सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 481

लेखक ने समाज की जिस सामान्य रूपरेखा की चर्चा की है वह काफ़ी हद
तक वैज्ञानिक समाजवाद जैसी ही है। लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें पुस्तक में हैं
जिनका विरोध या खण्डन करने, या और सटीक ढंग से कहें, तो जिनमें सुधार करने
की ज़रूरत है। उदाहरण के तौर पर 427वें पद के नीचे के एक फुटनोट में वे
लिखते हैं कि सरकारी कर्मचारियों को अपनी रोजी कमाने के लिए प्रतिदिन चार
घण्टे खेतों या कारखानों में काम करना होगा। लेकिन यह फिर एक काल्पनिक और
अव्यावहारिक बात है। सम्भवतः आज की व्यवस्था में राजकर्मचारी जो अनावश्यक
रूप से ऊँचा वेतन पाते हैं, यह बात उसी की प्रतिक्रिया की उपज है। वास्तव में
बोल्शेविकों को भी यह मानना पड़ा था कि मानसिक श्रम भी उतना ही उत्पादक
श्रम है जितना शारीरिक श्रम। और भविष्य के समाज में जब विभिन्न तत्त्वों के
सम्बन्धों का समायोजन समानता के आधार पर होगा तो उत्पादक और वितरक दोनों
को समान महत्त्व का दर्जा प्राप्त होगा। आप एक नाविक से यह उम्मीद नहीं कर
सकते कि वह चौबीस घण्टे में एक बार जहाज़ चलाना रोक कर उतर जाये और
रोजी कमाने के लिए चार घण्टे काम करने चला जाये, या एक वैज्ञानिक अपनी
प्रयोगशाला या अपना प्रयोग (काम) छोड़कर अपना काम का कोटा पूरा करने खेत
में चला जाये। दोनों ही अत्यन्त उत्पादक श्रम कर रहे हैं। समाजवादी समाज में
एकमात्र इस अन्तर की आशा की जानी चाहिए कि मानसिक श्रम करने वाला
शारीरिक श्रम करने वाले से श्रेष्ठ नहीं माना जायेगा।
निःशुल्क शिक्षा के बारे में लाला रामसरन दास के विचार वाक़ई ध्यान देने
योग्य हैं। रूस में समाजवादी सरकार ने बहुत कुछ उसी तरह के क़दम उठाये हैं।
अपराध के बारे में उन्होंने जो चर्चा की है, वह सचमुच सर्वाधिक विकसित
चिन्तनधारा है। अपराध सर्वाधिक गम्भीर सामाजिक समस्या है जिसे हल करने में
बहुत सतर्कता की ज़रूरत है। लेखक ने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा जेल में
बिताया है। उनके पास कुछ व्यावहारिक अनुभव हैं। एक स्थान पर उन्होंने ‘हलकी
मशक़्क़त, दरमियानी मशक़्क़त, सख़्त मशक़्क़त’ जैसे ठेठ जेल की शब्दावली का
इस्तेमाल किया है। सभी दूसरे समाजवादियों की तरह वे सुझाव देते हैं कि दण्ड
का आधार प्रतिशोध के बजाय सुधार का सिद्धान्त होना चाहिए। न्याय व्यवस्था का
निर्देशक सिद्धान्त दण्ड देना न होकर सुधारना होना चाहिए और जेलों का रूप
वास्तविक नर्क के बजाय सुधारालयों का होना चाहिए। इस सम्बन्ध में पाठकों को
रूसी जेल-व्यवस्था का अध्ययन करना चाहिए।
सेना की चर्चा करते समय उन्होंने युद्ध की भी चर्चा की है। मेरे विचार से
उस समय विश्वकोशों में एक संस्था के रूप में युद्ध की चर्चा बहुत थोड़े पन्नों
में रहेगी और युद्ध सामग्रियाँ संग्रहालयों की गैलरियों की शोभा बढ़ायेंगी, क्योंकि
उस समाज में परस्पर शत्रुतापूर्ण हित नहीं रह जायेंगे जो युद्ध को जन्म देते हैं।
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 475