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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 788 में से

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पृष्ठ 70

तरीक़े और दृष्टिकोण के लिए पूरा सम्मान प्रदर्शित किया है और उनकी
धार्मिकता के स्रोतों की पड़ताल की है। वे संकेत करते हैं कि अपने स्वयं के
राजनीतिक कार्यों की वैज्ञानिक समझ के अभाव में उन क्रान्तिकारियों को अपनी
आध्यात्मिकता की रक्षा करने, वैयक्तिक प्रलोभनों के विरुद्ध संघर्ष करने,
अवसाद से उबरने, भौतिक सुखों और अपने परिवारों तथा जीवन तक को त्यागने
की सामर्थ्य जुटाने के लिए विवेकहीन विश्वासों एवं रहस्यवादिता की
आवश्यकता थी। एक व्यक्ति जब निरन्तर अपने जीवन को जोखिम में डालने
और दूसरे सारे बलिदान करने के लिए तत्पर होता है तो उसे प्रेरणा के गहरे स्रोत
की आवश्यकता होती है। शुरू के क्रान्तिकारी, आतंकवादियों की यह अनिवार्य
आवश्यकता रहस्यवाद और धर्म से पूरी होती थी। लेकिन उन लोगों को ऐसे
स्रोतों से प्रेरणा लेने की ज़रूरत नहीं रह गयी थी जो अपने कामों की प्रकृति को
समझते थे, जो क्रान्तिकारी विचारधारा की दिशा में आगे बढ़ चुके थे, जो कृत्रिम
आध्यात्मिकता की बैसाखी लगाये बिना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकते थे,
जो स्वर्ग और मोक्ष के प्रलोभन और आश्वासन के बिना ही विश्वास के साथ
और निर्भीक भाव से फाँसी के तख्ते पर चढ़ सकते थे, जो दलितों की मुक्ति
और स्वतन्त्रता के पक्ष में इसलिए लड़े क्योंकि लड़ने के अलावा और कोई रास्ता
ही न था।"⁴⁶
असम्बली बमकाण्ड के केस की अपील के दौरान लाहौर हाईकोर्ट में बयान
देते हुए भगतसिंह ने विचारों की महत्ता पर बल देते हुए कहा था : "इन्क़लाब की
तलवार विचारों की सान पर तेज़ की जाती है," और उसके आधार पर उन्होंने यह
सूत्र प्रस्तुत किया कि "आलोचना और स्वतन्त्र विचार किसी क्रान्तिकारी के दो
अपरिहार्य गुण हैं," और यह कि "जो आदमी प्रगति के लिए संघर्ष करता है उसे
पुराने विश्वासों की एक-एक बात की आलोचना करनी होगी, उस पर अविश्वास
करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी। इस प्रचलित विश्वास के एक-एक कोने
में झाँककर उसे विवेकपूर्वक समझना होगा।" उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा था कि
"निरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़तरनाक है, इससे मस्तिष्क कुण्ठित होता है
और आदमी प्रतिक्रियावादी हो जाता है।"
भगतसिंह स्वीकार करते थे कि "ईश्वर में कमज़ोर आदमी को ज़बरदस्त
आश्वासन और सहारा मिलता है और विश्वास उसकी कठिनाइयों को आसान ही
नहीं बल्कि सुखकर भी बना देता है।" वे यह भी जानते थे कि "आँधी और तूफ़ान
में अपने पाँवों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।" लेकिन वे सहारे के
लिए किसी भी बनावटी अंग के विचार को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते थे। वे
कहते थे, "अपनी नियति का सामना करने के लिए मुझे किसी नशे की ज़रूरत
नहीं है।" उन्होंने एलान किया था कि "जो आदमी अपने पाँवों पर खड़े होने की
64 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़