भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंज़्यादा से ज़्यादा हम यह कह सकते हैं कि एक संस्था के रूप में युद्ध का
अस्तित्व संक्रमण काल तक रहेगा। वर्तमान रूस के उदाहरण से इस बात को
अच्छी तरह समझा जा सकता है। वहाँ पर इस समय सर्वहारा का अधिनायकत्व
क़ायम है। वे समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते हैं। तब तक के लिए
पूँजीवादी समाज से अपनी रक्षा के लिए उन्हें एक सेना रखनी पड़ रही है। पर
उनके युद्ध-उद्देश्य भिन्न होंगे। हमारे स्वप्नलोक की जनता को साम्राज्यवादी
योजनाएँ युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करेंगी। युद्ध की ट्राफियों का अस्तित्व शेष नहीं
रह जायेगा। क्रान्तिकारी सेनाएँ दूसरे देशों में वहाँ की जनता पर शासन करने के
लिए या उन्हें लूटने के लिए नहीं बल्कि वहाँ के परजीवी शासकों को सिंहासनों
से नीचे गिराने के लिए, वहाँ की जनता का खून चूसने वाले शोषण को बन्द
करने के लिए और मेहनतकश जनता को मुक्त करने के लिए जायेंगी। लेकिन
हमारे जवानों को युद्ध के लिए उकसाने वाले पुराने राष्ट्रीय या जातीय विद्वेष का
अस्तित्व नहीं रह जायेगा।
मुक्त चिन्तन करने वाले सभी लोगों के लिए, विश्व संघ की स्थापना
सर्वाधिक लोकप्रिय और फ़ौरी उद्देश्य है। लेखक ने इस विषय पर अच्छी चर्चा की
है और तथाकथित ‘लीग ऑफ़ नेशंस’ की सुन्दर आलोचना की है।
571(572) वें पद के नीचे के एक फुटनोट में लेखक ने साधन के प्रश्न की
संक्षिप्त चर्चा की है। वह कहता है, “ऐसा राज्य शारीरिक हिंसात्मक क्रान्तियों द्वारा
स्थापित नहीं हो सकता। यह समाज पर बाहर से थोपा नहीं जा सकता। यह अन्दर
से विकसित होगा...इसकी प्राप्ति धीरे-धीरे क्रमविकास की प्रक्रिया द्वारा और जनता
को ऊपर चर्चित लाइन पर प्रशिक्षित करके होगी”, आदि। यह वक्तव्य अपनेआप
में असंगत नहीं है। यह सर्वथा सही है, लेकिन पूरी तरह व्याख्या न की जाने के
कारण यह ग़लतफ़हमी या भ्रम पैदा कर सकता है। क्या इसका यह मतलब है कि
लाला रामसरन दास को बल-प्रयोग के रास्ते की निरर्थकता का आभास हो गया
है? क्या वे अहिंसा के पुरातनपन्थी समर्थक हो गये हैं? नहीं, इसका यह मतलब
नहीं है।
आइये, इस बात की व्याख्या करें कि ऊपर उद्धृत बयान का क्या मतलब है?
किसी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा क्रान्तिकारी इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह समझते
हैं कि समाजवादी समाज की स्थापना हिंसात्मक साधनों से नहीं हो सकती है
बल्कि उसे अन्दर से प्रस्फुटित और विकसित होना चाहिए। लेखक इसके लिए
एकमात्र अस्त्र के रूप में शिक्षा को अपनाने का सुझाव देता है। लेकिन हर आदमी
इस बात को आसानी से समझ सकता है कि यहाँ की वर्तमान सरकार और
दरअसल सभी पूँजीवादी सरकारें न केवल ऐसे प्रयासों की सहायता नहीं करेंगी
बल्कि इसके विपरीत निर्दयतापूर्वक इसका दमन करेंगी। तब उसके ‘क्रमिक
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