायेगा, हम पुलकित
हो उठे। ठीक उसी समय निरन्तर टिप्रेरी की ओर ताकता रहने वाला हमारा जासूस
आ धमका। उसके नेत्रों से सांग्रामिक तत्परता तथा असीम आनन्द की ज्योति निकल
रही थी। उसने शीघ्रता से परन्तु दृढ़ता के साथ कह दिया, “वे आ रहे हैं! वे आ
रहे हैं!!” एकाएक हम सभी चौंक पड़े। हम सभी अपना-अपना स्थान तथा कर्तव्य
जानते थे। हर एक अपनी-अपनी जगह पर जा डटा। गुप्तचर ने लौटकर उनकी
संख्या तथा अन्तर भी बता दिया। अब उस नीरव स्थान में घोड़े की टाप तथा गाड़ी
710 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की गड़गड़ाहट भी सुनायी देने लगी! उस दिन मैं किसी तरह धैर्य न रख सका।
उस समय मेरी नसें तनी जा रही थीं। सफलता और असफलता दोनों का भीषण
परिणाम उस समय मेरी आँखों के सामने दीख रहा था। हमें उन चिर अभ्यस्त
सिपाहियों का सामना करना था जोकि युद्ध विद्या में पूर्ण रूप से निपुण थे। और
हम? हमारे छोटे से दल में से कितनों ने गोली चलाने का अभ्यास किया था?
अभ्यास मात्र के लिए गोली चलाने की फ़िजूलखर्ची करने का तो हम कभी साहस
भी नहीं कर पाये थे। गोलियाँ मिलती ही कहाँ थीं? हम कितनी बार अभ्यास की
इस आवश्यकता पर वादविवाद करते हुए ऐसे अवसर पर अवश्यम्भावी अधीरता
की ओर संकेत कर हँस देते थे! परन्तु अब तो समय आ ही पहुँचा। अभी-अभी
कुछेक क्षण बाद हमारी परीक्षा हो जायेगी। वे सामने आ पहुँचे। ड्राइवर तथा इंचार्ज
घोड़े के ज़रा पीछे-पीछे चल रहे थे और केवल दो सिपाही रायफ़लें लिए गाड़ी
के पीछे-पीछे चले जा रहे थे। यह लो, वे हमारे रिवाल्वरों की ज़द (पहुँच या मार)
में आ गये। अब तो हमें उठना ही चाहिए! Hands up! Hands up!! (हाथ उठा
दो! हाथ उठा दो!!) कहते हुए हमारे साथी अपने-अपने स्थान पर से कूद पड़े।
परन्तु हमारे आदेश का सिपाहियों पर कुछ भी प्रभाव न हुआ। वे लिहाज़ करने वाले
नहीं हैं। बस! एक ही क्षण में 'बैक! बैक!!' का स्वर करती हुई हमारी गोलियाँ
अपने ठिकाने पर जा रहीं। दोनों सिपाही ज़मीन पर लोट गये! परन्तु अब?
घबराहट का समय तो अब आया। यदि बिना गोली चलाये ही सब कार्य हो
गया होता, तो इतनी खतरनाक बात न होती। परन्तु अब तो प्रत्येक घर और बाड़े
से स्त्री और पुरुष सड़क पर निकल आयेंगे और ड्राइवर तथा इंचार्ज महाशय भी
सामने ही त्रस्त हुए खड़े थे। अभी एक घण्टे के अन्दर यहाँ सैकड़ों सिपाही आ
इकट्ठा होंगे और हमें कुछ ही दिनों में लुटेरा डाकू घोषित कर हमारे सिर बड़ा भारी
ईनाम रख दिया जायेगा। खैर! पुलिस वालों की रायफ़लें उठाकर गाड़ी पर चढ़ बैठे!
हागन महोदय कोचवान बने। मैं और ट्रीसी पीछे बैठ गये। कोड़े पर कोड़ा बरसाते
हुए घोड़े को दौड़ाते जा रहे थे। लोग बड़े आश्चर्य से हमारी ओर देखते थे। हम
डनस्केह की ओर जा रहे थे। बहुत देर तक हम चुपचाप बैठे रहे। फिर ट्रीसी
महोदय बोले, “डेन, याद है। उस दिन विस्फोटक सम्बन्धी पुस्तक पढ़ रहे थे न,
कि विस्फोटकों को झटका नहीं लगना चाहिए, नहीं तो बहुत बड़ी हानि हो सकती
है?” वे बड़ी शान्ति के साथ बोले थे। परन्तु बोले गिरा दिया। और किसी के
विस्फोटकों को क्या, मानो एक विपत्ति का पहाड़ और जा भी रहे थे बड़ी तेज़ी
के साथ। इसलिए विस्फोटकों के झटके की तो बात ही क्या कहते? हमने स्थान
पर लूट का माल छिपा दिया और घोड़े को दूसरी ओर ले जाकर एलीने ब्रिज पर
छोड़ दिया और थोड़ा-सा विस्फोटक पदार्थ वहाँ पर रख दिया। यह सब तो हो गया,
परन्तु अब प्रश्न यह था कि हम कहाँ जायें?
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 711

टिप्रेरी में अब हमारे लिए जगह न थी। ऋतु अनुकूल न थी। कई दिन की
प्रतीक्षा तथा आज के परिश्रम से हम थक भी चुके थे। परन्तु अब तो बहुत दिनों
के लिए सुख आराम बदा ही न था। आख़िर दक्षिण की ओर चल दिये। आगे गालूटी
पहाड़ सीधा दीवार की तरह खड़ा था। हमारे जैसे सभी अभागे इन पर्वतों में आश्रय
पाते थे। उन्हीं लोगों की सहायता को पाने की ही हमें पूर्ण आशा थी। इसी आशा
में हम इन पर्वतों की घाटियों में बहुत दूर तक निकल गये।
घोड़ा छोड़ने की जगह से चार मील की दूरी पर श्रीमती फिज़ ज़र्ल्ड (Fizgerld)
के घर हमने भोजन किया और आगे चल दिये शीत को तो मानो हमसे प्रेम हो गया
था। ऐसा जान पड़ता था कि ठण्डी हवा हमारे शरीर के अन्दर घुस जाने के लिए
लालायित हो उठी है। हमें उस समय दो जीव और मिले, जो बिल्कुल सिकुड़े खड़े
थे। फिर हम न जाने किधर चलते चले गये। किसी घर अथवा बाड़े में जाकर मार्ग
पूछने का तो हमें साहस ही न होता था। उस समय लोग बड़े मुँहफट थे। वे अभी
गम्भीरता और मौन का महत्त्व समझ न पाये थे। चलते-चलते श्री ट्रीसी 20 फुट गहरी
खाई में गिर गये। हमें बहुत चिन्ता हुई। पर निकाला तो देखा कि भले-चंगे सामने खड़े
मुस्कुरा रहे हैं। आप बड़े हँसमुख व्यक्ति थे। हमें भी सदा हँसाते ही रहते थे। हम पहाड़ी
पर चढ़ते ही चले गये। परन्तु यकायक क्या देखते हैं कि मार्ग ख़त्म हो गया। आगे
किसी ओर भी जाने का रास्ता नहीं। उस समय क्लान्ति और शीत के मारे हम बिल्कुल
संज्ञाहीन हो गये थे। निराश होकर लौटना पड़ा। उस समय हागन महाशय बोल उठे,
“ठीक है, घरों में अंगीठी के पास आराम से बैठे हुए कम्बख़्त कवि लोग पर्वतों के
सौन्दर्य की प्रशंसा में इतनी बड़ी कविताएँ लिख डालते हैं। वे कभी हमारी तरह हमारी
अवस्था में इस शीत में इस तरह पत्थरों में ठोकर खायें। फिर देखें कि कैसे पर्वतों
तथा प्रकृति के सौन्दर्य की उपासना करते हैं।”
लौट आने पर काहिट जाने का निश्चय हुआ। रेलवे लाइन के साथ-साथ चले।
पक्की सड़क पर बड़ी रोशनी वाली मोटरगाड़ियों में सिपाही हमारी तलाश में फिर
रहे थे। घोर अन्धकार था। हमने एक मूर्ति देखी। मैंने तुरन्त पिस्तौल तानकर वही
सैनिक आज्ञा (Hands up) (हाथ उठा दो) दे डाली। मूर्ति वहीं खड़ी हो गयी। मैं
अपना रिवाल्वर ताने उसके पास गया, तो अपने को रेल के एक बोर्ड के सामने
खड़ा पाया, जिस पर लिखा था, कि गुज़रने वाला गिरफ़्तार किया जायेगा। हमारी
दशा इतनी चिन्ताजनक, विपत्तिपूर्ण तथा शोचनीय थी, पर फिर भी हम तीनों
खिलखिलाकर हँस पड़े। श्री ट्रीसी से बार-बार काहिट का अन्तर पूछते और ‘बस
सड़क के अगले मोड़ पर ही’ (जोकि क़रीब दो तीन मील पर आता) हर बार
यही उत्तर सुनते। आख़िर हम काहिट आ ही पहुँचे। श्रीमती टोकि के घर गये। वहाँ
बिस्तर मिल गया। उत्तेजना, क्लान्ति, अवसाद और ठण्ड ने हमारे लिए सोना
असम्भव कर दिया। परन्तु लेटे रहने से श्रान्त अंगों को कुछ विश्राम मिल गया। अब
712 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

समाचारपत्र पढ़ने की प्रबल इच्छा हो उठी। हमारी भविष्यवाणी के अनुसार
बड़े-बड़े भयंकर शीर्षकों से संवाद प्रकाशित किया गया। उदाहरणार्थ 'टिपेरी
उपद्रव', 'भीषण हत्याकाण्ड', 'भयंकर अपराध' आदि आदि। हागन के छोटे भाई
और एक बालक जिसकी आयु बारह वर्ष की थी, पकड़े गये, परन्तु शीघ्र ही छोड़
दिये गये। इस देश में और भी अशान्ति मच गयी। दक्षिण टिपेरी में मार्शल ला
(फ़ौजी क़ानून) जारी कर दिया गया। ताजीदी पुलिस की चौकियाँ गाँव-गाँव में
बिठा दी गईं। हमारे लिए ईनाम रख दिया गया जो पहले एक हज़ार पौण्ड था और
बाद में दस हज़ार कर दिया गया। हमारे छोटे से दल की उद्दण्डता के कारण अंग्रेज़ों
को नग्न मुख होकर संसार को दिखा देना पड़ा कि आयरलैण्ड का उनका अधिकार
केवल सैनिक बल पर निर्भर था। इस ज़बरदस्ती और बल प्रयोग के अतिरिक्त
उनके पास और कोई युक्ति न थी। 1916 के ईस्टर विद्रोह के बाद पहली गोली
चलने की घटना का यही अत्युक्तिरहित सच्चा विवरण है। इसी से आयरलैण्ड का
स्वातन्त्र्य-संग्राम प्रारम्भ हुआ।
चौथा परिच्छेद
अंग्रेज़ों के देश निकाले का हुक्म
श्रीमती टरविन के घर दो दिन ठहरने के बाद हम आगे चल दिये और विभिन्न मित्रों
के घरों में विश्राम करते रहे। एक बार कलिड निवासी श्री रीयन (Ryan) के घर
जाने का निश्चय किया। उन्हें कहला भी भेजा, परन्तु जा नहीं सके। यह अच्छा ही
हुआ क्योंकि ठीक उसी समय जबकि हमें वहाँ पहुँचना था, पुलिस ने उनका घर
घेर लिया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। बालघ के श्री ओब्रीन के घर एक दिन
ठहरे। हम छत पर सो रहे थे। घर में अपरिचित लोगों का शब्द सुनकर उठ बैठे।
देखा, पुलिस वाले घर में घुस आये हैं। युद्ध के लिए तैयार होकर बैठ गये और
उनकी प्रतीक्षा करने लगे। परन्तु वे यों ही लौट गये। पता चला कि कुत्तों का टैक्स
लेने आये थे। अन्त में हम गल्टी के दूसरी ओर मिकेल्स टाउन में जा पहुँचे। हमें
घर छोड़े बहुत दिन हो गये थे। परन्तु अभी तक सोलोहैडबेग से दस मील से अधिक
दूर नहीं जा पाये थे। पुलिस वालों ने हमारी तलाश में रात दिन एक कर रखा था।
सार्वजनिक नेताओं, पादरियों तथा संवाद पत्रों ने हमारी निन्दा करने में कोई कसर
उठा न रखी। प्रार्थनाओं के समय गिरजों में हमें अभिशाप दिये जाते। परन्तु हम जानते
थे कि 98 के विद्रोही वीरों, 67 के वीर फिनीयन्स तथा 1916 के ईस्टर के विद्रोह
के सैनिकों के साथ भी उस समय ऐसा ही बर्ताव हुआ था और बाद में लोगों ने
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 713

उनके पक्ष का ही समर्थन किया था। इसलिए बाद में लोग हमारी भी प्रशंसा करेंगे।
हमारे साथ बीत खूब रही थी। एक दिन एक ज़मींदार के बाड़े में उसके साथ
बैठे आग सेंक रहे थे। रात्रि का समय था। एकाएक किसी ने ज़ोर से द्वार खटखटाना
शुरू कर दिया। ज़मींदार ने बैठे-बैठे ही पूछा, ‘कौन है?’ उत्तर मिला, ‘पुलिस!’
बस! एकदम अपने रिवाल्वर निकालकर हम तैयार होकर बैठ गये। परन्तु द्वार खुलने
पर पड़ोस का एक कृषक अपनी दिल्लगी पर हँसता हुआ प्रविष्ट हुआ। हमने अपने
रिवाल्वर छिपाने का प्रयत्न तो बहुत किया परन्तु वे उस ज़मींदार की नज़र से न
बच पाये। उस कमबख़्त ने एकदम कह ही तो दिया, ‘महाशय, सशस्त्र लोगों को
अपने घर में आश्रय देने को मैं तो हरगिज़ तैयार नहीं।’ बाहर गज़ब की ठण्ड थी,
घोर अन्धकार था, परन्तु विवश हो अग्नि तथा गरम कमरे की ओर सतृष्ण नेत्रों से
देखते हुए बाहर निकलना पड़ा। पशुओं के कमरे में घुसकर रात वहीं बितायी। कपड़े
आदि भी फट गये। मित्र लोग मिलने तक से झेंपते थे। आख़िर हम दोनों नगर में
पहुँचे। यह स्थान सोलोहैडबेग से 7 मील की दूरी पर था। यहीं पर हमारे साथी
श्री राबिन्सन भी हमसे आ मिले। इस पुनर्मिलन से हमें अत्यन्त आनन्द हुआ। हमें
जुदा हुए अभी कुछ सप्ताह ही हुए थे, तथापि ऐसा मालूम होता था मानो हम सहोदर
चिर-आयोग के बाद फिर मिले हों। इसके बाद घूमते-घामते एक वृद्ध व्यापारी के
घर पहुँचे, वहाँ कुछ आराम मिला। पेटभर भोजन किया, और फिर युद्ध की सूझने
लगी। “नहीं, इस तरह निरुद्देश्य यात्रा में समय नष्ट हो रहा है, अतः हमें किसी
न किसी क्रियात्मक कार्य में जुट जाना चाहिए।” युद्ध घोषणा तैयार की गयी। उसमें
अंग्रेज़ों को देश ख़ाली कर देने की आज्ञा दे दी गयी थी और आज्ञोल्लंघन के
अपराध में मृत्यु दण्ड निश्चित किया गया था। हमने वह युद्ध-घोषणा अपने केन्द्र
डबलिन में मंजूरी के लिए भेजी, परन्तु उसकी मंजूरी के स्थान पर हमें आज्ञा मिली
कि तुम्हें अमेरिका जाना होगा, सब तैयारी हो चुकी है। यह हमारे लिए वज्रपात से
कम न था। हम तो आयरलैण्ड में रहकर युद्ध करना चाहते थे। पर उधर जिनसे
सहायता पाने की आशा थी, वे ही हमें निर्वासित करने की गुप्त मन्त्रणा कर रहे
थे। हमने दृढ़ता के साथ स्पष्ट कह दिया, “हम मृत्यु से नहीं डरते और आयरलैण्ड
में रहते हुए उसके लिए लड़ते हुए मर जाने में ही गौरव अनुभव करेंगे।” वे नाराज़
हो गये, परन्तु हमने उन्हें विश्वास दिलाया कि, “हमारे विचार से हमारे लिए पृथ्वी
पर यदि कहीं स्थान है तो आयरलैण्ड में! हम इसी देश में रहते हुए, इसी की
स्वतन्त्रता के लिए इसी के चौराहों, सड़कों, नगरों तथा खेतों में शत्रु से युद्ध करते
हुए प्राण दे देंगे।” हमें बाहर जाकर लेख लिखकर हृदय को शान्त कर लेना पर्याप्त
न जँचता था। ख़ैर, वे मान गये, परन्तु इस शर्त पर कि हम चुपचाप किसी कोने
में बैठे रहें। हमने सोचा हम इस असुविधा को भी जल्दी ही दूर कर लेंगे।
कुछ दिन बाद हम नोर्डस टाऊन निवासी डोन्ल्ली के घर पहुँचे। वहीं पर
714 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ब्रिगेड काउंसिल की बैठक हुई और हमने पूर्वोक्त घोषणा-पत्र प्रकाशित करने का
निश्चय कर ही लिया। फ़रवरी, 1919 के अन्तिम दिनों में वह सभी बड़े-बड़े नगरों
तथा कस्बों में लगा दिया गया। इस समय संवाद-पत्रों ने बड़े व्यंग्यपूर्ण शीर्षकों से
उसे प्रकाशित किया। सचमुच हमारी दशा को देखकर कोई भी यह कह सकता
है कि छोटा मुँह बड़ी बात की कहावत हम पर चरितार्थ होती थी। जो भी बाद
में उसका प्रभाव पड़ा, इसका सभी ने लोहा माना। एक दिन हम भूख से पीड़ित
हुए। बहुत दूर तक चलकर क्रीनीवासी श्री मर्फी के घर पहुँचे। भूख के मारे
अधपका मांस खाकर बेचारे हागन बीमार हो गये। हम डबलिन पहुँचना चाहते थे
परन्तु उनकी बीमारी से बड़ी विपत्ति पड़ी। खैर, श्री ट्रीसी और श्री राबिन्सन को
हमने पहले भेज दिया। वे वहाँ बिल्कुल सुरक्षित तौर से पहुँच गये। नित्य गजट में
हम सभी का हुलिया और पुरस्कार की बड़ी भारी रकम प्रकाशित होती रहती थी।
ऐसी दशा में नगर में जाना और वहाँ पर कार्य करना कितना ख़तरनाक है, इसका
अनुमान आसानी से किया जा सकता है। इधर मैं और हागन भी यहाँ अधिक न
ठहर सकते थे। आख़िर टामीमिक अनरनी मोटर लेकर आ पहुँचे। यह वहाँ से 1916
के विद्रोह में मोटर की टक्कर लगाकर दो अभागों को नदी में डुबो चुके थे और
स्वयं किसी न किसी तरह बच आये थे। खैर हम चल दिये।
लिम्बर्क लिम्मर्क तक तो कोई विशेष घटना नहीं हुई परन्तु वहाँ हमें सैनिक
लारियों की एक बड़ी श्रृंखला का सामना हुआ। सभी लारियों पर सैनिक लदे हुए
थे और प्रत्येक लारी के साथ एक-एक मशीनगन थी। हम समझे थे कि यह किसी
बड़े भारी कार्य पर जा रहे थे। पर बाद में शीघ्र ही पता चला कि वे हमारी ही
ख़ातिर आ रहे थे। उनमें कितने सैनिक घण्टों हमारा हुलिया याद करने का परिश्रम
करते रहे होंगे। किसी का किंचित मात्र भी सन्देह हमारी मृत्यु का कारण हो सकता
था। हम भी बड़े राजभक्तों की तरह मुग्ध-दृष्टि से उनकी ओर देख रहे थे। लारियाँ
धड़ाधड़ गुज़र रही थीं। कोई बीस एक के गुज़र जाने के बाद हमने देखा कि एक
सैनिक महाशय बन्दूक़ उठाये हमारी ओर आ रहे हैं उन्होंने आज्ञा दे ही दी, 'ठहरो!'
अब समझे पहली लारियाँ चुपचाप आगे क्यों बढ़ा दी गईं। ड्राइवर महोदय ने तुरन्त
ब्रेक कस दिये। मैं अपना अन्तिम समय निकट समझ पिस्तौल तानकर सोच ही रहा
था कि कौन-से सिपाही को सबसे पहले सुलाऊँ कि एक अफ़सर आगे बढ़ा और
कहने लगा, “महाशय आपको देरी हो रही होगी, क्षमा कीजियेगा, दो लारियाँ टूट
गयी हैं, और सड़क रुक गयी है।” मैंने तुरन्त पिस्तौल छिपा लिया। उन्होंने फिर
कहा, “यदि आप पैदल उतरकर चले जायें जो बहुत अच्छा हो।” इस समय तक
मेरी उद्विग्नता दूर हो चुकी थी। मैंने दृढ़ता से कहा, “महाशय, हम बड़ी दूर से चले
आ रहे हैं और थके हुए हैं। हमें बहुत ज़रूरी कार्य है और शीघ्र पहुँचना है। हम
पैदल नहीं जा सकते।” उसने तुरन्त सैनिकों को हमारी मोटर ढकेलने की आज्ञा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 715

दे दी, जो 200 गज तक उसे ढकेलते चले गये। उस समय निश्चय ही वे समझे
थे, कि मोटर में बैठने वाला आयरिश व्यक्ति पार्लियामेण्ट तक में प्रश्न छेड़ सकता
है। खैर! मैं और हागन बड़ी मुश्किल से हँसी रोक पाये और सैनिकों के कष्ट के
लिए उन्हें बार-बार धन्यवाद देते हुए विदा हुए। कोई आधा घण्टा बाद तक मोटर
को पूरी रफ़्तार पर चलाते रहे। इसी प्रकार उन सैनिकों ने जो हमारी ही तलाशी में
जा रहे थे, हमारी ही सहायता की! बहुत स्थानों पर होते हुए, विभिन्न मित्रों के घरों
में ठहरते हुए, हम लोग डबलिन की ओर चले जा रहे थे। हमारे परिचित हमारी
ओर देखकर बड़े चकित होते और हमें नमस्कार आदि कहने से पहले चारों ओर
बड़ी सावधानी से ताक लेते तथा बाद में भी बड़े धीमे स्वर से बात करते। उनका
यह व्यवहार देख हमें बड़ी हँसी आती। डबलिन में हम चारों फिर मिल गये। हम
जब भी मिलते तब हमें बिल्कुल ख़याल न रहता कि हमारे पीछे पुलिस मारी-मारी
फिरती है। हम ठीक छुट्टी पर आये हुए विद्यार्थियों की तरह हँसते-खेलते रहते
थे। हमने उन दोनों को चिढ़ाने के विचार से उपरोक्त सिपाहियों की सहायता पाने
की बात कही तो उन्होंने भी झट अपनी मोटर ठीक जेल के द्वार के सामने रुक
जाने तथा सिपाहियों के उसे धकेलने की बात सुनायी।
हमने मिलकर परामर्श किया तो बहुत पछताये कि विगत तीन मास हमने व्यर्थ
खो दिये। सोलोहैडबेग की घटना से तो माना देशभर में जीवन संचारित हो उठा था,
परन्तु अब तो वह स्मृति मात्र रह गयी थी। देशभर में सुविस्तृत सैनिक संगठन
विद्यमान था। शस्त्र भी पर्याप्त थे। लोग भी अब वैसे भीरू और कायर नहीं थे। वे
ड्रिल करने तथा शस्त्र रखने के अपराध में प्रसन्नतापूर्वक जेलों में जा रहे थे। परन्तु
आवश्यकता थी उन्हें शस्त्रों का प्रयोग करने का परामर्श देने की। इस तरह बहुत
देर तक सोच विचार करते रहने के बाद हमने चार साइकिलों का प्रबन्ध कर लिया
और डोनोहिल को वापिस चले गये। हम अपने मित्र होरेन परिवार के पास गये तो
उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए कि हम वास्तव में मनुष्य ही हैं – प्रेतात्मा नहीं,
बड़ी चेष्टा करनी पड़ी। मैं अपनी माँ से भी जा मिला। बेचारी मुझे देख बहुत
विस्मित तथा प्रसन्न हुईं। उन्होंने मेरे कारण बहुत कष्ट सहन किये। मेरे बाद तो दिन
में दो-दो तीन-तीन बार उनकी तलाशी हो जाती। घर का सब सामान पुलिस ले
गयी थी। मुर्गी और उसके बच्चे मारकर वे बदला निकालते थे। तो भी वे हतोत्साह
नहीं हुईं। जब कभी पुलिसमैन पूछता, “क्यों जी, तुम्हारा पुत्र डेनब्रीन कहाँ है?”
तो तुरन्त व्यंग्यपूर्ण उत्तर देतीं, “क्यों? क्या उसके साथ एक छत के नीचे बैठने का
साहस है?” इसी तरह एक बार पूछने पर उन्होंने कह दिया, “हाँ। डेनब्रीन ऊपर
बैठा है, और तुम्हें ऊपर चले आने का निमन्त्रण देता है। क्यों, साहस है?” बस
पुलिसमैन भाग गया और बड़ी भारी सेना ने घर घेरकर तलाशी लेनी शुरू कर दी।
जो भी हो, माँ ने एक भीषण अपराध किया था। उसी के फलस्वरूप वह सब कष्ट
716 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

उसे सहन करने पड़े। उसका वह भयंकर अपराध था अपने पुत्र को कर्त्तव्य-पालन
की शिक्षा देना तथा उसके हृदय में स्वदेश प्रेम जागृत करना! इसी अपराध का दण्ड
वह धैर्य से सहन करती रहीं! वह वीर माता थीं।
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पाँचवाँ परिच्छेद
ट्रेन में से बन्दी मित्र को छुड़ाया
हम टिप्रेरी में अपने सभी सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार करने लगे। उसके लिए
हमने समुचित प्रयत्न किया। एक दिन प्रातःकाल दो बजे अपनी साइकिल लिए जा
रहा था कि एक दूसरी ओर से आने वाली साइकिल के साथ टक्कर हो गयी।
उसकी साइकिल का हैण्डिल मेरी छाती में धँस गया और मैं वहाँ अचेत होकर गिर
गया। मेरे मुँह से बहुत रक्त बहा। उस समय बहुत घबराया। क्या जीवन का इसी
तरह अन्त होना था? युद्धक्षेत्र में शत्रु के विरुद्ध लड़ते हुए मुझे गोली लग गयी होती,
अहा! मैं कितना प्रसन्न होता। परन्तु आज इस तरह अनजान में व्यर्थ ही जीवन
समाप्त हो जायेगा, यह विचार ही मेरे लिए एक विपत्ति बन बैठा। अर्धचेतनावस्था
में मैंने देखा कि अंग्रेज़ सैनिकों ने मुझे पहचान लिया है। बस यमदूत के साक्षात
दर्शन होने लगे। चेतना हुई, उठा। ज्यों-त्यों घर पहुँचकर चिकित्सा की। स्वस्थ होकर
फिर अपने कार्य में जुट गया। दिन रात एक-सा परिश्रम करता। कभी रात अच्छे
बिस्तर में कट गयी, तो कहीं पृथ्वी पर लेटना पड़ा। कहीं अँगीठी मिल गयी तो
कहीं पशुओं के साथ रात बितायी। अब इस प्रकार की छोटी-छोटी असुविधाएँ
सहन करने का अभ्यास हो गया था।
इधर चार दिन से हम सोये नहीं थे। परिश्रम करते चले आ रहे थे। पता लगा,
कि बालघ (Bailagh) में ईमन ओ' डुभिर (Eamon O' Dubhir) के यहाँ नृत्य होने
वाला है। बस! सब रुकावट दूर हो गयी। हम युवक थे। विपत्तियाँ सहन करते चले
आ रहे थे। चिरकाल से किसी उत्सव में सम्मिलित होने का अवसर न मिला था।
हम सीधे उसी घर की ओर हो लिये। वहाँ पर बहुत से परिचित बालक तथा
बालिकाएँ आनन्द विहार में निमग्न थे। हमारे भी हृदयों का भार हलका हो गया।
कितना सुन्दर संगीत था! रातभर वहाँ नाच किया। ठीक उसी समय पुलिस के कई
दस्ते विभिन्न घरों में हमारी ही खोज में तलाशी ले रहे थे। उन बालक-बालिकाओं
में से कोई भी चुपचाप खिसक जाकर, पुलिस वालों को लेकर हमें पकड़वा सकता
था, परन्तु इसका किसी को स्वप्न में भी विचार न आया होगा। आयरलैण्ड वासियों
में सहस्रों दोष होंगे, परन्तु उनमें देशद्रोही बहुत कम होते हैं। प्रातः समय मैं वहाँ
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 717