भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
डर है कि इसमें गम्भीर अनियमितता पायी गयी है, जिससे मेरे बचाव में भारी
नुक़सान होगा।
यतीन्द्रनाथ दास,
3 जुलाई, 1929
2.10 अपराह्न
(क्रान्तिकारियों के विरुद्ध मुक़दमे की कार्रवाई किस ढंग से चल रही थी और
ब्रिटिश न्याय किस तरह से एक ढकोसला था, यह तथ्य मजिस्ट्रेट के नाम यतीन्द्रनाथ
दास के इस विरोध-पत्र से भली-भाँति उजागर होता है। – स.)
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 353
होम मेम्बर के नाम पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर \hfill 24 जुलाई, 1929
श्रीमान,
होम मेम्बर, भारत सरकार,
हमें (भगतसिंह और बी.के. दत्त) 12 जून, 1929 को दिल्ली के असेम्बली
बम केस में आजीवन कारावास का दण्ड सुनाया गया। जब तक हम दिल्ली जेल
में हवालाती क़ैदी (अण्डर ट्रायल) रहे, हमारे साथ बड़ा अच्छा सलूक किया गया,
पर जब से उस जेल से हमारी तब्दीली मियाँवाली और लाहौर सेण्ट्रल जेल में हुई,
तब से हमारे साथ इखलाकी क़ैदियों जैसा सलूक किया जा रहा है। पहले ही दिन
हमने उच्च अधिकारियों से अच्छी खुराक तथा कुछ और सुविधाओं की माँग की
और जेल की रोटी खाने से इन्कार कर दिया। हमारी माँगें इस प्रकार थीं –
- राजनीतिक क़ैदी होने के नाते हमें अच्छा खाना दिया जाना चाहिए, इसलिए
हमारे भोजन का रूप यूरोपियन क़ैदियों जैसा होना चाहिए। हम उसी तरह की
खुराक की माँग नहीं करते, बल्कि खुराक का स्तर वैसा चाहते हैं। - हमें मशक्क़त के नाम पर जेलों में सम्मानहीन काम करने के लिए बाध्य
नहीं किया जाना चाहिए। - बिना किसी रोक-टोक के पूर्व स्वीकृत (जिन्हें जेल-अधिकारी स्वीकृत
कर लें) पुस्तकें और लिखने का सामान लेने की सुविधा होनी चाहिए। - कम से कम एक दैनिक पत्र हरेक क़ैदी को मिलना चाहिए।
- हरेक जेल में राजनीतिक क़ैदियों का एक विशेष वार्ड होना चाहिए, जिसमें
उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की सुविधा होनी चाहिए, जो यूरोपियनों के लिए
होती हैं और एक जेल में रहने वाले सभी राजनीतिक क़ैदी उस वार्ड में इकट्ठा
रहने चाहिए। - स्नान के लिए सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
- अच्छे कपड़े मिलने चाहिए।
354 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हमारी ये माँगें पूर्णतया उचित हैं पर जेल-अधिकारियों ने हमें एक दिन कहा
कि उच्च अधिकारियों ने हमारी माँगें मानने से इन्कार कर दिया है। इससे भी
अधिक यह कि ज़बरदस्ती खाना देने वाले हमारे साथ बड़ा बुरा सलूक करते हैं।
1 जून, 1929 को भगतसिंह ज़बरदस्ती खाना देने के पन्द्रह मिनट बाद तक पूरी
तरह बेसुध पड़े रहे। अतः हम यह निवेदन करते हैं कि बिना किसी ढील के यह
दुर्व्यवहार बन्द किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही हमें यू.पी. जेल कमेटी में पण्डित जगतनारायण और ख़ान
बहादुर हाफ़िज़ हिदायत हुसेन की सिफ़ारिश की तरफ़ इशारा करने की आज्ञा दी
जाये। उन्होंने यह सिफ़ारिश की है कि राजनीतिक क़ैदियों के साथ अच्छी क्लास
के क़ैदियों जैसा सलूक किया जाना चाहिए।
हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हमारी माँगों की ओर ध्यान दिया जाये।
आपके,
भगतसिंह और बी.के. दत्त
नोट : राजनीतिक क़ैदियों से हमारा मतलब उन लोगों से है, जिन्हें
शासन-विरोधी कार्रवाइयों के कारण सज़ा हुई। उदाहरण के लिए, 1915-17 के
लाहौर षड्यन्त्र केस, काकोरी षड्यन्त्र केस व अन्य विद्रोही केसों में सज़ा पाये
लोग।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 355
पंजाब जेल जाँच समिति के अध्यक्ष को पत्र
6 सितम्बर, 1929
अध्यक्ष, पंजाब जेल जाँच समिति,
और भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यगण, शिमला
(द्वारा, अधीक्षक, बोर्स्टल इंस्टीट्यूट, लाहौर)
प्रिय महोदयो,
निम्न बातें हम आपके विचारार्थ रखने की अनुमति चाहते हैं –
(1) कि हमने भूख हड़ताल छोड़ी नहीं थी बल्कि सिर्फ़ सरकार के निर्णय
तक इसे स्थगित किया था। हमारा विचार है कि हमने यह बात आपसे स्पष्ट कह
दी थी और बार-बार फिर आपसे यह आग्रह किया था कि इसे जनता और साथ
ही सरकार के सामने स्पष्ट कर दिया जाये।
हमें बहुत हैरानी हुई कि 4 सितम्बर, 1929 के 'सिविल एण्ड मिलिट्री गजट'
में भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यों की ओर से दिये प्रेस-वक्तव्य में इस बात
का कोई ज़िक्र नहीं किया गया। फिर भी हमें उम्मीद है कि आप जल्द से जल्द
यह कर देंगे।
(2) हमने सिर्फ़ आश्वासन पर भूख हड़ताल स्थगित नहीं की थी कि आप
और जाँच समिति के बाक़ी सदस्य हमारे सन्तोष के अनुसार हमारी सारी माँगें मानते
हुए इसकी सिफारिश कर देंगे। हममें से एक ने तो आपसे कहा था कि सरकार
ने विगत समय में बहुत सारे मामलों में जाँच समिति की ऐसी सिफ़ारिशें नहीं मानी
थीं, क्योंकि इससे उनका लक्ष्य पूरा नहीं होता, उदाहरणस्वरूप सकीन समिति का
हवाला दिया गया था।
उन्हें संशय था कि आपकी समिति की सिफ़ारिशों के साथ भी यही व्यवहार
होगा।
जवाब में आपने कहा था कि हमारे पास आने से पहले आपने स्थानीय सरकार
से बात कर ली थी, और आप हमें आश्वासन देने की स्थिति में थे कि सरकार
इस मामले में ऐसा नहीं करेगी।
356 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
इस स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण आश्वासन पर ही, पूरे नौ घण्टे की बहस के बाद,
हमने भूख हड़ताल स्थगित करना स्वीकार किया था।
इसके अतिरिक्त, आपने हमें विश्वास दिलाया था कि हमारी दृढ़ इच्छा के
अनुसार साथी यतीन्द्रनाथ दास को, उनके स्वास्थ्य की नाजुक स्थिति को देखते
हुए रिहा कर दिया जायेगा।
दूसरे यह कि विचाराधीन कैदियों के रूप में हमारी माँगें, जिनमें सबसे
महत्त्वपूर्ण हम सभी को (समेत साथी भगतसिंह और साथी दत्त) एक साथ आम
बैरक में रखने की माँग, सरकार एक या दो दिन में ही मान लेगी।
पर हमारी आशंकाएँ सही सिद्ध हुईं, जब उपसमिति की तगड़ी व एकमत
सिफ़ारिशों के बावजूद सरकार ने न तो साथी दास को रिहा करना स्वीकार किया
और न ही साथी भगतसिंह और साथी दत्त को हमारे साथ रखना।
अतः इस तथ्य के तत्काल प्रमाण मिल गये हैं कि सरकार को आपकी
सिफ़ारिशों की कोई परवाह नहीं और हमें उम्मीद है, आप हमें यह कहने के लिए
क्षमा करेंगे कि सरकार यही चाहती थी कि हमारी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए
जन-नेता होने के आपके सम्माननीय पद का इस्तेमाल करे। हम और भी बता दें
कि भूख हड़ताल स्थगित करने से पहले हमने बहुत ध्यान से इस बात पर विचार
किया था कि जाँच समिति के वायदे पर कहाँ तक भरोसा किया जा सकता है?
इस सम्बन्ध में साथी भगतसिंह और साथी दत्त की सलाह थी कि वर्तमान अवसर
पर इसकी परीक्षा हो जायेगी। अब हम देख रहे हैं कि सरकार ने, जबकि आपकी
दो बहुत साधारण सिफ़ारिशों की ओर भी ध्यान नहीं दिया, हमें तुरन्त भूख हड़ताल
आरम्भ करने के लिए विवश किया है।
(3) साथी दास की अवस्था बेहद चिन्ताजनक है और यदि सरकार यह
सोचती है कि उनके देहान्त के बाद हम अपने कर्त्तव्य से पीछे हट जायेंगे तो यह
उसकी घातक ग़लती है। हम सभी यह बता रहे हैं कि हम सब उन्हीं के रास्ते पर
चलने के लिए तैयार हैं। फिर भी निरन्तर संघर्ष को ध्यान में रखते हुए सुविधा के
लिए हम स्वयं को दो गुटों में बाँट रहे हैं, जिनमें से पहला गुट फ़ौरन भूख हड़ताल
शुरू कर रहा है।
यह निश्चय किया गया है कि जब पहले गुट के सदस्य का देहान्त हो जाये
तो दूसरे गुट में से एक सदस्य आगे आयेगा।
हमने यह निर्णय इसकी पूरी गम्भीरता को देखते हुए लिया है। अपने साथी
दास के पद-चिह्नों पर चलने के सिवाय हमारे समक्ष और कोई भी सम्मानजनक
व सरल रास्ता नहीं बचा है।
हम अपने कॉज़ (Cause) को वाजिब व बाइज़्ज़त समझते हैं, जिन्हें ऐसे गम्भीर
क़दम उठाने पर मजबूर करने की बजाय कोई भी सरकार मान लेती। हम फिर बता
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 357
दें कि हम यह संघर्ष इस हद निश्चय के साथ कर रहे हैं कि वाजिब व पवित्र
लक्ष्य के लिए मृत्यूपर्यन्त संघर्ष करने के सिवाय और कोई भी चीज़ सम्माननीय
व शानदार नहीं हो सकती।
अन्त में हम यह महसूस करते हैं कि हम अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर रहे होंगे,
यदि सरकार के सामने हमारे लक्ष्य को दिये समर्थन के लिए आपकी सच्ची हार्दिक
दिलचस्पी और भारी कष्ट के प्रति आपका हार्दिक आभार न मानें।
सच्चे दिल से, हम हैं आपके,
लाहौर षड्यन्त्र केस के भूख हड़ताली
शुक्रवार, 6 सितम्बर, 1929
प्रातः दस बजे
358 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विद्यार्थियों के नाम पत्र
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया यह पत्र 19
अक्टूबर, 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन में पढ़कर सुनाया
गया था। अधिवेशन के सभापति थे सुभाषचन्द्र बोस। – स.
इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठायें।
आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्त्वपूर्ण काम है। आने वाले लाहौर
अधिवेशन में कांग्रेस देश की आज़ादी के लिए ज़बरदस्त लड़ाई की उद्घोषणा करने
वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कन्धों पर बहुत बड़ी
ज़िम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतन्त्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चों पर
विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार
की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचायेंगे?
नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है,
फ़ैक्टरी-कारख़ानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोंपड़ियों में रहने
वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और
तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।
पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी
ज़िम्मेदारी युवक वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और
शहीद यतीन्द्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें कि
स्वतन्त्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।
22 अक्टूबर, 1929 के ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 359
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है?
सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू के नाम पत्र
लाहौर के स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” नारा लगाने
के जुर्म में छात्रों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ गुजराँवाला में नौजवान भारत सभा ने
एक प्रस्ताव पारित किया। ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक रामानन्द चट्टोपाध्याय ने इस
ख़बर के आधार पर “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह
और बी.के. दत्त ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक को उनके उस सम्पादकीय का
निम्नलिखित उत्तर दिया था। — स.
सम्पादक महोदय,
मॉडर्न रिव्यू।
आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की
चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक
की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय
सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस
प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या
अभिप्राय है।
यह आवश्यक है, क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक
पहुँचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है।
यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी
लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा
कुछ अराजकतावादी क्रान्तिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या
है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई
भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थायी न रह सके, दूसरे शब्दों में — देश
और समाज में अराजकता फैली रहे।
360 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना
प्राप्त हो चुकी है, जो सम्भव है भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके
शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाये, परन्तु इसके साथ ही इस नारे
से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इसके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे
समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न
हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित हैं।
उदाहरण के लिए हम यतीन्द्रनाथ ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा
तात्पर्य यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को
सदा-सदा के लिए बनाये रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के
लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा
लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए ऐसे
ही अचूक उत्साह को अपनायें। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं।
इसी प्रकार हमें 'इन्क़लाब' शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना
चाहिए। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के
आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएँ जोड़ी जाती हैं।
क्रान्तिकारियों की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्यूनल
के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।
इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रान्ति (इन्क़लाब) का अर्थ अनिवार्य
रूप में सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रान्ति को
सफल बनाने के साधन-मात्र हो सकते हैं। इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ
आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल
इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रान्ति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को
क्रान्ति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम
परिणाम क्रान्ति हो।
इस वाक्य में क्रान्ति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं
आकांक्षा' है। लोग साधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते
हैं और परिवर्तन के विचार-मात्र से ही काँपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की
भावना है, जिसके स्थान पर क्रान्तिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है।
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता
है और रूढ़िवादी शक्तियाँ मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं। ये परिस्थितियाँ
मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं।
क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थायी तौर पर ओतप्रोत
रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियाँ मानव समाज की प्रगति की दौड़ में
बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 361
सदैव न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि
एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय
जिसको हृदय में रखकर हम ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा ऊँचा करते हैं।
22 दिसम्बर, 1929 भगतसिंह – बी.के. दत्त
362 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
गृह मन्त्री, भारत सरकार को तार
ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध क्रान्तिकारियों ने जेल में भी प्रतिदिन संघर्ष जारी
रखा। जेलों में सुधार के लिए जो भूख हड़ताल शुरू की गयी, वह कई मंज़िलों से
गुज़री। यतीन्द्रनाथ दास शहीद हुए, सरकार ने कुछ वायदे किये। एक बार भूख
हड़ताल छोड़ी गयी, और फिर शुरू कर दी गयी, क्योंकि सरकार के वायदे झूठे
साबित हुए थे। जनता के सामने सरकार की असलियत लाना उस अभियान का हिस्सा
था। फिर शुरू हुई भूख हड़ताल में सरकार ने कई बेहूदा ढंग अपनाये, लेकिन
क्रान्तिकारी दृढ़ता से अपने विश्वासों पर स्थिर रहे। भगतसिंह और उनके साथी सभी
कष्टों को हँसकर झेलने के सिद्धान्त पर चलते रहे।
20 जनवरी, 1930
प्रति,
गृहमन्त्री, भारत
भगतसिंह और अन्य क़ैदियों की ओर से।
समिति के इस आश्वासन पर कि राजनीतिक क़ैदियों के साथ व्यवहार का
प्रश्न हमारे सन्तोष के अनुसार शीघ्र ही अन्तिम रूप में हल किया जा रहा है, हमने
अपनी भूख हड़ताल स्थगित कर दी थी। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के भूख
हड़ताल सम्बन्धी प्रस्तावों की प्रतियाँ जेल-अधिकारियों ने रोक ली हैं। कांग्रेस
प्रतिनिधि मण्डल को क़ैदियों से मिलने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया गया
है। षड्यन्त्र केस से सम्बन्धित विचाराधीन व्यक्तियों पर पुलिस-अधिकारियों की
आज्ञा से 23, 24 अक्टूबर, 1929 को बुरी तरह हमले किये गये।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 363
तीसरे इण्टरनेशनल, मास्को के अध्यक्ष को तार
24 जनवरी, 1930 को लेनिन-दिवस के अवसर पर लाहौर षड्यन्त्र केस के
विचाराधीन कैदी अपनी गरदनों में लाल रूमाल बाँधकर अदालत में आये। वे
काकोरी-गीत गा रहे थे। मजिस्ट्रेट के आने पर उन्होंने ‘समाजवादी क्रान्ति –
ज़िन्दाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद’ के नारे लगाये। फिर भगतसिंह ने
निम्नलिखित तार तीसरी इण्टरनेशनल, मास्को के अध्यक्ष के नाम प्रेषित करने के
लिए मजिस्ट्रेट को दिया –
“लेनिन-दिवस के अवसर पर हम सोवियत रूस में हो रहे महान अनुभव और
साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिए अपनी दिली मुबारक़बाद भेजते
हैं। हम अपने को विश्व-क्रान्तिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं। मज़दूर-राज की
जीत हो। सरमायादारी का नाश हो।
साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद!!”
विचाराधीन कैदी,
24 जनवरी, 1930 लाहौर षड्यन्त्र केस
(ट्रिब्यून, लाहौर 26 जनवरी, 1930 में प्रकाशित)
364 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
गृह मन्त्रालय, भारत सरकार को स्मरणपत्र
द्वारा,
स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर षड्यन्त्र केस, लाहौर
28 जनवरी, 1930
20 जनवरी, 1930 के हमारे तार के सन्दर्भ में, जो नीचे दिया जा रहा है, हमें कोई
उत्तर नहीं दिया गया –
गृह सदस्य भारत सरकार, दिल्ली–लाहौर साज़िश केस के विचाराधीन
(अण्डर ट्रायल) बन्दियों ने इस आश्वासन पर भूख हड़ताल स्थगित की थी कि
सरकार जेल कमेटी की सिफ़ारिशों पर विचार कर रही है। अखिल भारतीय
सरकारी कॉन्फ़्रेंस समाप्त हो गयी लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी
– राजनीतिक बन्दियों के साथ प्रतिशोधात्मक व्यवहार अभी भी किया जा रहा है।
निवेदन है कि लाहौर साज़िश केस के बन्दियों के बारे में सरकार हमें अपने अन्तिम
निर्णय से एक हफ़्ते में अवगत करा दे।
जिस प्रकार उपरोक्त तार में संक्षेप में बताया है, आपके ध्यान में हम यह लाना
चाहते हैं कि पंजाब की जेलों में बन्द लाहौर साज़िश के बन्दियों और प्रत्येक
राजनीतिक बन्दी को पंजाब जेल जाँच कमेटी के सदस्यों के इस आश्वासन से कि
बहुत जल्द ही राजनीतिक बन्दियों के व्यवहार का प्रश्न हमारी तसल्ली के अनुसार
हल किया जा रहा है, भूख हड़ताल स्थगित कर दी। महान शहीद यतीन्द्रनाथ दास
की शहादत के बाद यह मामला लेजिस्लेटिव असेम्बली में उठा और सर जेम्स
कर्रीर ने सार्वजनिक रूप से यह आश्वासन दिया कि अब मन बदल गया है। और
तभी यह कहा गया था कि राजनीतिक कैदियों के साथ व्यवहार के प्रश्न पर उन्हें
बहुत सहानुभूति है। ऐसे राज–बन्दियों ने जो देश के भिन्न-भिन्न भागों की जेलों
में भूख हड़ताल पर थे, उस समय – उपरोक्त आश्वासन और कुछ बन्दियों की
बदतर हालत को सामने रखकर पास किये गये अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के
पारित प्रस्ताव और निवेदन पर – अपनी हड़ताल स्थगित कर दी थी। उस समय
से सभी स्थानीय सरकारों ने अपनी सिफ़ारिशें पेश कर दी हैं। अलग-अलग राज्यों
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 365
की जेलों के इंस्पेक्टर जनरलों की बैठक लखनऊ में अभी समाप्त हुई है। अखिल
भारतीय सरकारी कॉन्फ्रेंस का विचार-विमर्श दिल्ली में हुआ है। अखिल भारतीय
कॉन्फ्रेंस पिछले दिसम्बर महीने में हुई थी। एक माह से अधिक बीत चुका है,
लेकिन सरकार ने अभी तक एक भी सिफ़ारिश लागू नहीं की। इस तरह के
लटकाये रखने वाले व्यवहार में दूसरों की तरह हमें भी इस बात का भय है कि
सम्भवतः इस सवाल को एक ओर कर दिया गया है। पिछले चार महीनों में जिस
प्रकार भूख हड़तालों और राजनीतिक बन्दियों के साथ प्रतिशोधात्मक व्यवहार
हुआ है, उससे हमारी आशंका और पक्की हुई है। जो यातनाएँ राजनीतिक बन्दियों
को दी जा रही हैं, उनके सम्बन्ध में पूरी जानकारी होना हमारे लिए बहुत कठिन
है लेकिन फिर भी जेल की चारदीवारी में से जो थोड़ी-बहुत सूचनाएँ हमें मिल
सकती हैं वे हमें वस्तुस्थिति से परिचित कराने के लिए पर्याप्त हैं। ऐसे ही कुछ
उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं, जिनमें हम विचलित हुए बिना नहीं रह सके और जो
सरकारी आश्वासनों में मेल नहीं खाते -
- श्रीयुत ब.क. बनर्जी, जो दक्षिणेश्वर बम केस के सम्बन्ध में लाहौर सेण्ट्रल
जेल में पाँच बरस की सज़ा भुगत रहे हैं, गत वर्ष आम भूख हड़ताल में शामिल
हो गये। उनकी सज़ा के हिसाब से उनकी रिहाई पिछले दिसम्बर माह में हो जानी
थी, लेकिन अब चार माह के लिए टाल दी गयी है। इस जेल में लाहौर साज़िश
के सम्बन्ध में आजीवन बन्दी की सज़ा भुगत रहे सत्तर वर्षीय वृद्ध बाबा सोहन
सिंह¹ को सज़ा दी गयी है। इसके अलावा अन्यों में से मियाँवाली जेल में बन्द
सरदार काबल सिंह² और सरदार गोपाल सिंह³ को आम भूख हड़ताल में शामिल
होने के कारण सज़ाएँ दी गयी हैं। इनमें से अनेक मामलों में कैद बढ़ा दी गयी है,
जबकि कुछ स्पेशल क्लास से हटा दिये गये हैं। - इसी अपराध में अर्थात आम भूख हड़ताल में शामिल होने के कारण आगरा
सेण्ट्रल जेल में बन्द सर्वश्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, रामकृष्ण खत्री, सुरेश चन्द्र
भट्टाचार्य, रामकुमार सिन्हा, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त तथा काकोरी
केस के अनेक बन्दियों को सख़्त सज़ाएँ दी गईं। विश्वस्त सूत्र से पता चला है कि
श्री सान्याल को बेड़ियाँ डालकर एकान्त कोठरी में रखा गया है, जिसके कारण
उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया है। उनका वज़न 18 पौण्ड कम हो गया है। मालूम हुआ
कि श्री भट्टाचार्य तपेदिक के मरीज हैं। बरेली जेल के तीन बन्दियों को भी सज़ाएँ
दी गयी हैं। उनकी समस्त सुविधाएँ वापस ले ली गयीं। यहाँ तक कि अपने - बाबा सोहन सिंह भकना, (1867-1968), ग़दर पार्टी के पहले अध्यक्ष
- काबल सिंह गोविन्दपुरी
- गोपाल सिंह क़ौमी
366 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सम्बन्धियों से मुलाक़ात एवं पत्र-व्यवहार करने जैसे आम अधिकार भी छीन लिये
गये हैं। उनके वज़न काफ़ी कम हो गये हैं। इस सम्बन्ध में पण्डित जवाहरलाल
ने सितम्बर, 1929 और जनवरी, 1930 में दो प्रेस वक्तव्य दिये थे।
3. भूख हड़ताल के सम्बन्ध में अखिल भारतीय कांग्रेस का प्रस्ताव, स्वीकृत
होने के पश्चात, तार द्वारा अलग-अलग राजनीतिक बन्दियों को भेजा गया। इनकी
कापियाँ जेल-अधिकारियों ने रोक लीं। फिर इस सम्बन्ध में सरकार ने बन्दियों से
मुलाक़ात के लिए कांग्रेस प्रतिनिधि मण्डल को इजाज़त नहीं दी।
4. पुलिस के उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार 23 एवं 24 अक्टूबर, 1929
को लाहौर साज़िश केस के मुलज़िम बन्दियों पर वहशियाना हमला किया गया।
विवरण समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए हैं। स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण ने
हममें से एक व्यक्ति का बयान दर्ज किया था। इस बयान की कापी आपको
16 दिसम्बर, 1929 को भेजी जा चुकी है। पर न तो पंजाब सरकार और न ही
भारत सरकार ने उत्तर देना या हमारी ओर से जाँच कराने की माँग को आवश्यक
समझा, जबकि दूसरी ओर से इसी घटना के सम्बन्ध में 'हिंसात्मक प्रतिशोध' लेने
के इरादे से स्थानीय सरकार ने हम पर मुक़दमा चलाने की बहुत आवश्यकता
महसूस की है।
5. दिसम्बर, 1929 के अन्तिम सप्ताह में लाहौर बोर्स्टल जेल में क़ैद बन्दी
श्री किरणचन्द्र दास तथा अन्य आठ को जब मजिस्ट्रेट की अदालत में लाकर पेश
किया गया तो उन्हें हथकड़ियों और ज़ंजीरों से जकड़ा हुआ था। यह पंजाब जेल
जाँच कमेटी और पंजाब की जेलों के इंस्पेक्टर जनरल के समझौते का सरासर
उल्लंघन था। यह ध्यान देने योग्य है कि ये जमानत योग्य जुर्म के तहत बन्दी थे।
इस सम्बन्ध में डॉक्टर मोहम्मद आलम, लाला दुनीचन्द लाहौर वाले और लाला
दुनीचन्द अम्बाला वाले के लम्बे बयान 'ट्रिब्यून' में प्रकाशित हुए हैं।
जब हमें राजनीतिक बन्दियों की समस्त यातनाओं का पता चला तो हमने भूख
हड़ताल पुनः प्रारम्भ करने से गुरेज किया। भले ही इस बात का हमें अत्यन्त दुख
था, लेकिन हमने सोचा कि समस्या जल्द ही तय हो जायेगी। लेकिन अब उपरोक्त
उदाहरणों की रोशनी में क्या हम यह मानें कि भूख हड़ताल की अनकही, भयंकर
यातनाएँ और यतीन्द्रनाथ दास की महान शहादत ऐसे ही चली गयी? क्या हम यही
मानें कि उभर रहे जन-आन्दोलन को रोकने और संकटमय दौर को टालने की
नीयत से ही सरकार ने हमें आश्वासन दिये थे? हम आशा करते हैं कि आप हमसे
असहमत नहीं होंगे कि हमने काफ़ी समय तक धैर्य से प्रतीक्षा की है। लेकिन हम
अनन्त काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। सरकार के अपने ढुलमुल व्यवहार एवं
राजनीतिक बन्दियों के साथ दुर्व्यवहार के चलते हमारे पास पुनः संघर्ष शुरू करने
के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। हम जानते हैं कि भूख हड़ताल आरम्भ
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 367
करना और उसे जारी रखना कोई सरल कार्य नहीं, लेकिन साथ ही हम बता देते
हैं कि भारत अन्य बहुत-से यतीन्द्र और रामरक्खा और भान सिंह पैदा कर सकता
है। (अन्तिम दोनों ने 1917 में अण्डमान द्वीपों में अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया
था। पहले ने 92 दिनों की भूख हड़ताल के बाद आख़िरी साँस ली और दूसरा छह
महीने तक चुपचाप अमानवीय अत्याचार सहते हुए महान नायक की मृत्यु को प्राप्त
हुआ।)
राजनीतिक बन्दियों से अच्छे व्यवहार के समर्थन में जनता में से लोगों ने तथा
हमने काफ़ी कुछ कहा है। इसे दोहराने की ज़रूरत नहीं है। वर्गीकरण के मामले
में सबसे अहम पक्ष और मूल मन्तव्य की स्थापना के बारे में हम कुछ शब्द कहना
चाहेंगे। वर्गीकरण के मापदण्ड के प्रश्न पर हंगामा हुआ है। अलग-अलग सरकारों
को सुझाये हुए मापदण्ड में से मूल मन्तव्य को बिल्कुल निकाल दिया गया है। यह
वास्तव में अजब व्यवहार है। मात्र मूल मन्तव्य से ही किसी भी कार्यवाही की सही
क़द्र का निर्णय किया जा सकता है। क्या हम यह समझें कि सरकार – एक ऐसे
हमलावर जो अपने शिकार का शोषण करते हुए उसे जान से मार डालता है और
एक खड्गबहादुर, जो एक बदमाश की हत्या करके नौजवान लड़की की इज़्ज़त
बचाता है और समाज को सबसे अधिक दुराचारी चापलूस से मुक्ति दिलाता है –
दोनों के बीच अन्तर करने में असमर्थ है? क्या दोनों को एक ही वर्ग का व्यक्ति
समझा जाये? क्या एक जैसा अपराध करने वाले दो व्यक्तियों में कोई अन्तर नहीं
जिनमें एक स्वार्थी है और दूसरा निस्वार्थ? इसी तरह क्या एक सामान्य हत्यारे और
एक राजनीतिक कार्यकर्ता में कोई अन्तर नहीं? भले ही राजनीतिक कार्यकर्ता हिंसा
भी अपना ले, उसकी यह निस्वार्थता क्या उसे शेष अपराधियों से ऊँचा नहीं कर
देती? ऐसी स्थितियों में हमारी मान्यता है कि वर्गीकरण के मापदण्ड में मन्तव्य को
सबसे मुख्य पक्ष की तरह लिया जाना चाहिए।
गत वर्ष हमारी भूख हड़ताल आरम्भ होने पर जब इसी बात पर विचार के लिए
अनेक जन-नेता – जिनमें डॉ. गोपीचन्द्र और लाला दुनीचन्द अम्बाला वाले भी थे,
जिन्होंने पंजाब जेल में जाँच कमेटी की सिफ़ारिशों पर हस्ताक्षर किये हैं – हमारे
पास आये और जब उन्होंने बताया कि आतंकवादी अपराध के बन्दियों में से सज़ा
पाये राजनीतिक बन्दियों को सरकार विशेष वर्ग के बन्दी मानने पर विचार कर रही
है, तब वास्तव में हत्या के अपराधियों को बाहर रखने वाली हद तक की सिफ़ारिश
को समझौते के तौर पर मान लिया गया, लेकिन बाद में बहस के दौरान दूसरा ही
रवैया अपना लिया गया और पंजाब जेल जाँच कमेटी के लिए हवाले की शर्तों
वाला संयुक्त बयान इस तरह लिखा गया, जिससे प्रतीत होता था कि मूल मन्तव्य
का प्रश्न बिल्कुल ही अलग कर दिया गया है और समूचा वर्गीकरण दो चीज़ों पर
आधारित था –
368 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
- अपराध का ढंग, और
- अपराधी का सामाजिक स्तर।
इस मापदण्ड ने समस्या के निदान के बजाय उसे पेचीदा बना दिया।
अहिंसात्मक और हिंसात्मक अपराधों वाले राजनीतिक बन्दियों में दो वर्गों
वाली बात हम समझ सकते थे। लेकिन पंजाब जेल जाँच कमेटी की सिफ़ारिशों
में सामाजिक स्तर का प्रश्न आ जाता है। जिस प्रकार चौधरी अफ़ज़ल हक़ ने रिपोर्ट
से असहमति की टिप्पणी में ठीक ही कहा है कि स्वतन्त्रता के कार्य में जुटे रहने
के कारण कंगाल हो गये राजनीतिक कार्यकर्ताओं का क्या होगा? क्या उन्हें किसी
न्यायाधीश की दया पर छोड़ दिया जाये, जो प्रत्येक को साधारण अपराधी कहकर
अपनी वफ़ादारी सिद्ध करने की कोशिश करता रहेगा। या यह आशा की जाये कि
एक असहयोगी जेल से अच्छे व्यवहार की प्रार्थना करते हुए उन लोगों के आगे हाथ
फैलायेगा, जिनके विरुद्ध वह जूझ रहा है? क्या यह ढंग इस बेचैनी के कारण को
दूर करने का है या बढ़ाने का? तर्क दिया जा सकता है कि जेलों के बाहर दरिद्रता
में जीते लोगों को जेलों में ऐशो-आराम की आशा नहीं रखनी चाहिए जहाँ कि उन्हें
सज़ा के उद्देश्य से बन्दी बनाकर रखा गया है। पर वे कौन-से सुधार हैं जिनकी
ऐश के लिए आवश्यकता होती है? क्या वे मात्र साधारण जीवन-स्तर की
आवश्यकताएँ नहीं हैं? माँगी जाने वाली समस्त सुविधाओं के बावजूद जेल सदा
जेल ही रहेगी। बाहर के लोगों को आकर्षित करने के लिए (जेल) कोई चुम्बकीय
शक्ति नहीं होती और न ही कभी हो सकती है। केवल जेल आने के लिए कोई
भी अपराध नहीं करता। हम यह कहने का साहस रखते हैं कि किसी भी सरकार
का यह बहुत घटिया तर्क होगा कि नागरिकों को इस दर्जे तक मोहताजगी हो गयी
है, और उनके रहने का स्तर जेल के स्तर की अपेक्षा घटिया हो गया है। क्या ऐसे
तर्क में सरकार के अस्तित्व की कोई सम्भावना शेष रह जाती है? खैर, इस समय
हमें इन बातों से कोई सरोकार नहीं है। हम कहना चाहते हैं कि बेचैनी को दूर करने
का सबसे बेहतर ढंग यह है कि राजनीतिक बन्दियों को भिन्न वर्ग में रखा जाये।
बाद में अगर आवश्यकता महसूस हो तो इसको पुनः दो वर्गों – एक, जो अहिंसक
अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं और दूसरे, जो हिंसक अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं – में बाँटा
जा सकता है। इस स्थिति में मन्तव्य निर्णयात्मक पहलू बन जायेगा। यह कहना कि
राजनीतिक मामलों में मन्तव्य का फ़ैसला नहीं किया जा सकता, एक झूठा दावा
है। वह कौन-सी चीज़ है जो आज जेल-अधिकारियों से जेलों में 'राजनीतिकों' को
साधारण सुविधाओं से वंचित करने के लिए कहती है? वह कौन-सी चीज़ है जो
उनकी नम्बरदारियाँ छीनती है? वह कौन-सी चीज़ है जो अधिकारियों से यह
कहती है कि उन्हें शेष बन्दियों से अलग रखा जाये? यही चीज़ वर्गीकरण में भी
मदद कर सकती है।
जेल की सलाखों के पीछे से / 369
जहाँ तक विशेष माँगों का सम्बन्ध है, हम पहले ही पंजाब जेल जाँच कमेटी
से अपने स्मरण-पत्र में पूरी तरह कह चुके हैं। फिर भी हम इस बात पर ज़ोर देना
चाहते हैं कि किसी भी राजनीतिक बन्दी का चाहे जो अपराध हो, उसे सख़्त और
सम्मान-विरोधी मशक़्क़त नहीं मिलनी चाहिए। एक जेल में ऐसे सभी बन्दियों को
एक ही वार्ड में साथ-साथ रखना चाहिए और स्थानीय भाषा या अंग्रेज़ी का कम
से कम एक समाचारपत्र उन्हें दिया जाना चाहिए। अध्ययन के लिए सभी आवश्यक
सुविधाएँ दी जानी चाहिए और व्यक्तिगत साधनों से भोजन और कपड़े पर ख़र्च
बढ़ाने की इजाज़त दी जानी चाहिए।
हम अभी भी आशान्वित हैं कि सरकार हमें और जनता को दिये गये आश्वासन
को अविलम्ब कार्यरूप में लायेगी, ताकि भूख हड़ताल का फिर अवसर न आये।
आगामी सात दिनों में यदि सरकार ने अपना आश्वासन पूरा न किया तो हम पुनः
भूख हड़ताल करने के लिए बाध्य होंगे।
आपके,
भगतसिंह, दत्त और अन्य क़ैदी
लाहौर षड्यन्त्र केस।
370 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर के नाम
द्वारा, सुपरिटेण्डेण्ट, सेन्ट्रल जेल, लाहौर
11 फ़रवरी, 1930
मिस्टर मजिस्ट्रेट,
4 फ़रवरी, 1930 के सिविल एण्ड मिलिट्री गजट में प्रकाशित आपके बयान
के सम्बन्ध में यह ज़रूरी जान पड़ता है कि हम अपने अदालत में न आने के कारणों
से आपको परिचित करवायें, ताकि कोई ग़लतफ़हमी और ग़लत-प्रस्तुति सम्भव न
हो।
पहले हम यह कहना चाहेंगे कि हमने अभी तक ब्रिटिश अदालतों का बायकाट
नहीं किया है। हम मि. लुइस की अदालत में जा रहे हैं, जो हमारे विरुद्ध जेल एक्ट
धारा 22 के अधीन मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं। यह घटना 29 जनवरी को
आपकी अदालत में घटित हुई थी। लाहौर षड्यन्त्र केस के सम्बन्ध में यह क़दम
उठाने के लिए हमें विशेष परिस्थितियों ने मजबूर किया है। हम शुरू से ही महसूस
करते रहे हैं कि अदालत के ग़लत रवैये द्वारा या जेल के अथवा अन्य अधिकारियों
द्वारा हमारे अधिकारों की सीमा लाँघकर हमें निरन्तर जान-बूझकर परेशान किया जा
रहा है ताकि हमारी पैरवी में बाधाएँ डाली जा सकें। कुछ दिन पहले जमानत की
दरख़्वास्त में हमने अपनी तकलीफ़ें आपके सामने रखी थीं, लेकिन उस दरख़्वास्त
को कुछ क़ानूनी नुक्तों पर नामंजूर करते हुए आपने बन्दियों की तकलीफ़ों का ज़िक्र
करना ज़रूरी नहीं समझा, जिनके आधार पर जमानत की दरख़्वास्त दी गयी थी।
हम महसूस करते हैं कि मजिस्ट्रेट का पहला व मुख्य फ़र्ज़ यह होता है कि
उसका व्यवहार निष्पक्ष व दोनों पक्षों के ऊपर उठा होना चाहिए। यहाँ तक कि उस
दिन माननीय जस्टिस कोर्ट ने यह रूलिंग दी थी कि मजिस्ट्रेट को दूसरी सबसे
महत्त्वपूर्ण बात अपने सामने रखनी चाहिए कि विचाराधीन क़ैदी को अपनी पैरवी
के सम्बन्ध में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े और यदि कोई मुश्किल
हो तो उसे दूर करना चाहिए, अन्यथा पूरा मुक़दमा एक मज़ाक़ बनकर रह जाता
है। लेकिन ऐसे महत्त्वपूर्ण मुक़दमे में मजिस्ट्रेट का व्यवहार इससे उल्टा रहा है,
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 371
जिसमें 18 नवयुवकों पर गम्भीर आरोपों जैसे हत्या, डकैती और षड्यन्त्र - के
अधीन मुक़दमा चलाया जा रहा है, जिनसे सम्भव है उन्हें मृत्युदण्ड दिया जाये।
जिन प्रमुख मुद्दों पर हम आपकी अदालत में न आने के लिए विवश हुए हैं, वे इस
तरह हैं -
विचाराधीन क़ैदियों में से अधिकांश दूर-दराज प्रान्तों से हैं और सभी मध्य
वर्गीय लोग हैं। ऐसी स्थिति में उनके सम्बन्धियों द्वारा उनकी पैरवी के लिए
बार-बार आना न सिर्फ़ बहुत मुश्किल है, बल्कि बिल्कुल असम्भव है। वे अपने
कुछ दोस्तों से मुलाक़ात करना चाहते थे, जिन्हें वे अपनी पैरवी की सभी
ज़िम्मेदारियाँ सौंप सकते थे। साधारण बुद्धि का भी यही तक़ाज़ा है कि उन्हें
मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, इस मक़सद के लिए बार-बार प्रार्थना की
गयी, लेकिन सभी प्रार्थनाएँ अनसुनी रहीं।
श्री बी.के. दत्त बंगाल के रहने वाले हैं और श्री कमलनाथ तिवारी बिहार के।
दोनों अपनी-अपनी मित्र कुमारी लज्जावती व श्रीमती पार्वती से भेंट करना चाहते
थे। लेकिन अदालत ने उनकी दरख़्वास्त जेल-अधिकारियों को भेज दी और उन्होंने
यह कहकर दरख़्वास्त रद्द कर दी कि मुलाक़ात सिर्फ़ सम्बन्धियों व वकीलों से
ही हो सकती है। यह मामला बार-बार आपके ध्यान में लाया गया, लेकिन ऐसा
कोई क़दम नहीं उठाया गया, जिससे बन्दी पैरवी के लिए आवश्यक प्रबन्ध कर
सकते। बाद में उन्हें इनका वकालतनामा हासिल करने पर भी मुलाक़ात करने की
आज्ञा नहीं दी गयी और यहाँ तक कि मजिस्ट्रेट ने जेल-अधिकारियों को यह
लिखने से भी इन्कार कर दिया कि बन्दी उसकी ओर से चलाये जा रहे मुक़दमे
की पैरवी के सम्बन्ध में इन मुलाक़ातों की माँग कर रहे थे और इस प्रकार बन्दी
ऊपर की अदालत में जाने योग्य नहीं रहे। लेकिन मुक़दमे की सुनवाई जारी रही।
इन परिस्थितियों में बन्दी बिल्कुल विवश थे और उनके लिए मुक़दमा मज़ाक़ से
अधिक कुछ नहीं था। यह बात नोट करने योग्य है कि दूसरे बन्दियों में भी
अधिकांश की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो रहा था।
मेरा कोई वकील नहीं है और न ही मैं पूरे समय के लिए किसी को वकील
रख सकता हूँ। मैं कुछ नुकतों सम्बन्धी क़ानूनी परामर्श चाहता हूँ और एक विशेष
पड़ाव पर मैं चाहता था कि वे (वकील) कार्रवाई को स्वयं देखें, ताकि अपनी
राय बनाने के लिए वे बेहतर स्थिति में हों, लेकिन उन्हें अदालत में बैठने तक की
जगह नहीं दी गयी। हमारी पैरवी रोकने के लिए, हमें परेशान करने के लिए क्या
सम्बन्धित अधिकारियों की यह सोची-समझी चाल नहीं थी? वकील अपने सायलों
(प्रार्थियों) के हितों को देखने के लिए अदालत में आता है, जो न तो स्वयं
उपस्थित होते हैं और न उनका कोई प्रतिनिधि वहाँ होता है। इस मुक़दमे की ऐसी
कौन-सी विशेष परिस्थितियाँ हैं, जिससे मजिस्ट्रेट वकीलों के प्रति ऐसा सख़्त रवैया
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