भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने कार्यक्रम के एक आवश्यक अंग के रूप में अपनाना पड़ता है, और ऊपर
की पंक्तियों में हिंसा और अहिंसा के दर्शन को ख़ूबसूरत ढंग से बयान किया गया
है। लेनिन ने एक बार गोर्की से कहा कि उन्हें ऐसा संगीत सुनने को नहीं मिला
जो सभी नाड़ियों-शिराओं को झकझोर दे और जिसे सुनकर कलाकार का सिर
थपथपाने की इच्छा पैदा हो जाये। “लेकिन,” उन्होंने आगे कहा था, “यह समय
सिर थपथपाने का नहीं है। इस समय हाथों को खोपड़ियाँ तोड़नी हैं, हालाँकि हमारा
चरम उद्देश्य हर प्रकार की हिंसा को समाप्त करना है।”* एक भयानक आवश्यकता
के रूप में हिंसात्मक साधनों का उपयोग करते हुए क्रान्तिकारी भी ठीक ऐसा ही
सोचते हैं।
इसके बाद लेखक परस्पर-विरोधी धर्मों की समस्या पर विचार करता है। वह
सभी धर्मों में समन्वय स्थापित करने की चेष्टा करता है जैसाकि प्रायः सभी
राष्ट्रवादी किया करते हैं। इस सवाल को हल करने का यह तरीक़ा लम्बा और
गोलमोल है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं इस मसले को कार्ल मार्क्स के एक वाक्य
द्वारा ख़ारिज कर दूँगा कि “धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
अन्त में उसकी कविता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा आता है जहाँ उसने
उस भावी समाज के बारे में लिखा है जिसकी रचना करने के लिए हम सभी
लालायित हैं। लेकिन मैं शुरू में ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। ‘ड्रीमलैण्ड’
दरअसल एक यूटोपिया है। लेखक ने स्वयं इस बात को स्पष्ट रूप से शीर्षक में
ही स्वीकार किया है। वह इस विषय पर कोई वैज्ञानिक शोध-प्रबन्ध लिखने का
दावा नहीं करता। लेकिन निस्सन्देह, यूटोपिया की सामाजिक प्रगति में महत्त्वपूर्ण
भूमिका होती है। सेण्ट साइमन, फूरिये, रॉबर्ट ओवेन और उनके सिद्धान्तों के अभाव
में वैज्ञानिक मार्क्सवादी समाजवाद भी नहीं होता। लाला रामसरन दास की
‘यूटोपिया’ का भी उसी तरह से महत्त्व है। जब हमारा कार्यकर्ता अपने आन्दोलन
के दर्शन को व्यवस्थित रूप देने और एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का महत्त्व
समझेगा, उस समय यह पुस्तक उसके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होगी।
इस बात की ओर मेरा ध्यान गया है कि लेखक की अभिव्यक्ति की शैली
अपरिष्कृत है। अपनी ‘यूटोपिया’ का वर्णन करते हुए लेखक वर्तमान समाज के
विचारों से अछूता नहीं रह पाया है।
ज़रूरतमन्दों को दान देना
भविष्य के समाज में यानी कम्युनिस्ट समाज में जिसे हम बनाना चाहते हैं हम
धर्मार्थ संस्थाएँ स्थापित करने नहीं जा रहे हैं, बल्कि उस समाज में न ज़रूरतमन्द
होंगे न ग़रीब। न दान देने वाले। इस असंगति के बावजूद, इस प्रश्न को बड़े
ख़ूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
474 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़