भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है?
सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू के नाम पत्र
लाहौर के स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” नारा लगाने
के जुर्म में छात्रों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ गुजराँवाला में नौजवान भारत सभा ने
एक प्रस्ताव पारित किया। ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक रामानन्द चट्टोपाध्याय ने इस
ख़बर के आधार पर “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह
और बी.के. दत्त ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक को उनके उस सम्पादकीय का
निम्नलिखित उत्तर दिया था। — स.
सम्पादक महोदय,
मॉडर्न रिव्यू।
आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की
चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक
की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय
सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस
प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या
अभिप्राय है।
यह आवश्यक है, क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक
पहुँचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है।
यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी
लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा
कुछ अराजकतावादी क्रान्तिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या
है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई
भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थायी न रह सके, दूसरे शब्दों में — देश
और समाज में अराजकता फैली रहे।
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