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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 788 में से

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पृष्ठ 57

सरल और सीधी-सादी भाषा में इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने हिन्दी के पाठकों
के सामने कम्युनिस्ट सिद्धान्त के प्रमुख मुद्दों को प्रस्तुत किया था। इन पंक्तियों के
लेखक को भी कम्युनिज़्म का पहला सबक राधामोहन जी से ही मिला था।
राधामोहन जी कट्टर नास्तिक थे। ईश्वर, धर्म, अन्धविश्वास आदि पर उन्होंने
पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ लिखा था। उनका यह रूप देखकर हिन्दी के
उपन्यास-सम्राट प्रेमचन्द ने उन्हें ‘आधुनिक चार्वाक’ कहकर पुकारा था।
सत्यभक्त का कम्युनिज़्म अध्यात्मवादी रंग का था और मौलाना हसरत मोहानी
के विचार कम्युनिज़्म और इस्लाम की खिचड़ी कहे जा सकते हैं। इन कमज़ोरियों
के बावजूद सोवियत रूस और साम्यवाद को हिन्दी भाषा-भाषी जनता के बीच
जनप्रिय बनाने में इन तीनों की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। कानपुर
के युवा क्रान्तिकारियों ने समाजवाद की प्रथम दीक्षा इन्हीं महानुभावों से प्राप्त की
थी। शौक़त उस्मानी भी विजयकुमार सिन्हा के माध्यम से कानपुर ग्रुप के सम्पर्क
में थे, लेकिन हम लोगों को उनसे किसी प्रकार का सैद्धान्तिक मार्गदर्शन नहीं मिल
सका था। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी से भी, जो कानपुर की बहुत बड़ी मशहूर हस्ती
थे, क्रान्तिकारियों को हर तरह की सहायता मिलती रहती थी। वे राजनीतिक
अध्ययन और जनता के बीच काम पर विशेष रूप से बल देते थे।
इस सबके परिणामस्वरूप कानपुर के साथियों का झुकाव भी समाजवाद की
तरफ़ हो गया था। लेकिन यह झुकाव बुद्धिसंगत होने के बजाय भावनात्मक अधिक
था। उस समय तक कानपुर ग्रुप चन्द्रशेखर आज़ाद और कुन्दनलाल गुप्त से सम्पर्क
स्थापित कर चुका था। ये दोनों साथी काकोरी षड्यन्त्र केस में फ़रार घोषित किये
जा चुके थे।
यह थी पृष्ठभूमि, जब 1928 के आरम्भ में भगतसिंह ने विभिन्न दलों को
मिलाकर क्रान्तिकारियों का एक अखिल भारतीय संगठन बनाने का विचार अपने
साथियों के सामने रखा। उनके प्रस्ताव इस प्रकार थे : (क) समय आ गया है
कि हम समाजवाद को साहस के साथ अपना अन्तिम लक्ष्य घोषित करें;
(ख) पार्टी का नाम तदनुसार बदला जाना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि हमारा
अन्तिम लक्ष्य क्या है; (ग) हमें सिर्फ़ उन्हीं कामों को हाथ में लेना चाहिए जिनका
सीधा सम्बन्ध जनता की ज़रूरतों और भावनाओं से हो सकता है, और हमें मामूली
पुलिस अधिकारियों अथवा भेदयों को मारने में अपनी शक्ति और समय का
अपव्यय नहीं करना चाहिए; (घ) धन के लिए हमें सरकारी ख़ज़ाने पर ही हाथ
डालना चाहिए और यथासम्भव निजी घरों पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए; और
(ङ) सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
भगतसिंह ने इन सब मुद्दों पर लाहौर और कानपुर के अपने साथियों के साथ
विचार-विमर्श किया और चन्द्रशेखर आज़ाद तथा कुन्दनलाल की सहमति भी ले
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 51