भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
‘ड्रीमलैण्ड’ की भूमिका
लाला रामसरन दास आज़ादी की लड़ाई के पुराने सिपाही थे। 1907 में जब
भगतसिंह का जन्म हुआ तब वह उनके चाचा अजीत सिंह के साथ जंगे-आज़ादी
में क़दम रख चुके थे। उम्रक़ैद काटकर बाहर आये तो क्रान्तिकारियों की मदद करने
लगे। लाहौर षड्यन्त्र केस में उन्हें फँसाया गया और फिर पाँच साल की क़ैद हुई।
जेल में ही वे अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। उनकी काव्य पुस्तक ‘द ड्रीमलैण्ड’ जब
तैयार हुई तो भगतसिंह से उन्होंने इसकी भूमिका लिखने का अनुरोध किया। भगतसिंह
ने इसे बड़े संकोच से स्वीकारा और लाहौर सेण्ट्रल जेल में ही 15 जनवरी, 1931
को भूमिका के तौर पर यह आलोचनात्मक लेख लिखा। यह उनकी साहित्यिक
समझ, गहन अन्तर्दृष्टि, गहरी संवेदना और आलोचनात्मक विवेक का एक श्रेष्ठ
उदाहरण है। — स.
मेरे श्रेष्ठ मित्र लाला रामसरन दास ने मुझसे अपनी काव्यकृति ‘द ड्रीमलैण्ड’ की
भूमिका लिखने के लिए कहा है। मैं न तो कवि हूँ, न साहित्यकार हूँ और न पत्रकार
या आलोचक ही हूँ, इसलिए उनकी इस माँग का औचित्य मैं किसी भी तरह से
नहीं समझ पा रहा हूँ। लेकिन जिन परिस्थितियों में मैं हूँ उनमें लेखक से इस बारे
में बहस-मुबाहसा कर पाना सम्भव नहीं है, इसलिए मेरे सामने मित्र की इच्छा पूरी
करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता।
चूँकि मैं कवि नहीं हूँ, इसलिए मैं उस दृष्टिकोण से इस पर बहस करने नहीं
जा रहा हूँ। मैं छन्दों-तुकों के ज्ञान से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और यह भी नहीं जानता
कि छन्दों के मानदण्डों पर यह खरी उतरेगी या नहीं। एक साहित्यकार नहीं होने
के नाते मैं राष्ट्रीय साहित्य में इसका उचित स्थान दिलाने के दृष्टिकोण से इस पर
बहस करने नहीं जा रहा हूँ।
एक राजनीतिक कार्यकर्ता होने के नाते अधिक से अधिक मैं इस पर उसी
दृष्टिकोण से बहस कर सकता हूँ। लेकिन यहाँ भी एक बात मेरे काम को
व्यावहारिक तौर पर असम्भव, या कम से कम बहुत कठिन बना देती है।
नियमानुसार भूमिका हमेशा वह आदमी लिखता है जो कृति की विषयवस्तु के बारे
में वही विचार रखता हो जो लेखक रखता है। लेकिन यहाँ मामला काफ़ी भिन्न
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है। मैं अपने मित्र से सभी मामलों पर एकमत नहीं हूँ। वे इस तथ्य से परिचित थे
कि विभिन्न अहम बिन्दुओं पर मैं उनसे भिन्न विचार रखता हूँ। इसलिए, मैं यह
जो लिख रहा हूँ वह कम से कम इस पुस्तक की भूमिका नहीं होने जा रही है,
और चाहे जो हो। यह काफ़ी हद तक उसकी आलोचना हो सकती है, इसलिए
इसका स्थान पुस्तक के अन्त में होगा न कि उसके आरम्भ में।
राजनीतिक क्षेत्र में 'ड्रीमलैण्ड' का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान
परिस्थिति में वह आन्दोलन की एक महत्पूर्ण रिक्तता को भरती है। वास्तव में, हमारे
देश के सभी राजनीतिक आन्दोलनों में, जिन्होंने हमारे आधुनिक इतिहास में कोई
न कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है, उस आदर्श की कमी रही है जिसकी प्राप्ति
उसका लक्ष्य था। क्रान्तिकारी आन्दोलन इसका अपवाद नहीं है। एक ग़दर पार्टी को
छोड़कर जिसने अमेरिकी प्रणाली की सरकार से प्रेरित होकर स्पष्ट शब्दों में कहा
था कि वे मौजूदा सरकार की जगह गणतान्त्रिक ढंग की सरकार क़ायम करना
चाहते हैं, मुझे अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद एक भी ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी
नहीं मिली जिसके सामने यह विचार स्पष्ट हो कि वह किसलिए लड़ रही है। सभी
पार्टियों में केवल ऐसे लोग थे जिनके पास केवल एक विचार था और वह यह
था कि उन्हें विदेशी शासकों के विरुद्ध संघर्ष करना है। यह विचार पर्याप्त रूप से
सराहनीय है। लेकिन इसे एक क्रान्तिकारी विचार नहीं कहा जा सकता। हमें यह
स्पष्ट कर देना चाहिए कि क्रान्ति का अर्थ मात्र उथल-पुथल या रक्तरंजित संघर्ष
नहीं होता। क्रान्ति में, मौजूदा हालात (यानी सत्ता) को पूरी तरह से ध्वस्त करने
के बाद, एक नये और बेहतर स्वीकृत आधार पर समाज के सुव्यवस्थित पुनर्निर्माण
का कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अन्तर्निहित रहता है।
राजनीतिक क्षेत्र में, उदारवादी लोग मौजूदा सरकार में ही कुछ सुधार चाहते
थे, जबकि उग्रवादी इससे कुछ अधिक चाहते हैं और उस उद्देश्य के लिए उग्रवादी
साधन अपनाने के लिए तैयार थे। क्रान्तिकारी लोग हमेशा अतिवादी साधनों को
अपनाने के पक्षधर रहे हैं और उनका एक ही उद्देश्य रहा है – विदेशी प्रभुत्व को
उखाड़ फेंकना। बेशक इनमें कुछ ऐसे लोग भी रहे हैं जो इन साधनों से कुछ सुधार
प्राप्त करने के पक्षधर थे। इन सभी आन्दोलनों को सही मायने में क्रान्तिकारी
आन्दोलन की संज्ञा नहीं दी जा सकती।
लेकिन, लाला रामसरन दास पहले क्रान्तिकारी हैं जिन्हें 1908 में एक बंगाली
फ़रार (क्रान्तिकारी) ने पंजाब में औपचारिक रूप से क्रान्तिकारी पार्टी में शामिल
किया था। तब से वे लगातार क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े रहे और अन्ततोगत्वा
ग़दर पार्टी में शामिल हो गये, लेकिन उन्होंने अपने उन विचारों का परित्याग नहीं
किया जो आन्दोलन के आदर्शों के बारे में पुराने क्रान्तिकारियों के थे। पुस्तक के
आकर्षण और मूल्य को बढ़ाने वाला यह दूसरा दिलचस्प तथ्य है। लाला रामसरन
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 471
दास को 1915 में मौत की सज़ा मिली थी और बाद में उसे आजीवन कारावास
में बदल दिया गया था। आज खुद फाँसी की कालकोठरी में बैठकर मैं पाठकों
को साधिकार बता सकता हूँ कि आजीवन कारावास मौत की अपेक्षा कहीं अधिक
कठोर है। लाला रामसरन दास को पूरे चौदह वर्ष जेल की सज़ा भुगतनी पड़ी। यह
कविता उन्होंने दक्षिण की किसी जेल में लिखी थी। लेखक की उस समय की
मनःस्थिति और मानसिक संघर्ष का कविता पर स्पष्ट प्रभाव है जो इसे और अधिक
सुन्दर और दिलचस्प बना देता है। उसने जिस समय इसे लिखने का निश्चय किया
उस समय वह किन्हीं नैराश्यपूर्ण मनोभावों के विरुद्ध कठिन संघर्ष कर रहा था।
उन दिनों में, जब बहुत से साथी आश्वासन (‘अण्डरटेकिंग’) देकर छूट चुके थे
और सबके सामने, उसके (लेखक के) सामने भी बड़े-बड़े प्रलोभन थे, और जब
पत्नी और बच्चों की मधुर दुखदायी यादें अपनी मुक्ति की आकांक्षा को और
अधिक मज़बूत कर रही थीं, ऐसी स्थिति में लेखक को इन चीज़ों के पस्तहिम्मती
पैदा करने वाले प्रभाव के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना पड़ा था और उसने अपना
ध्यान इस रचना-कार्य की ओर मोड़ दिया था। इसलिए, प्रारम्भिक पदों में हमें इस
तरह का आकस्मिक भावोद्वेग मिलता है –
“पत्नी, बच्चे और मित्र
जो मुझे घेरे रहते थे
वे चारों ओर घूमते
ज़हरीले साँपों के समान थे।”
("Wife, children, friends, that me surround
Were poisonous snakes all around")
वह (कवि) शुरू में दर्शन की चर्चा करता है। यह दर्शन बंगाल और पंजाब
के सभी क्रान्तिकारी आन्दोलनों की रीढ़ है। इस बिन्दु पर मैं लेखक से बहुत
व्यापक मतभेद रखता हूँ। उसकी ब्रह्माण्ड की व्याख्या हेतुवादी और आधिभौतिक
है, जबकि मैं एक भौतिकवादी हूँ और इस परिघटना (फेनॉमेना) की मेरी व्याख्या
कारणसम्बद्ध होगी। फिर भी किसी भी तरह से यह रचना देश-काल की दृष्टि से
अनुपयुक्त नहीं है। जो सामान्य विचार हमारे देश में मौजूद हैं वे लेखक द्वारा
अभिव्यक्त विचारों के अनुरूप अधिक हैं। अपनी नैराश्यपूर्ण मनोदशा से संघर्ष के
लिए उसने प्रार्थना का रास्ता अख़्तियार किया है। यह इस बात से स्पष्ट है कि
पुस्तक का प्रारम्भ पूरी तरह ईश्वर, उसकी महिमा के वर्णन और उसकी परिभाषा
को समर्पित है। ईश्वर में विश्वास रहस्यवाद का परिणाम है जो निराशा का
स्वाभाविक प्रतिफलन है। यह विश्व एक ‘माया’, एक स्वप्न या कल्पना है – यह
स्पष्टतः रहस्यवाद है जिसे शंकराचार्य तथा दूसरे अन्य प्राचीन काल के हिन्दू
सन्तों ने जन्म दिया और विकसित किया। लेकिन भौतिकवादी दर्शन में इस
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चिन्तन-पद्धति के लिए कोई स्थान नहीं है। फिर भी लेखक का यह रहस्यवाद
किसी भी तरह से हेय या खेदजनक नहीं है। इसका अपना सौन्दर्य और आकर्षण
है। उसके विचार उत्साहप्रद हैं, उदाहरण के लिए –
“नींव के पत्थर बनो, अनजाने-अज्ञात,
और अपने सीने पर बरदाश्त करो खुशी-खुशी
विशाल भारी-भरकम निर्माण का बोझ,
पा लो आश्रय कष्ट सहन में,
मत करो ईर्ष्या शीर्ष पर जड़े पत्थर से
जिस पर उड़ेली जाती है सारी लौकिक प्रशंसा,” आदि आदि।
("Be a foundation stone obscure,
And on thy breast cheerfully bear
The architecture vast and huge,
In suffering find true refuge.
Envy not the plastered top-stone,
On which all worldly praise is thrown", etc. etc.)
अपने निजी अनुभव के आधार पर मैं अधिकारपूर्वक कह सकता हूँ कि गुप्त
कार्यों के दौरान, जब मनुष्य ‘बिना किसी आशा और भय के’, लगातार
अपरिचित, असम्मानित, अप्रशंसित व्यक्ति की मौत मरने के लिए तैयार रहते हुए’
लगातार एक जोखिम भरी ज़िन्दगी बिताता है, तो वह व्यक्तिगत प्रलोभनों और
इच्छाओं से सिर्फ़ इस तरह के रहस्यवाद के सहारे ही लड़ सकता है और ऐसा
रहस्यवाद किसी भी तरह से पस्तहिम्मती पैदा करने वाला नहीं होता। असली
चीज़ जिसका उन्होंने वर्णन किया है वह एक क्रान्तिकारी की मानसिकता है।
लाला रामसरन दास जिस क्रान्तिकारी पार्टी के सदस्य थे, उसे कई हिंसात्मक
कार्यों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। लेकिन इससे किसी भी तरह यह
साबित नहीं होता कि क्रान्तिकारी ध्वंस में सुख अनुभव करने वाले खून के प्यासे
राक्षस होते हैं। पढ़िये –
“अगर ज़रूरत हो, तो उग्र बनो ऊपरी तौर पर
लेकिन हमेशा नरम रहो अपने दिल में
अगर ज़रूरत हो, तो फुँफकारो पर डसो मत
दिल में प्यार को ज़िन्दा रखो और लड़ते रहो ऊपरी तौर पर”।
("If need be, outwardly be wild,
But in thy heart be always mild
Hiss if need be, but do not bite
Love in thy heart and outside fight".)
निर्माण के लिए ध्वंस ज़रूरी ही नहीं, अनिवार्य है। क्रान्तिकारियों को इसे
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 473
अपने कार्यक्रम के एक आवश्यक अंग के रूप में अपनाना पड़ता है, और ऊपर
की पंक्तियों में हिंसा और अहिंसा के दर्शन को ख़ूबसूरत ढंग से बयान किया गया
है। लेनिन ने एक बार गोर्की से कहा कि उन्हें ऐसा संगीत सुनने को नहीं मिला
जो सभी नाड़ियों-शिराओं को झकझोर दे और जिसे सुनकर कलाकार का सिर
थपथपाने की इच्छा पैदा हो जाये। “लेकिन,” उन्होंने आगे कहा था, “यह समय
सिर थपथपाने का नहीं है। इस समय हाथों को खोपड़ियाँ तोड़नी हैं, हालाँकि हमारा
चरम उद्देश्य हर प्रकार की हिंसा को समाप्त करना है।”* एक भयानक आवश्यकता
के रूप में हिंसात्मक साधनों का उपयोग करते हुए क्रान्तिकारी भी ठीक ऐसा ही
सोचते हैं।
इसके बाद लेखक परस्पर-विरोधी धर्मों की समस्या पर विचार करता है। वह
सभी धर्मों में समन्वय स्थापित करने की चेष्टा करता है जैसाकि प्रायः सभी
राष्ट्रवादी किया करते हैं। इस सवाल को हल करने का यह तरीक़ा लम्बा और
गोलमोल है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं इस मसले को कार्ल मार्क्स के एक वाक्य
द्वारा ख़ारिज कर दूँगा कि “धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
अन्त में उसकी कविता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा आता है जहाँ उसने
उस भावी समाज के बारे में लिखा है जिसकी रचना करने के लिए हम सभी
लालायित हैं। लेकिन मैं शुरू में ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। ‘ड्रीमलैण्ड’
दरअसल एक यूटोपिया है। लेखक ने स्वयं इस बात को स्पष्ट रूप से शीर्षक में
ही स्वीकार किया है। वह इस विषय पर कोई वैज्ञानिक शोध-प्रबन्ध लिखने का
दावा नहीं करता। लेकिन निस्सन्देह, यूटोपिया की सामाजिक प्रगति में महत्त्वपूर्ण
भूमिका होती है। सेण्ट साइमन, फूरिये, रॉबर्ट ओवेन और उनके सिद्धान्तों के अभाव
में वैज्ञानिक मार्क्सवादी समाजवाद भी नहीं होता। लाला रामसरन दास की
‘यूटोपिया’ का भी उसी तरह से महत्त्व है। जब हमारा कार्यकर्ता अपने आन्दोलन
के दर्शन को व्यवस्थित रूप देने और एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का महत्त्व
समझेगा, उस समय यह पुस्तक उसके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होगी।
इस बात की ओर मेरा ध्यान गया है कि लेखक की अभिव्यक्ति की शैली
अपरिष्कृत है। अपनी ‘यूटोपिया’ का वर्णन करते हुए लेखक वर्तमान समाज के
विचारों से अछूता नहीं रह पाया है।
ज़रूरतमन्दों को दान देना
भविष्य के समाज में यानी कम्युनिस्ट समाज में जिसे हम बनाना चाहते हैं हम
धर्मार्थ संस्थाएँ स्थापित करने नहीं जा रहे हैं, बल्कि उस समाज में न ज़रूरतमन्द
होंगे न ग़रीब। न दान देने वाले। इस असंगति के बावजूद, इस प्रश्न को बड़े
ख़ूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
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लेखक ने समाज की जिस सामान्य रूपरेखा की चर्चा की है वह काफ़ी हद
तक वैज्ञानिक समाजवाद जैसी ही है। लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें पुस्तक में हैं
जिनका विरोध या खण्डन करने, या और सटीक ढंग से कहें, तो जिनमें सुधार करने
की ज़रूरत है। उदाहरण के तौर पर 427वें पद के नीचे के एक फुटनोट में वे
लिखते हैं कि सरकारी कर्मचारियों को अपनी रोजी कमाने के लिए प्रतिदिन चार
घण्टे खेतों या कारखानों में काम करना होगा। लेकिन यह फिर एक काल्पनिक और
अव्यावहारिक बात है। सम्भवतः आज की व्यवस्था में राजकर्मचारी जो अनावश्यक
रूप से ऊँचा वेतन पाते हैं, यह बात उसी की प्रतिक्रिया की उपज है। वास्तव में
बोल्शेविकों को भी यह मानना पड़ा था कि मानसिक श्रम भी उतना ही उत्पादक
श्रम है जितना शारीरिक श्रम। और भविष्य के समाज में जब विभिन्न तत्त्वों के
सम्बन्धों का समायोजन समानता के आधार पर होगा तो उत्पादक और वितरक दोनों
को समान महत्त्व का दर्जा प्राप्त होगा। आप एक नाविक से यह उम्मीद नहीं कर
सकते कि वह चौबीस घण्टे में एक बार जहाज़ चलाना रोक कर उतर जाये और
रोजी कमाने के लिए चार घण्टे काम करने चला जाये, या एक वैज्ञानिक अपनी
प्रयोगशाला या अपना प्रयोग (काम) छोड़कर अपना काम का कोटा पूरा करने खेत
में चला जाये। दोनों ही अत्यन्त उत्पादक श्रम कर रहे हैं। समाजवादी समाज में
एकमात्र इस अन्तर की आशा की जानी चाहिए कि मानसिक श्रम करने वाला
शारीरिक श्रम करने वाले से श्रेष्ठ नहीं माना जायेगा।
निःशुल्क शिक्षा के बारे में लाला रामसरन दास के विचार वाक़ई ध्यान देने
योग्य हैं। रूस में समाजवादी सरकार ने बहुत कुछ उसी तरह के क़दम उठाये हैं।
अपराध के बारे में उन्होंने जो चर्चा की है, वह सचमुच सर्वाधिक विकसित
चिन्तनधारा है। अपराध सर्वाधिक गम्भीर सामाजिक समस्या है जिसे हल करने में
बहुत सतर्कता की ज़रूरत है। लेखक ने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा जेल में
बिताया है। उनके पास कुछ व्यावहारिक अनुभव हैं। एक स्थान पर उन्होंने ‘हलकी
मशक़्क़त, दरमियानी मशक़्क़त, सख़्त मशक़्क़त’ जैसे ठेठ जेल की शब्दावली का
इस्तेमाल किया है। सभी दूसरे समाजवादियों की तरह वे सुझाव देते हैं कि दण्ड
का आधार प्रतिशोध के बजाय सुधार का सिद्धान्त होना चाहिए। न्याय व्यवस्था का
निर्देशक सिद्धान्त दण्ड देना न होकर सुधारना होना चाहिए और जेलों का रूप
वास्तविक नर्क के बजाय सुधारालयों का होना चाहिए। इस सम्बन्ध में पाठकों को
रूसी जेल-व्यवस्था का अध्ययन करना चाहिए।
सेना की चर्चा करते समय उन्होंने युद्ध की भी चर्चा की है। मेरे विचार से
उस समय विश्वकोशों में एक संस्था के रूप में युद्ध की चर्चा बहुत थोड़े पन्नों
में रहेगी और युद्ध सामग्रियाँ संग्रहालयों की गैलरियों की शोभा बढ़ायेंगी, क्योंकि
उस समाज में परस्पर शत्रुतापूर्ण हित नहीं रह जायेंगे जो युद्ध को जन्म देते हैं।
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ज़्यादा से ज़्यादा हम यह कह सकते हैं कि एक संस्था के रूप में युद्ध का
अस्तित्व संक्रमण काल तक रहेगा। वर्तमान रूस के उदाहरण से इस बात को
अच्छी तरह समझा जा सकता है। वहाँ पर इस समय सर्वहारा का अधिनायकत्व
क़ायम है। वे समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते हैं। तब तक के लिए
पूँजीवादी समाज से अपनी रक्षा के लिए उन्हें एक सेना रखनी पड़ रही है। पर
उनके युद्ध-उद्देश्य भिन्न होंगे। हमारे स्वप्नलोक की जनता को साम्राज्यवादी
योजनाएँ युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करेंगी। युद्ध की ट्राफियों का अस्तित्व शेष नहीं
रह जायेगा। क्रान्तिकारी सेनाएँ दूसरे देशों में वहाँ की जनता पर शासन करने के
लिए या उन्हें लूटने के लिए नहीं बल्कि वहाँ के परजीवी शासकों को सिंहासनों
से नीचे गिराने के लिए, वहाँ की जनता का खून चूसने वाले शोषण को बन्द
करने के लिए और मेहनतकश जनता को मुक्त करने के लिए जायेंगी। लेकिन
हमारे जवानों को युद्ध के लिए उकसाने वाले पुराने राष्ट्रीय या जातीय विद्वेष का
अस्तित्व नहीं रह जायेगा।
मुक्त चिन्तन करने वाले सभी लोगों के लिए, विश्व संघ की स्थापना
सर्वाधिक लोकप्रिय और फ़ौरी उद्देश्य है। लेखक ने इस विषय पर अच्छी चर्चा की
है और तथाकथित ‘लीग ऑफ़ नेशंस’ की सुन्दर आलोचना की है।
571(572) वें पद के नीचे के एक फुटनोट में लेखक ने साधन के प्रश्न की
संक्षिप्त चर्चा की है। वह कहता है, “ऐसा राज्य शारीरिक हिंसात्मक क्रान्तियों द्वारा
स्थापित नहीं हो सकता। यह समाज पर बाहर से थोपा नहीं जा सकता। यह अन्दर
से विकसित होगा...इसकी प्राप्ति धीरे-धीरे क्रमविकास की प्रक्रिया द्वारा और जनता
को ऊपर चर्चित लाइन पर प्रशिक्षित करके होगी”, आदि। यह वक्तव्य अपनेआप
में असंगत नहीं है। यह सर्वथा सही है, लेकिन पूरी तरह व्याख्या न की जाने के
कारण यह ग़लतफ़हमी या भ्रम पैदा कर सकता है। क्या इसका यह मतलब है कि
लाला रामसरन दास को बल-प्रयोग के रास्ते की निरर्थकता का आभास हो गया
है? क्या वे अहिंसा के पुरातनपन्थी समर्थक हो गये हैं? नहीं, इसका यह मतलब
नहीं है।
आइये, इस बात की व्याख्या करें कि ऊपर उद्धृत बयान का क्या मतलब है?
किसी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा क्रान्तिकारी इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह समझते
हैं कि समाजवादी समाज की स्थापना हिंसात्मक साधनों से नहीं हो सकती है
बल्कि उसे अन्दर से प्रस्फुटित और विकसित होना चाहिए। लेखक इसके लिए
एकमात्र अस्त्र के रूप में शिक्षा को अपनाने का सुझाव देता है। लेकिन हर आदमी
इस बात को आसानी से समझ सकता है कि यहाँ की वर्तमान सरकार और
दरअसल सभी पूँजीवादी सरकारें न केवल ऐसे प्रयासों की सहायता नहीं करेंगी
बल्कि इसके विपरीत निर्दयतापूर्वक इसका दमन करेंगी। तब उसके ‘क्रमिक
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विकास' से क्या उपलब्धि होगी? हम क्रान्तिकारी लोग सत्ता पर अधिकार करने
और एक क्रान्तिकारी सरकार के गठन का प्रयास कर रहे हैं, जो जन-शिक्षा के
लिए अपने सभी साधनों का इस्तेमाल करेगी जैसाकि आज रूस में हो रहा है। सत्ता
पर अधिकार करने के पश्चात रचनात्मक कार्यों के लिए शान्तिपूर्ण तरीक़े अपनाये
जायेंगे और बाधाओं को कुचलने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जायेगा। यदि
लेखक का यही मतलब है तो हम उससे सहमत हैं और मुझे विश्वास है कि यही
उसका मतलब है।
मैंने इस पुस्तक पर विस्तार से चर्चा की है। बल्कि मैंने उसकी आलोचना ही
कर डाली है। लेकिन मैं पुस्तक में किसी प्रकार का परिवर्तन करने के लिए नहीं
कहने जा रहा हूँ क्योंकि उसका एक ऐतिहासिक मूल्य है। 1914-15 के
क्रान्तिकारियों के यही विचार थे।
मैं विशेष तौर पर नौजवानों के लिए इस पुस्तक की ज़ोरदार सिफ़ारिश करता
हूँ लेकिन एक चेतावनी के साथ, कृपया आँख मूँदकर अनुकरण करने के लिए इसे
मत पढ़िये। इसे पढ़िये, इसकी आलोचना कीजिये, इस पर सोचिये और इसकी
सहायता से अपनी समझदारी क़ायम करने की कोशिश करिये।
(जनवरी, 1931)
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 477
क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा
भगतसिंह द्वारा तैयार किये गये क्रान्तिकारी कार्यक्रम की योजना के दो हिस्से
हैं। एक, छापकर बाँटने के लिए जो एक पत्र की तरह लिखा गया है और दूसरा,
एक लेख के रूप में क्रान्तिकारी साथियों में विचार, बहस व काम में दिग्दर्शन के
लिए है। इसका पहला हिस्सा ‘नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम’ शीर्षक से
उस समय के विभिन्न समाचारपत्रों में काट-छाँटकर छपा था। भगतसिंह को फाँसी
के बाद लाहौर के ‘द पीपुल’ में 29 जुलाई, 1931 और इलाहाबाद के ‘अभ्युदय’
में 8 मई, 1931 के अंक में इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए थे।
यह दस्तावेज़ अपने समग्र रूप में कुछ वर्ष पहले अंग्रेज़ सरकार की एक गुप्त
पुस्तक में मिला। यह पुस्तक सी.आई.डी. अधिकारी सी.ई.एस. फेयरवेदर ने 1936
में ‘बंगाल में संयुक्त मोर्चा-आन्दोलन की प्रगति पर नोट’ शीर्षक से लिखी थी। उसके
अनुसार यह मसविदा भगतसिंह ने लिखा था और 3 अक्टूबर, 1931 को श्रीमती
विमला प्रभा देवी के घर से तलाशी में हासिल हुआ था। इस पुलिस अधिकारी ने
यह कहा था कि अब सभी क्रान्तिकारी शक्तियाँ इस कार्यक्रम में उल्लिखित सुझावों
के अनुसार काम कर रही हैं।
यह दस्तावेज़ यहाँ अपने सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र
प्रिय साथियो,
इस समय हमारा आन्दोलन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है। एक साल
के कड़े संघर्ष के बाद गोलमेज सम्मेलन ने हमारे सामने, संवैधानिक
सुधारों-सम्बन्धी कुछ निश्चित बातें प्रस्तुत की हैं और कांग्रेसी नेताओं से कहा गया
है कि वर्तमान परिस्थितियों में अपना आन्दोलन वापस लेकर इसमें मदद करें। इस
बात का हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं है कि वे आन्दोलन समाप्त करने का निर्णय
करते हैं या नहीं करते। यह तो निश्चित है कि वर्तमान आन्दोलन का अन्त किसी
न किसी तरह के समझौते के रूप में होगा। यह बात अलग है कि समझौता जल्द
होता है या देर से। वास्तव में समझौता कोई घटिया या घृणित वस्तु नहीं है, जैसाकि
प्रायः समझा जाता है। राजनीतिक संघर्षों का यह एक ज़रूरी दाँव-पेंच है। कोई भी
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राष्ट्र जो अत्याचारी शासकों के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होता है, शुरू में अवश्य असफल
रहता है। संघर्ष के बीच में समझौते द्वारा कुछ आधे-अधूरे सुधार हासिल करता है
और सिर्फ़ अन्तिम दौर में ही – जब सभी शक्तियाँ और साधन पूरी तरह संगठित
हो जाते हैं – शासक वर्ग को नष्ट करने के लिए आख़िरी ज़ोरदार हमला किया
जा सकता है। लेकिन यह भी सम्भव है कि तब भी असफलता हाथ लगे और
किसी प्रकार का समझौता अनिवार्य हो जाये। रूस के उदाहरण से यह बात अच्छी
तरह स्पष्ट की जा सकती है।
1905 में जब रूस में क्रान्तिकारी आन्दोलन शुरू हुआ तो राजनीतिक नेताओं
को बड़ी आशाएँ थीं। लेनिन तब विदेश से, जहाँ वे शरण लिये हुए थे, लौट आये
थे और संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे। लोग उन्हें यह बताने पहुँचे कि दर्जनों जागीरदार
मार दिये गये हैं और बीसियों महल जला दिये गये हैं। लेनिन ने उत्तर में कहा कि
लौटकर 1200 जागीरदार मारो और इतने ही महल व हवेलियाँ जला दो, क्योंकि
यदि असफल रहे तो भी इसका कुछ मतलब होगा। ड्यूमा (रूसी संसद) की
स्थापना हुई। अब लेनिन ने ड्यूमा में हिस्सा लेने की वकालत की। यह 1907 की
बात है, जबकि 1906 में वे पहली ड्यूमा में हिस्सा लेने के ख़िलाफ़ थे, बावजूद
इसके कि उस ड्यूमा में काम करने का अवसर अधिक था और इस ड्यूमा के
अधिकार अत्यन्त सीमित कर दिये गये थे। यह फ़ैसला बदली हुई परिस्थितियों के
कारण था। अब प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ बहुत बढ़ रही थीं और लेनिन ड्यूमा के
मंच को समाजवादी विचारों पर बहस के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे।
पुनः 1917 की क्रान्ति के बाद, जब बोल्शेविक ब्रेश्त-लितोव्स्क सन्धि पर
हस्ताक्षर करने के लिए विवश हुए तो लेनिन के सिवाय बाक़ी सभी इसका विरोध
कर रहे थे। लेकिन लेनिन ने कहा, “शान्ति, शान्ति और पुनः शान्ति! किसी भी
क़ीमत पर शान्ति होनी चाहिए।” जब कुछ बोल्शेविक-विरोधियों ने इस सन्धि के
लिए लेनिन की निन्दा की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि “बोल्शेविक जर्मन हमले का
सामना करने की सामर्थ्य नहीं रखते, इसीलिए सम्पूर्ण तबाही की जगह सन्धि को
प्राथमिकता दी गयी है।”
जो बात मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ वह यह है कि समझौता एक ऐसा ज़रूरी
हथियार है, जिसे संघर्ष के विकास के साथ ही साथ इस्तेमाल करना ज़रूरी बन
जाता है, लेकिन जिस चीज़ का हमेशा ध्यान रहना चाहिए वह है आन्दोलन का
उद्देश्य। जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं, उनके बारे में, हमें
पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए। इस बात से अपने आन्दोलन की उपलब्धियों,
सफलताओं व असफलताओं को आँकने में हमें सहायता मिलती है और अगला
कार्यक्रम बनाने व तय करने में भी। तिलक की नीति – उनके उद्देश्यों के बावजूद
– यानी उनके दाँव-पेंच बहुत अच्छे थे। आप अपने शत्रु से सोलह आना पाने के
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 479
लिए लड़ रहे हैं। आपको एक आना मिलता है, उसे जेब में डालिये और बाक़ी
के लिए संघर्ष जारी रखिये। नरम दल के लोगों में जिस चीज़ की कमी हम देखते
हैं वह उनके आदर्श की है। वे इकन्नी के लिए लड़ते हैं और इसलिए उन्हें मिल
ही कुछ नहीं सकता। क्रान्तिकारियों को यह बात हमेशा अपने मन में रखनी चाहिए
कि वे आमूल परिवर्तन लाने वाली क्रान्ति के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें ताक़त की
बागडोर पूरी तरह अपने हाथों में लेनी है। समझौतों से इसीलिए डर महसूस होता
है, क्योंकि प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ समझौते के बाद क्रान्तिकारी शक्तियों को
समाप्त करवाने की कोशिशें करती हैं लेकिन समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नेता
आन्दोलन को ऐसे गड्ढों में गिरने से बचा सकते हैं। हमें ऐसे समय और ऐसे मोड़
पर वास्तविक मुद्दों और विशेषतः उद्देश्यों-सम्बन्धी कुछ गड़बड़ नहीं होने देनी
चाहिए। इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी ने वास्तविक संघर्ष से धोखा किया है और वे
(उसके नेता) सिर्फ़ कुटिल साम्राज्यवादी बनकर रह गये हैं।
मेरे विचार में इन रँगे हुए साम्राज्यवादी लेबर नेताओं से कट्टर प्रतिक्रियावादी
हमारे लिए बेहतर हैं। दाँव-पेंचों और रणनीति-सम्बन्धी लेनिन के जीवन और लेखन
पर हमें विचार करना चाहिए। समझौते के मामले पर ‘वामपन्थी कम्युनिज़्म’ में
उनके स्पष्ट विचार मिलते हैं।
कांग्रेस का उद्देश्य क्या है?
मैंने कहा है कि वर्तमान आन्दोलन किसी न किसी समझौते या पूर्ण असफलता में
समाप्त होगा।
मैंने यह इसलिए कहा है क्योंकि मेरी राय में इस समय वास्तविक क्रान्तिकारी
ताक़तें मैदान में नहीं हैं। यह संघर्ष मध्यमवर्गीय दुकानदारों और चन्द पूँजीपतियों के
बलबूते किया जा रहा है। ये दोनों वर्ग, विशेषतः पूँजीपति, अपनी सम्पत्ति या
मिल्कियत ख़तरे में डालने की जुर्रत नहीं कर सकते। वास्तविक क्रान्तिकारी सेनाएँ
तो गाँवों और कारख़ानों में हैं – किसान और मज़दूर। लेकिन हमारे ‘बुर्जुआ’ नेताओं
में उन्हें साथ लेने की हिम्मत नहीं है, न ही वे ऐसी हिम्मत कर सकते हैं। ये सोये
हुए सिंह यदि एक बार गहरी नींद से जग गये तो वे हमारे नेताओं की लक्ष्य-पूर्ति
के बाद ही रुकने वाले नहीं हैं। 1920 में अहमदाबाद के मज़दूरों के साथ अपने
प्रथम अनुभव के बाद महात्मा गाँधी ने कहा था, “हमें मज़दूरों के साथ साँठ-गाँठ
नहीं करना चाहिए। कारख़ानों के सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक हितों के लिए
इस्तेमाल करना ख़तरनाक है।” (मई, 1921 के ‘दि टाइम्स’) से। तब से उन्होंने
इस वर्ग को साथ लेने का कष्ट नहीं उठाया। यही हाल किसानों के साथ है। 1922
का बारदोली-सत्याग्रह पूरी तरह यह स्पष्ट करता है कि नेताओं ने जब किसान वर्ग
के उस विद्रोह को देखा, जिसे न सिर्फ़ विदेशी राष्ट्र के प्रभुत्व से ही मुक्ति हासिल
480 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
करनी थी वरन देशी ज़मींदारों की ज़ंजीरें भी तोड़ देनी थीं, तो कितना ख़तरा
महसूस किया था।
यही कारण है कि हमारे नेता किसानों के आगे झुकने की जगह अंग्रेज़ों के
आगे घुटने टेकना पसन्द करते हैं। पण्डित जवाहरलाल को छोड़ दें तो क्या आप
किसी भी नेता का नाम ले सकते हैं, जिसने मज़दूरों या किसानों को संगठित करने
की कोशिश की हो। नहीं, वे ख़तरा मोल नहीं लेंगे। यही तो उनमें कमी है, इसीलिए
मैं कहता हूँ कि वे सम्पूर्ण आज़ादी नहीं चाहते। आर्थिक और प्रशासकीय दबाव
डालकर वे चन्द और सुधार, यानी भारतीय पूँजीपतियों के लिए चन्द और रियायतें
हासिल करना चाहेंगे। इसीलिए मैं कहता हूँ कि इस आन्दोलन का बेड़ा तो डूबेगा
ही – शायद किसी न किसी समझौते या ऐसी किसी चीज़ के बिना ही। नवयुवक
कार्यकर्ता, जो पूरी तनदेही से ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' के नारे लगाते हैं, स्वयं पूरी
तरह संगठित नहीं हैं और अपना आन्दोलन आगे ले जाने की ताक़त नहीं रखते हैं।
वास्तव में पण्डित मोतीलाल नेहरू के सिवाय हमारे बड़े नेता कोई ज़िम्मेदारी नहीं
लेना चाहते। यही कारण है कि वे हर बार गाँधी के आगे बिना शर्त घुटने टेक देते
हैं। अलग राय होने पर भी वे पूरे ज़ोर से विरोध नहीं करते और गाँधी के कारण
प्रस्ताव पास कर दिये जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में, क्रान्ति के प्रति पूरी संजीदगी
रखने वाले नौजवान कार्यकर्ताओं को मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि कठिन समय
आ रहा है, वे चौकस रहें, हिम्मत न हारें और उलझनों में न फँसें। ‘महान गाँधी'
के दो संघर्षों के अनुभवों के बाद हम आज की परिस्थिति व भविष्य के कार्यक्रम
के बारे में स्पष्ट राय बना सकते हैं।
अब मैं बिल्कुल सादे ढंग से यह केस बताता हूँ। आप ‘इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद'
का नारा लगाते हो। मैं यह मानकर चलता हूँ कि आप इसका मतलब समझते हो।
असेम्बली बम केस में दी गयी हमारी परिभाषा के अनुसार इन्क़लाब का अर्थ
मौजूदा सामाजिक ढाँचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना है। इस लक्ष्य
के लिए हमारा पहला क़दम ताक़त हासिल करना है। वास्तव में 'राज्य', यानी
सरकारी मशीनरी, शासक वर्ग के हाथों में अपने हितों की रक्षा करने और उन्हें आगे
बढ़ाने का यन्त्र ही है। हम इस यन्त्र को छीनकर अपने आदर्शों की पूर्ति के लिए
इस्तेमाल करना चाहते हैं। हमारा आदर्श है – नये ढंग से सामाजिक संरचना, यानी
मार्क्सवादी ढंग से। इसी लक्ष्य के लिए हम सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करना
चाहते हैं। जनता को लगातार शिक्षा देते रहना है ताकि अपने सामाजिक कार्यक्रम
की पूर्ति के लिए अनुकूल व सुविधाजनक वातावरण बनाया जा सके। हम उन्हें
संघर्षों के दौरान ही अच्छा प्रशिक्षण और शिक्षा दे सकते हैं।
इन बातों के बारे में स्पष्टता, यानी हमारे फ़ौरी और अन्तिम लक्ष्य को स्पष्टता
से समझने के बाद हम आज की परिस्थिति का विश्लेषण कर सकते हैं। किसी
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 481
भी स्थिति का विश्लेषण करते समय हमें हमेशा बिल्कुल बेझिझक, बेलाग व
व्यावहारिक होना चाहिए।
हम जानते हैं कि जब भारत सरकार में भारतीयों की हिस्सेदारी को लेकर
हल्ला हुआ था तो मिण्टो-मार्ले सुधार लागू हुए थे, जिनके द्वारा केवल सलाह देने
का अधिकार रखने वाली वायसराय-परिषद बनायी गयी थी।
विश्वयुद्ध के दौरान जब भारतीय सहायता की अत्यन्त आवश्यकता थी तो
स्वायत्त शासन वाली सरकार का वायदा किया गया और मौजूदा सुधार लागू किये
गये। असेम्बली को कुछ सीमित क़ानून बनाने की ताक़त दी गयी, लेकिन सबकुछ
वायसराय की खुशी पर निर्भर है। अब तीसरी स्टेज है।
अब सुधारों-सम्बन्धी विचार हो रहा है और निकट भविष्य में ये लागू होंगे।
अब नौजवान इनकी परीक्षा कैसे कर सकते हैं? यह एक सवाल है। मैं नहीं जानता
कि कांग्रेसी नेता कैसे इनकी परख करेंगे? लेकिन हम क्रान्तिकारी इन्हें निम्नलिखित
कसौटी पर परखेंगे –
- किस सीमा तक शासन की ज़िम्मेदारी भारतीयों को सौंपी जाती है?
- शासन चलाने के लिए किस तरह की सरकार बनायी जाती है और सामान्य जनता
को इसमें हिस्सा लेने का कहाँ तक अवसर मिलता है? - भविष्य में क्या सम्भावनाएँ हो सकती हैं और इन उपलब्धियों को किस प्रकार
बचाया जा सकता है?
इसके लिए शायद कुछ और स्पष्टीकरण की ज़रूरत हो। पहली बात यह कि
हमारी जनता के प्रतिनिधियों को कार्यपालिका पर कितना अधिकार और ज़िम्मेदारी
हासिल होती है। अब तक कार्यपालिका को लेजिस्लेटिव असेम्बली के सामने
उत्तरदायी नहीं बनाया गया है। वायसराय के पास वोटों की ताक़त है, जिससे चुने
हुए प्रतिनिधियों की सारी कोशिशें बेअसर और ठप्प कर दी जाती हैं।
हम स्वराज्य पार्टी के शुक्रगुज़ार हैं जिनकी कोशिशों से वायसराय ने अपनी इस
ताक़त का बड़ी बेशर्मी से बार-बार इस्तेमाल किया और राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के
मर्यादा भरे निर्णय पाँव तले कुचल दिये। यह बात पूरी तरह स्पष्ट है और इस पर
और बहस की ज़रूरत नहीं है।
आइये, सबसे पहले कार्यकारिणी की स्थापना के ढंग पर विचार करें? क्या
कार्यकारिणी को असेम्बली के चुने हुए सदस्य चुनते हैं या पहले की ही तरह ऊपर
से थोपी जायेगी? क्या यह असेम्बली के आगे उत्तरदायी होगी या पहले की ही तरह
असेम्बली का अपमान करेगी?
जहाँ तक दूसरी बात का सम्बन्ध है, उसे हम वयस्क मताधिकार की
सम्भावना से देख सकते हैं। सम्पत्ति होने की धारा को पूरी तरह समाप्त कर
व्यापक मताधिकार दिये जाने चाहिए। हर वयस्क स्त्री-पुरुष को वोट का
482 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अधिकार मिलना चाहिए। अब तो सिर्फ़ यह देख सकते हैं कि मताधिकार किस
सीमा तक दिये जाते हैं।
जहाँ तक व्यवस्था का प्रश्न है, अभी दो सभाओं वाली सरकार है। मेरे ख़याल
में उच्च सभा बुर्जुआ भ्रमजाल या बहकावे के अतिरिक्त कुछ नहीं। मेरी समझ से
जहाँ तक उम्मीद की जा सके, एक सभा वाली सरकार अच्छी है।
यहाँ मैं प्रान्तीय स्वायत्तता के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। जो कुछ मैंने सुना
है, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि ऊपर से थोपा हुआ गवर्नर, जिसके
पास असेम्बली से ऊपर विशेष अधिकार होंगे, तानाशाह से कम सिद्ध नहीं होगा।
हम इसे प्रान्तीय स्वायत्तता न कहकर प्रान्तीय अत्याचार कहें। राज्य की संस्थाओं
का यह अजीब लोकतन्त्रीकरण है।
तीसरी बात तो बिल्कुल स्पष्ट है। पिछले दो साल से अंग्रेज़ राजनीतिज्ञ उस
वायदे को मिटाने में लगे हैं, जिसे मोण्टेग्यू ने यह कहकर रद्द कर दिया था कि
जब तक अंग्रेज़ी ख़ज़ाने में दम है, प्रत्येक दस वर्ष पर और सुधार किये जाते रहेंगे।
हम देख सकते हैं कि उन्होंने भविष्य के लिए क्या फ़ैसला किया है। मैं यह
बात स्पष्ट कर दूँ कि हम इन बातों का विश्लेषण इसलिए नहीं कर रहे कि
उपलब्धियों पर जश्न मनाये जायें, वरन इसलिए कि जनता में जागृति लायी जा सके
और उन्हें आने वाले संघर्षों के लिए तैयार किया जा सके। हमारे लिए समझौता घुटने
टेकना नहीं है, बल्कि एक क़दम बढ़ना और फिर कुछ आराम करना है।
लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि समझौता इससे
अधिक कुछ और है भी नहीं। यह अन्तिम लक्ष्य और अन्तिम विश्राम की जगह
नहीं है।
वर्तमान परिस्थिति पर कुछ हद तक विचार करने के बाद भविष्य के कार्यक्रम और
कार्यनीति पर भी विचार कर लिया जाये।
जैसाकि मैंने पहले भी कहा है कि किसी क्रान्तिकारी पार्टी के लिए
निश्चित कार्यक्रम होना बहुत ज़रूरी है। आपको यह पता होना चाहिए कि क्रान्ति
का मतलब गतिविधि है। इसका मतलब संगठित व क्रमबद्ध काम द्वारा
सोची-समझी तब्दीली लाना है और यह तोड़-फोड़ – असंगठित, एकदम या
स्वतः परिवर्तन – के विरुद्ध है। कार्यक्रम बनाने के लिए अनिवार्य रूप से इन
बातों के अध्ययन की ज़रूरत है –
- मंज़िल (लक्ष्य) या उद्देश्य।
- आधार, जहाँ से शुरू करना है, यानी वर्तमान परिस्थिति।
- कार्यरूप, यानी साधन व दाँव-पेंच।
जब तक इन तत्त्वों के सम्बन्ध में कुछ स्पष्ट संकल्प नहीं है, तब तक
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 483
कार्यक्रम-सम्बन्धी कोई विचार सम्भव नहीं।
वर्तमान परिस्थिति पर हम कुछ हद तक विचार कर चुके हैं, लक्ष्य-सम्बन्धी
भी कुछ चर्चा हुई है। हम समाजवादी क्रान्ति चाहते हैं, जिसके लिए बुनियादी
ज़रूरत राजनीतिक क्रान्ति की है। यही है जो हम चाहते हैं। राजनीतिक क्रान्ति का
अर्थ राजसत्ता (यानी मोटे तौर पर ताक़त) का अंग्रेज़ी हाथों से भारतीय हाथों में
आना है और वह भी उन भारतीयों के हाथों में, जिनका अन्तिम लक्ष्य हमारे लक्ष्य
से मिलता हो। और स्पष्टता से कहें तो – राजसत्ता का सामान्य जनता की कोशिश
से क्रान्तिकारी पार्टी के हाथों में आना। इसके बाद पूरी संजीदगी से पूरे समाज को
समाजवादी दिशा में ले जाने के लिए जुट जाना होगा। यदि क्रान्ति से आपका यह
अर्थ नहीं है तो महाशय, मेहरबानी करें और 'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' के नारे लगाने
बन्द कर दें। कम से कम हमारे लिए 'क्रान्ति' शब्द में बहुत ऊँचे विचार निहित
हैं और इसका प्रयोग बिना संजीदगी के नहीं करना चाहिए, नहीं तो इसका दुरुपयोग
होगा। लेकिन यदि आप कहते हैं कि आप राष्ट्रीय क्रान्ति चाहते हैं जिसका लक्ष्य
भारतीय गणतन्त्र की स्थापना है तो मेरा प्रश्न यह है कि उसके लिए आप, क्रान्ति
में सहायक होने के लिए, किन शक्तियों पर निर्भर कर रहे हैं? क्रान्ति राष्ट्रीय हो
या समाजवादी, जिन शक्तियों पर हम निर्भर हो सकते हैं वे हैं किसान और मज़दूर।
कांग्रेसी नेताओं में इन्हें संगठित करने की हिम्मत नहीं है, इस आन्दोलन में यह
आपने स्पष्ट देख लिया है। किसी और से अधिक उन्हें इस बात का अहसास है
कि इन शक्तियों के बिना वे विवश हैं। जब उन्होंने सम्पूर्ण आज़ादी का प्रस्ताव पास
किया तो इसका अर्थ क्रान्ति ही था, पर इनका (कांग्रेस का) मतलब यह नहीं था।
इसे नौजवान कार्यकर्ताओं के दबाव में पास किया गया था और इसका इस्तेमाल
वे धमकी के रूप में करना चाहते थे, ताकि अपना मनचाहा डोमिनियन स्टेटस
हासिल कर सकें। आप कांग्रेस के पिछले तीनों अधिवेशनों के प्रस्ताव पढ़कर इस
सम्बन्ध में ठीक राय बना सकते हैं। मेरा इशारा मद्रास, कलकत्ता व लाहौर
अधिवेशनों की ओर है। कलकत्ता में डोमिनियन स्टेटस की माँग का प्रस्ताव पास
किया गया। 12 महीने के भीतर इस माँग को स्वीकार करने के लिए कहा गया
और यदि ऐसा न किया गया तो कांग्रेस मजबूर होकर पूर्ण आज़ादी को अपना उद्देश्य
बना लेगी। पूरी संजीदगी से वे 31 दिसम्बर, 1929 की आधी रात तक इस तोहफ़े
को प्राप्त करने का इन्तज़ार करते रहे और तब उन्होंने पूर्ण आज़ादी का प्रस्ताव मानने
के लिए स्वयं को 'वचनबद्ध' पाया, जोकि वे चाहते नहीं थे। और तब भी महात्मा
जी ने यह बात छिपाकर नहीं रखी कि बातचीत के दरवाज़े खुले हैं। यह था इसका
वास्तविक आशय। बिल्कुल शुरू से ही वे जानते थे कि उनके आन्दोलन का अन्त
किसी न किसी तरह के समझौते में होगा। इस बेदिली से हम नफ़रत करते हैं न
कि संघर्ष के किसी मसले पर समझौते से।
484 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हम इस बात पर विचार कर रहे थे कि क्रान्ति किन-किन ताक़तों पर निर्भर
है? लेकिन यदि आप सोचते हैं कि किसानों और मज़दूरों को सक्रिय हिस्सेदारी
के लिए आप मना लेंगे तो मैं बताना चाहता हूँ कि वे किसी प्रकार की भावुक
बातों से बेवकूफ़ नहीं बनाये जा सकते। वे साफ़-साफ़ पूछेंगे कि उन्हें आपकी
क्रान्ति से क्या लाभ होगा, वह क्रान्ति जिसके लिए आप उनसे बलिदान की माँग
कर रहे हैं। भारत सरकार का प्रमुख लॉर्ड रीडिंग की जगह यदि सर पुरुषोत्तम
दास ठाकुर दास हो तो उन्हें (जनता को) इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? एक
किसान को इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा, यदि लॉर्ड इरविन की जगह सर तेज़ बहादुर
सप्रू आ जायें। राष्ट्रीय भावनाओं की अपील बिल्कुल बेकार है। उसे आप अपने
काम के लिए 'इस्तेमाल' नहीं कर सकते। आपको गम्भीरता से काम लेना होगा
और उन्हें समझाना होगा कि क्रान्ति उनके हित में है और उनकी अपनी है।
सर्वहारा श्रमिक वर्ग की क्रान्ति, सर्वहारा के लिए।
जब आप अपने लक्ष्य के बारे में स्पष्ट अवधारणा बना लेंगे तो ऐसे उद्देश्य की
पूर्ति के लिए आप अपनी शक्ति सँजोने में जुट जायेंगे। अब दो अलग-अलग पड़ावों
से गुज़रना होगा – पहला तैयारी का पड़ाव, दूसरा उसे कार्यरूप देने का।
जब यह वर्तमान आन्दोलन खत्म होगा तो आप अनेक ईमानदार व गम्भीर
क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को निराश व उचाट पायेंगे। लेकिन आपको घबराने की
ज़रूरत नहीं है। भावुकता एक ओर रखो। वास्तविकता का सामना करने के लिए
तैयार होओ। क्रान्ति करना बहुत कठिन काम है। यह किसी एक आदमी की ताक़त
के वश की बात नहीं है और न ही यह किसी निश्चित तारीख़ को आ सकती है।
यह तो विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से पैदा होती है और एक संगठित
पार्टी को ऐसे अवसर को सँभालना होता है और जनता को इसके लिए तैयार करना
होता है। क्रान्ति के दुस्साध्य कार्य के लिए सभी शक्तियों को संगठित करना होता
है। इस सबके लिए क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को अनेक कुर्बानियाँ देनी होती हैं।
यहाँ मैं यह स्पष्ट कह दूँ कि यदि आप व्यापारी हैं या सुस्थिर दुनियादार या
पारिवारिक व्यक्ति हैं तो महाशय! इस आग से न खेलें। एक नेता के रूप में आप
पार्टी के किसी काम के नहीं हैं। पहले ही हमारे पास ऐसे बहुत से नेता हैं जो शाम
के समय भाषण देने के लिए कुछ वक़्त ज़रूर निकाल लेते हैं। ये नेता हमारे किसी
काम के नहीं हैं। हम तो लेनिन के अत्यन्त प्रिय शब्द 'पेशेवर क्रान्तिकारी' का
प्रयोग करेंगे। पूरा समय देने वाले कार्यकर्ता, क्रान्ति के सिवाय जीवन में जिनकी
और कोई ख़्वाहिश ही न हो। जितने अधिक ऐसे कार्यकर्ता पार्टी में संगठित होंगे,
उतने ही सफलता के अवसर अधिक होंगे।
पार्टी को ठीक ढंग से आगे बढ़ाने के लिए जिस बात की सबसे अधिक
ज़रूरत है वह यह है कि ऐसे कार्यकर्ता स्पष्ट विचार, प्रत्यक्ष समझदारी,
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 485
पहलक़दमी की योग्यता और तुरन्त निर्णय कर सकने की शक्ति रखते हों। पार्टी
में फौलादी अनुशासन होगा और यह ज़रूरी नहीं कि पार्टी भूमिगत रहकर ही काम
करे, बल्कि इसके विपरीत खुले रूप में काम कर सकती है, यद्यपि स्वेच्छा से
जेल जाने की नीति पूरी तरह छोड़ दी जानी चाहिए। इस तरह बहुत से कार्यकर्ताओं
को गुप्त रूप से काम करते हुए जीवन बिताने की भी ज़रूरत पड़ सकती है,
लेकिन उन्हें उसी तरह पूरे उत्साह से काम करते रहना चाहिए और यही है वह
ग्रुप जिससे अवसर सँभाल सकने वाले नेता तैयार होंगे।
पार्टी को कार्यकर्ताओं की ज़रूरत होगी, जिन्हें नौजवानों के आन्दोलनों से भरती
किया जा सकता है। इसीलिए नवयुवकों के आन्दोलन सबसे पहली मंज़िल हैं, जहाँ
से हमारा आन्दोलन शुरू होगा। युवक आन्दोलन को अध्ययन-केन्द्र (स्टडी
सर्किल) खोलने चाहिए। लीफ़लेट, पैम्फ़लेट, पुस्तकें, मैगज़ीन छापने चाहिए।
क्लासों में लेक्चर होने चाहिए। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए भरती करने और
प्रशिक्षण देने की यह सबसे अच्छी जगह होगी।
उन नौजवानों को पार्टी में ले लेना चाहिए, जिनके विचार विकसित हो चुके
हैं और वे अपना जीवन इस काम में लगाने के लिए तैयार हैं। — पार्टी कार्यकर्ता
नवयुवक आन्दोलन के काम को दिशा देंगे। पार्टी अपना काम प्रचार से शुरू करेगी।
यह अत्यन्त आवश्यक है। ग़दर पार्टी (1914-15) के असफल होने का मुख्य
कारण था — जनता की अज्ञानता, लगावहीनता और कई बार विरोध। इसके
अतिरिक्त किसानों और मज़दूरों का सक्रिय समर्थन हासिल करने के लिए भी प्रचार
ज़रूरी है। पार्टी का नाम कम्युनिस्ट पार्टी हो। ठोस अनुशासन वाली राजनीतिक
कार्यकर्ताओं की यह पार्टी बाक़ी सभी आन्दोलन चलायेगी। इसे मज़दूरों व किसानों
की तथा अन्य पार्टियों का संचालन भी करना होगा और लेबर यूनियन कांग्रेस तथा
इस तरह की अन्य राजनीतिक संस्थाओं पर प्रभावी होने की कोशिश भी पार्टी
करेगी। पार्टी एक बड़ा प्रकाशन-अभियान चलायेगी जिससे राष्ट्रीय चेतना ही नहीं,
वर्ग चेतना भी पैदा होगी। समाजवादी सिद्धान्तों के सम्बन्ध में जनता को सचेत बनाने
के लिए सभी समस्याओं की विषयवस्तु प्रत्येक व्यक्ति की समझ में आनी चाहिए
और ऐसे प्रकाशनों को बड़े पैमाने पर वितरित किया जाना चाहिए। लेखन सादा और
स्पष्ट हो।
मज़दूर आन्दोलन में ऐसे व्यक्ति हैं जो मज़दूरों और किसानों की आर्थिक और
राजनीतिक स्वतन्त्रता के बारे में बड़े अजीब विचार रखते हैं। ये लोग उत्तेजना फैलाने
वाले हैं या बौखलाये हुए हैं। ऐसे विचार या तो ऊलजलूल हैं या कल्पनाहीन। हमारा
मतलब जनता की आर्थिक स्वतन्त्रता से है और इसी के लिए हम राजनीतिक
ताक़त हासिल करना चाहते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि शुरू में छोटी-मोटी
आर्थिक माँगों और इन वर्गों के विशेष अधिकारों के लिए हमें लड़ना होगा। यही
486 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
संघर्ष उन्हें राजनीतिक ताक़त हासिल करने के अन्तिम संघर्ष के लिए सचेत व
तैयार करेगा।
इसके अतिरिक्त सैनिक विभाग भी संगठित करना होगा। यह बहुत महत्त्वपूर्ण
है। कई बार इसकी बुरी तरह ज़रूरत होती है। उस समय शुरू करके आप ऐसा
ग्रुप तैयार नहीं कर सकते जिसके पास काम करने की पूरी ताक़त हो। शायद इस
विषय को बारीक़ी से समझाना ज़रूरी है। इस विषय पर मेरे विचारों को ग़लत रंग
दिये जाने की बहुत अधिक सम्भावना है। ऊपरी तौर पर मैंने एक आतंकवादी की
तरह काम किया है, लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं एक क्रान्तिकारी हूँ, जिसके
दीर्घकालिक कार्यक्रम-सम्बन्धी ठोस व विशिष्ट विचार हैं जिन पर यहाँ विचार
किया जा रहा है। 'शस्त्रों के साथी' मेरे कुछ साथी मुझे रामप्रसाद बिस्मिल की
तरह इस बात के लिए दोषी ठहरायेंगे कि फाँसी की कोठरी में रहकर मेरे भीतर
कुछ प्रतिक्रिया पैदा हुई है। इसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है। मेरे विचार वही हैं, मुझमें
वही दृढ़ता है और वही जोश व स्पिरिट मुझमें यहाँ है, जो बाहर थी – नहीं, उससे
कुछ अधिक है। इसलिए अपने पाठकों को मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि मेरे शब्दों
को वे पूरे ध्यान से पढ़ें।
उन्हें पंक्तियों के बीच कुछ भी नहीं देखना चाहिए। मैं अपनी पूरी ताक़त से
यह कहना चाहता हूँ कि क्रान्तिकारी जीवन के शुरू के चन्द दिनों के सिवाय न
तो मैं आतंकवादी हूँ और न ही था; और मुझे पूरा यक़ीन है कि इस तरह के तरीक़ों
से हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। हिन्दुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन पार्टी
के इतिहास से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। हमारे सभी काम इसी दिशा में थे,
यानी बड़े राष्ट्रीय आन्दोलन के सैनिक विभाग की जगह अपनी पहचान करवाना।
यदि किसी ने मुझे ग़लत समझ लिया है तो वे सुधार कर लें। मेरा मतलब यह
कदापि नहीं है कि बम व पिस्तौल बेकार हैं, वरन इसके विपरीत, ये लाभदायक
हैं। लेकिन मेरा मतलब यह ज़रूर है कि केवल बम फेंकना न सिर्फ़ बेकार, बल्कि
नुक़सानदायक है। पार्टी के सैनिक विभाग को हमेशा तैयार रहना चाहिए, ताकि
संकट के समय काम आ सके। इसे पार्टी के राजनीतिक काम में सहायक के रूप
में होना चाहिए। यह अपनेआप स्वतन्त्र काम न करे।
जैसे ऊपर इन पंक्तियों में बताया गया है, पार्टी अपने काम को आगे बढ़ाये।
समय-समय पर मीटिंगें और सम्मेलन बुलाकर अपने कार्यकर्ताओं को सभी
विषयों के बारे में सूचनाएँ और सजगता देते रहना चाहिए। यदि आप इस तरह से
काम शुरू करते हैं तो आपको काफ़ी गम्भीरता से काम लेना होगा। इस काम को
पूरा होने में कम से कम बीस साल लगेंगे। क्रान्ति-सम्बन्धी यौवन काल के दस
साल में पूरे होने के सपनों को एक ओर रख दें, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी के
(एक साल में स्वराज के) सपने को परे रख दिया था। न तो इसके लिए भावुक
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 487
होने की ज़रूरत है और न ही यह सरल है। ज़रूरत है निरन्तर संघर्ष करने, कष्ट
सहने और कुर्बानी भरा जीवन बिताने की। अपना व्यक्तिवाद पहले ख़त्म करो।
व्यक्तिगत सुख के सपने उतारकर एक ओर रख दो और फिर काम शुरू करो।
इंच-इंच कर आप आगे बढ़ेंगे। इसके लिए हिम्मत, दृढ़ता और बहुत मज़बूत इरादे
की ज़रूरत है। कितने ही भारी कष्ट कठिनाइयाँ क्यों न हों, आपकी हिम्मत न
काँपे। कोई भी पराजय या धोखा आपका दिल न तोड़ सके। कितने भी कष्ट
क्यों न आयें, आपका क्रान्तिकारी जोश ठण्डा न पड़े। कष्ट सहने और कुर्बानी
करने के सिद्धान्त से आप सफलता हासिल करेंगे और ये व्यक्तिगत सफलताएँ
क्रान्ति की अमूल्य सम्पत्ति होंगी।
इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद!
2 फ़रवरी, 1931
हमारे लिए सुनहरा अवसर
भारत की स्वतन्त्रता अब शायद दूर का स्वप्न नहीं रहा। घटनाएँ बड़ी तेज़ी से घट
रही हैं इसलिए स्वतन्त्रता अब हमारी आशाओं से भी जल्द ही एक सच्चाई बन
जायेगी। ब्रिटिश साम्राज्य बुरी तरह लताड़ा हुआ है। जर्मनी को मुँह की खानी पड़
रही है, फ्रांस थर-थर काँप रहा है और अमेरिका हिला हुआ है और इन सबकी
कठिनाइयाँ हमारे लिए सुनहरा अवसर है। प्रत्येक चीज़ उस महान भविष्यवाणी की
ओर संकेत कर रही है, जिसके अनुसार समाज का पूँजीवादी ढाँचा नष्ट होना अटल
है। कूटनीतिज्ञ लोग स्वयं को बचाने के लिए प्रयत्नशील हो सकते हैं और पूँजीवादी
षड्यन्त्र से 'क्रान्ति के बाघ' को अपने घर से दूर रखने की कोशिशें कर सकते
हैं। अंग्रेज़ों का बजट सन्तुलित हो सकता है और मृत्यु के मुँह में पड़े पूँजीवाद को
कुछ पलों की राहत मिल सकती है। 'डालर राजा' चाहे अपना ताज सँभाल लें तो
भी व्यापक मन्दी यदि जारी रही और जिसका जारी रहना लाज़िमी है, तो बेरोज़गारों
की फ़ौज तेज़ी से बढ़ेगी और यह बढ़ भी रही है, क्योंकि पूँजीवादी उत्पादन-
व्यवस्था ही ऐसी है। यह चक्कर पूँजीवादी व्यवस्था को पटरी से उतार देगा। बस,
बात कुछ महीनों की ही है। इसीलिए क्रान्ति अब भविष्यवाणी या सम्भावना नहीं,
वरन 'व्यावहारिक राजनीति' है जिसे सोची-समझी योजना और कठोर अमल से
सफल बनाया जा सकता है। इसके विभिन्न पहलुओं और तात्पर्य, इसके तरीक़ों और
उद्देश्यों-सम्बन्धी कोई विचारधारात्मक उलझन नहीं होनी चाहिए।
गाँधीवाद
कांग्रेस आन्दोलन की सम्भावनाओं, पराजयों और उपलब्धियों के बारे में हमें किसी
प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। आज चल रहे इस आन्दोलन को गाँधीवाद कहना
488 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
ही उचित है। यह दावे के साथ आज़ादी के लिए स्टैण्ड नहीं लेता, बल्कि सत्ता
में 'हिस्सेदारी' के पक्ष में है। 'पूर्ण स्वतन्त्रता' के अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं।
इसका तरीक़ा अनूठा है, लेकिन बेचारे लोगों के किसी काम का नहीं है। साबरमती
के सन्त को गाँधीवाद कोई स्थायी शिष्य नहीं दे पायेगा। यह एक बीच की पार्टी
– यानी लिबरल-रैडिकल मेल-जोल का काम कर रही है और करती भी रही
है। मौके की असलियत से टकराने में इसे शर्म आती है। इसे चलाने वाले देश के
ऐसे ही लोग हैं जिनके हित इससे बँधे हुए हैं और वे अपने हितों के लिए बुर्जुआ
हठ से चिपके हुए हैं। यदि क्रान्तिकारी रक्त से इसे गर्मजोशी न दी गयी तो इसका
ठण्डा होना लाज़िमी है। इसे इसी के दोस्तों से बचाने की ज़रूरत है।
आतंकवाद
आइये, हम इस कठिन सवाल के बारे में स्पष्ट हों। बम का रास्ता 1905 से चला
आ रहा है और क्रान्तिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है। अभी यह महसूस
नहीं किया गया कि इसका उपयोग व दुरुपयोग क्या है। आतंकवाद हमारे समाज
में क्रान्तिकारी चिन्तन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है; या एक पछतावा।
इसी तरह ये अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ
था। इसने राजनीति को आमूल बदल दिया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को
चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलन्त रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों
के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई और शक्ति को ज़ाहिर करने का अवसर
मिला। लेकिन यह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद का)
इतिहास असफलता का इतिहास है – फ्रांस, रूस, जर्मनी में बाल्कन देशों, स्पेन
में – हर जगह इसकी यही कहानी है। इसकी पराजय के बीज इसके भीतर ही
होते हैं। साम्राज्यवादियों को अच्छी तरह पता है कि 30 करोड़ लोगों पर शासन के
लिए प्रति वर्ष 30 व्यक्तियों की बलि दी जा सकती है। शासन करने का स्वाद
बमों या पिस्तौलों से किरकिरा तो किया जा सकता है, लेकिन शोषण के
व्यावहारिक लाभ उसे बनाये रखने पर विवश करेंगे। भले ही हमारी उम्मीद के
अनुसार हथियार आसानी से मिल जायें और यदि हम पूरे ज़ोर से लड़ें, जैसाकि
इतिहास में पहले कभी न घटा हो, तो भी आतंकवाद अधिक से अधिक
साम्राज्यवादी ताक़त को समझौते के लिए ही मजबूर कर सकता है। ऐसे समझौते,
हमारे उद्देश्य – पूर्ण आज़ादी – से हमेशा ही कहीं दूर रहेंगे। इस प्रकार आतंकवाद,
एक समझौता, सुधारों की एक किश्त निचोड़कर निकाल सकता है और इसे ही
हासिल करने के लिए गाँधीवाद ज़ोर लगा रहा है। वह चाहता है कि दिल्ली का
शासन गोरे हाथों से भूरे हाथों में आ जाये। ये लोगों के जीवन से दूर हैं और इनके
गद्दी पर बैठते ही ज़ालिम बन जाने की बहुत सम्भावनाएँ हैं। आयरिश उदाहरण यहाँ
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 489