भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्देश्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया था, अमल में हम लोग उसी पुराने
व्यक्तिवादी ढंग के कामों में ही लगे रहे। हम मज़दूरों, किसानों, युवकों और
मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों को संगठित करने की बात तो करते थे लेकिन पंजाब में
नौजवान भारत सभा के गठन को छोड़कर और कहीं भी संजीदगी के साथ उस
दिशा में क़दम उठाने की कोशिश नहीं की गयी। उस मायने में हमारी वैज्ञानिक
समाजवाद अर्थात मार्क्सवाद की समझ अधकचरी थी। मार्क्सवाद अमल को
सिद्धान्त से अलग करने की इजाज़त नहीं देता, यह बात हम समझ नहीं पाये थे
और यह कि उसमें व्यक्तिगत कामों के लिए कोई स्थान नहीं है। हम हिंसात्मक
गतिविधियों को, जिसमें ज़ालिम सरकारी अधिकारियों की हत्या और छुटपुट विद्रोह
शामिल थे, मज़दूरों, किसानों, युवकों और विद्यार्थियों के जन-संगठन बनाने के
काम में मिलाना चाहते थे। लेकिन अमल में हमारा ज़ोर हिंसात्मक गतिविधियों और
सशस्त्र कामों की तैयारी तक ही सीमित रहा। हमारा विश्वास था कि लोगों को
नींद से जगाने के लिए और सरकारी दमन का जवाब देने के लिए यह सब
आवश्यक है। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अवसर पर दिसम्बर, 1928 में
भगतसिंह ने का. सोहन सिंह जोश से कहा था, “हम आपकी पार्टी के कामों से
और उसके कार्यक्रम से सौ फ़ीसदी सहमत हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे भी क्षण
आते हैं जब जनता में विश्वास की भावना जागृत करने के लिए दुश्मन के प्रहार
का सशस्त्र कामों द्वारा तत्काल जवाब देना आवश्यक हो जाता है।”³⁸ उस समय
हमारे दिमाग़ इसी तरह काम कर रहे थे। हमारी समझ में निहित अन्तरविरोध का
अपना तर्क था। मज़दूरों-किसानों को संगठित करने का हमारा फ़ैसला केवल एक
पवित्र इरादा बनकर ही रह गया। हमारी शक्ति का अधिकांश हिस्सा प्रतिशोधात्मक
कामों को संगठित करने में ही ज़ाया हुआ।
हमारी ग़लत समझ को ठीक करने का एक प्रयास तीसरे इन्टरनेशनल ने किया
था। यह प्रयास विदेश में गठित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा “राष्ट्रवादियों से
अपील” के ज़रिये किया गया था। यह अपील 15 दिसम्बर, 1924 के वैनगार्ड के
परिशिष्ट में प्रकाशित हुई थी। अपील में क्रान्तिकारियों के बारे में कहा गया था :
“गुप्त सभाओं द्वारा किये जाने वाले छुटपुट आतंकवादी काम भी कुछ कम
प्रभावहीन नहीं हैं। इस प्रकार के व्यर्थ उग्रवाद को अपनाने वालों की क्रान्ति की
समझ भी उतनी ही ग़लत है। समाज की मौजूदा स्थिति में ऐसी उम्मीद नहीं की
जा सकती है कि राजनीतिक और सामाजिक क्रान्तियाँ अहिंसात्मक होंगी या
उनमें रक्तपात नहीं होगा। लेकिन हर रक्तपात या हिंसात्मक काम को क्रान्ति नहीं
कहा जा सकता। एक ख़ास सामाजिक व्यवस्था को या राजनीतिक संस्था को
उसके चन्द समर्थकों को मारकर कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। और
यह तो और भी नामुमकिन है कि थोड़े से सरकारी अफ़सरों को मारकर या
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