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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 788 में से

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पृष्ठ 486

लिए लड़ रहे हैं। आपको एक आना मिलता है, उसे जेब में डालिये और बाक़ी
के लिए संघर्ष जारी रखिये। नरम दल के लोगों में जिस चीज़ की कमी हम देखते
हैं वह उनके आदर्श की है। वे इकन्नी के लिए लड़ते हैं और इसलिए उन्हें मिल
ही कुछ नहीं सकता। क्रान्तिकारियों को यह बात हमेशा अपने मन में रखनी चाहिए
कि वे आमूल परिवर्तन लाने वाली क्रान्ति के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें ताक़त की
बागडोर पूरी तरह अपने हाथों में लेनी है। समझौतों से इसीलिए डर महसूस होता
है, क्योंकि प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ समझौते के बाद क्रान्तिकारी शक्तियों को
समाप्त करवाने की कोशिशें करती हैं लेकिन समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नेता
आन्दोलन को ऐसे गड्ढों में गिरने से बचा सकते हैं। हमें ऐसे समय और ऐसे मोड़
पर वास्तविक मुद्दों और विशेषतः उद्देश्यों-सम्बन्धी कुछ गड़बड़ नहीं होने देनी
चाहिए। इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी ने वास्तविक संघर्ष से धोखा किया है और वे
(उसके नेता) सिर्फ़ कुटिल साम्राज्यवादी बनकर रह गये हैं।
मेरे विचार में इन रँगे हुए साम्राज्यवादी लेबर नेताओं से कट्टर प्रतिक्रियावादी
हमारे लिए बेहतर हैं। दाँव-पेंचों और रणनीति-सम्बन्धी लेनिन के जीवन और लेखन
पर हमें विचार करना चाहिए। समझौते के मामले पर ‘वामपन्थी कम्युनिज़्म’ में
उनके स्पष्ट विचार मिलते हैं।

कांग्रेस का उद्देश्य क्या है?

मैंने कहा है कि वर्तमान आन्दोलन किसी न किसी समझौते या पूर्ण असफलता में
समाप्त होगा।
मैंने यह इसलिए कहा है क्योंकि मेरी राय में इस समय वास्तविक क्रान्तिकारी
ताक़तें मैदान में नहीं हैं। यह संघर्ष मध्यमवर्गीय दुकानदारों और चन्द पूँजीपतियों के
बलबूते किया जा रहा है। ये दोनों वर्ग, विशेषतः पूँजीपति, अपनी सम्पत्ति या
मिल्कियत ख़तरे में डालने की जुर्रत नहीं कर सकते। वास्तविक क्रान्तिकारी सेनाएँ
तो गाँवों और कारख़ानों में हैं – किसान और मज़दूर। लेकिन हमारे ‘बुर्जुआ’ नेताओं
में उन्हें साथ लेने की हिम्मत नहीं है, न ही वे ऐसी हिम्मत कर सकते हैं। ये सोये
हुए सिंह यदि एक बार गहरी नींद से जग गये तो वे हमारे नेताओं की लक्ष्य-पूर्ति
के बाद ही रुकने वाले नहीं हैं। 1920 में अहमदाबाद के मज़दूरों के साथ अपने
प्रथम अनुभव के बाद महात्मा गाँधी ने कहा था, “हमें मज़दूरों के साथ साँठ-गाँठ
नहीं करना चाहिए। कारख़ानों के सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक हितों के लिए
इस्तेमाल करना ख़तरनाक है।” (मई, 1921 के ‘दि टाइम्स’) से। तब से उन्होंने
इस वर्ग को साथ लेने का कष्ट नहीं उठाया। यही हाल किसानों के साथ है। 1922
का बारदोली-सत्याग्रह पूरी तरह यह स्पष्ट करता है कि नेताओं ने जब किसान वर्ग
के उस विद्रोह को देखा, जिसे न सिर्फ़ विदेशी राष्ट्र के प्रभुत्व से ही मुक्ति हासिल
480 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़