सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

कोशिश करता है और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक विश्वास को एक तरफ़
रखकर, जिन-जिन मुसीबतों और दुखों में परिस्थितियों ने उसे डाल दिया है, उनका
एक मर्द की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा।”
ईश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को यह तिलांजलि भगतसिंह के लिए न तो
आकस्मिक थी और न ही उनके अभिमान या अहं का परिणाम थी। उन्होंने बहुत
पहले 1926 में ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में,
“1926 के अन्त तक मुझे इस बात पर यक़ीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण,
व्यवस्थापन और नियन्त्रण करने वाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व
का सिद्धान्त एकदम निराधार है।”
भावना कभी नहीं मरती
वह जुलाई, 1930 का अन्तिम रविवार था। भगतसिंह लाहौर सेण्ट्रल जेल से हमें
मिलने के लिए बोर्स्टल जेल आये थे। वे इस तर्क पर सरकार से यह सुविधा
हासिल करने में क़ामयाब हो गये थे कि उन्हें दूसरे अभियुक्तों के साथ बचाव के
तरीक़ों पर बातचीत करनी है। तो उस दिन हम किसी राजनीतिक विषय पर बहस
कर रहे थे कि बातों का रुख़ फ़ैसले की तरफ़ मुड़ गया, जिसका हम सबको
बेसब्री से इन्तज़ार था। मज़ाक़-मज़ाक़ में हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ फ़ैसले सुनाने
लगे, सिर्फ़ राजगुरु और भगतसिंह को इन फ़ैसलों से बरी रखा गया। हम जानते थे
कि उन्हें फाँसी पर लटकाया जायेगा।
“और राजगुरु और मेरा फ़ैसला? क्या आप लोग हमें बरी कर रहे हैं?”
मुस्कुराते हुए भगतसिंह ने पूछा।
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
“असलियत को स्वीकार करते डर लगता है?” धीमे स्वर में उन्होंने पूछा।
चुप्पी छाई रही।
हमारी चुप्पी पर उन्होंने ठहाका लगाया और बोले, “हमें गर्दन से फाँसी के
फन्दे से तब तक लटकाया जाये जब तक कि हम मर न जायें। यह है असलियत।
मैं इसे जानता हूँ। तुम भी जानते हो। फिर इसकी तरफ़ से आँखें क्यों बन्द करते
हो?”
अब तक भगतसिंह अपने रंग में आ चुके थे। वे बहुत धीमे स्वर में बोल रहे
थे। यही उनका तरीक़ा था। सुनने वालों को लगता था कि वे उन्हें फुसलाने की
कोशिश कर रहे हैं। चिल्लाकर बोलना उनकी आदत नहीं थी। यही शायद उनकी
शक्ति भी थी।
वे अपने स्वाभाविक अन्दाज़ में बोलते रहे, “देशभक्ति के लिए यह सर्वोच्च
पुरस्कार है, और मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूँ। वे सोचते हैं कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 65