भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजनीतिक मामलों की पैरवी पर
23 दिसम्बर, 1930 को पंजाब के गवर्नर सर ज़्याफ़्रेडी पर क्रान्तिकारी युवक
हरिकृष्ण ने गोली चलायी और उसे घायल कर दिया। हरिकृष्ण पकड़ा गया और
उस पर केस चला। लेकिन वकील की सलाह पर हरिकृष्ण जिस तरह केस की पैरवी
कर रहा था, भगतसिंह उसके तरीक़े से असहमत थे। इसलिए उन्होंने अपने एक साथी
को जेल से दो पत्र जोकि जून, 1931 में लाहौर से प्रकाशित 'पीपुल्स' नामक अंग्रेज़ी
साप्ताहिक में छपा था, नीचे दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि हरिकृष्ण को 9
जून, 1931 को फाँसी दी गयी। – स.
मुझे यह जानकर बहुत अफ़सोस है कि इस सम्बन्ध में मेरा पहला पत्र समय पर
अपने ठिकाने नहीं पहुँच सका और इसलिए उससे कोई फ़ायदा न हो सका, या
यह कि वह उस उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा, जिसके लिए वह लिखा गया
था। इसलिए मैं आमतौर पर यह पत्र राजनीतिक मुक़दमों में पैरवी के सवाल के
बारे में और ख़ासतौर पर क्रान्तिकारी मुक़दमे के बारे में अपने विचारों को प्रकट
करने के लिए लिख रहा हूँ। पहले पत्र में विचारे गये ख़ास-ख़ास नुकतों के अलावा
इसका एक और मक़सद भी होगा, और वह यह कि मैं घटनाओं से गुज़र जाने के
बाद समझदार नहीं बन रहा हूँ।
ख़ैर, मैंने उस ख़त में यह लिखा था कि वकील पैरवी के लिए जो दलीलें
दे रहा था, उन्हें माना न जाये, पर बावजूद आपके और मेरे विरोध के उन्हें मान
लिया गया है।
बावजूद इसके हम अधिक रोशनी में इस बात पर विचार कर सकते हैं और
पैरवी से सम्बन्धित आगामी नीति के बारे में ठोस विचार बना सकते हैं।
आप यह जानते ही हैं कि मैं कभी भी हमारे राजनीतिक बन्दियों की बचाव
वाली पैरवी करने का समर्थक नहीं रहा, परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उचित
संघर्ष की ख़ूबसूरती बिल्कुल ही बिगाड़ दी जाये। इस पर विशेष ध्यान की
आवश्यकता है कि ख़ूबसूरती शब्द यहाँ अवास्तविक शक्ल में प्रयोग नहीं किया
गया है और इसका उस उद्देश्य से सम्बन्ध है, जिसने कि एक ख़ास कार्रवाई के
लिए हरिकृष्ण को प्रेरित किया। जब मैं यह जानता हूँ कि सब राजनीतिक बन्दियों
386 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़