भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर के नाम
द्वारा, सुपरिटेण्डेण्ट, सेन्ट्रल जेल, लाहौर
11 फ़रवरी, 1930
मिस्टर मजिस्ट्रेट,
4 फ़रवरी, 1930 के सिविल एण्ड मिलिट्री गजट में प्रकाशित आपके बयान
के सम्बन्ध में यह ज़रूरी जान पड़ता है कि हम अपने अदालत में न आने के कारणों
से आपको परिचित करवायें, ताकि कोई ग़लतफ़हमी और ग़लत-प्रस्तुति सम्भव न
हो।
पहले हम यह कहना चाहेंगे कि हमने अभी तक ब्रिटिश अदालतों का बायकाट
नहीं किया है। हम मि. लुइस की अदालत में जा रहे हैं, जो हमारे विरुद्ध जेल एक्ट
धारा 22 के अधीन मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं। यह घटना 29 जनवरी को
आपकी अदालत में घटित हुई थी। लाहौर षड्यन्त्र केस के सम्बन्ध में यह क़दम
उठाने के लिए हमें विशेष परिस्थितियों ने मजबूर किया है। हम शुरू से ही महसूस
करते रहे हैं कि अदालत के ग़लत रवैये द्वारा या जेल के अथवा अन्य अधिकारियों
द्वारा हमारे अधिकारों की सीमा लाँघकर हमें निरन्तर जान-बूझकर परेशान किया जा
रहा है ताकि हमारी पैरवी में बाधाएँ डाली जा सकें। कुछ दिन पहले जमानत की
दरख़्वास्त में हमने अपनी तकलीफ़ें आपके सामने रखी थीं, लेकिन उस दरख़्वास्त
को कुछ क़ानूनी नुक्तों पर नामंजूर करते हुए आपने बन्दियों की तकलीफ़ों का ज़िक्र
करना ज़रूरी नहीं समझा, जिनके आधार पर जमानत की दरख़्वास्त दी गयी थी।
हम महसूस करते हैं कि मजिस्ट्रेट का पहला व मुख्य फ़र्ज़ यह होता है कि
उसका व्यवहार निष्पक्ष व दोनों पक्षों के ऊपर उठा होना चाहिए। यहाँ तक कि उस
दिन माननीय जस्टिस कोर्ट ने यह रूलिंग दी थी कि मजिस्ट्रेट को दूसरी सबसे
महत्त्वपूर्ण बात अपने सामने रखनी चाहिए कि विचाराधीन क़ैदी को अपनी पैरवी
के सम्बन्ध में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े और यदि कोई मुश्किल
हो तो उसे दूर करना चाहिए, अन्यथा पूरा मुक़दमा एक मज़ाक़ बनकर रह जाता
है। लेकिन ऐसे महत्त्वपूर्ण मुक़दमे में मजिस्ट्रेट का व्यवहार इससे उल्टा रहा है,
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 371
जिसमें 18 नवयुवकों पर गम्भीर आरोपों जैसे हत्या, डकैती और षड्यन्त्र - के
अधीन मुक़दमा चलाया जा रहा है, जिनसे सम्भव है उन्हें मृत्युदण्ड दिया जाये।
जिन प्रमुख मुद्दों पर हम आपकी अदालत में न आने के लिए विवश हुए हैं, वे इस
तरह हैं -
विचाराधीन क़ैदियों में से अधिकांश दूर-दराज प्रान्तों से हैं और सभी मध्य
वर्गीय लोग हैं। ऐसी स्थिति में उनके सम्बन्धियों द्वारा उनकी पैरवी के लिए
बार-बार आना न सिर्फ़ बहुत मुश्किल है, बल्कि बिल्कुल असम्भव है। वे अपने
कुछ दोस्तों से मुलाक़ात करना चाहते थे, जिन्हें वे अपनी पैरवी की सभी
ज़िम्मेदारियाँ सौंप सकते थे। साधारण बुद्धि का भी यही तक़ाज़ा है कि उन्हें
मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, इस मक़सद के लिए बार-बार प्रार्थना की
गयी, लेकिन सभी प्रार्थनाएँ अनसुनी रहीं।
श्री बी.के. दत्त बंगाल के रहने वाले हैं और श्री कमलनाथ तिवारी बिहार के।
दोनों अपनी-अपनी मित्र कुमारी लज्जावती व श्रीमती पार्वती से भेंट करना चाहते
थे। लेकिन अदालत ने उनकी दरख़्वास्त जेल-अधिकारियों को भेज दी और उन्होंने
यह कहकर दरख़्वास्त रद्द कर दी कि मुलाक़ात सिर्फ़ सम्बन्धियों व वकीलों से
ही हो सकती है। यह मामला बार-बार आपके ध्यान में लाया गया, लेकिन ऐसा
कोई क़दम नहीं उठाया गया, जिससे बन्दी पैरवी के लिए आवश्यक प्रबन्ध कर
सकते। बाद में उन्हें इनका वकालतनामा हासिल करने पर भी मुलाक़ात करने की
आज्ञा नहीं दी गयी और यहाँ तक कि मजिस्ट्रेट ने जेल-अधिकारियों को यह
लिखने से भी इन्कार कर दिया कि बन्दी उसकी ओर से चलाये जा रहे मुक़दमे
की पैरवी के सम्बन्ध में इन मुलाक़ातों की माँग कर रहे थे और इस प्रकार बन्दी
ऊपर की अदालत में जाने योग्य नहीं रहे। लेकिन मुक़दमे की सुनवाई जारी रही।
इन परिस्थितियों में बन्दी बिल्कुल विवश थे और उनके लिए मुक़दमा मज़ाक़ से
अधिक कुछ नहीं था। यह बात नोट करने योग्य है कि दूसरे बन्दियों में भी
अधिकांश की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो रहा था।
मेरा कोई वकील नहीं है और न ही मैं पूरे समय के लिए किसी को वकील
रख सकता हूँ। मैं कुछ नुकतों सम्बन्धी क़ानूनी परामर्श चाहता हूँ और एक विशेष
पड़ाव पर मैं चाहता था कि वे (वकील) कार्रवाई को स्वयं देखें, ताकि अपनी
राय बनाने के लिए वे बेहतर स्थिति में हों, लेकिन उन्हें अदालत में बैठने तक की
जगह नहीं दी गयी। हमारी पैरवी रोकने के लिए, हमें परेशान करने के लिए क्या
सम्बन्धित अधिकारियों की यह सोची-समझी चाल नहीं थी? वकील अपने सायलों
(प्रार्थियों) के हितों को देखने के लिए अदालत में आता है, जो न तो स्वयं
उपस्थित होते हैं और न उनका कोई प्रतिनिधि वहाँ होता है। इस मुक़दमे की ऐसी
कौन-सी विशेष परिस्थितियाँ हैं, जिससे मजिस्ट्रेट वकीलों के प्रति ऐसा सख़्त रवैया
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अपनाने पर मजबूर हुए? इस प्रकार हर उस वकील की हिम्मत तोड़ी गयी जो
बन्दियों को मदद के लिए बुलाये जा सकते थे। श्री अमरदास को पैरवी (डिफ़ेंस)
की कुर्सी पर बैठने की इजाज़त देने की क्या तुक थी, जबकि वे किसी भी पक्ष
का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे और न ही उन्होंने किसी को क़ानूनी परामर्श दिया।
अपने मुख़्तारों से मुलाक़ातों के सम्बन्ध में मुझे क़ानूनी सलाहकार से विचार-विमर्श
करना था और इसी नुक्ते को लेकर हाईकोर्ट जाने के लिए उनसे कहना था। लेकिन
उनके साथ इस सम्बन्ध में बात करने का मुझे कोई अवसर ही नहीं मिला और
कुछ न हो सका। इस सबका क्या मतलब है? यह दिखाकर कि मुक़दमा क़ानून
के अनुसार चलाया जा रहा है, क्या लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंकी जा रही?
अपने बचाव का इन्तज़ाम करने के लिए बन्दियों को क़तई कोई अवसर नहीं दिया
गया। इस बात के ख़िलाफ़ हम रोष प्रकट करते हैं। यदि सबकुछ उचित ढंग से
नहीं किया जाता तो इस तमाशे की कोई ज़रूरत नहीं है। न्याय के नाम पर हम
अन्याय होता नहीं देख सकते। इन परिस्थितियों में हम सभी ने सोचा कि या तो
हमें अपनी ज़िन्दगी बचाने का उचित अवसर मिलना चाहिए, और या हमें हमारी
अनुपस्थिति में चले मुक़दमे में हमारे ख़िलाफ़ दी सज़ाओं को भुगतने के लिए तैयार
रहना चाहिए।
तीसरी बड़ी शिकायत अख़बारों के बाँटने सम्बन्धी है। विचाराधीन क़ैदियों को
कभी भी दण्ड प्राप्त कैदी नहीं माना जाना चाहिए और यह रोक उन पर तभी
लगायी जा सकती जब उनकी सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी हो। इससे अधिक इसे
उचित नहीं माना जा सकता। जमानत पर रिहा न हो सकने वाले बन्दी को कभी
भी दण्ड के तौर पर कष्ट नहीं देने चाहिए। सो प्रत्येक शिक्षित विचाराधीन क़ैदी
को कम से कम एक अख़बार लेने का अधिकार है। अदालत में 'एक्ज़ीक्यूटिव'
कुछ सिद्धान्तों पर हमें हर रोज़ एक अंग्रेज़ी अख़बार देने के लिए सहमत हुई थी।
लेकिन अधूरी चीजें न होने से भी बुरी होती हैं। अंग्रेज़ी न जानने वाले बन्दियों के
लिए स्थानीय अख़बार देने के अनुरोध व्यर्थ सिद्ध हुए। अतः स्थानीय अख़बार न
देने के आदेश के विरुद्ध रोष प्रकट करते हुए हम दैनिक ट्रिब्यून लौटाते रहे हैं।
इन तीन आधारों पर हमने 29 जनवरी को अदालत में आने से इन्कार करने
की घोषणा की थी। ज्यों ही ये मुश्किलें दूर कर दी जायेंगी, हम बाखुशी अदालत
में आयेंगे।
भगतसिंह व अन्य
('हिन्दुस्तान टाइम्स' में 13 फ़रवरी, 1930 को प्रकाशित)
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 373
हिन्दुस्तानी एसोसिएशन, बर्लिन के नाम तार
कृपया भारत में समाजवादी क्रान्तिकारी आन्दोलन के झण्डा-बरदारों में से एक
कामरेड कृष्ण वर्मा के देहान्त पर हमारा हार्दिक शोक अपने साथियों तक पहुँचायें।
उनका जीवन भारतीय मुक्ति के लम्बे संघर्ष के आदर्श में एक राष्ट्रीय सम्पत्ति
है, जो आज़ादी की लड़ाई के कार्यकर्ताओं को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
विचाराधीन कैदी,
5 अप्रैल, 1930 लाहौर षड्यन्त्र केस
(‘ट्रिब्यून’, लाहौर 8 अप्रैल, 1930 में प्रकाशित)
374 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी केस के बन्दियों के नाम तार
द्वारा, स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर
5 अप्रैल, 1930
कृपया निम्न तार तुरन्त काकोरी-क़ैदियों को भेज दें, जो बरेली जेल में भूख
हड़ताल पर हैं और जिनके बारे में कहा जाता है कि वे गम्भीर हालत में हैं।
आपके भगतसिंह, बी. के. दत्त
तार
गुप्त, बख्शी, सिन्हा, मुकन्दीलाल
काकोरी-क़ैदी,
सेण्ट्रल जेल,
बरेली।
आपकी नाजुक हालत के बारे में जानकर बहुत दुख है। हमारा पहला तार आप
तक नहीं पहुँचा। हम आपसे हार्दिक निवेदन करते हैं कि सरकार की ओर से
बन्दियों के वर्गीकरण के अन्तिम नोटिस को ध्यान में रखते हुए आप अपना संघर्ष
त्याग दें। जहाँ तक नये नियमों के लागू होने का प्रश्न है, हमें एक साथ इन्तज़ार
करना चाहिए।
भगतसिंह और दत्त
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 375
गवाहियों की अपेक्षा रसगुल्ले ज़्यादा ज़रूरी
आज अदालत में भगतसिंह ने शिकायत की है कि जब बचाव समिति के एक
सदस्य दोपहर में भोजन के लिए कुछ वस्तुएँ ला रहे थे तब खाने योग्य वस्तुएँ
अदालत में नहीं लाने दी गयीं।
दोपहर में भोजन के बाद कथित अपराधी जतिन सान्याल ने मजिस्ट्रेट से
शिकायत की कि उनके लिए बंगाल से रसगुल्ले का पार्सल आया था, लेकिन
जेल-अधिकारियों ने वह इस तरह कुचल डाला कि वे खाने योग्य न रहे।
सरदार भगतसिंह (मजिस्ट्रेट से) : रसगुल्ले बाहर पड़े हैं। क्या आप उनका
मुआयना करने का कष्ट करेंगे। आहा! एक ख़ूबसूरत दृश्य है! बस ज़रा अवलोकन
कर लें! इन गवाहियों की अपेक्षा रसगुल्ले हमारे लिए ज़्यादा ज़रूरी हैं।
जतिन सान्याल : सभी चीजें बहुत बेहूदा हाल में हैं। क्या आप इसे तर्कसंगत
कहते हैं?
सरदार भगतसिंह : यह (मजिस्ट्रेट) बिल्कुल तर्कविहीन हैं।
जतिन सान्याल : यह हम किसे वापस करें, आपको या जेल-अधिकारियों
को?
मजिस्ट्रेट : जेल-अधिकारियों को।
सरदार भगतसिंह : लेकिन इसकी क़ीमत कौन देगा? हमारे दोस्त ने काफ़ी
रकम ख़र्च की है इस पर।
मजिस्ट्रेट : यह बात जेल-अधिकारियों के साथ सम्बन्ध रखती है।
(‘ट्रिब्यून’, लाहौर, 9 अप्रैल 1930 में प्रकाशित)
376 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर
भगतसिंह और उनके साथी मुक़दमे के परिणाम से पूरी तरह परिचित थे और
मिलने वाली सज़ाओं की ओर से बिल्कुल बेपरवाह। वे अपने विचार जनता तक ले
जाने और लोगों को ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करना चाहते थे, इसलिए
यह भी इच्छा रखते थे कि मुक़दमे की कार्रवाई धीमी गति से आगे बढ़े, ताकि जनता
तक उनके विचार पहुँच सकें। लेकिन सरकार खीझ रही थी। आख़िर 1 मई, 1930
को एक विशेष अध्यादेश द्वारा एक विशेष ट्रिब्यूनल स्थापित किया गया। उस
अध्यादेश के बारे में बताये गये सरकारी बहाने का उत्तर भगतसिंह ने 2 मई, 1930
को प्रस्तुत निम्नलिखित दस्तावेज़ में दिया। – स.
गवर्नर जनरल, भारत, शिमला (पंजाब)
श्रीमान,
हमारे मुक़दमे को जल्द निबटाने के लिए जारी किये आर्डिनेंस की पूरी कॉपी
पढ़कर सुनायी जा चुकी है। इसके लिए पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार-क्षेत्र में एक
ट्रिब्यूनल की नियुक्ति की गयी है। अगर इस सम्बन्ध में अपनाये गये व्यवहार का
उल्लेख न किया होता और इसकी सारी जवाबदेही हमारे सिर पर न मढ़ी होती तो
हम शायद अपनी ज़ुबान बन्द रखते, परन्तु वर्तमान स्थितियों में इसके सम्बन्ध में
हम अपना बयान देना आवश्यक समझते हैं।
हम आरम्भ से ही जानते हैं कि सरकार जान-बूझकर हमारे बारे में ग़लतफ़हमी
पैदा कर रही है। आख़िरकार यह एक लड़ाई है और हम भली प्रकार जानते हैं कि
अपने दुश्मनों का मुक़ाबला करने के लिए ग़लतफ़हमियों का जाल बनाना सरकार
का सबसे बड़ा हथकण्डा है। इस घृणित कार्य को रोकने का हमारे पास कोई साधन
नहीं, लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए हम कुछ कहने के लिए
मजबूर हैं।
आपने लाहौर साज़िश केस के बारे में जारी अध्यादेश में हमारी भूख हड़ताल
के बारे में अपना स्पष्टीकरण शामिल किया है। आपने स्वयं स्वीकारा है कि हममें
से दो ने इस मुक़दमे के सम्बन्ध में स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण की अदालत
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 377
में होने वाली जाँच-पड़ताल होने से पहले भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। सामान्य
समझ वाले साधारण व्यक्ति की समझ में भी यह बात आ सकती है कि इस
मुक़दमे का भूख हड़ताल से कोई सम्बन्ध नहीं है। भूख हड़ताल आरम्भ करने के
कुछ विशेष कारण थे, इस स्थिति में सरकार को उन कारणों के बारे में स्पष्टीकरण
देना था जिसके आधार पर भूख हड़ताल की गयी थी। जब सरकार ने इस समस्या
को सुलझाने के लिए कुछ प्रबन्ध करने की स्वीकृति दी और जेल जाँच कमेटी
स्थापित की तब हमने भूख हड़ताल समाप्त की थी। लेकिन सबसे पहले हमें यह
बताया गया था कि यह समस्या नवम्बर तक सुलझा दी जायेगी लेकिन उसमें
दिसम्बर तक विलम्ब किया गया। जनवरी भी बीत गयी लेकिन इस बात का कोई
संकेत नहीं मिल रहा कि सरकार वास्तव में इस सम्बन्ध में कुछ करेगी भी या
नहीं। हमें लगा कि मामला समाप्त कर दिया गया है। इन स्थितियों में हमने पूरे एक
हफ़्ते का नोटिस देकर 4 फ़रवरी, 1930 से पुनः भूख हडताल आरम्भ कर दी।
इसके बाद ही सरकार ने इस समस्या को अन्तिम रूप से हल करने के लिए कुछ
क़दम उठाये।
इस आशय का एक विज्ञापन फिर सरकार ने समाचारपत्रों में जारी किया। तब
हमने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। यहाँ तक कि हमने इस बात का इन्तज़ार भी
नहीं किया कि सरकार अपने अन्तिम निर्णय लागू करती भी है या नहीं? लेकिन
आज ही हमने यह महसूस किया है कि अंग्रेज़ सरकार ऐसे साधारण मामलों में भी
झूठ और फ़रेब का सहारा लेने से बाज़ नहीं आयी। वह विज्ञापन ख़ास निश्चित और
निर्णय निकालने वाले आधार पर निर्धारित थे, लेकिन हमने देखा कि उस पर भी
विपरीत अमल किया गया। जो भी हो, इस विषय पर बहस करने का यह उचित
अवसर नहीं। अगर यह मामला पुनः कभी उठा तो हम इसका अवश्य निर्णय करेंगे।
लेकिन हम पुरज़ोर कहना चाहते हैं कि भूख हड़ताल का उद्देश्य इसतगासा की
कार्यवाही के विरुद्ध कोई क़दम नहीं था, ऐसे साधारण कारणों से हमने इतनी
यातनाएँ नहीं सही थीं। यतीन्द्रनाथ दास ने इतने सामान्य कारण के लिए अपने
जीवन का बलिदान नहीं दिया, राजगुरु और सुखदेव ने भी इस बचाव के लिए ही
अपने जीवन संकट में नहीं डाले थे।
आप स्वयं हमारे मुक़दमे के सन्दर्भ में यह अच्छी तरह जानते थे कि अध्यादेश
जारी करने की वजह भूख हड़ताल नहीं थी। लेकिन असल कारण तो कुछ और
हैं जिनके बारे में सोचकर आपकी सरकार के होश-हवास गुम हो गये। न तो वे
इस मुक़दमे में विलम्ब के कारण हुए और न ही कोई ऐसी संकटमय स्थिति पैदा
हुई, जिसके कारण इस बेक़ानून के क़ानून के ऊपर हस्ताक्षर किये। ज़रूर ही इसके
पीछे कुछ और है।
लेकिन हम यह बता देना चाहते हैं कि उन अध्यादेशों से हमारी भावनाओं को
378 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कुचला नहीं जा सकता। भले ही आप कुछ इन्सानों को कुचल देने में सफलता
हासिल कर लें, लेकिन याद रहे, आप इस राष्ट्र को नहीं कुचल सकते। जहाँ तक
इस अध्यादेश का सन्दर्भ है, हम इसे अपनी शानदार सफलता मानते हैं। हम आरम्भ
से ही यह बताने का प्रयास करते रहे हैं कि आपका यह क़ानून एक खूबसूरत फ़रेब
है। यह न्याय नहीं दे सकता। लेकिन अफ़सोस है कि जेल में जो सुविधाएँ क़ानूनन
और इंसाफ़ करके अपराधियों को मिलती हैं और साधारण बन्दियों को भी दी जाती
हैं, वे सुविधाएँ भी हम राजनीतिक बन्दियों को नहीं दी जातीं। हम चाहते थे कि
सरकार पर्दे से बाहर आये और स्पष्ट कहे कि राजनीतिक बन्दियों को बचाव का
कोई अवसर नहीं दिया जा सकता।
हमें लगता है कि सरकार ने यही बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी है। हम
आपको और आपकी सरकार को इस साफ़गोई के लिए धन्यवाद देते हैं और
अध्यादेश का स्वागत करते हैं।
आपके प्रतिनिधि स्पेशल मजिस्ट्रेट और इस्तगासा के सरकारी वकील द्वारा
लगातार हमारे उचित व्यवहार को साफ़-साफ़ स्वीकारने के बावजूद सिर्फ़ हमारे
मुक़दमे के वजूद के बारे में सोचते ही आपके मस्तिष्क में भयंकर खलबली मची
हुई है। हमारे इस संघर्ष की शानदार सफलता का इससे बढ़कर भरोसा और क्या
हो सकता है?
आपके आदि-आदि
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 379
अदालत एक ढकोसला है
छह साथियों का एलान
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल,
लाहौर साज़िश केस, लाहौर
जनाब,
अपने छह साथियों की ओर से, जिनमें कि मैं भी शामिल हूँ, निम्नलिखित
स्पष्टीकरण इस सुनवाई के शुरू में ही देना आवश्यक है। हम चाहते हैं कि यह
दर्ज किया जाये।
हम मुक़दमे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार भाग नहीं लेना चाहते, क्योंकि
हम इस सरकार को न तो न्याय पर आधारित समझते हैं और न ही क़ानूनी तौर
पर स्थापित। हम अपने विश्वास से यह घोषणा करते हैं कि “समस्त शक्ति का
आधार मनुष्य है। कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी ऐसी शक्ति की हक़दार नहीं
है जो जनता ने उसको न दी हो।” क्योंकि यह सरकार इन सिद्धान्तों के विपरीत
है इसलिए इसका अस्तित्व ही उचित नहीं है। ऐसी सरकारें जो राष्ट्रों को लूटने के
लिए एकजुट हो जाती हैं उनमें तलवार की शक्ति के अलावा कोई आधार क़ायम
रहने के लिए नहीं होता। इसीलिए वे वहशी ताक़त के साथ मुक्ति और आज़ादी
के विचार और लोगों की उचित इच्छाओं को कुचलती हैं।
हमारा विश्वास है कि ऐसी सरकारें, विशेषकर अंग्रेज़ी सरकार जो असहाय और
असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गयी है, गुण्डों, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों का
टोला है जिसने क़त्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार
की शक्तियाँ जुटायी हुई हैं। शान्ति-व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियों या
रहस्य खोलने वाले को कुचल देती है।
हमारा यह भी विश्वास है कि साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साज़िश
के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों
380 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों, और लूटने की योजनाओं को
पूरा करने के लिए न सिर्फ़ न्यायालयों एवं क़ानून को क़त्ल करते हैं, बल्कि
भयंकर हत्याकाण्ड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग
जैसे ख़ौफ़नाक अपराध भी करते हैं। जहाँ कहीं लोग उनकी नादिरशाही शोषणकारी
माँगों को स्वीकार न करें या चुपचाप उनकी ध्वस्त कर देने वाली और घृणा योग्य
साज़िशों को मानने से इन्कार कर दें तो वह निरपराधियों का खून बहाने से संकोच
नहीं करते। शान्ति-व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति-व्यवस्था भंग करते हैं। भगदड़
मचाते हुए लोगों की हत्या, अर्थात हर सम्भव दमन करते हैं।
हम मानते हैं कि स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। हर मनुष्य
को अपने श्रम का फल पाने जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र
अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता
को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह
अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्त्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को
समाप्त कर दे। क्योंकि ब्रिटिश सरकार इन सिद्धान्तों, जिनके लिए हम लड़ रहे
हैं, के बिल्कुल विपरीत है, इसलिए हमारा दृढ़ विश्वास है कि जिस भी ढंग से
देश में क्रान्ति लायी जा सके और इस सरकार का पूरी तरह ख़ात्मा किया जा
सके, इसके लिए हर प्रयास और अपनाये गये सभी ढंग नैतिक स्तर पर उचित
हैं। हम वर्तमान ढाँचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी
परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित
समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव
बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतन्त्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब
तक सारा सामाजिक ढाँचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी
समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर
देने वाले प्रलय-संकट में है।
जहाँ तक शान्तिपूर्ण या अन्य तरीक़ों से क्रान्तिकारी आदर्शों की स्थापना का
सम्बन्ध है, हम घोषणा करते हैं कि इसका चुनाव तत्कालीन शासकों की मर्जी पर
निर्भर है। क्रान्तिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी
हैं। हम शाश्वत और वास्तविक शान्ति चाहते हैं, जिसका आधार न्याय और समानता
है। हम झूठी और दिखावटी शान्ति के समर्थक नहीं जो बुज़दिली से पैदा होती है
और भालों और बन्दूक़ों के सहारे जीवित रहती है।
क्रान्तिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम
आवश्यकता में से पैदा होता है और आख़िरी दाँव के तौर पर होता है। हमारा
विश्वास है कि अमन और क़ानून मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य अमन और
क़ानून के लिए।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 381
फ़्रांस के उच्च न्यायाधीश का यह कहना उचित है कि क़ानून की आन्तरिक
भावना स्वतन्त्रता समाप्त करना या प्रतिबन्ध लगाना नहीं, वरन स्वतन्त्रता को सुरक्षित
रखना और उसे आगे बढ़ाना है। सरकार को क़ानूनी शक्ति बनाये गये उन उचित
क़ानूनों से मिलेगी जो केवल सामूहिक हितों के लिए बनाये गये हैं, और जो जनता
की इच्छाओं पर आधारित हों, जिनके लिए यह बनाये गये हैं। इससे विधायकों समेत
कोई भी बाहर नहीं हो सकता।
क़ानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल
यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों में एक
पुर्ज़ा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्त्व खो बैठता है। न्याय प्रदान करने
के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का ख़ात्मा होना चाहिए।
ज्यों ही क़ानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना बन्द कर देता है त्यों ही
ज़ुल्म और अन्याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे क़ानूनों को जारी रखना
सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्भपूर्ण ज़बरदस्ती के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान सरकार के क़ानून विदेशी शासन के हितों के लिए चलते हैं और हम
लोगों के हितों के विपरीत हैं। इसलिए इनकी हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की
सदाचारिता लागू नहीं होती।
अतः हर भारतीय की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि इन क़ानूनों को चुनौती दे
और इनका उल्लंघन करे। अंग्रेज़ न्यायालय, जो शोषण के पुर्जे हैं, न्याय नहीं दे
सकते। विशेषकर राजनीतिक क्षेत्रों में, जहाँ सरकार और लोगों के हितों का टकराव
है। हम जानते हैं कि ये न्यायालय सिवाय न्याय के ढकोसले के और कुछ नहीं
हैं।
इन्हीं कारणों से हम इसमें भागीदारी करने से इन्कार करते हैं और इस मुक़दमे
की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे।
5-5-30
जज ने नोट किया – यह रिकॉर्ड में तो रखा जाये लेकिन इसकी कॉपी न दी
जाये, क्योंकि इसमें कुछ अनचाही बातें लिखी हैं।
382 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विशेष ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन पर
1 मई, 1930 को अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल के सदस्य थे –
जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष), जस्टिस आग़ा हैदर व जस्टिस जी.सी. हिल्टन।
5 मई को कार्रवाई शुरू हुई। पुंज हाउस को अदालत बनाया गया। क्रान्तिकारी युवक
अदालत में क्रान्तिकारी गीत गाते और क्रान्तिकारी नारे लगाते आते। भगतसिंह ने माँग
की कि उन्हें 15 दिन का समय दिया जाये, ताकि वे ट्रिब्यूनल के गैर-क़ानूनी होने
सम्बन्धी तर्क पेश कर सकें। लेकिन यह माँग मानी नहीं गयी। 24 क्रान्तिकारियों के
नाम मुक़दमे के लिए लिये गये, जिनमें से 16 पर मुक़दमा चलाया गया। बाद में
बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ केस वापिस ले लिया गया। जिन पर मुक़दमा शुरू किया
गया वे थे – सुखदेव, भगतसिंह, किशोरी लाल, देसराज, प्रेमदत्त, जयदेव कपूर, शिव
वर्मा, महावीर सिंह, यतीन्द्रनाथ दास, अजयकुमार घोष, यतीन्द्र सान्याल, विजयकुमार
सिन्हा, शिवराम राजगुरु, कुन्दनलाल व कमलनाथ तिवारी। भगतसिंह और उनके
साथियों ने वकील करने से इन्कार कर दिया। 12 मई, 1930 को भगतसिंह और
उनके साथियों को हथकड़ियों में अदालत में लाया गया। हथकड़ियाँ न खोलने के
विरोध में उन्होंने बस से उतरने से इन्कार कर दिया। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने उन्हें
ज़बरदस्ती उतारने का आदेश दिया। भगतसिंह और उनके साथियों ने अदालत का
बायकाट कर दिया। यद्यपि उन लोगों की हथकड़ियाँ दोपहर के खाने के लिए खोली
गयीं, लेकिन खाने के बाद फिर लगाने का आदेश दे दिया गया, जिसका भगतसिंह
और उनके साथियों ने विरोध किया। अध्यक्ष ने भारतीयों को गाली देते हुए भगतसिंह
को लाठियों से पीटने का आदेश दिया।
अदालत में क्रान्तिकारियों, ख़ासकर भगतसिंह को संवाददाताओं और जनता के
सामने लाठियों और जूतों से मारा गया। भगतसिंह ने भारतीयों को गाली देने पर
आपत्ति करते हुए जस्टिस आग़ा हैदर के भारतीय होने पर सवाल किया और पूछा
कि ऐसी मानसिक स्थिति वाले जज न्याय कैसे करेंगे? जस्टिस आग़ा हैदर ने उस
दिन की कार्रवाई पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इस घटना की दुनियाभर
में चर्चा हुई। सारे भारत में भगतसिंह-दिवस मनाया गया, जिसके फलस्वरूप जस्टिस
कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर जाना पड़ा और 21 जून को ट्रिब्यूनल नये सिरे से
गठित किया गया। अब जस्टिस जी.सी. हिल्टन को अध्यक्ष व जस्टिस जे.के. टैप और
जस्टिस अब्दुल कादिर को सदस्य बनाया गया।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 383
इस पर भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने निम्नलिखित पत्र में अपने विचार प्रकट
किये। – स.
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल
लाहौर षड्यन्त्र केस, लाहौर
श्रीमान जी,
जबकि ट्रिब्यूनल के दो न्यायाधीशों को हटा दिया गया है या वे हट गये
हैं और दो नये न्यायाधीश उनके स्थान पर नियुक्त कर दिये गये हैं, इसलिए
हम अपना स्पष्टीकरण दर्ज कराना आवश्यक समझते हैं, ताकि हम अपना पक्ष
स्पष्ट कर सकें और किसी भी प्रकार की शंकाएँ पैदा होने से बचा जा सके।
12 मई, 1930 को न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम ने जोकि अध्यक्ष भी हैं, एक
अदालती आदेश पास किया जिसके अन्तर्गत हमें अदालत में हथकड़ियाँ पहनाने
का आदेश दिया गया। इस आदेश का पालन कराने के लिए पुलिस को
बल-प्रयोग करने के लिए भी कहा गया।
इस अचानक और असाधारण आदेश का कारण जानने के लिए हमने इस
अदालत से निवेदन किया था, जिसे सुनने की आवश्यकता महसूस नहीं की
गयी। ऐसी स्थितियों में पुलिस हमें ज़बरन हथकड़ियाँ लगाकर वापिस जेल ले
आयी। अगले दिन तीन में से एक न्यायाधीश आगा़ हैदर ने अध्यक्ष के इस
आदेश से अपने को अलग कर लिया। उस दिन से हम न्यायालय में नहीं जा
रहे।
जिन शर्तों पर हम न्यायालय में आने को तैयार हैं, वे अगले दिन न्यायालय
के समक्ष रखी गयी थीं। शर्तें थीं कि या तो अध्यक्ष क्षमा माँगें या फिर उन्हें
बदल दिया जाये। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उनकी जगह पर ऐसे
एक न्यायाधीश को बैठा दिया जाये जो उस आदेश में भागीदार था।
पाँच हफ़्ते तक तो अपराधियों की शिकायत को विचार-योग्य ही नहीं
समझा गया।
वर्तमान ट्रिब्यूनल के निर्माण में दोनों अध्यक्ष और दूसरे न्यायाधीश – जो
उनके साथ सहमत नहीं हुए थे – को बदलकर दो नये न्यायाधीश लगाये गये
हैं। इस तरह एक न्यायाधीश को जो उस आदेश में भागीदार था, क्योंकि
आदेश बहुमत के आधार पर दिया गया था, ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष बनाया गया
है। ऐसी स्थिति में हम पुरज़ोर यह कहना चाहते हैं कि न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम
से व्यक्तिगत स्तर पर हमारा कोई शिकवा नहीं था और न ही शिकायत थी।
384 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हमारे विरोध का कारण तो न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम की ओर से पास किया
बहुमत का आदेश और उसके बाद हमारे साथ हुआ दुर्व्यवहार था। न्यायाधीश
कोल्डस्ट्रीम और न्यायाधीश हैमिल्टन का हम सम्मान करते हैं, जैसाकि एक
मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का किया जाना चाहिए। हमारा रोष एक विशेष आदेश
के विरोध में था जिसके कारण ट्रिब्यूनल, जोकि उस आदेश के लिए
ज़िम्मेदार है, के अध्यक्ष से क्षमा माँगने की माँग की गयी थी। अध्यक्ष को
हटा देने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि अब जज हैमिल्टन, जो उस
आदेश में शरीक थे, न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम के स्थान पर अध्यक्षता कर रहे
हैं। हम तो केवल यह कह सकते हैं कि बदली हुई स्थितियों ने अब ज़ख़्म
पर नमक छिड़कने का ही काम किया है।
आपके,
भगतसिंह
25 जून, 1930 बी.के. दत्त
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 385
राजनीतिक मामलों की पैरवी पर
23 दिसम्बर, 1930 को पंजाब के गवर्नर सर ज़्याफ़्रेडी पर क्रान्तिकारी युवक
हरिकृष्ण ने गोली चलायी और उसे घायल कर दिया। हरिकृष्ण पकड़ा गया और
उस पर केस चला। लेकिन वकील की सलाह पर हरिकृष्ण जिस तरह केस की पैरवी
कर रहा था, भगतसिंह उसके तरीक़े से असहमत थे। इसलिए उन्होंने अपने एक साथी
को जेल से दो पत्र जोकि जून, 1931 में लाहौर से प्रकाशित 'पीपुल्स' नामक अंग्रेज़ी
साप्ताहिक में छपा था, नीचे दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि हरिकृष्ण को 9
जून, 1931 को फाँसी दी गयी। – स.
मुझे यह जानकर बहुत अफ़सोस है कि इस सम्बन्ध में मेरा पहला पत्र समय पर
अपने ठिकाने नहीं पहुँच सका और इसलिए उससे कोई फ़ायदा न हो सका, या
यह कि वह उस उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा, जिसके लिए वह लिखा गया
था। इसलिए मैं आमतौर पर यह पत्र राजनीतिक मुक़दमों में पैरवी के सवाल के
बारे में और ख़ासतौर पर क्रान्तिकारी मुक़दमे के बारे में अपने विचारों को प्रकट
करने के लिए लिख रहा हूँ। पहले पत्र में विचारे गये ख़ास-ख़ास नुकतों के अलावा
इसका एक और मक़सद भी होगा, और वह यह कि मैं घटनाओं से गुज़र जाने के
बाद समझदार नहीं बन रहा हूँ।
ख़ैर, मैंने उस ख़त में यह लिखा था कि वकील पैरवी के लिए जो दलीलें
दे रहा था, उन्हें माना न जाये, पर बावजूद आपके और मेरे विरोध के उन्हें मान
लिया गया है।
बावजूद इसके हम अधिक रोशनी में इस बात पर विचार कर सकते हैं और
पैरवी से सम्बन्धित आगामी नीति के बारे में ठोस विचार बना सकते हैं।
आप यह जानते ही हैं कि मैं कभी भी हमारे राजनीतिक बन्दियों की बचाव
वाली पैरवी करने का समर्थक नहीं रहा, परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उचित
संघर्ष की ख़ूबसूरती बिल्कुल ही बिगाड़ दी जाये। इस पर विशेष ध्यान की
आवश्यकता है कि ख़ूबसूरती शब्द यहाँ अवास्तविक शक्ल में प्रयोग नहीं किया
गया है और इसका उस उद्देश्य से सम्बन्ध है, जिसने कि एक ख़ास कार्रवाई के
लिए हरिकृष्ण को प्रेरित किया। जब मैं यह जानता हूँ कि सब राजनीतिक बन्दियों
386 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
को अपनी पैरवी स्वयं करनी चाहिए, तो यह कुछ विशेष मान्यताओं के साथ कहता
हूँ। मेरा मतलब सिर्फ़ एक ही बात से साफ़ हो सकता है।
एक मनुष्य एक ही विशेष मक़सद को सामने रखकर काम नहीं करता।
उसकी गिरफ़्तारी के बाद उसके काम का राजनीतिक महत्त्व समाप्त नहीं होना
चाहिए और काम की अपेक्षा मरने की तैयारी ही ज़्यादा ज़रूरी नहीं बन जानी
चाहिए। हम इसे उदाहरण की मदद से और साफ़ करें। हरिकृष्ण गवर्नर को गोली
मारने के लिए आये। मैं इस कार्रवाई का नैतिक पक्ष नहीं लेना चाहता। मैं सिर्फ़
इस केस के राजनीतिक पहलू पर विचार करना चाहता हूँ। गोली मारने वाला व्यक्ति
गिरफ़्तार कर लिया गया। दुर्भाग्य से पुलिस-कर्मचारी इस कार्रवाई में मर गया। अब
पैरवी का सवाल सामने आता है। जब गवर्नर बच गया तो हरिकृष्ण के केस में बड़ा
सुन्दर बयान आ सकता था; अर्थात असली तथ्यों का बयान, जैसाकि हमारे केस
में नीचे की अदालत में दिया गया था। इस प्रकार यह क़ानूनी मक़सद को भी पूरा
कर देता और कार्य के उद्देश्य को भी ऊपर उठाता, पर वकील की कोशिश और
क़ाबिलियत सब-इंस्पेक्टर की मौत के बारे में दलीलें देने में उलझी रही। उसे यह
कहकर क्या मिला कि हरिकृष्ण सिर्फ़ गवर्नर को ज़ख़्मी करना चाहता था, मारना
नहीं चाहता था? इसी तरह की दूसरी बातें थीं। क्या कोई समझदार एक क्षण के
लिए भी ऐसी बात की उम्मीद कर सकता है? क्या इस दलील की कोई क़ानूनी
क़ीमत थी? बिल्कुल कोई क़ीमत नहीं, तो फिर गवर्नर पर गोली चलाने के विशेष
कार्य की ही नहीं, बल्कि सारी क्रान्तिकारी लहर की ख़ूबसूरती ख़राब करने से
क्या फ़ायदा था?
प्रतिवाद तथा भावनाएँ ज़्यादा देर तक नहीं चल सकतीं। क्रान्तिकारी दल के
द्वारा सरकार को बहुत समय पहले चेतावनी दी जा चुकी। इसके लिए क्रान्तिकारी
दल को भारत ने बेहद इज़्ज़त दी थी और क्रान्ति की लहर सही स्वरूप में आरम्भ
हो गयी थी। वायसराय की गाड़ी पर बम फेंकने का कार्य एक चेतावनी नहीं था;
भले ही वह असफल रहा। चटगाँव की घटनाएँ न चेतावनी थीं और न केवल
विरोध-प्रदर्शन। इसी तरह हरिकृष्ण का एक्शन अपनेआप में क्रान्तिकारी संघर्ष का
एक हिस्सा था, चेतावनी बिल्कुल नहीं। कार्रवाई की असफलता के बाद अभियुक्त
इस चीज़ को खिलाड़ी की तरह ले सकता है। मक़सद पूरा होने पर सम्भव है
भाग्यवश गवर्नर के बच जाने से हरिकृष्ण प्रसन्न हुआ हो। व्यक्तिगत रूप में किसी
को मारने से कोई लाभ भी नहीं। इन कार्यों का राजनीतिक महत्त्व होता है, ये वह
वातावरण और सोचने का ढंग बनाने में मदद करते हैं जोकि आख़िरी संघर्ष के लिए
बहुत ज़रूरी है। इतना ही पर्याप्त है। व्यक्तिगत कार्य लोगों की सहानुभूति जीतने
के लिए होते हैं। हम कभी-कभी इनको अपने कार्यों के द्वारा प्रोपेगेण्डा का नाम
दे देते हैं।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 387
इस विचार की रोशनी में क्रान्तिकारी मुक़दमों की पैरवी होनी चाहिए। यह एक
आम समझ वाला नियम है कि संघर्ष करने वाली सभी पार्टियाँ प्राप्त अधिक करना
चाहती हैं और खोना कम। कोई भी जनरल ऐसी युद्धनीति नहीं अपना सकता जिसमें
उसे सोचे हुए लाभ से अधिक बलिदान देना पड़े। मुझसे अधिक कोई भी हरिकृष्ण
के अमूल्य जीवन को बचाने के लिए बेताब नहीं होगा, पर मैं आपको बताना चाहता
हूँ कि जो चीज़ उसकी ज़िन्दगी को अनमोल बनाती है उसे आँख से ओझल नहीं
करना चाहिए। किसी भी क़ीमत पर जीवन को बचाना ही हमारी नीति नहीं है। यह
कांग्रेस की नीति हो सकती है, यह आरामकुर्सियों वाले राजनीतिज्ञों की नीति हो
सकती है, परन्तु यह हमारी नीति नहीं है। बचाव-नीति (डिफ़ेंस पालिसी)
अधिकतर अभियुक्त के अपने सोचने के ढंग पर आधारित होती है, पर यदि
अभियुक्त न सिर्फ़ निडर हो, बल्कि हमेशा की तरह जोशीला भी रहे तो जिस कार्य
के लिए उसने अपनी ज़िन्दगी का ख़तरा मोल लिया उसे बयान में पहले लिया
जाना चाहिए और व्यक्तिगत मसलों को बाद में। इसके बाद भी एक तरह की
उलझन भरी स्थिति हो सकती है क्योंकि कुछ ऐसे केस हो सकते हैं जिनमें
स्थानीय महत्त्व के होने पर भी कार्रवाई (एक्शन) का आम महत्त्व न हो। वहाँ
अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने में अभियुक्त को भावुक नहीं होना चाहिए।
निर्मलकान्त राय का मशहूर मुक़दमा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, परन्तु इस
तरह के राजनीतिक महत्त्व के केस में व्यक्तिगत पहलू को राजनीतिक पहलू से
अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आप मेरा निष्पक्ष मत प्रस्तुत केस के
बारे में पूछना चाहते हैं तो मैं साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ कि यह ऐतिहासिक
महत्त्व की राजनीतिक हत्या बिल्कुल नहीं है।
यहाँ मैं एक बात अवश्य बताना चाहता हूँ कि इस केस का गला घोंटने वाले
लोग – जिन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया है और उसके बाद जो समझदार
बन गये हैं, लेकिन अपने कन्धों पर उत्तरदायित्व लेने का हौसला नहीं कर पा रहे
हैं – हमारे नौजवान साथी के चमत्कारी चरित्र के सौन्दर्य को नीचा दिखाने की
कोशिश कर रहे हैं। मैंने उन्हें यह कहते सुना है कि हरिकृष्ण बहादुरी से सामना
करने में काँप गया है यह एक हद दर्जे का शर्मनाक झूठ है। मुझे उस जैसा हौसले
वाला नौजवान कभी कोई नहीं मिला। लोगों को हमारे ऊपर मेहरबानी करनी चाहिए।
हौसला पस्त करने और नीचा दिखाने से तो अच्छा है कि वे हमारी तरफ़ ध्यान
ही न दें।
वकीलों को उन नौजवानों की ज़िन्दगियाँ, यहाँ तक कि मौतों को ख़राब करने
में इतने आत्महीन विशेषज्ञ (बेज़मीरे एक्सपर्ट) नहीं होना चाहिए, जो दुखी जनता
की मुक्ति के पवित्र काम में अपना आपा न्योछावर करने के लिए आते हैं। मुझे
यह जानकर सचमुच बहुत दुख होता है कि धीरे-धीरे हम राजनीतिक कार्यकर्ताओं
388 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
की एक नयी अफ़सरशाही बना रहे हैं। यह बात ठीक नहीं है तो भला एक वकील
किसी राजनीतिक मुक़दमे में यक़ीन न आने वाली फ़ीस क्यों माँगे, जैसाकि इस
केस में फ़ीस दी गयी है।
राजद्रोह के केसों में मैं वह हद बता सकता हूँ जिस तक हम पैरवी की इजाज़त
दे सकते हैं। गत वर्ष जब एक साथी पर समाजवादी भाषण देने का मुक़दमा चला
और उसे ग़लत ढंग पर लड़ा गया तो हमें केवल हैरानगी ही हुई थी। ऐसे केसों
में हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और
स्वतन्त्र भाषण का अधिकार माँगना चाहिए, परन्तु कहाँ यह बात और कहाँ यह
कहना कि हमने कुछ कहा ही नहीं! हम इस तरह अपने ही आन्दोलन के हितों
के विरुद्ध जाते हैं। कांग्रेस को मौजूदा आन्दोलन में बिना मुक़दमों की पैरवी किये
जेल जाने से नुक़सान पहुँचा है। मेरे विचार में यह एक ग़लती थी।
ख़ैर, मेरा ख़याल है कि आप मेरा यह पत्र पिछले पत्र के साथ पढ़ेंगे और
राजनीतिक मुक़दमों की पैरवी के बारे में मेरे विचारों से अच्छी तरह परिचित हो
जायेंगे। हरिकृष्ण के केस में मेरे ख़याल में जल्दी से जल्दी हाईकोर्ट में अपील कर
देनी चाहिए और उसको बचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए। मुझे आशा है कि
मेरे ये दोनों पत्र प्रत्येक बात आपको बता देंगे, जो मैं आपको बताना चाहता हूँ।
आपका
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 389
गाँधीजी के नाम
सुखदेव की खुली चिट्ठी
गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गयी
थी जो गाँधीजी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’ 30 अप्रैल, 1931 के अंक में
प्रकाशित हुई थी। — स.
परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की
सफलता के बाद आपने क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल अपना आन्दोलन
बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आज़मा देखने का आख़िरी मौक़ा
देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं। वस्तुतः किसी आन्दोलन को बन्द करना
केवल आदर्श या भावना से होने वाला काम नहीं है। भिन्न-भिन्न अवसरों की
आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए
विवश करता है।
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए
भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अन्तिम समझौता
न होगा। मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ
गये होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई
यह न मानेगा कि हम मंज़िले-मकसूद पर पहुँच गये हैं। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक
न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव
से बँधी हुई है। उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ़
कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के
लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा
विश्राम है। इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की
कल्पना की जा सकती है और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है।
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्तें
ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआओं का है। लाहौर वाले प्रस्ताव के
390 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़