भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी पार्टी के उद्देश्यों तथा प्रयोजनों को जनता के सामने रखने के लिए
अदालत का मंच के रूप में जमकर इस्तेमाल किया।
उनकी यह रणनीति क़ामयाब हुई। इसके बारे में एस.एन. मजूमदार ने लिखा
है : “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की तमाम ग़लतियों और
कमज़ोरियों के बावजूद समूचे राष्ट्रीय आन्दोलन में और तरुण क्रान्तिकारियों को
साम्यवाद की ओर आकर्षित करने में इस पार्टी के योगदान की उपेक्षा नहीं की
जा सकती है।”⁴²
जी.एस. देओल के अनुसार, “क्रान्तिकारी आन्दोलन का कार्यक्षेत्र चाहे जितना
सीमित रहा हो उसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की गति को एक दूसरी धारा के
माध्यम से और तेज़ किया। बेशक यह कहा जा सकता है कि उनके (भगतसिंह
और उनके साथियों के – शि.व.) कार्यकलापों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए
दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग करने और पूर्ण
स्वराज्य का प्रस्ताव पास करने का पथ प्रशस्त किया।”⁴³
देओल के अनुसार क्रान्तिकारियों के कार्यकलापों और संघर्षों ने देश में अत्यन्त
विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके कारण कांग्रेस 1930 का असहयोग
आन्दोलन शुरू करने के लिए मजबूर हो गयी थी। “यह आन्दोलन भगतसिंह और
उनके साथियों के उग्र आन्दोलन के विकल्प के रूप में शुरू किया गया था। इस
मत की पुष्टि महात्मा गाँधी द्वारा 2 मार्च, 1930 को वायसराय को लिखे गये एक
पत्र के इस अंश से होती है : ‘हिंसावादी पार्टी अपनी जगह बनाती जा रही है और
उसने अपने अस्तित्व का अहसास कराना शुरू कर दिया है।’ उन्होंने आगे स्पष्ट
किया था कि वे जिस तरह का अहिंसक आन्दोलन शुरू करना चाहते हैं, उससे
न सिर्फ़ ब्रिटिश हुकूमत की हिंसक शक्ति का बल्कि उभरते हुए हिंसावादी दल
की संगठित हिंसक शक्तियों का भी प्रतिरोध किया जा सकेगा।”⁴⁴
वैज्ञानिक समाजवाद की ओर
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ के अधिकांश प्रमुख नेता 1929 के मध्य तक
गिरफ़्तार करके जेलों में बन्द कर दिये गये थे, जहाँ उन्हें पढ़ने और विचार-विमर्श
करने का भरपूर मौक़ा मिला। इससे उनके अन्दर जो नयी समझ पैदा हुई थी, उसके
आधार पर उन्होंने अपने पूरे अतीत को, ख़ासकर वैयक्तिक कार्यकलापों और शौर्य
प्रदर्शन के आदर्श को नये सिरे से जाँचा-परखा और अपनी अब तक की
कार्यप्रणाली को छोड़कर समाजवादी क्रान्ति का रास्ता अपनाने का निश्चय किया।
गहन अध्ययन और बोर्स्टल जेल में दूसरे साथियों से लम्बे विचार-विमर्श के बाद
भगतसिंह इस निर्णय पर पहुँचे कि यहाँ-वहाँ कुछ भेदियों और सरकारी अफ़सरों
की वैयक्तिक हत्याओं से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 61