भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसे फिर असेम्बली के सामने रखा।<sup>37</sup>
जिस समय समाचारपत्रों में यह ख़बर छपी कि सरकार ने बिल को असेम्बली
में फिर से पेश करने का फ़ैसला कर लिया है उस समय भगतसिंह आगरे में था।
समाचार पर उसकी जो प्रतिक्रिया हुई वह बड़ी तीखी थी। उसने कहा कि सरकार
के इस मनमानेपन के ख़िलाफ़ प्रतिवाद के रूप में कुछ न कुछ ज़रूर करना चाहिए।
वह लाहौर गया, सुखदेव के साथ अपने प्रस्तावों पर बात की, वापस आया, केन्द्रीय
कमेटी की बैठक बुलायी और उसके सामने अपने प्रस्ताव रखे। संक्षेप में उसके
प्रस्ताव इस प्रकार थे : (1) पार्टी को असेम्बली में बम फेंककर सरकार के इस
सख़्त एवं हठी रवैये का विरोध करना चाहिए; (2) इस काम को करने के लिए
जो साथी तैनात किये जायें वे काम के बाद भागने की कोशिश करने के बजाय
वहीं आत्मसमर्पण कर दें और केस के दौरान अदालत को पार्टी के उद्देश्यों के प्रचार
के लिए मंच के तौर पर इस्तेमाल करें; और (3) इस फ़ैसले को कार्यान्वित करने
के लिए एक और साथी के साथ उसे स्वयं जाने की अनुमति दी जाये। भगतसिंह
के पहले दो सुझावों का केन्द्रीय कमेटी के सभी सदस्यों ने स्वागत किया। लेकिन
उसका तीसरा सुझाव किसी ने भी नहीं माना। यह मीटिंग आगरे में हुई थी और
पहले दिन सुखदेव उसमें उपस्थित नहीं था। वह दूसरे दिन आया। सुखदेव के आ
जाने पर भगतसिंह को बल मिला और काफ़ी बहस के बाद अन्त में कमेटी ने
भगतसिंह का तीसरा प्रस्ताव भी मान लिया।
दूसरा बिल (ट्रेड डिस्प्यूट बिल) असेम्बली में 4 सितम्बर, 1928 को पेश
किया गया था। सदन ने उसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया। वहाँ से कुछ
फेर-बदल के साथ उसे 2 अप्रैल, 1929 को बहस के लिए असेम्बली के सामने
फिर लाया गया। सदन ने 8 अप्रैल को 38 के ख़िलाफ़ कुछ वोटों से उसे पास
कर दिया। जैसे ही अध्यक्ष महोदय वोटिंग का परिणाम घोषित करने के लिए उठे
वैसे ही भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से असेम्बली भवन में बम
फेंके और नारे लगाने के साथ-साथ परचे भी गिराये, जिनमें बम फेंकने के
राजनीतिक उद्देश्य को स्पष्ट किया गया था। यह परचा उसी दिन हिन्दुस्तान टाइम्स
के सन्ध्याकालीन परिशिष्ट में प्रकाशित हो गया था। यह हमें क्रान्तिकारी आन्दोलन
के एक छोटे दौर में पहुँचा देता है, जिसका ज़िक्र लोग कभी-कभी
आतंकवादी-साम्यवाद या टेरो-कम्युनिज़्म के नाम से करते हैं।
टेरो-कम्युनिज़्म या आतंकवादी-साम्यवाद
लाहौर तथा कानपुर के क्रान्तिकारियों ने 1926-27 से ही समाजवाद की ओर
बढ़ना शुरू कर दिया था। आठ-नौ सितम्बर 1928 की दिल्ली मीटिंग में हालाँकि
समाजवाद को सिद्धान्त के रूप में और समाजवादी समाज की स्थापना को अन्तिम
क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास / 57