भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 478, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदास को 1915 में मौत की सज़ा मिली थी और बाद में उसे आजीवन कारावास
में बदल दिया गया था। आज खुद फाँसी की कालकोठरी में बैठकर मैं पाठकों
को साधिकार बता सकता हूँ कि आजीवन कारावास मौत की अपेक्षा कहीं अधिक
कठोर है। लाला रामसरन दास को पूरे चौदह वर्ष जेल की सज़ा भुगतनी पड़ी। यह
कविता उन्होंने दक्षिण की किसी जेल में लिखी थी। लेखक की उस समय की
मनःस्थिति और मानसिक संघर्ष का कविता पर स्पष्ट प्रभाव है जो इसे और अधिक
सुन्दर और दिलचस्प बना देता है। उसने जिस समय इसे लिखने का निश्चय किया
उस समय वह किन्हीं नैराश्यपूर्ण मनोभावों के विरुद्ध कठिन संघर्ष कर रहा था।
उन दिनों में, जब बहुत से साथी आश्वासन (‘अण्डरटेकिंग’) देकर छूट चुके थे
और सबके सामने, उसके (लेखक के) सामने भी बड़े-बड़े प्रलोभन थे, और जब
पत्नी और बच्चों की मधुर दुखदायी यादें अपनी मुक्ति की आकांक्षा को और
अधिक मज़बूत कर रही थीं, ऐसी स्थिति में लेखक को इन चीज़ों के पस्तहिम्मती
पैदा करने वाले प्रभाव के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना पड़ा था और उसने अपना
ध्यान इस रचना-कार्य की ओर मोड़ दिया था। इसलिए, प्रारम्भिक पदों में हमें इस
तरह का आकस्मिक भावोद्वेग मिलता है –
“पत्नी, बच्चे और मित्र
जो मुझे घेरे रहते थे
वे चारों ओर घूमते
ज़हरीले साँपों के समान थे।”
("Wife, children, friends, that me surround
Were poisonous snakes all around")
वह (कवि) शुरू में दर्शन की चर्चा करता है। यह दर्शन बंगाल और पंजाब
के सभी क्रान्तिकारी आन्दोलनों की रीढ़ है। इस बिन्दु पर मैं लेखक से बहुत
व्यापक मतभेद रखता हूँ। उसकी ब्रह्माण्ड की व्याख्या हेतुवादी और आधिभौतिक
है, जबकि मैं एक भौतिकवादी हूँ और इस परिघटना (फेनॉमेना) की मेरी व्याख्या
कारणसम्बद्ध होगी। फिर भी किसी भी तरह से यह रचना देश-काल की दृष्टि से
अनुपयुक्त नहीं है। जो सामान्य विचार हमारे देश में मौजूद हैं वे लेखक द्वारा
अभिव्यक्त विचारों के अनुरूप अधिक हैं। अपनी नैराश्यपूर्ण मनोदशा से संघर्ष के
लिए उसने प्रार्थना का रास्ता अख़्तियार किया है। यह इस बात से स्पष्ट है कि
पुस्तक का प्रारम्भ पूरी तरह ईश्वर, उसकी महिमा के वर्णन और उसकी परिभाषा
को समर्पित है। ईश्वर में विश्वास रहस्यवाद का परिणाम है जो निराशा का
स्वाभाविक प्रतिफलन है। यह विश्व एक ‘माया’, एक स्वप्न या कल्पना है – यह
स्पष्टतः रहस्यवाद है जिसे शंकराचार्य तथा दूसरे अन्य प्राचीन काल के हिन्दू
सन्तों ने जन्म दिया और विकसित किया। लेकिन भौतिकवादी दर्शन में इस
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