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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 788 में से

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गाँधीजी के नाम

सुखदेव की खुली चिट्ठी

गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गयी
थी जो गाँधीजी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’ 30 अप्रैल, 1931 के अंक में
प्रकाशित हुई थी। — स.
परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की
सफलता के बाद आपने क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल अपना आन्दोलन
बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आज़मा देखने का आख़िरी मौक़ा
देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं। वस्तुतः किसी आन्दोलन को बन्द करना
केवल आदर्श या भावना से होने वाला काम नहीं है। भिन्न-भिन्न अवसरों की
आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए
विवश करता है।
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए
भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अन्तिम समझौता
न होगा। मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ
गये होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई
यह न मानेगा कि हम मंज़िले-मकसूद पर पहुँच गये हैं। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक
न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव
से बँधी हुई है। उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ़
कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के
लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा
विश्राम है। इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की
कल्पना की जा सकती है और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है।
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्तें
ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआओं का है। लाहौर वाले प्रस्ताव के
390 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़