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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 788 में से

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पृष्ठ 488

भी स्थिति का विश्लेषण करते समय हमें हमेशा बिल्कुल बेझिझक, बेलाग व
व्यावहारिक होना चाहिए।
हम जानते हैं कि जब भारत सरकार में भारतीयों की हिस्सेदारी को लेकर
हल्ला हुआ था तो मिण्टो-मार्ले सुधार लागू हुए थे, जिनके द्वारा केवल सलाह देने
का अधिकार रखने वाली वायसराय-परिषद बनायी गयी थी।
विश्वयुद्ध के दौरान जब भारतीय सहायता की अत्यन्त आवश्यकता थी तो
स्वायत्त शासन वाली सरकार का वायदा किया गया और मौजूदा सुधार लागू किये
गये। असेम्बली को कुछ सीमित क़ानून बनाने की ताक़त दी गयी, लेकिन सबकुछ
वायसराय की खुशी पर निर्भर है। अब तीसरी स्टेज है।
अब सुधारों-सम्बन्धी विचार हो रहा है और निकट भविष्य में ये लागू होंगे।
अब नौजवान इनकी परीक्षा कैसे कर सकते हैं? यह एक सवाल है। मैं नहीं जानता
कि कांग्रेसी नेता कैसे इनकी परख करेंगे? लेकिन हम क्रान्तिकारी इन्हें निम्नलिखित
कसौटी पर परखेंगे –

  1. किस सीमा तक शासन की ज़िम्मेदारी भारतीयों को सौंपी जाती है?
  2. शासन चलाने के लिए किस तरह की सरकार बनायी जाती है और सामान्य जनता
    को इसमें हिस्सा लेने का कहाँ तक अवसर मिलता है?
  3. भविष्य में क्या सम्भावनाएँ हो सकती हैं और इन उपलब्धियों को किस प्रकार
    बचाया जा सकता है?
    इसके लिए शायद कुछ और स्पष्टीकरण की ज़रूरत हो। पहली बात यह कि
    हमारी जनता के प्रतिनिधियों को कार्यपालिका पर कितना अधिकार और ज़िम्मेदारी
    हासिल होती है। अब तक कार्यपालिका को लेजिस्लेटिव असेम्बली के सामने
    उत्तरदायी नहीं बनाया गया है। वायसराय के पास वोटों की ताक़त है, जिससे चुने
    हुए प्रतिनिधियों की सारी कोशिशें बेअसर और ठप्प कर दी जाती हैं।
    हम स्वराज्य पार्टी के शुक्रगुज़ार हैं जिनकी कोशिशों से वायसराय ने अपनी इस
    ताक़त का बड़ी बेशर्मी से बार-बार इस्तेमाल किया और राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के
    मर्यादा भरे निर्णय पाँव तले कुचल दिये। यह बात पूरी तरह स्पष्ट है और इस पर
    और बहस की ज़रूरत नहीं है।
    आइये, सबसे पहले कार्यकारिणी की स्थापना के ढंग पर विचार करें? क्या
    कार्यकारिणी को असेम्बली के चुने हुए सदस्य चुनते हैं या पहले की ही तरह ऊपर
    से थोपी जायेगी? क्या यह असेम्बली के आगे उत्तरदायी होगी या पहले की ही तरह
    असेम्बली का अपमान करेगी?
    जहाँ तक दूसरी बात का सम्बन्ध है, उसे हम वयस्क मताधिकार की
    सम्भावना से देख सकते हैं। सम्पत्ति होने की धारा को पूरी तरह समाप्त कर
    व्यापक मताधिकार दिये जाने चाहिए। हर वयस्क स्त्री-पुरुष को वोट का
    482 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़