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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 788 में से

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पृष्ठ 340

अधिवेशन में कहा है कि “यह विद्रोह किसी व्यक्ति-विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, वरन
सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था के विरुद्ध था।” यह सुनकर हमने तुरन्त भाँप लिया कि
लोगों ने हमारे इस काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है।
मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। हमें किसी से व्यक्तिगत
द्वेष नहीं है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की नज़र से देखते आये हैं। हम
न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं, जैसाकि सोशलिस्ट कहलाने
वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल हैं, जैसाकि लाहौर के
‘ट्रिब्यून’ तथा कुछ अन्य अख़बारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। हम तो
केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित
आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावाभर कर सकते हैं।
हमें ढोंग तथा पाखण्ड से नफ़रत है।
एक अपकारजनक संस्था
यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है।
हमारा उद्देश्य केवल उस शासन-व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिवाद करना था जिसके हर
एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं वरन अपकार करने की उसकी असीम
क्षमता भी प्रकट होती है। इस विषय पर हमने जितना विचार किया उतना ही हमें
इस बात का दृढ़ विश्वास होता गया कि वह केवल संसार के सामने भारत की
लज्जाजनक तथा असहाय अवस्था का ढिंढोरा पीटने के लिए ही क़ायम है और
वह एक ग़ैर-ज़िम्मेदार तथा निरंकुश शासन का प्रतीक है।
जनता के प्रतिनिधियों ने कितनी ही बार राष्ट्रीय माँगों को सरकार के सामने
रखा, परन्तु उसने उन माँगों की सर्वथा अवहेलना करके हर बार उन्हें रद्दी की
टोकरी में डाल दिया। सदन द्वारा पास किये गये गम्भीर प्रस्तावों को भारत की
तथाकथित पार्लियामेण्ट के सामने ही तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदा गया है,
दमनकारी तथा निरंकुश क़ानूनों को समाप्त करने की माँग करने वाले प्रस्तावों को
हमेशा अवज्ञा की दृष्टि से ही देखा गया है और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने
सरकार के जिन क़ानूनों तथा प्रस्तावों को अवांछित एवं अवैधानिक बताकर रद्द कर
दिया था, उन्हें केवल क़लम हिलाकर ही सरकार ने लागू कर लिया है।
संक्षेप में, बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का
औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका जो, बावजूद उस तमाम शानो-शौक़त
के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल
मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक
संस्था है। हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ
हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतन्त्रता
334 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़