भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
लें तो क्रान्तिकारियों को अपने रास्ते पर चलने की पूरी छूट होगी। क्रान्तिकारी
नेताओं ने गाँधीजी की बात मान ली। सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हुआ। देखते-देखते
वह सारे देश में फैल गया और गाँवों की छोटी-छोटी झोंपड़ियों तक में ‘स्वराज्य’
शब्द गूँजने लगा। आन्दोलन में भाग लेने के लिए गाँधीजी ने जो भी रोकथाम की
शर्तें लगाई थीं उन सबको भी तोड़कर किसान पूरे जोश के साथ आन्दोलन में कूद
पड़े। “सरकार परेशान और घबरायी हुई थी, उसके हाथ-पैर फूलने लगे थे। यदि
सरकार की चौमुखी अवज्ञा की छूट शहरों से चलकर करोड़ों किसानों तक पहुँच
जाती है तो अंग्रेज़ी हुकूमत के पास बचत के लिए कोई चारा नहीं रह जायेगा; तीस
करोड़ जनता के विद्रोह की खौलती हुई हाँडी से उनकी सारी तोपें और हवाई जहाज़
भी उन्हें बचा नहीं सकेंगे।”²⁴ गाँधीजी भी खुश नहीं थे और उतने ही घबराये हुए
थे। वे आन्दोलन वापस लेने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा में थे और फ़रवरी,
1922 में चौरी-चौरा की घटना से उन्हें यह अवसर मिल गया। बजाय इसके कि
वे उस घटना का स्वागत करते और जनता से उसी प्रकार की हज़ारों और घटनाओं
की माँग करते, उन्होंने किसी से सलाह लिये बग़ैर चुपचाप आन्दोलन वापस ले
लिया और राजनीति से अलग हो गये। इस पृष्ठभूमि में क्रान्तिकारियों ने, जिन्होंने
गाँधीजी के कहने पर हथियार रख दिये थे, अपने को संगठित करके फिर से
हथियार उठाने का फ़ैसला किया।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
सभी क्रान्तिकारियों को एक अखिल भारतीय पार्टी में संगठित करने में पहल की
शचीन्द्रनाथ सान्याल ने। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1923 के अन्त में ‘हिन्दुस्तान
प्रजातन्त्र संघ’ (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) की बुनियाद डाली। उन्होंने
पार्टी का संविधान भी तैयार किया जो पीले काग़ज़ पर छपा था और इसीलिए वह
‘पीला परचा’ के नाम से मशहूर है। एक और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ जो उन्होंने तैयार
किया वह था ‘हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ’ का घोषणापत्र जिसका शीर्षक था (दि
रिवोल्यूशनरी)। यह दस्तावेज़ पहली जनवरी, 1925 की रात में पूरे उत्तर भारत में
बाँटा गया था। 1917 की अक्टूबर क्रान्ति से प्रभावित होकर घोषणापत्र में भारतीय
क्रान्तिकारियों के उद्देश्य का एलान नीचे लिखे शब्दों में किया गया था :
“राजनीति के क्षेत्र में क्रान्तिकारी पार्टी का तात्कालिक उद्देश्य संगठित सशस्त्र
क्रान्ति द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य (फ़ेडरल रिपब्लिक
ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इण्डिया) स्थापित करना है। इस गणराज्य के अन्तिम
संविधान का निर्माण एवं घोषणा तब होगी जब सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि अपने
निर्णयों को लागू करने में सक्षम होंगे। लेकिन इस गणराज्य का मूलभूत सिद्धान्त
सार्वजनिक मताधिकार पर और शोषण पर आधारित ऐसी समस्त व्यवस्थाओं की
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समाप्ति पर आधारित होगा जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।
इस गणराज्य में मतदाताओं को, यदि वे चाहें तो, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का
अधिकार होगा, अन्यथा प्रजातन्त्र एक मखौल बनकर रह जायेगा।”
घोषणापत्र में कहा गया था कि “यह क्रान्तिकारी पार्टी इन अर्थों में राष्ट्रीय न
होकर अन्तरराष्ट्रीय है कि इसका अन्तिम उद्देश्य विश्व में मेल एवं सामंजस्य
स्थापित करना है। यह विभिन्न राष्ट्रों और राज्यों के बीच प्रतिद्वन्द्विता के बजाय
सहयोग चाहती है; और इन अर्थों में वह भारत के उज्ज्वल अतीत के महान ऋषियों
एवं आज के बोल्शेविक रूस का अनुसरण करेगी।”²⁵
घोषणापत्र में साम्प्रदायिक समस्या के बारे में, जनता के आर्थिक एवं
सामाजिक हितों के सवाल पर और कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक पार्टियों के बारे
में क्रान्तिकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया था।
इन सभी सवालों पर घोषणापत्र का दृष्टिकोण निश्चित रूप से अतीत का
दामन छोड़कर समाजवाद का और सोवियत को ‘विजयी समाजवाद का पहला देश’
कहकर उसका स्वागत करता है। उसमें हमें राष्ट्रीय आज़ादी के लिए चलने वाले
आन्दोलनों के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र की समझ भी देखने को मिलती है। हालाँकि यह
समझ अभी बहुत साफ़ नहीं है। स्वतन्त्र भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था
कैसी होगी, घोषणापत्र में उस पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है और
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मज़दूरों और किसानों को संगठित करने की
आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि
घोषणापत्र का लेखक मार्क्सवादी था या उसने वैज्ञानिक समाजवाद के सारतत्त्व को
आत्मसात कर लिया था। उसका झुकाव ख़ासतौर पर ईश्वर और रहस्यवाद की ओर
है। घोषणापत्र के अनुसार, “पार्टी का उद्देश्य सत्य को प्रस्थापित करना और उसका
प्रचार करना है। विश्व न माया है न भ्रम कि उसकी तरफ़ से आँख बन्द कर ली
जाये और उसकी उपेक्षा की जाये। वह एक अविभाज्य आत्मा का प्रकट स्वरूप
है, आत्मा जो शक्ति, ज्ञान और सौन्दर्य का सर्वोच्च उद्गम है।” लेखक मार्क्सवाद
के आर्थिक पक्ष को स्वीकार करता है, जो काकोरी से पहले के क्रान्तिकारियों के
मुक़ाबले निश्चय ही एक आगे बढ़ा हुआ क़दम है। लेकिन जहाँ तक मार्क्सवाद
के दार्शनिक पक्ष का सवाल है, लेखक भौतिकवाद को न मानकर भगवान और
धैर्य पर अडिग रहता है। आगे चलकर सान्याल जी स्वयं लिखते हैं : “कम्युनिस्ट
दर्शन में इतिहास के भौतिकवादी विश्लेषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। और
इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा शुरू से आख़िर तक
लगातार मौजूद है...मैं आज भी इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं कर पाया हूँ...।”²⁶
एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दा जिस पर उनका कम्युनिज़्म से मतभेद था, वह था
सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व की अवधारणा। उनका यह मत था कि “सिर्फ़ मध्यम वर्ग
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 47
के नौजवान ही नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, जबकि मज़दूर और किसान
क्रान्तिकारी सेना के सिपाही का काम करेंगे।”27
शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके समय के अन्य क्रान्तिकारियों की सैद्धान्तिक
मान्यताओं का सत्येन्द्र नारायण मजूमदार ने अपनी पुस्तक इन सर्च ऑफ़ ए
रिवोल्यूशनरी आइडियोलोजी एण्ड रिवोल्यूशनरी प्रोग्राम में संक्षेप में बड़ा अच्छा
खुलासा प्रस्तुत किया है। दोनों दस्तावेज़ों (क्रान्तिकारी और संविधान) पर टिप्पणी
करते हुए उन्होंने लिखा है : “ये दोनों दस्तावेज़ उन क्रान्तिकारियों की सोच का
प्रतिनिधित्व करते हैं जो उन दिनों साम्यवाद की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे।”28
इसके बाद दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं
: “इन दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताएँ हैं – (क) समाजवाद की विजय-पताका
फहराने वाले पहले देश के रूप में बोल्शेविक रूस के प्रति और साम्यवाद के प्रति
स्पष्ट झुकाव; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति के लिए क्रान्ति के अन्तरराष्ट्रीय चरित्र को
समझने की शुरुआत, हालाँकि यह समझ अभी बहुत साफ़ नहीं थी; (ग) स्वतन्त्र
भारत की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश;
(घ) मज़दूरों और किसानों को संगठित करने के लिए कृत-संकल्प होना;
(ङ) पार्टी में जनवादी-केन्द्रीयता के सिद्धान्त का प्रवेश।”29
दोनों दस्तावेज़ों की कमज़ोरियों को मजूमदार ने इस प्रकार गिनाया है : “
(क) साम्यवाद के प्रति झुकाव अवश्य था, लेकिन अभी तक साम्यवाद के
अध्ययन का ठोस आधार उसे नहीं मिला था; (ख) राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में मज़दूरों
और किसानों की भूमिका के वास्तविक महत्त्व को स्पष्ट रूप से नहीं समझा गया
था; (ग) घोषणापत्र का लेखक अभी तक धार्मिक रहस्यवाद के प्रभाव से ग्रस्त
है; (घ) घोषणापत्र यह समझने में असफल रहा कि आतंकवाद का मुक़ाबला करने
के लिए जवाबी आतंकवादी अभियान का मज़दूरों और किसानों को संगठित करने
के कार्य से सामंजस्य बैठाना अव्यावहारिक है; (ङ) राष्ट्रीय स्थिति का ग़लत
विश्लेषण देते हुए घोषणापत्र में कहा गया था कि 'हमारे जीवन के हर क्षेत्र में चरम
असहायता की भावना विद्यमान है और आतंकवाद उसमें यथोचित उत्साह पैदा करने
का प्रभावकारी साधन' आदि। जबकि उस समय तक भारत की मेहनतकश जनता
संघर्ष की राह पर कूच कर चुकी थी। उसका अगुवा दस्ता मज़दूर वर्ग निर्मम
पुलिस-दमन के बावजूद लगातार और बहादुरी के साथ शानदार लड़ाइयाँ लड़ रहा
था।”30
बंगाल में भी उसी दिशा में विकास हो रहा था। वहाँ अनुशीलन और युगान्तर
के कई नेताओं ने सोवियत रूस तथा कम्युनिज़्म में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी
थी। लेकिन यह दिलचस्पी साम्यवाद के अध्ययन पर या अक्टूबर क्रान्ति और
उसकी विशिष्टता की ठीक समझ पर आधारित नहीं थी। वे सोवियत यूनियन और
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कोमिण्टर्न को “हथियार तथा अन्य प्रकार की सहायता, मसलन बम बनाने की
शिक्षा आदि, प्राप्त करने के एक सम्भावित स्रोत के रूप में देखते थे। लेकिन जब
उन्हें पता चला कि सोवियत यूनियन और कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल दोनों ही जनता
से अलग किसी प्रकार की सशस्त्र गतिविधियों को प्रोत्साहन नहीं देते हैं तो उनकी
दिलचस्पी ठण्डी पड़ गयी।”³¹
उस समय, अर्थात तीसरे दशक के उत्तरार्द्ध में भारतवर्ष में कम्युनिस्ट
विचारधारा जनप्रिय हो रही थी। अक्टूबर क्रान्ति और रूस के ख़िलाफ़ साम्राज्यवादी
हस्तक्षेप की पराजय के अलावा इस बदलाव के कुछ अन्य कारण भी थे। जैसे :
(क) पेशावर और कानपुर के बोल्शेविक षड्यन्त्र केस; (ख) देश के कई भागों
में किसानों के जुझारू संघर्ष; (ग) मज़दूरों की देशव्यापी बड़ी-बड़ी हड़तालें
(घ) मज़दूर-किसान पार्टी का गठन; (ङ) देश के विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों को
मिलाकर एक अखिल भारतीय पार्टी के गठन का प्रयास। राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय
पैमाने पर घटित इन घटनाओं से प्रभावित होकर अनुशीलन के कुछ कार्यकर्ता पार्टी
से अलग होकर कम्युनिस्ट आन्दोलन में चले गये। अनुशीलन में उनका अच्छा
सम्मान था और क्रान्तिकारी युवकों में साम्यवाद को जनप्रिय बनाने में उन लोगों
की काफ़ी हद तक महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ का गठन
संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) में 1925 में क्रान्तिकारी पार्टी के प्रायः सभी प्रमुख
नेता काकोरी षड्यन्त्र केस के सिलसिले में पकड़कर जेल में बन्द कर दिये गये
थे। इससे हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के संगठन को बहुत बड़ा धक्का लगा। केवल
चन्द्रशेखर आज़ाद और कुन्दनलाल गुप्त ही पुलिस के चंगुल से बचकर निकल पाये
थे। इनके अतिरिक्त बाहर जो साथी रह गये थे वे सब दूसरी पंक्ति के सिपाही थे।
पार्टी को फिर से संगठित करने का दायित्व इन्हीं दूसरी पंक्ति के साथियों पर पड़ा।
उस समय अर्थात 1925 में कुछ क्रान्तिकारी लाहौर में सक्रिय थे और कुछ कानपुर
में फिर से काम आरम्भ करने का प्रयास कर रहे थे। सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से उस
समय तक इन दोनों केन्द्रों के साथियों के दिमाग़ साफ़ नहीं थे। हाँ, एक सही
सिद्धान्त की तलाश अवश्य आरम्भ हो गयी थी। इस दिशा में दोनों केन्द्रों के
साथियों को योग्य मार्गदर्शक भी मिल गये थे।
इस समय (1925-26) लाहौर के साथी, ख़ासकर भगतसिंह और सुखदेव,
रूसी अराजकतावादी बाकुनिन से प्रभावित थे। भगतसिंह को अराजकतावाद से
समाजवाद की ओर लाने का श्रेय दो व्यक्तियों को है – कामरेड सोहन सिंह जोश
जो अब हमारे बीच में नहीं हैं और लाला छबीलदास। जोश एक मशहूर कम्युनिस्ट
नेता और किरती नाम की पंजाबी मासिक पत्रिका के सम्पादक थे। वे भगतसिंह
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 49
से विभिन्न विषयों पर बातचीत करते और उन्हें किरती में लिखने के लिए प्रोत्साहित
करते थे। लाला छबीलदास ‘तिलक स्कूल ऑफ़ पोलिटिक्स’, जो नेशनल कॉलेज
के नाम से भी प्रसिद्ध था, के प्रधानाचार्य थे। वे नौजवान क्रान्तिकारियों को बतलाते
रहते थे कि क्या पढ़ें और कैसे पढ़ें। भगवतीचरण वोहरा का समाजवाद की तरफ़
आरम्भ से ही रुझान था। सोहन सिंह जोश का सारा मार्ग-दर्शन और लाला
छबीलदास के किताबों के बारे में सारे सुझाव पुस्तकों के अभाव में व्यर्थ ही रह
जाते। इस आवश्यकता को कुछ हद तक पूरा किया लाला लाजपत राय की
‘द्वारकादास लाइब्रेरी’ ने। इस पुस्तकालय में राजनीति-सम्बन्धी पुस्तकों का अच्छा
संग्रह था जिनमें मार्क्सवादी और सोवियत रूस पर ऐसी पुस्तकें भी शामिल थीं
जिन्हें सरकार ने ज़ब्त नहीं किया था।
लाहौर के क्रान्तिकारियों ने उस पुस्तकालय से पूरा लाभ उठाया। उस काम
में उन्हें पुस्तकालय के अध्यक्ष और क्रान्तिकारियों के हमदर्द श्री राजाराम शास्त्री
(अब स्वर्गीय) से काफ़ी सहायता मिलती थी। पुस्तकें प्राप्त करने का एक और
भी सोर्स था रामकृष्ण एण्ड सन्स नाम की किताबों की एक दूकान। यह दूकान
अनारकली बाज़ार में थी और उसके पास इंग्लैण्ड से ज़ब्तशुदा पुस्तकें मँगवाने
की अच्छी व्यवस्था थी। पंजाब के क्रान्तिकारियों ने, खासकर भगतसिंह और
भगवतीचरण वोहरा ने, इन सुविधाओं से पूरा लाभ उठाया। श्री राजाराम शास्त्री
ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि भगतसिंह वस्तुतः पुस्तकों
को पढ़ता नहीं निगलता था, लेकिन फिर भी उसकी ज्ञान की पिपासा सदा
अनबुझी ही रहती थी। भगतसिंह पुस्तकों का अध्ययन करता, नोट्स बनाता,
अपने साथियों से उन पर विचार-विमर्श करता, अपनी समझ को नये ज्ञान की
कसौटी पर आत्मालोचनात्मक ढंग से परखने का प्रयास करता और इस प्रक्रिया
में अपनी समझ में जो-जो ग़लतियाँ दिखलायी पड़तीं उन्हें सुधारने की कोशिश
करता। इन सब बातों ने पंजाब ग्रुप को तेज़ी के साथ आगे बढ़ने में मदद की।
परिणामस्वरूप 1928 के आरम्भ में उन्होंने अराजकतावाद को छोड़कर समाजवाद
को ध्येय के रूप में स्वीकार कर लिया। इसका यह मतलब नहीं कि उन्होंने
मार्क्सवाद को पूरी तरह से समझ लिया था। अतीत के प्रभाव से अभी पूरी तरह
छुटकारा नहीं मिल पाया था।
कानपुर के साथी भी ठीक उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे, हालाँकि उनकी
आगे बढ़ने की गति में वह तेज़ी नहीं थी जो लाहौर के साथियों में थी। कानपुर
में राधामोहन गोकुलजी, सत्यभक्त और मौलाना हसरत मोहानी अपने को कम्युनिस्ट
कहते थे। इनमें से राधामोहन जी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके पास
पुस्तकों का अच्छा संग्रह था। अध्ययनशील व्यक्ति होने के साथ ही वे एक सशक्त
लेखक भी थे। 1927 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी – कम्युनिज़्म क्या है?
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सरल और सीधी-सादी भाषा में इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने हिन्दी के पाठकों
के सामने कम्युनिस्ट सिद्धान्त के प्रमुख मुद्दों को प्रस्तुत किया था। इन पंक्तियों के
लेखक को भी कम्युनिज़्म का पहला सबक राधामोहन जी से ही मिला था।
राधामोहन जी कट्टर नास्तिक थे। ईश्वर, धर्म, अन्धविश्वास आदि पर उन्होंने
पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ लिखा था। उनका यह रूप देखकर हिन्दी के
उपन्यास-सम्राट प्रेमचन्द ने उन्हें ‘आधुनिक चार्वाक’ कहकर पुकारा था।
सत्यभक्त का कम्युनिज़्म अध्यात्मवादी रंग का था और मौलाना हसरत मोहानी
के विचार कम्युनिज़्म और इस्लाम की खिचड़ी कहे जा सकते हैं। इन कमज़ोरियों
के बावजूद सोवियत रूस और साम्यवाद को हिन्दी भाषा-भाषी जनता के बीच
जनप्रिय बनाने में इन तीनों की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। कानपुर
के युवा क्रान्तिकारियों ने समाजवाद की प्रथम दीक्षा इन्हीं महानुभावों से प्राप्त की
थी। शौक़त उस्मानी भी विजयकुमार सिन्हा के माध्यम से कानपुर ग्रुप के सम्पर्क
में थे, लेकिन हम लोगों को उनसे किसी प्रकार का सैद्धान्तिक मार्गदर्शन नहीं मिल
सका था। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी से भी, जो कानपुर की बहुत बड़ी मशहूर हस्ती
थे, क्रान्तिकारियों को हर तरह की सहायता मिलती रहती थी। वे राजनीतिक
अध्ययन और जनता के बीच काम पर विशेष रूप से बल देते थे।
इस सबके परिणामस्वरूप कानपुर के साथियों का झुकाव भी समाजवाद की
तरफ़ हो गया था। लेकिन यह झुकाव बुद्धिसंगत होने के बजाय भावनात्मक अधिक
था। उस समय तक कानपुर ग्रुप चन्द्रशेखर आज़ाद और कुन्दनलाल गुप्त से सम्पर्क
स्थापित कर चुका था। ये दोनों साथी काकोरी षड्यन्त्र केस में फ़रार घोषित किये
जा चुके थे।
यह थी पृष्ठभूमि, जब 1928 के आरम्भ में भगतसिंह ने विभिन्न दलों को
मिलाकर क्रान्तिकारियों का एक अखिल भारतीय संगठन बनाने का विचार अपने
साथियों के सामने रखा। उनके प्रस्ताव इस प्रकार थे : (क) समय आ गया है
कि हम समाजवाद को साहस के साथ अपना अन्तिम लक्ष्य घोषित करें;
(ख) पार्टी का नाम तदनुसार बदला जाना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि हमारा
अन्तिम लक्ष्य क्या है; (ग) हमें सिर्फ़ उन्हीं कामों को हाथ में लेना चाहिए जिनका
सीधा सम्बन्ध जनता की ज़रूरतों और भावनाओं से हो सकता है, और हमें मामूली
पुलिस अधिकारियों अथवा भेदयों को मारने में अपनी शक्ति और समय का
अपव्यय नहीं करना चाहिए; (घ) धन के लिए हमें सरकारी ख़ज़ाने पर ही हाथ
डालना चाहिए और यथासम्भव निजी घरों पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए; और
(ङ) सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
भगतसिंह ने इन सब मुद्दों पर लाहौर और कानपुर के अपने साथियों के साथ
विचार-विमर्श किया और चन्द्रशेखर आज़ाद तथा कुन्दनलाल की सहमति भी ले
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 51
ली। इसके बाद यह तय किया गया कि विभिन्न प्रान्तों के प्रतिनिधियों की एक
बैठक 8 और 9 सितम्बर, 1928 को दिल्ली में आयोजित की जाये। पाँच प्रान्तों
के प्रतिनिधियों को इसके लिए आमन्त्रित किया गया, लेकिन इनमें से चार प्रान्तों
ने ही अपनी स्वीकृति दी। बंगाल को मीटिंग में भाग लेने के लिए हम राज़ी नहीं
कर पाये।
इस सम्बन्ध में एस.एन. मजूमदार ने लिखा है कि “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन
एसोसिएशन के बंगाल के प्रतिनिधियों ने मीटिंग में भाग नहीं लिया क्योंकि ऐसा
कहा जाता है कि वे आतंकवाद तथा हिंसा के ख़िलाफ़ थे।” यह सही नहीं है।
पार्टी की ओर से स्वयं मुझे ही अगस्त 1928 के अन्तिम सप्ताह में कलकत्ता भेजा
गया था ताकि बंगाल के साथियों के साथ प्रस्तावों पर बातचीत करके उन्हें दिल्ली
मीटिंग में आने के लिए आमन्त्रित किया जा सके। सम्पर्क मिला था वाराणसी के
एक तारापद भट्टाचार्य से। कलकत्ते में मेरा परिचय जिन सज्जन से कराया गया
उनके बारे में कहा गया कि वे अभी-अभी जेल से छूटकर आये हैं। देखने से वे
बुजुर्ग लगते थे, उनका शरीर मोटा और थुलथुला था और उनका व्यवहार बड़ा ही
अरुचिकर था। उनकी बातचीत और हाव-भाव से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी
कि मैं जिस व्यक्ति से मिल रहा हूँ, वह तानाशाही प्रवृत्ति वाला एक दम्भी एवं
बड़ा अहंकारी व्यक्ति है। चार-पाँच नौजवान लड़के जो बराबर वहाँ मौजूद रहे, उन्हें
सुशील दा कहकर सम्बोधित करते थे। मैंने जैसे ही उनके कमरे में प्रवेश किया
वैसे ही उन्होंने यू.पी. ग्रुप को काकोरी काण्ड के लिए डाँटना-फटकारना शुरू कर
दिया, “तुम लोगों ने यह काम हम लोगों से पूछे बग़ैर क्यों किया? और अब सारा
संगठन चौपट कर देने के बाद हमसे सहायता माँगने आने से क्या फ़ायदा?” मैंने
उनसे कहा कि मैं आपसे कोई सहायता माँगने नहीं आया हूँ बल्कि कुछ मुद्दों पर
बातचीत करने और आपको दिल्ली मीटिंग के लिए आमन्त्रित करने आया हूँ। इसके
बाद मैंने एक-एक करके सभी प्रस्तावों के बारे में उन्हें बतलाया और उनसे दिल्ली
मीटिंग में भाग लेने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वे अपनी शर्तों पर ही
मीटिंग में भाग ले सकेंगे और मुझसे यह आश्वासन माँगा कि उनकी शर्तें मान ली
जायेंगी। उनकी शर्तें इस प्रकार थीं : (क) कि हम लोग समाजवाद या कम्युनिज़्म
से कोई सरोकार नहीं रखेंगे; (ख) कि पार्टी का नाम नहीं बदला जायेगा;
(ग) कि हमें सरकार से सीधे भिड़ा देने वाले काकोरी जैसे काम भविष्य में हमसे
पूछे बग़ैर नहीं किये जायेंगे; (घ) कि केन्द्रीय कमेटी जैसी कोई चीज़ नहीं होगी
और हम लोगों को केवल उन्हीं के माध्यम से बंगाल के मातहत रहकर काम करना
होगा; (ङ) कि हम लोगों को अपनी गतिविधियाँ सिर्फ़ संगठन बनाने, हथियार
और पैसा जमा करने तक ही सीमित रखनी होंगी; (च) कि पैसे के लिए सिर्फ़
अराजनीतिक कामों की ही इजाज़त होगी। मैंने उन्हें इस बात पर राजी करने की
52 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कोशिश की कि वे बग़ैर किसी प्रकार की शर्तें लगाये खुले दिल से मीटिंग में आयें
और सभी बातों पर बहस में हिस्सा लें। उन्होंने मेरी बात मानने से साफ़ इन्कार कर
दिया। चूँकि उनकी सभी शर्तें हमारे प्रस्तावों से बिल्कुल भिन्न थीं इसलिए मैंने
विनम्रतापूर्वक उनकी शर्तें मानने से इन्कार कर दिया। इन कारणों से दिल्ली मीटिंग
बंगाल के साथियों की अनुपस्थिति में ही करनी पड़ी।
दिल्ली मीटिंग और उसके बाद
आठ सितम्बर, 1928 को मीटिंग में भाग लेने के लिए चार प्रान्तों का
प्रतिनिधित्व करने वाले कुल मिलाकर दस साथी कोटला फ़िरोज़शाह में जमा हुए
थे। इनमें दो बिहार से, दो पंजाब से, एक राजस्थान से और पाँच संयुक्त प्रान्त
(अब उत्तर प्रदेश) से थे। यू.पी. के पाँच साथियों में से भी दो ने मीटिंग में बैठने
से इन्कार कर दिया क्योंकि बाक़ी साथियों ने उनकी कुछ शर्तें नहीं मानीं। इस
प्रकार केवल आठ साथियों ने ही बातचीत में भाग लिया। आज़ाद को सुरक्षा की
दृष्टि से दिल्ली नहीं लाया गया था। लेकिन उनसे सभी मुद्दों पर पूर्वस्वीकृति
प्राप्त कर ली गयी थी। मीटिंग में दो दिन की बहस के बाद भगतसिंह द्वारा रखे
गये सभी प्रस्तावों को दो के ख़िलाफ़ छह के बहुमत से स्वीकार कर लिया गया।
फणीन्द्रनाथ घोष और मनमोहन बनर्जी (दोनों बिहार से) ने समाजवाद को पार्टी
के अन्तिम लक्ष्य के रूप में अपनाये जाने और पार्टी का नाम बदलने के प्रस्ताव
का विरोध किया। आगे चलकर जब दिसम्बर 1928 में भगतसिंह कलकत्ता गये
और त्रैलोक्य चक्रवर्ती तथा प्रतुल गांगुली, जो उस समय तक जेल से छूटकर
बाहर आ चुके थे, से मिले तो उन्होंने बताया कि दिल्ली मीटिंग के लिए बंगाल
को आमन्त्रित करने जो साथी पहले आये थे, उनको दुर्भाग्यवश एक ग़लत
आदमी से मिला दिया गया था। भगतसिंह ने दोनों नेताओं को दिल्ली के फ़ैसलों
से अवगत कराया और सभी मुद्दों पर उनकी सहमति भी प्राप्त कर ली। वे हममें
से कुछ साथियों को बम बनाने का प्रशिक्षण देने के लिए यतीन्द्रनाथ दास को
आगरा भेजने के लिए भी सहमत हो गये।
1928 के आते-आते हम लोगों ने समाजवाद को सिद्धान्त के रूप में
स्वीकार कर लिया था, लेकिन अमल में हम पर अतीत का साया अब भी हावी
था। फिर भी यह कहना ग़लत होगा कि साण्डर्स वध और केन्द्रीय असेम्बली
में बम फेंकने के पीछे भगतसिंह की किसी प्रकार की मानसिक कुण्ठा या
निराशा काम कर रही थी, जैसाकि एस.एन. मजूमदार ने साबित करने की
कोशिश की है। वे लिखते हैं : “त्रैलोक्य चक्रवर्ती ने उन्हें (भगतसिंह को) पाँच
हज़ार की एक युवा वालण्टियर वाहिनी संगठित करने की सलाह दी, जैसीकि
कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के समय (दिसम्बर 1928) संगठित की गयी
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 53
थी। चक्रवर्ती ने आगे लिखा है कि भगतसिंह ने उनकी सलाह पर अमल करने
की कोशिश की लेकिन असफल रहा। इसने उसके दिमाग़ में कुण्ठा और निराशा
को जन्म दिया और कुछ सनसनीखेज़ काम की अनिवार्य आवश्यकता के बारे
में उसके विश्वास को और पक्का कर दिया। शीघ्र ही उसके बाद असेम्बली में
बम फेंकने की घटना हुई।”$^{32}$
यह सारी कहानी तथ्यों से मेल नहीं खाती है। पहली बात तो यह कि भगतसिंह
ने कभी कोई बड़ा राजनीतिक क़दम पार्टी की केन्द्रीय कमेटी को विश्वास में लिये
बग़ैर नहीं उठाया। पाँच हज़ार नौजवानों की एक वालण्टियर सेना गठित करने का
प्रश्न कभी भी केन्द्रीय समिति के सामने बहस के लिए नहीं आया। दूसरी बात
यह कि इस प्रकार की किसी वालण्टियर सेना का विचार हवा में पुल बाँधने जैसा
विचार था। चार-पाँच दिनों के लिए थैलियों के सहारे खुलेतौर पर पाँच हज़ार की
वालण्टियर सेना (कांग्रेस द्वारा – स.) खड़ी कर लेना एक बात थी, लेकिन गुप्त
क्रान्तिकारी काम के लिए राजनीतिक तौर पर सजग, प्रशिक्षित और अनुशासित
नौजवानों की इतनी बड़ी सेना कुछ महीनों में खड़ी कर लेना सम्भव भी नहीं था।
यहाँ यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि भगतसिंह कलकत्ते से जनवरी 1929
के पहले सप्ताह में वापस आये। फ़रवरी में जब यतीन्द्रनाथ दास आगरा आये तो
हममें से हर कोई किसी न किसी रूप में बम फ़ैक्टरी स्थापित करने के काम में
व्यस्त हो गया था। फिर मेरठ की गिरफ़्तारियों से पहले फ़रवरी के अन्त में आगरा
में ही असेम्बली में बम फेंकने का फ़ैसला लिया गया। ऐसी स्थिति में भगतसिंह
का त्रैलोक्य बाबू की सलाह पर अमल करने का प्रयास करना, विफल होना,
निराशा और पस्ती का शिकार होना आदि का प्रश्न नहीं उठता था। इस प्रकार की
असफलता, निराशा, कुण्ठा आदि की मनगढ़न्त बातों से असेम्बली में बम फेंकने
के काम का राजनीतिक महत्त्व ही समाप्त हो जाता है और वह एक व्यक्ति की
कुण्ठा और निराशा का परिणाम-मात्र रह जाता है।
ऐसी ही हानिकारक और असेम्बली में बम फेंकने के महत्त्व को कम करने वाली
कहानी मन्मथनाथ गुप्त ने दी है। सुखदेव राज (शहीद सुखदेव नहीं – स.), जो
1928 और '29 के पूर्वार्द्ध में कहीं भी तस्वीर में नहीं था, द्वारा प्रसारित एक सौ
फ़ीसदी मनगढ़न्त कहानी को आधार बनाकर गुप्त जी ने कहा है कि पार्टी असेम्बली
में बम फेंकने के लिए सुखदेव तथा बटुकेश्वर दत्त को भेजने के पक्ष में थी। लेकिन
भगतसिंह के प्रति व्यक्तिगत ईर्ष्या के कारण उसने भगतसिंह को बी.के. दत्त के साथ
जाने के लिए मजबूर कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद और दूसरे लोग निकल आने के
पक्ष में थे। लेकिन भगतसिंह इसके लिए राज़ी नहीं हुए। उनका तर्क था कि जनता
को जगाने के लिए उच्चतम बलिदान की आवश्यकता है।$^{33}$
यहाँ पर यह कहना ही ग़लत है कि असेम्बली में बम फेंकने के लिए सुखदेव
54 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
को चुना गया था। आगरे में केन्द्रीय कमेटी की पहले दिन की मीटिंग में जो दो
नाम तय हुए थे, वे थे बटुकेश्वर दत्त और विजयकुमार सिन्हा। इस काम के लिए
किसी भी स्तर पर सुखदेव का नाम कमेटी में विचारार्थ नहीं आया। हमारे सामने
विचार-विमर्श का मुख्य विषय राजनीति था न कि व्यक्तिगत ईर्ष्या या वैरभाव, जो
सौभाग्यवश उस समय हमारे बीच में नहीं था। इसमें सन्देह नहीं कि असेम्बली में
बम फेंकने के लिए विजयकुमार सिन्हा के स्थान पर भगतसिंह को भेजने के लिए
सुखदेव पूरी तरह उत्तरदायी था। उसने यह इसलिए किया क्योंकि वह ईमानदारी
के साथ विश्वास करता था कि भगतसिंह के अलावा और किसी के जाने से काम
का राजनीतिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जहाँ तक उच्चतम बलिदान का सवाल है,
क्रान्तिकारी आन्दोलन में बलिदान की कमी नहीं रही (और हर बलिदान उच्चतम
होता है)। ऐसा नहीं था कि भगतसिंह एक निराश एवं विफल मनोरथ नौजवान था,
जिसने असेम्बली में बम फेंककर आत्महत्या करने का एक आसान रास्ता निकाल
लिया था।
असेम्बली में बम फेंकने का फ़ैसला
कैसे और कब लिया गया?
राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष के इतिहास में तीसरे दशक के अन्तिम वर्ष, ख़ासकर
1928-30 के वर्ष, बड़े ही महत्त्वपूर्ण थे। यही समय था जब वामपन्थी शक्तियों
ने संगठित रूप से एवं दृढ़तापूर्वक बोलना आरम्भ कर दिया था। सर्वहारा वर्ग की
बड़ी-बड़ी जुझारू हड़तालों ने देशव्यापी रूप धारण कर लिया था। मज़दूरों की
संगठित ट्रेड यूनियन गतिविधियाँ बढ़ती जा रही थीं, जिसके फलस्वरूप मज़दूर
काम के हालात में सुधार और मज़दूरी में बढ़ोत्तरी के लिए और अधिक मुस्तैदी
के साथ संघर्ष करने की स्थिति में आ गये थे। मज़दूरों, नौजवानों और विद्यार्थियों
में कम्युनिस्टों का प्रभाव तेज़ी के साथ बढ़ रहा था : देश में पहली बार बायें बाजू
का राजनीतिक आन्दोलन सर उठा रहा था। उस समय की युवा पीढ़ी की सोच
की दिशा का वर्णन करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, "बुद्धिजीवियों, यहाँ
तक कि सरकारी अफ़सरों में भी साम्यवाद और समाजवाद के अस्पष्ट विचार फैल
चुके थे। कांग्रेस के नौजवान पुरुष और महिलाएँ, जो पहले 'ब्राइस ऑन डेमोक्रेसी',
मार्ले और कीथ और मैज़िनी को पढ़ा करते थे, अब जब भी उन्हें उपलब्ध होतीं
तो समाजवाद, कम्युनिज़्म और रूस पर किताबें पढ़ते थे : इन नये विचारों की तरफ़
लोगों का रुझान पैदा करने में मेरठ षड्यन्त्र केस ने काफ़ी सहायता पहुँचाई थी।
विश्व-आर्थिक संकट ने भी लोगों को इस तरफ़ ध्यान देने के लिए मजबूर कर
दिया था। चारों तरफ़ जिज्ञासा की एक नयी भावना स्पष्ट दिखलायी पड़ रही थी
– मौजूदा संस्थाओं के प्रति एक प्रश्नवाचक और चुनौती भरी जिज्ञासा। उस
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 55
मानसिक तूफ़ान का आम रुख स्पष्ट था। लेकिन वह अभी एक हलकी बयार थी
– स्वयं अपने से अनभिज्ञ।"³⁴
अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों को इस सबसे चिन्ता हुई और उन्होंने आन्दोलन को
प्रारम्भ में ही कुचल देने का फ़ैसला किया। अधिकारी कितने घबराये हुए थे और
सरकार का दिमाग़ किस तरह काम कर रहा था, यह देखने के लिए एक मिसाल
ही पर्याप्त होगी। गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक सर डेविड पैट्रिक ने 'भारत में
कम्युनिज़्म' पर अपनी रिपोर्ट में, जिसे उन्होंने 1929 में तैयार किया था,
'बोल्शेविक अभिशाप' के स्वरूप का नीचे लिखे शब्दों में वर्णन किया है :
“सन् 1920 में तीसरी इण्टरनेशनल ने अपनी दूसरी कांग्रेस में जो थीसिस पास
की थी उसमें सर सेसिल केए ने भारत के ख़िलाफ़ एक सुनिश्चित षड्यन्त्र के
कीटाणुओं को ठीक ही पहचाना था। उस थीसिस में कहा गया था,
'उपनिवेशिक और अर्द्ध-उपनिवेशिक देशों का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुगत
दृष्टिकोण से और बुनियादी तौर पर क्रान्तिकारी संघर्ष है, और इसलिए वह
विश्व-क्रान्तिकारी संघर्ष का हिस्सा है।' इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि
ग्रेट ब्रिटेन ने बोल्शेविक हमले का मुख्य प्रहार अपने ऊपर लिया है...क्योंकि वह
विश्व-क्रान्ति, जिसे बोल्शेविक लोग अपनी अन्तिम सफलता के लिए ज़रूरी
शर्त मानते हैं, के ख़िलाफ़ मुख्य क़िलों में से एक है। बोल्शेविकों का यह
विश्वास है कि ब्रिटिश साम्राज्य में भारत सबसे कमज़ोर बिन्दु है। और वे इसे
धार्मिक विश्वास के रूप में दिल में सँजोये हुए हैं कि जब तक भारत आज़ाद
नहीं हो जाता तब तक रूस इंग्लैण्ड के अभिशाप से मुक्त नहीं हो सकेगा।”³⁵
जे. क्रेरर ने, जो उस समय भारत सरकार के होम मेम्बर थे, कहा था कि एक
व्यवस्थित समाज के लिए कम्युनिज़्म के सिद्धान्त और अमल से अधिक विध्वंसक
और कोई चीज़ नहीं हो सकती।³⁶
कम्युनिज़्म, बायें बाजू की शक्तियों और श्रमिक वर्ग के आन्दोलन को कुचलने
के लिए सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में दो बिल पेश करने का फ़ैसला किया –
पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल। पहला बिल उन लोगों के ख़िलाफ़
था जो ब्रिटिश-भारत या किसी भारतीय रजवाड़े के निवासी नहीं थे। पहले बिल
में गवर्नर जनरल को यह अधिकार दिया गया था कि वह अंग्रेज़ या अन्य विदेशी
कम्युनिस्ट को भारत से निकाल दें। दूसरे बिल का उद्देश्य मज़दूरों के ट्रेड यूनियन
अधिकारों की कटौती करना था।
असेम्बली में पूरे विरोध पक्ष ने, जनता ने और प्रेस ने दोनों बिलों का जमकर
विरोध किया। इस चौमुखी विरोध को नज़रअन्दाज़ करते हुए सरकार ने 6 सितम्बर,
1928 को पब्लिक सेफ़्टी बिल असेम्बली में पेश किया। 24 सितम्बर को सदन
ने उसे नामंजूर कर दिया। जनवरी 1929 में कुछ फेर-बदल के साथ सरकार ने
56 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
उसे फिर असेम्बली के सामने रखा।<sup>37</sup>
जिस समय समाचारपत्रों में यह ख़बर छपी कि सरकार ने बिल को असेम्बली
में फिर से पेश करने का फ़ैसला कर लिया है उस समय भगतसिंह आगरे में था।
समाचार पर उसकी जो प्रतिक्रिया हुई वह बड़ी तीखी थी। उसने कहा कि सरकार
के इस मनमानेपन के ख़िलाफ़ प्रतिवाद के रूप में कुछ न कुछ ज़रूर करना चाहिए।
वह लाहौर गया, सुखदेव के साथ अपने प्रस्तावों पर बात की, वापस आया, केन्द्रीय
कमेटी की बैठक बुलायी और उसके सामने अपने प्रस्ताव रखे। संक्षेप में उसके
प्रस्ताव इस प्रकार थे : (1) पार्टी को असेम्बली में बम फेंककर सरकार के इस
सख़्त एवं हठी रवैये का विरोध करना चाहिए; (2) इस काम को करने के लिए
जो साथी तैनात किये जायें वे काम के बाद भागने की कोशिश करने के बजाय
वहीं आत्मसमर्पण कर दें और केस के दौरान अदालत को पार्टी के उद्देश्यों के प्रचार
के लिए मंच के तौर पर इस्तेमाल करें; और (3) इस फ़ैसले को कार्यान्वित करने
के लिए एक और साथी के साथ उसे स्वयं जाने की अनुमति दी जाये। भगतसिंह
के पहले दो सुझावों का केन्द्रीय कमेटी के सभी सदस्यों ने स्वागत किया। लेकिन
उसका तीसरा सुझाव किसी ने भी नहीं माना। यह मीटिंग आगरे में हुई थी और
पहले दिन सुखदेव उसमें उपस्थित नहीं था। वह दूसरे दिन आया। सुखदेव के आ
जाने पर भगतसिंह को बल मिला और काफ़ी बहस के बाद अन्त में कमेटी ने
भगतसिंह का तीसरा प्रस्ताव भी मान लिया।
दूसरा बिल (ट्रेड डिस्प्यूट बिल) असेम्बली में 4 सितम्बर, 1928 को पेश
किया गया था। सदन ने उसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया। वहाँ से कुछ
फेर-बदल के साथ उसे 2 अप्रैल, 1929 को बहस के लिए असेम्बली के सामने
फिर लाया गया। सदन ने 8 अप्रैल को 38 के ख़िलाफ़ कुछ वोटों से उसे पास
कर दिया। जैसे ही अध्यक्ष महोदय वोटिंग का परिणाम घोषित करने के लिए उठे
वैसे ही भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से असेम्बली भवन में बम
फेंके और नारे लगाने के साथ-साथ परचे भी गिराये, जिनमें बम फेंकने के
राजनीतिक उद्देश्य को स्पष्ट किया गया था। यह परचा उसी दिन हिन्दुस्तान टाइम्स
के सन्ध्याकालीन परिशिष्ट में प्रकाशित हो गया था। यह हमें क्रान्तिकारी आन्दोलन
के एक छोटे दौर में पहुँचा देता है, जिसका ज़िक्र लोग कभी-कभी
आतंकवादी-साम्यवाद या टेरो-कम्युनिज़्म के नाम से करते हैं।
टेरो-कम्युनिज़्म या आतंकवादी-साम्यवाद
लाहौर तथा कानपुर के क्रान्तिकारियों ने 1926-27 से ही समाजवाद की ओर
बढ़ना शुरू कर दिया था। आठ-नौ सितम्बर 1928 की दिल्ली मीटिंग में हालाँकि
समाजवाद को सिद्धान्त के रूप में और समाजवादी समाज की स्थापना को अन्तिम
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 57
उद्देश्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया था, अमल में हम लोग उसी पुराने
व्यक्तिवादी ढंग के कामों में ही लगे रहे। हम मज़दूरों, किसानों, युवकों और
मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों को संगठित करने की बात तो करते थे लेकिन पंजाब में
नौजवान भारत सभा के गठन को छोड़कर और कहीं भी संजीदगी के साथ उस
दिशा में क़दम उठाने की कोशिश नहीं की गयी। उस मायने में हमारी वैज्ञानिक
समाजवाद अर्थात मार्क्सवाद की समझ अधकचरी थी। मार्क्सवाद अमल को
सिद्धान्त से अलग करने की इजाज़त नहीं देता, यह बात हम समझ नहीं पाये थे
और यह कि उसमें व्यक्तिगत कामों के लिए कोई स्थान नहीं है। हम हिंसात्मक
गतिविधियों को, जिसमें ज़ालिम सरकारी अधिकारियों की हत्या और छुटपुट विद्रोह
शामिल थे, मज़दूरों, किसानों, युवकों और विद्यार्थियों के जन-संगठन बनाने के
काम में मिलाना चाहते थे। लेकिन अमल में हमारा ज़ोर हिंसात्मक गतिविधियों और
सशस्त्र कामों की तैयारी तक ही सीमित रहा। हमारा विश्वास था कि लोगों को
नींद से जगाने के लिए और सरकारी दमन का जवाब देने के लिए यह सब
आवश्यक है। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अवसर पर दिसम्बर, 1928 में
भगतसिंह ने का. सोहन सिंह जोश से कहा था, “हम आपकी पार्टी के कामों से
और उसके कार्यक्रम से सौ फ़ीसदी सहमत हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे भी क्षण
आते हैं जब जनता में विश्वास की भावना जागृत करने के लिए दुश्मन के प्रहार
का सशस्त्र कामों द्वारा तत्काल जवाब देना आवश्यक हो जाता है।”³⁸ उस समय
हमारे दिमाग़ इसी तरह काम कर रहे थे। हमारी समझ में निहित अन्तरविरोध का
अपना तर्क था। मज़दूरों-किसानों को संगठित करने का हमारा फ़ैसला केवल एक
पवित्र इरादा बनकर ही रह गया। हमारी शक्ति का अधिकांश हिस्सा प्रतिशोधात्मक
कामों को संगठित करने में ही ज़ाया हुआ।
हमारी ग़लत समझ को ठीक करने का एक प्रयास तीसरे इन्टरनेशनल ने किया
था। यह प्रयास विदेश में गठित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा “राष्ट्रवादियों से
अपील” के ज़रिये किया गया था। यह अपील 15 दिसम्बर, 1924 के वैनगार्ड के
परिशिष्ट में प्रकाशित हुई थी। अपील में क्रान्तिकारियों के बारे में कहा गया था :
“गुप्त सभाओं द्वारा किये जाने वाले छुटपुट आतंकवादी काम भी कुछ कम
प्रभावहीन नहीं हैं। इस प्रकार के व्यर्थ उग्रवाद को अपनाने वालों की क्रान्ति की
समझ भी उतनी ही ग़लत है। समाज की मौजूदा स्थिति में ऐसी उम्मीद नहीं की
जा सकती है कि राजनीतिक और सामाजिक क्रान्तियाँ अहिंसात्मक होंगी या
उनमें रक्तपात नहीं होगा। लेकिन हर रक्तपात या हिंसात्मक काम को क्रान्ति नहीं
कहा जा सकता। एक ख़ास सामाजिक व्यवस्था को या राजनीतिक संस्था को
उसके चन्द समर्थकों को मारकर कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। और
यह तो और भी नामुमकिन है कि थोड़े से सरकारी अफ़सरों को मारकर या
58 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
ब्रिटिश पार्लियामेण्ट से बहुत से सुधार पास करवाकर देश की आज़ादी हासिल
की जा सके। ये दोनों उपाय समान रूप से प्राणहीन हैं, क्योंकि इनमें से कोई
भी बुराई की जड़ पर चोट नहीं करता। दोनों ही राजनीतिक भूल हैं। लेकिन
आतंकवादियों को 'क्रान्तिकारी अपराधी' कहना निपट मूर्खता है, क्योंकि
'संवैधानिकतावादी' निश्चित रूप से गैर-क्रान्तिकारी हैं और निर्णायक घड़ी आते
ही वे प्रतिक्रियावादी हो जायेंगे।"³⁹
उसी लेख में दूसरी जगह पर क्रान्ति की सही-सही परिभाषा दे दी गयी थी :
“क्रान्ति क्या है? भारत के राष्ट्रीय हलकों में इसके बारे में एक बड़ी ग़लत
धारणा बनी हुई है। आमतौर पर क्रान्ति को बम, रिवाल्वर और गुप्त संस्थाओं से
जोड़ दिया जाता है। भारतीय राजनीतिक शब्दकोष में बहु-प्रचलित वाक्य
'क्रान्तिकारी अपराध' क्रान्ति की इसी ग़लत अवधारणा की उपज है। बहरहाल,
क्रान्ति इस सबसे कहीं अधिक गम्भीर समस्या है। क्रान्ति एक महत्त्वपूर्ण
ऐतिहासिक घटना है, जो प्रस्तुत ऐतिहासिक युग का अन्त और उसके स्थान पर एक
नये युग का शुभारम्भ करती है। चूँकि जाने वाले समाज के प्रतिनिधि या दलाल,
आर्थिक वर्ग और राजनीतिक संस्थाएँ, जो उस समाज में प्रचलित हालात से
लाभान्वित होते रहे हैं, एक भयानक प्रतिरोध के बग़ैर ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होने
देंगे जिससे उनके प्रभुत्व का अन्त हो जाये और, जैसाकि आमतौर पर होता है,
जिसका अन्त उनके चौमुखी विनाश में हो जाये। इसीलिए आमतौर पर राजनीतिक
हिंसा और सामाजिक उथल-पुथल 'क्रान्ति' कहलाने वाली ऐतिहासिक घटना के
अंग बन जाते हैं।"⁴⁰
सन् 1925 में यंग कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल ने बंगाल के युवा क्रान्तिकारी
संगठन के नाम एक अपील शाया की थी। यह यंग कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के
घोषणापत्र के रूप में थी जो मासेज़ के जिल्द 1, नम्बर 7 में प्रकाशित हुआ था।
घोषणापत्र में इस बात को स्वीकार किया गया था कि पूर्व के क्रान्तिकारी नौजवान
राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाई में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। जनता के
लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले 'हीरो-आतंकवादी' के साहस और बहादुरी
के प्रति गहरा आदर व्यक्त करते हुए घोषणापत्र ने कहा था कि “एक क्रान्तिकारी
जो जनता के लिए लड़ रहा है उसे नैतिक अधिकार है कि वह जनता का गला
घोंटने वालों और जल्लादों को रास्ते से हटा दे।"⁴¹
दुर्भाग्यवश इनमें से कोई भी दस्तावेज़ उस समय हमें नहीं मिला और हमें अपने
अनुभवों के सहारे ही आगे बढ़ना पड़ा। व्यक्तिगत कामों का दायरा बहुत सीमित
है यह समझने में हमें तीन साल लग गये। हम क़दम-ब-क़दम समाजवाद की
तरफ़ बढ़ रहे थे। गिरफ़्तारी के बाद जेल में काफ़ी समय मिला, पढ़ने के लिए
काफ़ी सामग्री मिली, आपस में बहस करने और अपने अतीत पर संजीदगी से
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 59
सोचने का काफ़ी मौक़ा मिला और तब कहीं जाकर हम सही नतीजे पर पहुँच पाये।
इसका यह मतलब नहीं कि जिस दौर की समीक्षा की जा रही है उसमें
सकारात्मक कुछ था ही नहीं। उसकी कमज़ोरियों के साथ ही उसके कुछ
सकारात्मक और मज़बूत पहलू भी थे। मैं अपनी और अपने साथियों की समझ
की ख़ास कमियों पर रोशनी डाल चुका हूँ। संक्षेप में फिर से दोहरा दूँ, पहली
बात तो यह कि हमारा कम्युनिज़्म को स्वीकार करना मार्क्सवाद के सही अध्ययन
पर आधारित नहीं था। दूसरी कमज़ोरी थी मज़दूरों और किसानों को संगठित
करने और जवाबी आतंकवाद के बीच तालमेल बिठलाने की अव्यावहारिकता को
न समझ पाना।
इन सारी कमियों और सीमाओं के बावजूद इस थोड़े समय चलने वाले चर्चित
दौर के खाते में कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हैं। लाहौर की 'नौजवान भारत
सभा का घोषणापत्र' (1928), असेम्बली बम केस के दौरान भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान (1929), कांग्रेस के लाहौर
अधिवेशन के समय बाँटा गया 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ का घोषणापत्र'
(दिसम्बर 1929) और 'बम का दर्शन' (जनवरी 1930) उस युग के सर्वश्रेष्ठ
प्रतिनिधि दस्तावेज़ हैं। इन दस्तावेज़ों के आधार पर हम कह सकते हैं कि
'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ' (हिसप्रस) का पहला आगे बढ़ा हुआ क़दम
था मार्क्सवाद को सिद्धान्त के रूप में और समाजवाद को अन्तिम उद्देश्य के रूप
में स्वीकार करना। बंगाल में भी आन्दोलन का रुख़ यही था, हालाँकि गति
अपेक्षाकृत धीमी थी। जिस समय हिसप्रस ने समाजवाद को डंके की चोट पर
अपना अन्तिम उद्देश्य घोषित कर दिया था, उस समय बंगाल के लगभग सभी
क्रान्तिकारी दल और प्रमुख पार्टियाँ इस सवाल पर अनिश्चितता की स्थिति में थे।
समाजवाद को ध्येय के रूप में स्वीकार करने के अलावा इस दौर के
क्रान्तिकारी मनुष्य द्वारा मनुष्य के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्त
वर्गहीन समाज के पक्ष में थे। उन्होंने एलान किया कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ ब्रिटिश
साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ही नहीं है, बल्कि विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के
ख़िलाफ़ है। उनके दिलों में सोवियत यूनियन के प्रति प्रगाढ़ आदर और अपनापन
था। उनका विश्वास था कि क्रान्ति के बाद जो सरकार बनेगी उसका रूप एक
प्रकार की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का होगा। उन्होंने ईश्वर, धर्म और रहस्यवाद
से पूरी तरह छुटकारा पा लिया था। वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते थे और उनका
दृष्टिकोण घोर साम्प्रदायिकतावाद विरोधी था।
असेम्बली बमकाण्ड के बाद हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ के अधिकांश
साथी गिरफ़्तार कर लिये गये। उन्होंने अपने मुक़दमे की सुनवाई के दौरान अपने
दृष्टिकोण को प्रचारित करने, समाजवाद के विचारों को लोकप्रिय बनाने और
60 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
क्रान्तिकारी पार्टी के उद्देश्यों तथा प्रयोजनों को जनता के सामने रखने के लिए
अदालत का मंच के रूप में जमकर इस्तेमाल किया।
उनकी यह रणनीति क़ामयाब हुई। इसके बारे में एस.एन. मजूमदार ने लिखा
है : “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की तमाम ग़लतियों और
कमज़ोरियों के बावजूद समूचे राष्ट्रीय आन्दोलन में और तरुण क्रान्तिकारियों को
साम्यवाद की ओर आकर्षित करने में इस पार्टी के योगदान की उपेक्षा नहीं की
जा सकती है।”⁴²
जी.एस. देओल के अनुसार, “क्रान्तिकारी आन्दोलन का कार्यक्षेत्र चाहे जितना
सीमित रहा हो उसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की गति को एक दूसरी धारा के
माध्यम से और तेज़ किया। बेशक यह कहा जा सकता है कि उनके (भगतसिंह
और उनके साथियों के – शि.व.) कार्यकलापों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए
दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग करने और पूर्ण
स्वराज्य का प्रस्ताव पास करने का पथ प्रशस्त किया।”⁴³
देओल के अनुसार क्रान्तिकारियों के कार्यकलापों और संघर्षों ने देश में अत्यन्त
विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके कारण कांग्रेस 1930 का असहयोग
आन्दोलन शुरू करने के लिए मजबूर हो गयी थी। “यह आन्दोलन भगतसिंह और
उनके साथियों के उग्र आन्दोलन के विकल्प के रूप में शुरू किया गया था। इस
मत की पुष्टि महात्मा गाँधी द्वारा 2 मार्च, 1930 को वायसराय को लिखे गये एक
पत्र के इस अंश से होती है : ‘हिंसावादी पार्टी अपनी जगह बनाती जा रही है और
उसने अपने अस्तित्व का अहसास कराना शुरू कर दिया है।’ उन्होंने आगे स्पष्ट
किया था कि वे जिस तरह का अहिंसक आन्दोलन शुरू करना चाहते हैं, उससे
न सिर्फ़ ब्रिटिश हुकूमत की हिंसक शक्ति का बल्कि उभरते हुए हिंसावादी दल
की संगठित हिंसक शक्तियों का भी प्रतिरोध किया जा सकेगा।”⁴⁴
वैज्ञानिक समाजवाद की ओर
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ के अधिकांश प्रमुख नेता 1929 के मध्य तक
गिरफ़्तार करके जेलों में बन्द कर दिये गये थे, जहाँ उन्हें पढ़ने और विचार-विमर्श
करने का भरपूर मौक़ा मिला। इससे उनके अन्दर जो नयी समझ पैदा हुई थी, उसके
आधार पर उन्होंने अपने पूरे अतीत को, ख़ासकर वैयक्तिक कार्यकलापों और शौर्य
प्रदर्शन के आदर्श को नये सिरे से जाँचा-परखा और अपनी अब तक की
कार्यप्रणाली को छोड़कर समाजवादी क्रान्ति का रास्ता अपनाने का निश्चय किया।
गहन अध्ययन और बोर्स्टल जेल में दूसरे साथियों से लम्बे विचार-विमर्श के बाद
भगतसिंह इस निर्णय पर पहुँचे कि यहाँ-वहाँ कुछ भेदियों और सरकारी अफ़सरों
की वैयक्तिक हत्याओं से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 61
भगतसिंह ने 19 अक्टूबर, 1929 को पंजाब स्टूडेण्ट्स की कांग्रेस के नाम एक
सन्देश भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था – “आज हम नौजवानों को बम और
पिस्तौल अपनाने के लिए नहीं कह सकते।...इन्हें औद्योगिक क्षेत्रों की गन्दी बस्तियों
में और गाँवों के टूटे-फूटे झोंपड़ों में रहने वाले करोड़ों लोगों को जगाना है।”
2 फ़रवरी, 1931 को उन्होंने ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम’ एक
अपील लिखी थी जिसमें उन्होंने जनसाधारण के बीच काम करने के महत्त्व को
बारम्बार रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था, “गाँवों और कारख़ानों में किसान और
मज़दूर ही असली क्रान्तिकारी सैनिक हैं।”
इसी अपील में भगतसिंह ने बलपूर्वक इस बात से इन्कार किया था कि वे
आतंकवादी हैं। उनका कहना था, “मैंने एक आतंकवादी की तरह काम किया है।
लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं तो ऐसा क्रान्तिकारी हूँ जिसके पास एक लम्बा
कार्यक्रम और उसके बारे में सुनिश्चित विचार होते हैं। मैं पूरी ताक़त के साथ बताना
चाहता हूँ कि मैं आतंकवादी नहीं हूँ और कभी था भी नहीं, कदाचित उन कुछ
दिनों को छोड़कर जब मैं अपने क्रान्तिकारी जीवन की शुरुआत कर रहा था। मुझे
विश्वास है कि हम ऐसे तरीक़ों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं।” उन्होंने
नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे मार्क्स और लेनिन का
अध्ययन करें, उनकी शिक्षा को अपना मार्गदर्शक बनायें, जनता के बीच जायें,
मज़दूरों, किसानों और शिक्षित मध्यवर्गीय नौजवानों के बीच काम करें, उन्हें
राजनीतिक दृष्टि से शिक्षित करें, उनमें वर्ग-चेतना उत्पन्न करें, उन्हें यूनियनों में
संगठित करें, आदि। उन्होंने नवयुवकों से यह भी कहा कि यह सारा काम तब तक
सम्भव नहीं है जब तक जनता की एक अपनी पार्टी न हो। वे किस तरह की पार्टी
चाहते थे इसका खुलासा करते हुए उन्होंने लिखा था, “हमें पेशेवर क्रान्तिकारियों
की ज़रूरत है – यह शब्द लेनिन को बहुत प्रिय था – पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं
की, जिनकी क्रान्ति के सिवा और कोई आकांक्षा न हो, और न जीवन का कोई
दूसरा लक्ष्य हो। ऐसे कार्यकर्ता जितनी बड़ी संख्या में एक पार्टी के रूप में संगठित
होंगे, उतनी ही तुम्हारी सफलता की सम्भावनाएँ बढ़ जायेंगी।”
उन्होंने आगे कहा :
“व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ने के लिए आपको जिसकी सबसे अधिक
आवश्यकता है, वह है एक पार्टी जिसके पास जिस टाइप के कार्यकर्ताओं का ऊपर
ज़िक्र किया जा चुका है वैसे कार्यकर्ता हों – ऐसे कार्यकर्ता जिनके दिमाग़ साफ़
हों और समस्याओं की तीखी पकड़ हो और पहल करने और तुरन्त फ़ैसला लेने
की क्षमता हो। इस पार्टी का अनुशासन बहुत कठोर होगा और यह ज़रूरी नहीं है
कि वह भूमिगत पार्टी हो, बल्कि भूमिगत नहीं होनी चाहिए...पार्टी को अपने काम
की शुरुआत अवाम के बीच प्रचार से करनी चाहिए। किसानों और मज़दूरों को
62 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
संगठित करने और उनकी सक्रिय सहानुभूति प्राप्त करने के लिए यह बहुत ज़रूरी
है। इस पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी का नाम दिया जा सकता है।"
यहाँ भगतसिंह खुल्लम-खुल्ला मार्क्सवाद, साम्यवाद और एक साम्यवादी पार्टी
की वकालत करते दिखायी देते हैं।
क्रान्ति की परिभाषा
क्रान्ति के सम्बन्ध में भगतसिंह के विचार बहुत स्पष्ट थे। निचली अदालत में जब
उनसे पूछा गया कि क्रान्ति शब्द से उनका क्या मतलब है, तो उत्तर में उन्होंने कहा
था, “क्रान्ति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है, और न ही उसमें व्यक्तिगत
प्रतिहिंसा का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रान्ति
से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुलेतौर पर अन्याय पर टिकी
हुई है, बदलनी चाहिए।" अपनी बात को और भी स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था,
“क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अन्ततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से
है जिसको इस प्रकार के घातक ख़तरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा
वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो तथा एक विश्वसंघ मानवजाति को पूँजीवाद के
बन्धन से और साम्राज्यवादी युद्धों से उत्पन्न होने वाली बरबादी और मुसीबतों से
बचा सके।"
समाजवाद की दिशा में भगतसिंह की वैचारिक प्रगति की रफ़्तार बहुत तेज़
थी। उन्होंने 1924 से 1928 के बीच विभिन्न विषयों का विस्तृत अध्ययन किया
था। लाला लाजपत राय की द्वारकादास लाइब्रेरी के पुस्तकालयाध्यक्ष राजाराम
शास्त्री के अनुसार उन दिनों भगतसिंह वस्तुतः “किताबों को निगला करता था।"
उनके प्रिय विषय थे रूसी क्रान्ति, सोवियत संघ, आयरलैण्ड, फ्रांस और भारत का
क्रान्तिकारी आन्दोलन, अराजकतावाद और मार्क्सवाद। उन्होंने और उनके साथियों
ने 1928 के अन्त तक समाजवाद को अपने आन्दोलन का अन्तिम लक्ष्य घोषित
कर दिया था और अपनी पार्टी का नाम भी तदनुसार बदल दिया था। उनकी यह
वैचारिक प्रगति उनके फाँसी पर चढ़ने के दिन तक जारी रही।
ईश्वर और धर्म के बारे में
ईश्वर, धर्म तथा रहस्यवाद पर भगतसिंह के विचारों के बारे में कुछ शब्द कहे बग़ैर
यह भूमिका अधूरी रह जायेगी। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि आज हर तरह के
प्रतिक्रियावादी, रूढ़िवादी और साम्प्रदायिकतावादी लोग भगतसिंह तथा चन्द्रशेखर
आज़ाद के नाम और यश को अपनी निज की राजनीति और विचारधारा के पक्ष
में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
अपनेआप को नास्तिक बताते हुए “भगतसिंह ने शुरू के क्रान्तिकारियों के
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 63
तरीक़े और दृष्टिकोण के लिए पूरा सम्मान प्रदर्शित किया है और उनकी
धार्मिकता के स्रोतों की पड़ताल की है। वे संकेत करते हैं कि अपने स्वयं के
राजनीतिक कार्यों की वैज्ञानिक समझ के अभाव में उन क्रान्तिकारियों को अपनी
आध्यात्मिकता की रक्षा करने, वैयक्तिक प्रलोभनों के विरुद्ध संघर्ष करने,
अवसाद से उबरने, भौतिक सुखों और अपने परिवारों तथा जीवन तक को त्यागने
की सामर्थ्य जुटाने के लिए विवेकहीन विश्वासों एवं रहस्यवादिता की
आवश्यकता थी। एक व्यक्ति जब निरन्तर अपने जीवन को जोखिम में डालने
और दूसरे सारे बलिदान करने के लिए तत्पर होता है तो उसे प्रेरणा के गहरे स्रोत
की आवश्यकता होती है। शुरू के क्रान्तिकारी, आतंकवादियों की यह अनिवार्य
आवश्यकता रहस्यवाद और धर्म से पूरी होती थी। लेकिन उन लोगों को ऐसे
स्रोतों से प्रेरणा लेने की ज़रूरत नहीं रह गयी थी जो अपने कामों की प्रकृति को
समझते थे, जो क्रान्तिकारी विचारधारा की दिशा में आगे बढ़ चुके थे, जो कृत्रिम
आध्यात्मिकता की बैसाखी लगाये बिना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकते थे,
जो स्वर्ग और मोक्ष के प्रलोभन और आश्वासन के बिना ही विश्वास के साथ
और निर्भीक भाव से फाँसी के तख्ते पर चढ़ सकते थे, जो दलितों की मुक्ति
और स्वतन्त्रता के पक्ष में इसलिए लड़े क्योंकि लड़ने के अलावा और कोई रास्ता
ही न था।"⁴⁶
असम्बली बमकाण्ड के केस की अपील के दौरान लाहौर हाईकोर्ट में बयान
देते हुए भगतसिंह ने विचारों की महत्ता पर बल देते हुए कहा था : "इन्क़लाब की
तलवार विचारों की सान पर तेज़ की जाती है," और उसके आधार पर उन्होंने यह
सूत्र प्रस्तुत किया कि "आलोचना और स्वतन्त्र विचार किसी क्रान्तिकारी के दो
अपरिहार्य गुण हैं," और यह कि "जो आदमी प्रगति के लिए संघर्ष करता है उसे
पुराने विश्वासों की एक-एक बात की आलोचना करनी होगी, उस पर अविश्वास
करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी। इस प्रचलित विश्वास के एक-एक कोने
में झाँककर उसे विवेकपूर्वक समझना होगा।" उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा था कि
"निरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़तरनाक है, इससे मस्तिष्क कुण्ठित होता है
और आदमी प्रतिक्रियावादी हो जाता है।"
भगतसिंह स्वीकार करते थे कि "ईश्वर में कमज़ोर आदमी को ज़बरदस्त
आश्वासन और सहारा मिलता है और विश्वास उसकी कठिनाइयों को आसान ही
नहीं बल्कि सुखकर भी बना देता है।" वे यह भी जानते थे कि "आँधी और तूफ़ान
में अपने पाँवों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।" लेकिन वे सहारे के
लिए किसी भी बनावटी अंग के विचार को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते थे। वे
कहते थे, "अपनी नियति का सामना करने के लिए मुझे किसी नशे की ज़रूरत
नहीं है।" उन्होंने एलान किया था कि "जो आदमी अपने पाँवों पर खड़े होने की
64 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कोशिश करता है और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक विश्वास को एक तरफ़
रखकर, जिन-जिन मुसीबतों और दुखों में परिस्थितियों ने उसे डाल दिया है, उनका
एक मर्द की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा।”
ईश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को यह तिलांजलि भगतसिंह के लिए न तो
आकस्मिक थी और न ही उनके अभिमान या अहं का परिणाम थी। उन्होंने बहुत
पहले 1926 में ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में,
“1926 के अन्त तक मुझे इस बात पर यक़ीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण,
व्यवस्थापन और नियन्त्रण करने वाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व
का सिद्धान्त एकदम निराधार है।”
भावना कभी नहीं मरती
वह जुलाई, 1930 का अन्तिम रविवार था। भगतसिंह लाहौर सेण्ट्रल जेल से हमें
मिलने के लिए बोर्स्टल जेल आये थे। वे इस तर्क पर सरकार से यह सुविधा
हासिल करने में क़ामयाब हो गये थे कि उन्हें दूसरे अभियुक्तों के साथ बचाव के
तरीक़ों पर बातचीत करनी है। तो उस दिन हम किसी राजनीतिक विषय पर बहस
कर रहे थे कि बातों का रुख़ फ़ैसले की तरफ़ मुड़ गया, जिसका हम सबको
बेसब्री से इन्तज़ार था। मज़ाक़-मज़ाक़ में हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ फ़ैसले सुनाने
लगे, सिर्फ़ राजगुरु और भगतसिंह को इन फ़ैसलों से बरी रखा गया। हम जानते थे
कि उन्हें फाँसी पर लटकाया जायेगा।
“और राजगुरु और मेरा फ़ैसला? क्या आप लोग हमें बरी कर रहे हैं?”
मुस्कुराते हुए भगतसिंह ने पूछा।
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
“असलियत को स्वीकार करते डर लगता है?” धीमे स्वर में उन्होंने पूछा।
चुप्पी छाई रही।
हमारी चुप्पी पर उन्होंने ठहाका लगाया और बोले, “हमें गर्दन से फाँसी के
फन्दे से तब तक लटकाया जाये जब तक कि हम मर न जायें। यह है असलियत।
मैं इसे जानता हूँ। तुम भी जानते हो। फिर इसकी तरफ़ से आँखें क्यों बन्द करते
हो?”
अब तक भगतसिंह अपने रंग में आ चुके थे। वे बहुत धीमे स्वर में बोल रहे
थे। यही उनका तरीक़ा था। सुनने वालों को लगता था कि वे उन्हें फुसलाने की
कोशिश कर रहे हैं। चिल्लाकर बोलना उनकी आदत नहीं थी। यही शायद उनकी
शक्ति भी थी।
वे अपने स्वाभाविक अन्दाज़ में बोलते रहे, “देशभक्ति के लिए यह सर्वोच्च
पुरस्कार है, और मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूँ। वे सोचते हैं कि
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