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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 788 में से

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सोचने का काफ़ी मौक़ा मिला और तब कहीं जाकर हम सही नतीजे पर पहुँच पाये।
इसका यह मतलब नहीं कि जिस दौर की समीक्षा की जा रही है उसमें
सकारात्मक कुछ था ही नहीं। उसकी कमज़ोरियों के साथ ही उसके कुछ
सकारात्मक और मज़बूत पहलू भी थे। मैं अपनी और अपने साथियों की समझ
की ख़ास कमियों पर रोशनी डाल चुका हूँ। संक्षेप में फिर से दोहरा दूँ, पहली
बात तो यह कि हमारा कम्युनिज़्म को स्वीकार करना मार्क्सवाद के सही अध्ययन
पर आधारित नहीं था। दूसरी कमज़ोरी थी मज़दूरों और किसानों को संगठित
करने और जवाबी आतंकवाद के बीच तालमेल बिठलाने की अव्यावहारिकता को
न समझ पाना।
इन सारी कमियों और सीमाओं के बावजूद इस थोड़े समय चलने वाले चर्चित
दौर के खाते में कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हैं। लाहौर की 'नौजवान भारत
सभा का घोषणापत्र' (1928), असेम्बली बम केस के दौरान भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान (1929), कांग्रेस के लाहौर
अधिवेशन के समय बाँटा गया 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ का घोषणापत्र'
(दिसम्बर 1929) और 'बम का दर्शन' (जनवरी 1930) उस युग के सर्वश्रेष्ठ
प्रतिनिधि दस्तावेज़ हैं। इन दस्तावेज़ों के आधार पर हम कह सकते हैं कि
'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ' (हिसप्रस) का पहला आगे बढ़ा हुआ क़दम
था मार्क्सवाद को सिद्धान्त के रूप में और समाजवाद को अन्तिम उद्देश्य के रूप
में स्वीकार करना। बंगाल में भी आन्दोलन का रुख़ यही था, हालाँकि गति
अपेक्षाकृत धीमी थी। जिस समय हिसप्रस ने समाजवाद को डंके की चोट पर
अपना अन्तिम उद्देश्य घोषित कर दिया था, उस समय बंगाल के लगभग सभी
क्रान्तिकारी दल और प्रमुख पार्टियाँ इस सवाल पर अनिश्चितता की स्थिति में थे।
समाजवाद को ध्येय के रूप में स्वीकार करने के अलावा इस दौर के
क्रान्तिकारी मनुष्य द्वारा मनुष्य के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्त
वर्गहीन समाज के पक्ष में थे। उन्होंने एलान किया कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ ब्रिटिश
साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ही नहीं है, बल्कि विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के
ख़िलाफ़ है। उनके दिलों में सोवियत यूनियन के प्रति प्रगाढ़ आदर और अपनापन
था। उनका विश्वास था कि क्रान्ति के बाद जो सरकार बनेगी उसका रूप एक
प्रकार की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का होगा। उन्होंने ईश्वर, धर्म और रहस्यवाद
से पूरी तरह छुटकारा पा लिया था। वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते थे और उनका
दृष्टिकोण घोर साम्प्रदायिकतावाद विरोधी था।
असेम्बली बमकाण्ड के बाद हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ के अधिकांश
साथी गिरफ़्तार कर लिये गये। उन्होंने अपने मुक़दमे की सुनवाई के दौरान अपने
दृष्टिकोण को प्रचारित करने, समाजवाद के विचारों को लोकप्रिय बनाने और
60 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़