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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

जिसका उल्लेख हम पिछले अंक में कर चुके हैं, के सन्दर्भ में लिखा गया था, लेकिन
उसमें नौजवानों का उल्लेख आ गया। लाला जी फ़रमाते हैं कि आजकल के उग्र
विचारों वाले नौजवानों के भाषणों से जनता को बचना चाहिए। ये युगान्तकारी क्रान्ति
समर्थक हैं। सम्पत्ति के लिए इनका प्रचार हानिकारक है, क्योंकि इससे वर्ग-संघर्ष
छिड़ने का डर है। अन्त में कहा कि यह काम कुछ विदेशी शरारती तत्त्वों के उकसावे
में आकर आरम्भ किया गया है। वह बाहरी तत्त्व हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट
डालना चाहते हैं, इसलिए वह बहुत ख़तरनाक हैं। साथ वह यह भी मानते हैं कि इस
तरह के प्रचार से सम्पत्ति वाले व्यक्ति सरकार में मिल जायेंगे। इन प्रचारक नौजवानों
को गुमराह, बाहरी तत्त्वों के उकसावे में आये हुए, शरारती और लोभी बताते हुए अन्त
में कहा है कि उन्हें पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर पूरी तरह यक़ीन है। वे यदि कुछ
कर रहे हैं अथवा कह रहे हैं तो नेकनीयती और समझबूझ से। बहुत ख़ूब! जिन पण्डित
जवाहरलाल नेहरू आदि के विचारों पर रूस का अच्छा-ख़ासा असर हुआ, जिन्होंने
रूस से लौट आने पर इन विचारों का प्रचार शुरू किया, उनकी नीयत पर कोई शक
नहीं। वह विदेशी प्रभाव या उकसावे में ये बातें नहीं कह रहे, बल्कि नेकनीयती से
कह रहे हैं, लेकिन जो बेचारे देश से बाहर नहीं जा सके वे उकसावे में आये हुए हैं!
ख़ूब! बहुत ख़ूब! असल बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू की हैसियत बहुत बड़ी
हो गयी है। उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेश हो रहा है, तो उम्मीद भी
है कि वे जल्द ही अध्यक्ष बन भी जायेंगे। उनके विरुद्ध लिखने पर ईंट का जवाब
पत्थर से मिलने का भय होता है, लेकिन गुमनाम नौजवानों के लिए जो मन में आये.
..कौन पूछता है। नौजवानों को संकटों में फँसाने की इन कोशिशों को हम क्या कहें?
लाला जी को यह शोभा नहीं देता। ख़ैर, जो उनके मन में आये, करें। अब हम उनकी
कुछ बातों का उत्तर देना चाहेंगे।
सबसे पहले हम यह बताना चाहते हैं कि इस प्रचार के लिए कोई विदेशी
हमें गुमराह नहीं कर रहा। नौजवान किसी के उकसावे में आकर ऐसी बातें नहीं
कह रहे, बल्कि अब देश के भीतर से ही महसूस करने लगे हैं। लाला जी स्वयं
बड़े आदमी हैं। प्रथम या द्वितीय श्रेणी में यात्रा करते हैं। उन्हें क्या मालूम कि
तीसरे दर्जे में कौन सफ़र कर रहा है? वे क्या जानें कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िर-
ख़ानों में किसे लातें खानी पड़ती हैं? वे मोटर में बैठकर अपने साथियों के साथ
हँसते-खेलते हज़ारों गाँवों से गुज़र जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि हज़ारों लोगों पर
क्या गुज़र रही है? क्या आज हम 'अनहैप्पी इण्डिया' जैसी किताब के लेखक
को हिन्दुस्तान के करोड़ों भूखों मरने वालों की दयनीय दशा बतायें? क्या आज
उन करोड़ों मनुष्यों को देखकर जो सुबह से शाम तक ख़ून-पसीना एक करके
पेट भी नहीं भर सकते, यह आवश्यकता शेष रह जाती है कि कोई बाहर से
आकर हमें कहे कि उनके पेट भरने की कोई राह निकालो। हम गाँवों में गर्मी,
316 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सर्दी, बारिश, धूप, लू और कोहरे में रात-दिन किसानों को काम करते देखते
हैं। लेकिन वे बेचारे रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहे हैं – और क़र्ज़ के
नीचे दबे हुए हैं। तब क्या हम तड़प नहीं उठते? उस समय हमारे दिलों में आग
नहीं भड़क उठती? तब भी क्या हमें किसी की आवश्यकता रह जाती है जो
आकर यह बताये कि इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करो। जब हम नित्य
प्रति देखते हैं कि श्रमिक भूखे मरते हैं और निठल्ले बैठकर खाने वाले आनन्द
मना रहे हैं, तो क्या हम इस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ियाँ
अनुभव नहीं कर सकते? जब हम देखते हैं कि दिनोदिन अपराध बढ़ रहे हैं,
जनता की हालत रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है, तब क्या हमें बाहरी
उपदेशकों की आवश्यकता है जो हमें आकर समझायें कि क्रान्ति की
आवश्यकता है...करोड़ों मनुष्यों को जिन्हें हमने अछूत कहकर दूर किया हुआ है
उनकी दर्दनाक स्थितियाँ देखकर क्या क्रोध नहीं आता? करोड़ों (लोग) दुनिया
का बहुत विकास कर सकते हैं, वे जन-सेवा कर सकते थे, लेकिन आज वे हम
पर भार महसूस होते हैं। उनकी इस स्थिति में सुधार के लिए, उन्हें पूर्ण रूप
से मनुष्य बनाने के लिए और कुओं की जगत पर चढ़ाने-मात्र के लिए क्या
आन्दोलनों की ज़रूरत नहीं है? क्या उन्हें ऐसी अवस्था में लाने की आवश्यकता
नहीं थी कि वे हमारी तरह कमा-खा सकें? इसके लिए क्या सामाजिक और
आर्थिक नियमों में क्रान्ति आवश्यक नहीं है? क्या पंजाब तथा हिन्दुस्तान के
नौजवानों में स्वयं कुछ अहसास करने की कोई शक्ति शेष नहीं बची? उनके
सीने में क्या दिल नहीं धड़कता? क्या उनके दिलों में मानवता नहीं है? नहीं तो
फिर क्यों कहा जाता है कि विदेशियों ने आकर उन्हें उकसाया है। हाँ, हम यह
स्वीकारते हैं कि रूसी क्रान्ति ने दुनिया के समक्ष एकदम नये विचार रखे हैं।
हम मानते हैं कि जिन बातों का हल शायद अभी हम स्वयं नहीं सोच सकते,
रूसी विद्वानों ने उम्रभर कष्ट सहते हुए, तिल-तिल कर जीवन समाप्त करते हुए
उनके बारे में अपने विचार दुनिया के सामने रखे। क्या उन्हें उसका कोई लाभ
नहीं मिलना चाहिए? क्या उनसे विचारों की समानता भी उकसावा है? तब तो
लाला जी को मैजिनी ने देश के नौजवानों को गुमराह करके देशसेवा के काम
में जुटाया हुआ था!
प्रश्न यह है कि आजकल, 1928 में, क्या दुनिया को फ़्रांसीसी क्रान्ति से
कोई सबक सीखना और उसे अपना आदर्श बनाना चाहिए या आज नये वातावरण
में नये विचारों से पूर्ण रूसी क्रान्ति को? क्या लाला जी की यह मंशा है कि
अब अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध ही क्रान्ति की जाये और शासन की बागडोर अमीरों
के हाथों में दी जाये? करोड़ों जन इसी तरह नहीं, इससे भी अधिक बुरी
स्थितियों में पड़ें, मरें और तब फिर सैकड़ों बरसों के खून-ख़राबे के पश्चात
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 317

पुनः इस राह पर आयें और फिर हम अपने पूँजीपतियों के विरुद्ध क्रान्ति करें?
यह अव्वल दर्जे की मूर्खता होगी।
लाला जी ने एक-दो बार दास के शब्द सुन-सुनाकर गाँवों में संगठन की बात
थोड़ी-सी उठायी थी। लाला जी को तो गाँवों में जाने की फुरसत ही नहीं। वे क्या
जानें कि जनता के विचार क्या हैं? लोग साफ़ कहते हैं कि हमें इन्कलाब का क्या
लाभ? जब इसी तरह मर-खपकर दो जून की रोटी जुटनी है और तब भी नम्बरदार,
तहसीलदार और थानेदार को इसी तरह अत्याचार करने हैं, इसी तरह किराये वसूल
किये जाने हैं तो हम अभी की रोटी क्यों गँवाये? किसी के लिए अपने प्रियजनों
को क्यों उलझनों में डालें? हम उन्हें क्या बतायें कि उनके पूर्वज कैसे थे, जिससे
कि वे बलिदान के लिए तैयार हो जायें।
अच्छा, माना कि यहाँ क्रान्ति हो जाये तब लाला जी के विचार से किसे शासन
सौंपा जायेगा? क्या महाराज वर्द्धमान या महाराज पटियाला को और पूँजीपतियों के
टोले को? क्या आज अमेरिका और फ़्रांस के करोड़ों मज़दूर भूखों नहीं मर रहे?
हम सबकुछ जानते-बुझते क्यों कुएँ में गिरें?
लाला जी कहते हैं कि हमारे साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूँजीपति सरकार
के साथ मिल जायेंगे। बहुत ख़ूब! पहले वे किधर हैं? कितने पूँजीपति युगान्तरकारी
बने हैं? क्रान्ति से जिन्हें अपनी सम्पत्ति में थोड़ी-बहुत हानि होने का डर होगा वे
हमेशा ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनकी जी-हजूरी के लिए आदर्श
त्यागकर ख़ामखाह अपने कार्य को हानि पहुँचाना उचित नहीं। दूसरी बात यह कि
पूँजीपति ज़रा सोचें कि किस स्थिति में उन्हें लाभ है? आज अंग्रेज़ उन्हें अपने स्वार्थ
के लिए अपने साथ अवश्य मिला लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूँजी छीनकर उसे
अपने पूँजीपतियों के हाथों में स्थानान्तरित कर देंगे। तब यह ग़रीब (हो गये
सरमायेदार) आज जैसे करोड़ों मज़दूरों में शामिल होकर मरते-खपते रहेंगे। इन्हें
सामाजिक व्यवस्था में अन्याय दिखायी देगा। अगर वे साम्यवादी क्रान्ति कर लें तो
आज उनकी हरामख़ोरी पर तो ज़रूर रोक लगायी जायेगी लेकिन दुनिया की आम
खुशहाली में जोकि निश्चय ही आनी है, शामिल होकर वे बहुत सुखी रहेंगे।
हिन्दुस्तानी पूँजीपति सोच लें कि उनको किस में लाभ है?
लेकिन मज़दूर-आन्दोलन उनके लिए रुक नहीं सकता, उनकी प्रतीक्षा भी नहीं
कर सकता। नौजवानों को घबराना नहीं चाहिए। काम को आरम्भ करने में बहुत
कठिनाइयाँ पैदा होती हैं, धीरज से मुक़ाबला करना चाहिए। लाला जी और दूसरे
प्रकार के पूँजीवादी नीति वाले नेता भी धीरे-धीरे स्वयं मैदान से बाहर हो रहे हैं,
जिस प्रकार पहले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी हुए थे और आज सप्रू तथा चिन्तामणि जैसे हो
रहे हैं। अन्त में मज़दूर-आन्दोलन की जीत होगी। बोलो साम्यवादियों की जय!
युगान्तकारी धारा क़ायम रहे!
318 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

नये नेताओं के अलग-अलग विचार
(जुलाई, 1928 के ‘किरती’ में छपे इस लेख में भगतसिंह ने सुभाषचन्द्र बोस
और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है। बाद में इतिहास ने भगतसिंह
के इन विचारों की पुष्टि की। – स.)
असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी
फैली। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों ने बचा-खुचा साहस भी खत्म कर डाला। लेकिन देश
में जब एक बार जागृति फैल जाये तब देश ज़्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता।
कुछ ही दिनों बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है। आज
हिन्दुस्तान में फिर जान आ गयी है। हिन्दुस्तान फिर जाग रहा है। देखने में तो कोई
बड़ा जन-आन्दोलन नज़र नहीं आता लेकिन नींव ज़रूर मज़बूत की जा रही है।
आधुनिक विचारों के अनेक नये नेता सामने आ रहे हैं। इस बार नौजवान नेता ही
आगे बढ़े और देश में नौजवानों के ही आन्दोलन चल रहे हैं। नौजवान नेता ही
देशभक्त लोगों की नज़रों में आ रहे हैं। बड़े-बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक
तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं। इस समय जो नेता आगे आये हैं वे हैं – बंगाल के
पूजनीय श्री सुभाषचन्द्र बोस और माननीय पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू। यही दो
नेता हिन्दुस्तान में उभरते नज़र आ रहे हैं और युवाओं के आन्दोलनों में विशेष रूप
से भाग ले रहे हैं। दोनों ही हिन्दुस्तान की आज़ादी के कट्टर समर्थक हैं। दोनों ही
समझदार और सच्चे देशभक्त हैं। लेकिन फिर भी इनके विचारों में ज़मीन-आसमान
का अन्तर है। एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो
दूसरे को पक्का पश्चिम का शिष्य। एक को कोमल हृदय वाला भावुक कहा जाता
है और दूसरे को पक्का युगान्तकारी। हम इस लेख में उनके अलग-अलग विचारों
को जनता के समक्ष रखेंगे, ताकि जनता स्वयं उनके अन्तर को समझ सके और
स्वयं भी विचार कर सके। लेकिन उन दोनों के विचारों का उल्लेख करने से पूर्व
एक और व्यक्ति का उल्लेख करना भी ज़रूरी है जोकि इन्हीं की भाँति स्वतन्त्रता
प्रेमी है और युवा-आन्दोलनों की एक विशेष शख्सियत है। साधू वासवानी जो चाहे
कांग्रेस के बड़े नेताओं की भाँति जाने-माने तो नहीं, चाहे देश के राजनीतिक क्षेत्र
में उनका कोई विशेष स्थान तो नहीं, तो भी युवाओं पर, जिन्हें कि कल देश की
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 319

बागडोर सँभालनी है, उनका असर है और उनके ही द्वारा शुरू हुआ आन्दोलन
'भारत-युवा संघ' इस समय युवाओं में विशेष प्रभाव रखता है। उनके विचार
बिल्कुल अलग ढंग के हैं। उनके विचार एक ही शब्द में बताये जा सकते हैं -
“वापस वेदों की ओर लौट चलो।” (बैक टु वेद्स)। यह आवाज़ सबसे पहले
आर्यसमाज ने उठायी थी। इस विचार का आधार इस आस्था में है कि वेदों में
परमात्मा ने संसार का सारा ज्ञान उँडेल दिया है। इससे आगे और अधिक विकास
नहीं हो सकता। इसलिए हमारे हिन्दुस्तान ने चौतरफ़ा जो प्रगति कर ली थी उससे
आगे न दुनिया बढ़ी है और न बढ़ सकती है! ख़ैर, वासवानी आदि इसी आस्था
को मानते हैं। तभी एक जगह कहते हैं -
“हमारी राजनीति ने अब तक कभी तो मैजिनी और वाल्टेयर को अपना आदर्श
मानकर उदाहरण स्थापित किये हैं और या कभी लेनिन और टालस्टाय से सबक
सीखा। हालाँकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि उनके पास उनसे कहीं बड़े आदर्श हमारे
पुराने ऋषि हैं।” वे इस बात पर यक़ीन करते हैं कि हमारा देश एक बार तो विकास
की अन्तिम सीमा तक जा चुका था और आज हमें आगे कहीं भी जाने की
आवश्यकता नहीं, बल्कि पीछे लौटने की ज़रूरत है।
आप एक कवि हैं। कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नज़र आता है। साथ
ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं। यह 'शक्ति' धर्म चलाना चाहते हैं। यह कहते
हैं, “इस समय हमें शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है।” वह 'शक्ति' शब्द का अर्थ
केवल भारत के लिए इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार
की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है। वे एक बहुत भावुक कवि
की तरह कहते हैं :
"For in solitude have communicated with her, our admired Bharat
Mata, And my aching head had heard voices saying...'The day of free-
dom is not far off.'... Sometimes indeed a strange feeling visits me and
I say to myself-Holly, holy is Hindustan. For still is she under the pro-
tection of her mighty Rishis and their beauty is around us, but we behold
it not."
अर्थात् एकान्त में भारत की आवाज़ मैंने सुनी है। मेरे दुखी मन ने कई बार
यह आवाज़ सुनी है कि 'आज़ादी का दिन दूर नहीं'...कभी-कभी बहुत अजीब
विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूँ, हमारा हिन्दुस्तान पाक और पवित्र
है, क्योंकि पुराने ऋषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी ख़ूबसूरती हिन्दुस्तान के
पास है। लेकिन हम उन्हें देख नहीं सकते।
यह कवि का विलाप है कि वह पागलों या दीवानों की तरह कहते रहते हैं
: “हमारी माता बड़ी महान है। बहुत शक्तिशाली है। उसे परास्त करने वाला कौन
पैदा हुआ है।” इस तरह वे केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं
320 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

: "Our national movement must become a purifying mass movement. If it is
to fulfil its destiny without falling into class war one of the dangers of
Bolshevism."
अर्थात हमें अपने राष्ट्रीय जन-आन्दोलन को देश-सुधार का आन्दोलन बना
देना चाहिए। तभी हम वर्गयुद्ध के बोल्शेविज़्म के ख़तरों से बच सकेंगे। वह इतना
कहकर ही कि ग़रीबों के पास जाओ, गाँवों की ओर जाओ, उनको दवा-दारू मुफ़्त
दो – समझते हैं कि हमारा कार्यक्रम पूरा हो गया। वे छायावादी कवि हैं। उनकी
कविता का कोई विशेष अर्थ तो नहीं निकल सकता, मात्र दिल का उत्साह बढ़ाया
जा सकता है। बस पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई कार्यक्रम
नहीं। युवाओं के दिमाग़ों को वे कुछ नया नहीं देते। केवल दिल को भावुकता से
ही भरना चाहते हैं। उनका युवाओं में बहुत असर है। और भी पैदा हो रहा है। उनके
दकियानूसी और संक्षिप्त-से विचार यही हैं जोकि हमने ऊपर बताये हैं। उनके
विचारों का राजनीतिक क्षेत्र में सीधा असर न होने के बावजूद बहुत असर पड़ता
है। विशेषकर इस कारण कि नौजवानों, युवाओं को ही कल आगे बढ़ना है और
उन्हीं के बीच इन विचारों का प्रचार किया जा रहा है।
अब हम श्री सुभाषचन्द्र बोस और श्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों पर आ
रहे हैं। दो-तीन महीनों से आप बहुत-सी कॉन्फ़्रेंसों के अध्यक्ष बनाये गये और आपने
अपने-अपने विचार लोगों के सामने रखे। सुभाष बाबू को सरकार तख़्तापलट गिरोह
का सदस्य समझती है और इसीलिए उन्हें बंगाल अध्यादेश के अन्तर्गत क़ैद कर
रखा था। आप रिहा हुए और गर्म दल के नेता बनाये गये। आप भारत का आदर्श
पूर्ण स्वराज्य मानते हैं, और महाराष्ट्र कॉन्फ़्रेंस में अध्यक्षीय भाषण में आपने इसी
प्रस्ताव का प्रचार किया।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू स्वराज पार्टी के नेता पण्डित मोतीलाल नेहरू जी
के सुपुत्र हैं। बैरिस्टरी पास हैं। आप बहुत विद्वान हैं। आप रूस आदि का दौरा कर
आये हैं। आप भी गर्म दल के नेता हैं और मद्रास कॉन्फ़्रेंस में आपके और आपके
साथियों के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था। आपने
अमृतसर कॉन्फ़्रेंस के भाषण में भी इसी बात पर ज़ोर दिया। लेकिन फिर भी इन
दोनों सज्जनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। अमृतसर और महाराष्ट्र
कॉन्फ़्रेंसों के इन दोनों अध्यक्षों के भाषण पढ़कर ही हमें इनके विचारों का अन्तर
स्पष्ट हुआ था। लेकिन बाद में बम्बई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से
हमारे सामने आ गयी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर
रहे थे और सुभाषचन्द्र ने भाषण किया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने
भाषण आरम्भ किया कि हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष सन्देश है। वह
दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर, आगे वे दीवाने की तरह कहना आरम्भ
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 321

कर देते हैं – चाँदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह समझ
का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार
ने लिखा है कि हममें 'यह हमारे आँसू ही जम-जमकर पत्थर बन गये हैं।' वह
भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले
भाषण में 'राष्ट्रवादिता' के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तरराष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद
को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी
राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है। न निजी स्वार्थ से प्रेरित है
और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो यह 'सत्यम शिवम
सुन्दरम' है, अर्थात 'सच, कल्याणकारी और सुन्दर।'
यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन
युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते
हैं। पंचायतीराज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। 'पंचायती राज और जनता
का राज' वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं
कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नयी चीज़ नहीं। ख़ैर, उन्होंने सबसे ज़्यादा उस
दिन के भाषण में ज़ोर जिस बात पर दिया था वह यह थी कि हिन्दुस्तान का दुनिया
के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल
विपरीत हैं। वे कहते हैं –
“जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष
सन्देश है। इंग्लैण्ड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई
विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत
यक़ीन है।” जवाहरलाल कहते हैं – "Every youth must rebel. Not only in
political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have
not much use for any man who comes and tells me that such and such thing
is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they
find authority for it in the Vedas and Koran." (यानी) “प्रत्येक नौजवान को
विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और
धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे
कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख
में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा
गया हो, नहीं माननी चाहिए।”
यह एक युगान्तकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राजपरिवर्तनकारी के
विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के
विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा
322 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जाता है और एक को युगान्तकारी और विद्रोही! पण्डित जी एक स्थान पर कहते
हैं – "To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring
back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the
vedic Age in India. I say, that it is inconcievable that you can bring back
the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of
imagiation may remain stationary."
वे कहते हैं कि जो अब भी क़ुरान के ज़माने के, अर्थात 1300 बरस पीछे
के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के ज़माने की ओर
देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह
युग वापस लौट आयेगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक
दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता
महसूस करते हैं।
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज़ पश्चिम
के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज क़ायम करके सारी
सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की
आवश्यकता है।
सुभाष बाबू मज़दूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते
हैं। पण्डित जी एक क्रान्ति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष
भावुक हैं – दिल के लिए नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के
लिए। दूसरा युगान्तकारी है जोकि दिल के साथ-साथ दिमाग़ को भी बहुत कुछ
दे रहा है – "They should aim at Swaraj for the masses based on socialism.
That was a revolutionary change which they could not bring about without
revolutionary methods....Mere reform or gradual repairing of the existing
machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General
Masses." (अर्थात) हमारा आदर्श समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज्य
होना चाहिए, जोकि युगान्तकारी तरीक़ों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार
और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गयी मरम्मत जनता के लिए
वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठीक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की
ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया
की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी
राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गये हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गये हैं। हमें किस ओर
झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचारपत्र ने सुभाष की तारीफ़ के पुल बाँधकर
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 323

पण्डित जी आदि के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर
मर जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रान्त है। लोग
जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग की तरह बैठ जाते हैं।
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक
खुराक नहीं दे रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों
को इन युगान्तकारी विचारों को ख़ूब सोच-विचारकर पक्का कर लेना चाहिए। इस
समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल
नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन
जाना चाहिए। लेकिन जहाँ तक विचारों का सम्बन्ध है, वहाँ तक इस समय पंजाबी
नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्क़लाब के वास्तविक अर्थ,
हिन्दुस्तान में इन्क़लाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्क़लाब का स्थान क्या है,
आदि के बारे में जान सकें। सोच-विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर
करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों
और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुक़ाबले में डटे रह सकें। इसी तरह जनता
इन्क़लाब के ध्येय को पूरा कर सकेगी।
324 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

साण्डर्स की हत्या के बाद :
दो नोटिस
17 नवम्बर, 1928 को लाला लाजपत राय का देहान्त हुआ। अक्टूबर में साइमन
कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए विशाल प्रदर्शन का लाला जी ने नेतृत्व किया था
और पुलिस ने उन पर लाठियाँ बरसायी थीं। यही लाठियाँ लाला जी की मृत्यु का कारण
बनीं। लाला जी की मृत्यु से देश में दुख व आतंक छा गया। श्रीमती चितरंजन दास
ने ऐसे माहौल में सवाल किया था, ‘क्या देश में मानवता व जवानी अभी बाक़ी है?’
लाला लाजपत राय के प्रति बहुत अच्छी राय न होने के बावजूद, क्रान्तिकारियों
ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान का मुद्दा बनाया और इसका बदला लाला
जी पर लाठियाँ बरसाने वाले ब्रिटिश पुलिस अधिकारी साण्डर्स को मारकर लिया।
हालाँकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्काट क्रान्तिकारियों से बच गया।
साण्डर्स की हत्या 17 दिसम्बर को की गयी। 18 दिसम्बर को पूरे लाहौर में
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना के कमाण्डर इन चीफ़ के हस्ताक्षर से एक
परचा बाँटा गया। 23 दिसम्बर को फिर एक नोटिस लगाया गया। – स.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
नोटिस
नौकरशाही सावधान!
जे.पी. साण्डर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय जी की हत्या का
बदला ले लिया गया।
यह सोचकर कितना दुख होता है कि जे.पी. साण्डर्स जैसे एक मामूली पुलिस
अफ़सर के कमीने हाथों देश की तीस करोड़ जनता द्वारा सम्मानित एक नेता पर
हमला करके उनके प्राण ले लिये गये। राष्ट्र का यह अपमान हिन्दुस्तानी नवयुवकों
और मर्दों को चुनौती थी।
आज संसार ने देख लिया है कि हिन्दुस्तान की जनता निष्प्राण नहीं हो गयी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 325

है, उनका (नौजवानों) ख़ून जम नहीं गया, वे अपने राष्ट्र के सम्मान के लिए प्राणों
की बाज़ी लगा सकते हैं। और यह प्रमाण देश के उन युवकों ने दिया है जिनकी
स्वयं देश के नेता निन्दा और अपमान करते हैं।
अत्याचार सरकार सावधान!
इस देश की दलित और पीड़ित जनता की भावनाओं को ठेस मत लगाओ!
अपनी शैतानी हरकतें बन्द करो। हमें हथियार न रखने देने के लिए बनाये तुम्हारे
सब क़ानूनों और चौकसी के बावजूद पिस्तौल और रिवाल्वर इस देश की जनता
के हाथ में आते ही रहेंगे। यदि वह हथियार सशस्त्र क्रान्ति के लिए पर्याप्त न भी
हुए तो भी राष्ट्रीय अपमान का बदला लेते रहने के लिए तो काफ़ी रहेंगे ही।
हमारे अपने लोग हमारी निन्दा और अपमान करें। विदेशी सरकार चाहे हमारा
कितना भी दमन कर ले, परन्तु हम राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने और विदेशी
अत्याचारियों को सबक सिखाने के लिए सदा तत्पर रहेंगे। हम सब विरोध और
दमन के बावजूद क्रान्ति की पुकार को बुलन्द रखेंगे और फाँसी के तख़्तों पर से
भी पुकार कर कहेंगे –
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है। परन्तु यह आदमी उस निर्दयी,
नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक है। इस
आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के कारिन्दे के रूप में की गयी है।
यह सरकार संसार की सबसे अत्याचारी सरकार है।
मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमें खेद है। परन्तु क्रान्ति की वेदी पर
कभी-कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से
है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी।
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!’
ह. बलराज
18 दिसम्बर, 1928 ‘सेनापति, पंजाब हि.स.प्र.स.’
326 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना
नोटिस
17 दिसम्बर की घटना सम्बन्धी
अब कोई रहस्य नहीं! कोई अनुमान नहीं!
जे.पी. साण्डर्स मारा गया!
लाला लाजपत राय का बदला ले लिया गया!!
हि.स.प्र.स. की नियमावली (नियम 10-बी व सी) के अनुसार इस बात की सूचना
दी जाती है कि यह सीधी राजनीतिक प्रकृति की बदले की कार्रवाई थी। भारत
के महान बुजुर्ग लाला लाजपत राय पर किये गये अत्यन्त घृणित हमले से उनकी
मृत्यु हुई। यह इस देश की राष्ट्रीयता का सबसे बड़ा अपमान था और अब इसका
बदला ले लिया गया है।
इसके बाद सभी से यह अनुरोध है कि हमारे शत्रु पुलिस को हमारा
पता-ठिकाना बताने में किसी क़िस्म की सहायता न दें। जो कोई इसके विपरीत
काम करेगा, उस पर सख़्त कार्रवाई की जायेगी।
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
हस्ताक्षर बलराज
23 दिसम्बर, 1928 कमाण्डर-इन चीफ़
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 327

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VII.
बहरों को सुनाने के लिए
बम का धमाका

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असेम्बली हॉल में फेंका गया परचा
8 अप्रैल, सन् 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गये अंग्रेज़ी परचे का हिन्दी अनुवाद। - स.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
सूचना
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है”, प्रसिद्ध
फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के ये अमर शब्द हमारे काम के औचित्य
के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का
जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं और न ही
हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर
पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की
आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग ‘साइमन
कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाये हैं और इन टुकड़ों
के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’
(पब्लिक सेफ़्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स
बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है।
इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में ‘अख़बारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून’
(प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक
काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ़्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं
कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व
की गम्भीरता को महसूस कर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ ने अपनी सेना
को यह क़दम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 331

यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाये। विदेशी शोषक नौकरशाही जो
चाहे करे परन्तु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड
को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन
और शोषण के विरुद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला
देना चाहते हैं कि हम 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' के दमनकारी
क़ानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर
से यह क़दम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में
विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर
मिल सके। हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रान्ति
द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर
देने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
ह. बलराज
कमाण्डर इन चीफ़
332 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

बमकाण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान
असेम्बली में बम फेंकने के बाद, 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज
मि. लियोनार्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का
ऐतिहासिक बयान। – स.
हमारे ऊपर गम्भीर आरोप लगाये गये हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी
अपनी सफ़ाई में कुछ शब्द कहें। हमारे कथित अपराध के सम्बन्ध में निम्नलिखित
प्रश्न उठते हैं : (1) क्या वास्तव में असेम्बली में बम फेंके गये थे, यदि हाँ तो
क्यों? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये गये हैं, वे सही हैं
या ग़लत?
पहले प्रश्न के पहले भाग के लिए हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन
तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है वह सरासर झूठ
है। चूँकि हम बम फेंकने से इन्कार नहीं कर रहे हैं इसलिए यहाँ इन गवाहों
के बयानों की सच्चाई की परख भी हो जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम
यहाँ बता देना चाहते हैं कि सार्जेण्ट टेरी का यह कहना कि उन्होंने हममें से
एक के पास से पिस्तौल बरामद की, एक सफ़ेद झूठ-मात्र है, क्योंकि जब
हमने अपनेआप को पुलिस के हाथों में सौंपा तो हममें से किसी के पास कोई
पिस्तौल न थी। जिन गवाहों ने कहा है कि उन्होंने हमें बम फेंकते देखा था,
वे झूठ बोलते हैं। न्याय तथा निष्कपट व्यवहार को सर्वोपरि मानने वाले लोगों
को इन झूठी बातों से एक सबक लेना चाहिए। साथ ही हम सरकारी वकील
के उचित व्यवहार तथा अदालत के अभी तक के न्यायसंगत रवैये को भी
स्वीकार करते हैं।
पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर देने के लिए हमें इस बमकाण्ड जैसी
ऐतिहासिक घटना के कुछ विस्तार में जाना पड़ेगा। हमने वह काम किस
अभिप्राय से तथा किन परिस्थितियों के बीच किया, इसकी पूरी एवं खुली
सफ़ाई आवश्यक है।
जेल में हमारे पास कुछ पुलिस अधिकारी आये थे। उन्होंने हमें बताया कि
लॉर्ड इर्विन ने इस घटना के बाद ही असेम्बली के दोनों सदनों के सम्मिलित
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 333

अधिवेशन में कहा है कि “यह विद्रोह किसी व्यक्ति-विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, वरन
सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था के विरुद्ध था।” यह सुनकर हमने तुरन्त भाँप लिया कि
लोगों ने हमारे इस काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है।
मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। हमें किसी से व्यक्तिगत
द्वेष नहीं है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की नज़र से देखते आये हैं। हम
न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं, जैसाकि सोशलिस्ट कहलाने
वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल हैं, जैसाकि लाहौर के
‘ट्रिब्यून’ तथा कुछ अन्य अख़बारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। हम तो
केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित
आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावाभर कर सकते हैं।
हमें ढोंग तथा पाखण्ड से नफ़रत है।
एक अपकारजनक संस्था
यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है।
हमारा उद्देश्य केवल उस शासन-व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिवाद करना था जिसके हर
एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं वरन अपकार करने की उसकी असीम
क्षमता भी प्रकट होती है। इस विषय पर हमने जितना विचार किया उतना ही हमें
इस बात का दृढ़ विश्वास होता गया कि वह केवल संसार के सामने भारत की
लज्जाजनक तथा असहाय अवस्था का ढिंढोरा पीटने के लिए ही क़ायम है और
वह एक ग़ैर-ज़िम्मेदार तथा निरंकुश शासन का प्रतीक है।
जनता के प्रतिनिधियों ने कितनी ही बार राष्ट्रीय माँगों को सरकार के सामने
रखा, परन्तु उसने उन माँगों की सर्वथा अवहेलना करके हर बार उन्हें रद्दी की
टोकरी में डाल दिया। सदन द्वारा पास किये गये गम्भीर प्रस्तावों को भारत की
तथाकथित पार्लियामेण्ट के सामने ही तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदा गया है,
दमनकारी तथा निरंकुश क़ानूनों को समाप्त करने की माँग करने वाले प्रस्तावों को
हमेशा अवज्ञा की दृष्टि से ही देखा गया है और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने
सरकार के जिन क़ानूनों तथा प्रस्तावों को अवांछित एवं अवैधानिक बताकर रद्द कर
दिया था, उन्हें केवल क़लम हिलाकर ही सरकार ने लागू कर लिया है।
संक्षेप में, बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का
औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका जो, बावजूद उस तमाम शानो-शौक़त
के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल
मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक
संस्था है। हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ
हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतन्त्रता
334 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की खिल्ली उड़ाने वाले इतने स्पष्ट एवं पूर्वनियोजित प्रदर्शनों पर सार्वजनिक
सम्पत्ति एवं समय बरबाद करने में सहायक क्यों बनते हैं।
हम इन्हीं प्रश्नों तथा मज़दूर आन्दोलन के नेताओं की धरपकड़ पर विचार कर
ही रहे थे कि सरकार औद्योगिक विवाद विधेयक लेकर सामने आयी। हम इसी
सम्बन्ध में असेम्बली की कार्यवाही देखने गये। वहाँ हमारा यह विश्वास और भी
दृढ़ हो गया कि भारत की लाखों मेहनतकश जनता एक ऐसी संस्था से किसी बात
की भी आशा नहीं कर सकती जो भारत के बेबस मेहनतकशों की दासता तथा
शोषकों की गलाघोंटू शक्ति की अहितकारी यादगार है।
अन्त में वह क़ानून, जिसे हम बर्बर एवं अमानवीय समझते हैं, देश के
प्रतिनिधियों के सरों पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे
मज़दूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनके हाथों से
उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने
भी कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा
है वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा। बलि के बकरों की भाँति
शोषकों – और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है – की बलिवेदी पर आये दिन
होने वाली मज़दूरों की इन मूक कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता
है वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एस.आर.
दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंग्लैण्ड की स्वप्ननिद्रा
भंग करने के लिए बम का उपयोग आवश्यक था। श्री दास के इन्हीं शब्दों को
सामने रखकर हमने असेम्बली भवन में बम फेंके थे। हमने वह काम मज़दूरों की
तरफ़ से प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए किया था। उन असहाय मज़दूरों के पास
अपने मर्मान्तिक क्लेशों को व्यक्त करने का और कोई साधन भी तो नहीं था। हमारा
एकमात्र उद्देश्य था 'बहरों को सुनाना' और उन पीड़ितों की माँगों पर ध्यान न देने
वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना।
हमारी ही तरह दूसरों की भी परोक्ष धारणा है कि प्रशान्त सागर रूपी भारतीय
मानवता की ऊपरी शान्ति किसी भी समय फूट पड़ने वाले एक भीषण तूफ़ान की
द्योतक है। हमने तो उन लोगों के लिए सिर्फ़ ख़तरे की घण्टी बजायी है जो आने
वाले भयानक ख़तरे की परवाह किये बग़ैर तेज़ रफ़्तार से आगे की तरफ़ भागे जा
रहे हैं। हम लोगों को सिर्फ़ यह बता देना चाहते हैं कि 'काल्पनिक अहिंसा' का
युग अब समाप्त हो चुका है और आज की उठती हुई नयी पीढ़ी को उसकी व्यर्थता
में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं रह गया है।
मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमिट प्रेम रखने के कारण उसे व्यर्थ
के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 335