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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

रखने पर दुत्कारना शुरू कर देते हैं और उन बेचारे देशभक्तों पर कहर बरपा करते
हैं और कोई परवाह नहीं करते। 1914-15 के मुक़दमों में जो अन्धेरगर्दी हुई, क्या
वे साथी अपनी ही लापरवाही का परिणाम नहीं थे? तब गला फाड़-फाड़कर
काँव-काँव। ये बड़े ख़तरनाक हैं, खूँखार हैं। और जब उन बेचारों का फाँसी लग
जाना, तब भीतर घुस-घुस बातें करना। वे सच्चे देशभक्त थे। 1908 से लोग फाँसी
पर चढ़ते रहे, पर सब अक्लमन्द लोग उन्हें गालियाँ देते रहे। 1925 में विपिनचन्द्र
पाल ने एक लेख लिखा कि It were political assasins who passed their way
to Minto Morely scheme. यानी राजनीतिक हत्यारों की कृपा से ही मिण्टो-मारले
स्कीम मिली थी। और आज काकोरी वाले शहीदों के घरवालों से सहानुभूति प्रकट
करने पर बिगड़ जाने वाला Modern Review भी विपिनचन्द्र पाल की उपरोक्त बात
की ताईद करता हुआ एक बड़े माडरेट एस.आर. दास के एक पत्र में लिखता है
कि इंगलिस्तान को जगाने के लिए और यह बताने के लिए कि हिन्दुस्तान की
स्थिति अच्छी नहीं है, एक बम की ज़रूरत थी – 'A bomb was necessary to
awaken England from Iber sweet dream that all was well with India.'
यदि उन ग़रीबों की ओर, जोकि शान्ति में विश्वास नहीं करते, लेकिन आज़ादी
के लिए हम लोगों से अधिक बलिदान कर सकते हैं, समय पर ध्यान दिया जाये
तो कम से कम उनके साथ अन्धेरगर्दी और जुल्म तो न हुआ करें और उनकी
मुसीबत में कुछ तो कमी हो जाया करे।
एक और भी बात है कि माडरेटों को सदस्य बनाने के लिए खद्दर की शर्त
लगाने पर ज़ोर देने वाले सज्जन यह तो बतायें कि क्या माडरेटों से अधिक बलिदान
करने वाले नौजवानों के लिए कांग्रेस का दर खोलना पाप है? उनको आगे नहीं आने
देना? यह तो हम जानते हैं कि आज़ादी की जंग में इस्तेमाल के लिए हमारे पास
केवल एक ही हथियार है 'सिविल नाफ़रमानी' और वैसा आन्दोलन अधिक
शान्तिपूर्ण होगा ही, लेकिन 'सम्भव' शब्द के आ जाने से किसी को भी कोई
शिकायत नहीं रह जानी चाहिए।
और यदि शब्द कहने से डरते हो कि सरकार आ गला पकड़ेगी तो सुन लो
– "Freedom has to be won inch by inch and whether peaceful or other
methods are employed, the Government of the day will not spare any pains
to crush the movement of independence." यानी सरकार तो शान्तिपूर्ण या
अशान्तिपूर्ण, सभी आन्दोलनों को दबाने की कोशिश करेगी। इसलिए हमें उस
प्रस्ताव से डरना नहीं चाहिए जिसने हमारे काम के दायरे को ज़्यादा खुला कर दिया
और हमारी तंगनज़र को खोल दिया है, बल्कि उसका तो स्वागत करना चाहिए।
किरती/मई, 1928
242 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आतंक के असली अर्थ
अपने समय की विचारधारात्मक बहस में हिस्सा लेते हुए भगतसिंह और उनके
साथियों ने 'आतंक' शब्द के अर्थ समझने की कोशिश की। मई, 1928 के 'किरती'
में यह लेख इसी विषय पर छपा जो बम्बई के अख़बार 'श्रद्धानन्द' से अनूदित था
तथा भगतसिंह और उनके साथियों के उस समय के विचारों का प्रतिनिधित्व करता
है। – स.
पिछले सात-आठ सालों में जिन कुछ शब्दों ने हमारे राजनीतिक जीवन में तूफ़ान
खड़ा किया है और जिनके बारे में बहुत लोगों को ग़लतफ़हमी रही है उनमें सबसे
ज़रूरी शब्द 'आतंक' है। अब तक किसी ने भी गहन विचार कर इस शब्द के अर्थ
समझने के यत्न नहीं किये। इसीलिए आज तक इस शब्द का ग़लत इस्तेमाल होता
रहा है। पूरी क़ौम अपने लक्ष्य को ठीक न समझ पाने के कारण दिन को रात और
रात को दिन समझती हुई ठोकरें खा रही है।
आतंक पर बोलते ही अनुभव होने लगता है कि वह त्याज्य और बुरा शब्द है।
सुनते ही यह विचार पैदा होता है कि वह दुख देने वाला, अत्याचारी,
ज़ोर-ज़बरदस्ती और अन्यायपूर्ण है। जिस काम के साथ 'आतंक' शब्द लग जाये
वही काम पलीत, हानिकर और त्याज्य लगने लगता है। इस हालत में कोई शरीफ़
और नेकदिल इन्सान इससे हमेशा के लिए परे रहने का यत्न करे तो यह एक
स्वाभाविक बात है। आतंक और जुल्म से आशय ताक़त का अयोग्य ढंग से प्रयोग
है। इन दोनों शब्दों से ताक़त के इस्तेमाल की बू तो आती है, लेकिन ताक़त के
इस्तेमाल की एक सीमा है। उसी सीमा का ख़याल न रखते हुए कुछ हंगामाबाज़
लोगों ने 'आतंक' नाम दे दिया है और हिन्दी भाषा में इसकी तुलना में 'अहिंसा'
शब्द ठोंक दिया गया है। इसी कारण आज एक बड़ी ख़तरनाक ग़लतफ़हमी फैली
हुई है।
आतंक में ताक़त का इस्तेमाल भी होता है। इसलिए कुछ घटिया दिमाग़ वालों
ने ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम दे डाला। किसी आदमी को बुरे काम
से रोकने के लिए यही कह देना काफ़ी होता है कि वह काम बहुत बुरा और घृणित
है। ऐसे ही शब्दों में आतंक भी एक है। कांग्रेस के आदेशानुसार हज़ारों इन्सान बिना
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 243

किसी न-नकार के शान्ति की क़समें उठाते चले गये। बात तो ठीक थी। आतंक
का अर्थ ज़ुल्म और ज़बरदस्ती करना है। ऐसा बुरा काम न करने की क़सम खाने
में किसी को क्या उज़्र हो सकता है, लेकिन असली बात यह है कि ज़ुल्म को
नहीं, बल्कि ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम देकर लोगों में ग़लतफ़हमी
फैला दी गयी है। बहुत-से लोग जोकि ताक़त के इस्तेमाल के हक़ में थे, वे आतंक
का पक्ष लेने की हिम्मत न दिखा सके और उन्होंने भी चुपचाप शान्तिपूर्ण
(आन्दोलन) के पक्ष में होने की क़सम उठा ली। इसीलिए अहिंसा (Non-
violence) जैसे शब्दों ने बहुत गड़बड़ी मचा दी। हज़ारों ही काम जो आज तक न
सिर्फ़ जायज़, बल्कि अच्छे माने जाते थे, वह पलक झपकने में ही घृणित माने जाने
लगे। वीरता, हिम्मत, शहादत, बलिदान, सैनिक-कर्तव्य, शस्त्र चलाने की योग्यता,
दिलेरी और अत्याचारियों का सर कुचलने वाली बहादुरी आदि गुण बल-प्रयोग पर
निर्भर थे। अब ये गुण अयोग्यता और नीचता समझे जाने लगे! आतंक शब्द के इन
भ्रामक अर्थों ने क़ौम की समझ पर पानी फेर दिया। नौबत यहाँ तक पहुँची कि
हथौड़े से पत्थर का बुत तोड़ना भी आतंक के दायरे में मान लिया गया और लाठी
पकड़ने तक को आतंक माना गया। तो क्या बुत को हाथों से तोड़ा जाये?
किसी भी शब्द के सुनते ही हर इन्सान के दिल में एक विचित्र ढंग की
भावनाएँ पैदा हो जाती हैं और उसके बाद झटपट एक प्रकार के अर्थ समझ
चुकने के कारण इन्सान उसकी तह तक जाने के लिए अधिक दिमाग़ नहीं
लड़ाता। किसी अजनबी इन्सान के आते ही यदि यह कह दिया जाये कि वह
बड़ा पापी है, लुच्चा है, तो सुनने वाले के दिल में उसके ख़िलाफ़ स्वभावतः
ही एक तरह के घृणित ख़याल उत्पन्न हो जाते हैं। उस आदमी के सम्बन्ध में
अधिक जाँच किये बग़ैर ही राय बना ली जाती है। इसी तरह शब्दों के प्रयोग
सम्बन्धी मामले में कहा जा सकता है। वेदों और पुराणों में इस बात पर ज़ोर दिया
गया है कि जो भी शब्द बोले जायें, उनका सही प्रयोग होना चाहिए, क्योंकि
शाब्दिक भ्रम से देवताओं तक में बड़े-बड़े दंगे हो गये थे और बड़ा भारी
नुक़सान हो गया था। ठीक वही दशा पिछले सात साल से हमारी हो रही है।
ताक़त के योग्य और अयोग्य इस्तेमाल को बिना किसी जाँच-विचार के फ़ौरन
आतंक का फतवा देकर घृणित होने की घोषणा कर दी गयी है।
यदि कोई डाकू कुल्हाड़ी लेकर किसी के घर में आ घुसे तो उसे आतंक (की
कार्यवाही) कहा गया, लेकिन यदि घरवालों ने छुरी का इस्तेमाल कर डाकू को
मार डाला तो उसे भी आतंक (का काम) माना गया। अर्थात जब अपने और अपने
परिवार की रक्षा के लिए ताक़त का योग्य और नेक इरादों से इस्तेमाल किया गया
तब भी उसे आतंक ही कहा गया। रावण ज़ोर-ज़बरदस्ती सीता को उठा ले गया
तो वह आतंक। और सीता को छुड़ाने गये राम ने रावण का सिर काट दिया तो वह
244 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

भी आतंक! इटली, अमेरिका, आयरलैण्ड आदि देशों पर कई प्रकार के जुल्म करने
वाले अत्याचारी भी आतंक फैलाने वाले समझे गये और नंगी तलवार पकड़े इन
विदेशी डकैतों का छिपी हुई शमशीर से इलाज करने वालों को भी आतंक (फैलाने
वाले) की उपाधि दी जाती है। गैरीबाल्डी, वाशिंगटन, एमट और डी वलेरा आदि
सभी इसी सूची में डाल दिये गये। क्या इसे इन्साफ़ कहा जा सकता है? आभूषण
चुराने के लिए मासूम बच्चे की गरदन काट देने वाला चोर भी घृणित और उस
पत्थर-दिल चोर को फाँसी पर लटका देने वाला न्यायकारी सम्राट भी आतंकवादी
और घृणित! कृष्ण भी उतना ही पापी, जितना कंस! शूरवीर भीम भी उतना ही
गुनहगार, जितना कि उसकी धर्मात्मा पत्नी का अपमान करने वाला दुःशासन! आह!
कितनी ग़लतफ़हमी है। कितना बड़ा अन्याय है। इसीलिए कुछ सीधे-सादे लोगों ने
अच्छे कामों को भी केवल बल-प्रयोग के कारण अयोग्य और आतंकवादी कह
दिया। साँप डसता है, आदमी उसे मार डालता है। पर दोनों बराबर-बराबर नहीं।
डसना तो साँप की आदत थी और वह इस आदत से मजबूर था, लेकिन इन्सान
ने यह काम जानबूझकर किया, इसलिए उसे अधिक नीच समझा जाना चाहिए!
नौबत यहाँ तक पहुँची कि देश और क़ौम के लिए सशस्त्र हो मैदाने-जंग में शहीद
हो जाने वाले बहादुर भी पापी समझे जाने लगे। शिवाजी, राणा प्रताप और रणजीत
सिंह जी को आतंक फैलाने वाले कहा गया और वे पूजनीय व्यक्तित्व भी घृणा
का शिकार हो गये।
उधर दुनिया के सारे देश शस्त्रधारी हैं। प्रत्येक अपने हथियारों की ताक़त को
बढ़ाता चला जा रहा है। इधर हमारा यह भारतवर्ष है, जिसमें रहने वालों का शस्त्र
पकड़ना पाप समझा जाता है। 'लाठी मत पकड़ो' – यह शिक्षा देने वाले लाठी
देखते ही डरपोक और कायर लोगों की पीठ ठोंकने लगे। देश को गिरी हुई अवस्था
से उठाकर उन्नति के रास्ते पर खड़ा करने वाली शूर-वीरता मटियामेट होने लगी
और ताक़त से डरने वाले दुश्मन राजी-ख़ुशी दिखायी देने लगे। कुछ बिरले ही लोग
थे जो यह दुखद स्थिति न देख सके और उन्होंने इसका खण्डन करना शुरू कर
दिया। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वे स्वयं भी इस गड़बड़ी का शिकार
हो गये और ठोस तर्कों से विरोध प्रकट करना उनके लिए कठिन हो गया। बस
इसी से युग पलटने वाले लोगों ने चिढ़कर यह कहना शुरू कर दिया – हाँ, हाँ,
हम आतंक फैलायेंगे, हम Violence ही करेंगे! जैसे कोई शरीफ़ आदमी अपने अच्छे
काम को गुनाह ठहराये जाते देखकर और फिर तर्कसम्मत उत्तर न दे पाने के कारण
हड़बड़ाकर यही कहना शुरू कर दे – हाँ, हाँ, मैं गुनाह ही करूँगा। ठीक यही
स्थिति इन बेचारे युग पलटने वालों की हो रही है। मद्रास कांग्रेस के अध्यक्ष तक
ने यह कह दिया कि आज यदि हम शान्तिपूर्ण (तरीक़े) के पक्षधर हैं तो इसका
यह अर्थ नहीं है कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। हो सकता है कि हमें कल ही आतंक
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 245

(Violence) के लिए तैयार होना पड़े। दुख तो इस बात का है कि यह 'आतंक'
शब्द घृणित है। यह अपने गुणों व ठीक अर्थों में व्याख्यायित न होने के कारण दूसरों
को अपने पक्ष में नहीं कर सका – अर्थात वे लोग जोकि बल-प्रयोग के पक्ष में
भी हैं, वे भी ज़ालिम या आतंकवादी कहलवाना पसन्द नहीं कर सकते। इस एक
शब्द 'आतंक' के अर्थों के अनर्थ होने के कारण ही कितना भारी नुक़सान हो रहा
है।
पूरी ग़लतफ़हमी की जड़ तो इस एक शब्द 'आतंक' की ग़लत व्याख्या है;
क्योंकि आतंक व ज़ुल्म भी बल-प्रयोग से ही होते हैं, इसलिए बल-प्रयोग से बहुत
सारे अच्छे व बुरे काम होते हैं। ज़ुल्म इनमें से एक है। एक पुरुष चोरी से किसी
के घर में आग लगाता है, वह भी आग लगाने वाला है और दूसरी ओर रसोइया
भी आग जलाता है, लेकिन रसोइया अपराधी नहीं कहला सकता और न ही आग
लगाने का काम बुरा कहा जा सकता है। इसी तरह अपने देश की रक्षा के लिए
या देश की आज़ादी की प्राप्ति के लिए शस्त्र लेकर मैदान में उतरने वाला देशभक्त
जब ज़ालिम और बलशाली की गर्दन तलवार से उतार देता है या ज़ालिम से किसी
मज़लूम का बदला लेता हुआ फाँसी पर चढ़ जाता है, वह या कोई और शूरवीर,
जोकि अपने सगे-सम्बन्धियों, अपनी पत्नी या घर-बार की रक्षा के लिए हथियार
लेकर लुच्चे ज़ालिमों का मुक़ाबला करने के लिए निकलता है, वह बल-प्रयोग
तो ज़रूर करता है, लेकिन आतंक नहीं फैलाता, अर्थात इनके किये काम, आतंक
के कामों में नहीं गिने जा सकते, बल्कि वे अच्छे और नेक कहे जाते हैं।
वह बल-प्रयोग जिससे निर्दोषों को बिना किसी कारण से सताया जाये या
दूसरों को किसी नीच इच्छा से नुक़सान पहुँचाया जाये, केवल ऐसे ही बेहूदा कामों
के लिए (किये गये) बल-प्रयोग को आतंक कहा जा सकता है, लेकिन जब इसी
ताक़त को किसी ग़रीब अनाथ की मदद के लिए या ऐसे ही किसी और काम
के लिए इस्तेमाल किया जाये तो वह आतंक नहीं, बल्कि पुण्य और परोपकार
कहलाता है। या फिर इससे सिद्ध हुआ कि बल-प्रयोग करना कोई ज़ुल्म, अत्याचार
या आतंक नहीं, बल्कि यह बल-प्रयोग करने वाले की नीयत पर निर्भर रहता है।
यदि उसने किसी भले व नेक काम के लिए बल-प्रयोग किया है तो उसे आतंक
का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि उसने अपने व्यक्तिगत हित या
निर्दोषों को दुख देने की ख़ातिर अपने बल का ग़लत प्रयोग किया है तो उसे
निःसन्देह, निर्भय होकर 'आतंकवादी' कहा जा सकता है। आतंक हमेशा ही घृणा
योग्य है। आतंक ताक़त का ऐसा इस्तेमाल है, जिससे बिना अपराध के किसी को
दुख दिया जाये। लेकिन जहाँ ज़ालिमों और गुण्डों की गुण्डई रोकने के लिए
बल-प्रयोग किया जाये, वह आतंक नहीं बल्कि अच्छा व भला काम होता है,
क्योंकि दुनिया के अच्छे कामों की परख की एक ही कसौटी है – यह कि वे
246 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

काम दुनिया को सुख व आराम देने वाले हों। किसी को दुख देना आतंक है, लेकिन
दुख देने वाले ज़ालिम का खुरा-खोज मिटाना पुण्य है। ज़ालिम कंस जब जुल्म की
तलवार पकड़ देवकी के घर में जा घुसता है, उसका उस समय का काम घृणित
आतंक है, लेकिन जब इसी ज़ालिम के पंजे से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए
श्रीकृष्ण तलवार लेकर उसके दरबार में घुस जाते हैं और तलवार से उसका सिर
गर्दन से अलग कर देते हैं, उस समय की उनकी यह कार्रवाई अभिनन्दनीय है।
दोनों तलवारें हैं, दोनों हथियार हैं, दोनों कामों में बल-प्रयोग किया गया है, लेकिन
एक काम जुल्मों से भरा है, इसलिए उसे आतंक कहा जायेगा और दूसरा काम नेक
है, वह एक ज़ालिम और अत्याचारी की हस्ती को, ग़लत अक्षर की तरह, मिटाकर
लोगों पर परोपकार करना है, इसलिए वह नेक काम सम्माननीय है। पर यदि हमारी
मौजूदा फ़िलासफ़ी के हिसाब से देखा जाये तो दोनों ही काम आतंकवादी और
घृणित हैं। लोगों को दुख देने वाला ज़ालिम भी आतंकवादी, और लोगों को ज़ालिम
के पंजे से छुटकारा दिलाने वाला भी आतंकवादी! यदि हमारे देश में यही स्थिति
रही तो अच्छे-बुरे की पहचान कैसे होगी और सम्माननीय कामों और घृणित कामों
के फ़र्क़ का कैसे पता चलेगा?
यदि इतना जान लिया जाये कि ताक़त का ग़लत इस्तेमाल अर्थात ग़रीबों,
अनाथों को सताना आतंक कहलाता है और इन सबको रोकना अच्छे काम समझा
जाता है तो सारे भ्रम दूर हो सकते हैं। चोर, डाकू और हत्यारे जब हथियारों का
इस्तेमाल करते हैं तो वे आतंक करते हैं (That force being aggressively used
become violence), लेकिन जब घर का मालिक समय पाकर उस डाकू या हत्यारे
की छाती में छुरी घोंप देता है या उस डाकू को कोई न्यायप्रिय शासक फाँसी की
सज़ा देता है तो वह अच्छा काम होता है। इसीलिए हिन्दू धर्मशास्त्र के कर्ता मनु
जी लिखते हैं –
ज़ालिम, हत्यारे, अपराधी को ख़ुफ़िया ढंग से या खुले मैदान चुनौती देकर या
किसी और ढंग से छापा मारकर जान से मार डालने वाले दिलेर इन्सान पापी या
गुनाहगार नहीं, बल्कि सम्माननीय इन्सान कहलाता है। पुराने से पुराने और नये से
नये क़ानून के अनुसार आत्मरक्षा में किये बल-प्रयोग को कभी भी आतंक के नाम
से नहीं पुकारा गया। यहाँ तक कि हिन्दू दण्ड-विधान में भी उसे आतंक
(Violence) नहीं कहा गया। आतंक फैलाना दण्डनीय है, लेकिन आत्मरक्षा में
बल-प्रयोग क़ानूनी ताक़त समझी जाती है।
ठीक वही बात राजनीति की है। इटली पर इस देश की इच्छा के विरुद्ध
आस्ट्रिया सिर्फ़ तलवार के ज़ोर से राज करता था, इसलिए इटली को ज़बरदस्ती
अधीन रखने का उसका काम आतंक था, घृणित था और ख़त्म करने योग्य था।
लेकिन जब गैरीबाल्डी और मैजिनी ने इसके ख़िलाफ़ तलवार उठायी और उस
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 247

ज़ालिम बादशाहत को उलटा दिया तब उनका यह काम घृणा लायक नहीं, बल्कि
पूजनीय माना गया। ठीक यही बात हम 1857 में हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए
लड़ी लड़ाई के सम्बन्ध में कह सकते हैं, क्योंकि वह हमारे पहले बताये अनुसार
जुल्म या आतंक नहीं था। इस लेख से यह अर्थ निकालना कि हम एक हथियारबन्द
बग़ावत करने की प्रेरणा दे रहे हैं, बिल्कुल झूठ और बेकार होगा। आज हम
हथियारबन्द बग़ावत करने या न करने सम्बन्धी कुछ नहीं लिखते। हथियारबन्द
बग़ावत की प्रौढ़ता या विरोध अलग-अलग देशों के अलग-अलग समाचारों के
कारण होते हैं। जो लोग इस समय हथियारबन्द बग़ावत को कठिन या समयपूर्व
मानते हों, वे ‘आतंक’ शब्द की ओट लेकर उस विचार को ही त्याज्य न बनायें।
इस विचार से ही आतंक शब्द की उक्त व्याख्या की गयी है, ताकि लोग फिर वैसी
ही ख़तरनाक और ठीक न हो सकने वाली भूल न करें।
(‘श्रद्धानन्द’, बम्बई से) किरती/मई, 1928
248 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम
मई, 1928 के 'किरती' में यह लेख छपा। अमृतसर में अप्रैल में राजनीतिक
कॉन्फ़्रेंस और नौजवान सभा की कॉन्फ़्रेंस हुई थी, जिसमें धर्म की समस्या पर शहीद
भगतसिंह और उनके साथियों में जमकर विचार-विमर्श हुआ। यह लेख उसी मसले
पर प्रकाश डालता है। – स.
अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कॉन्फ़्रेंस हुई और साथ ही युवकों
की भी कॉन्फ़्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें
से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु
साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन
संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ
देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और
धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कॉन्फ़्रेंस की विषय
समिति में भी मौलाना ज़फ़र अली साहब के पाँच-सात बार ख़ुदा-ख़ुदा करने पर
अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर ख़ुदा-ख़ुदा न कहें।
आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता (Irreligion) का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर
में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म
के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर
जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।
सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमर
सिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा
ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति
में कोई विघ्न न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की क्या
ज़रूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या
बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी
आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मन्त्र पढ़े जाने
लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता
था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 249

जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतन्त्रता प्रेमी
लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते
हैं।
बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं
बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर
नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतन्त्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गुलामी
का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि – ईश्वर ही
सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है – बच्चे को हमेशा
के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की
भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे
अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो भी हमें नज़र आता है कि धर्म
हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें
पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन
धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग
भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को
जनेऊ तक देने से इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की क़सम
ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिए, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग
यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत ख़ूब! छूत-अछूत
को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव
तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर
आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?
धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को फिर तलवार
के घाट उतार देना चाहिए और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम
क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मन्त्र
पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि
इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे
सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतन्त्रता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ
आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय
कोई मुहम्मद गौरी की तरह – जैसीकि कहावत बतायी जाती है – आज भी हमारे
सामने गायें, सूअर, ग्रन्थ साहिब, वेद-कुरान आदि चीजें खड़ी कर दी जायें, तो हम
क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ
जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं
चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हज़ार पण्डों
की तरह ठाकुरों के आगे लौटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर
250 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहुँचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन
यदि धर्म के पक्ष वालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में
अन्धेर हो जायेगा, पाप बढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।
रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर
बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये हैं -

  1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना,
    चोरी न करना, ग़रीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वग़ैरा।
  2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना
    आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्ज़ी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न
    करता है।
  3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वग़ैरा। मतलब यह कि पहले
    हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार
    से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो
    झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने
    चाहिए। दूसरा फ़िलासफ़ी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि
    Philosophy is the outcome of Human weakness, यानी फ़िलासफ़ी आदमी
    की कमज़ोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं।
    जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग़ लड़ाना शुरू कर दिया और खास-खास
    निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फ़िलासफ़ी बड़ी ज़रूरी चीज़ है, क्योंकि इसके
    बग़ैर उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी
    ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई
    और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है।
    आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन
    'मसला-ए-तनासुक' पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में
    लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग़ को, बुद्धि को, सोचने-
    समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद
    भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान
    शरीफ़ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति
    (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फ़िलासफ़ी हर
    व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फ़िलासफ़ी
    मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।
    अब आती है तीसरी बात - रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजा वाले दिन, सरस्वती
    की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है। उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी
    ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म
    विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 251

कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिए? नागरिक
आज़ादी का हक़ (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाजा बजाते हुए
भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का
बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल
की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही
फ़िलासफ़ी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion)
बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे
सामने है।
सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को
मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिए।
यदि पहली और दूसरी बात में स्वतन्त्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म
मुबारक है।
लेकिन अलग-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है।
छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली
छोड़कर एक न होंगे, तब तक हममें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए
ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आज़ादी की ओर बढ़ सकते हैं।
हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह
पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमाग़ी
गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।
252 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सत्याग्रह और हड़तालें

जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती'
के सम्पादक मण्डल में थे। उस समय उनके विचारों की झलक इनसे मिल सकती
है। – स.

सत्याग्रह

1928 में हिन्दुस्तान में फिर प्राण धड़कते नज़र आने लगे हैं। एक ओर
हड़तालों का ज़ोर है और दूसरी ओर सत्याग्रह की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं। ये
लक्षण बड़े अच्छे हैं। सबसे बड़ा सत्याग्रह बारदोली (गुजरात प्रान्त) के किसान
कर रहे हैं। तीस सालों के बाद नया बन्दोबस्त किया जाता है और हर बार
ज़मीन का लगान बढ़ा दिया जाता है। इसी तरह इस बार भी बन्दोबस्त हुआ
और मामला बढ़ा दिया गया। लोग बेचारे क्या करें? ग़रीब किसान तो पहले ही
पेट भरकर रोटी नहीं खा सकते और वे पहले से 22 प्रतिशत लगान कहाँ से
दें। सत्याग्रह की तैयारियाँ की गयीं। महात्मा गाँधी ने लाट पंजाब के साथ
पत्र-व्यवहार कर लगान कम करवाने का यत्न किया था, लेकिन जनाब, सिर्फ़
पत्र-व्यवहार से सर झुकाने वाली सरकार यह नहीं है। कुछ असर न हुआ।
सत्याग्रह करना ही पड़ा। गुजरात में पहले भी किसान एक-दो बार बड़ा भारी
सत्याग्रह करके सरकार को हरा चुके हैं। पहले-पहल 1917-18 में बारिश
अधिक होने से फ़सलें ख़राब हो गयी थीं और रुपये में चार आना भी नहीं
हुईं। क़ानून यह था कि रुपये में छह आने से कम फ़सल होने से उस साल
लगान न लिया जाये, अगले वर्ष एक साथ ले लिया जाये। उस साल लोगों ने
जब कहा कि चार आने भी फ़सल नहीं हुई तो सरकार नहीं मानी। फिर
महात्मा गाँधीजी ने काम हाथ में ले लिया। एक सभा की। लोगों को बताया
कि यदि आप लगान देने से इन्कार करोगे तो आपकी जायदाद ज़ब्त हो जायेगी,
क्या आप तैयार हैं? लोग चुपचाप बैठे रहे तो बम्बई के सत्याग्रही नेता इस बात
पर बड़े नाराज़ हुए और चल दिये। लेकिन फिर एक बुड्ढा किसान उठा और
उसने कहा कि हम सबकुछ सहन करेंगे और बाद में सभी लोग यही कहने
लगे। सत्याग्रह शुरू हुआ। सरकार ने भी जायदाद और ज़मीनें ज़ब्त करना शुरू
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 253

कर दिया, लेकिन दो महीने बाद सरकार ने सिर झुका दिया और ज़मींदारों
(?) की शर्त मान ली।
दूसरी बार जब महात्मा जी 1923-24 में जेल में थे तब सत्याग्रह हुआ। पहली
बार 600 गाँवों ने हिस्सा लिया था। इस बार 94 गाँवों का लगान बढ़ाया और इन
गाँवों ने सत्याग्रह किया। उन पर ताजीरी टैक्स लगाया गया था। वहाँ नियम था कि
सूर्यास्त होने पर जायदाद कुर्क नहीं हो सकती थी और किसान सवेरे ही
अपने-अपने घरों को ताले लगाकर चले जाते और पुलिस को कोई गवाह तक न
मिलता। अधिक तंग आकर सरकार ने टैक्स वापस ले लिया। इस बार बारदोली
में सत्याग्रह शुरू हुआ है। बारदोली में 1921-22 में आज़ादी के लिए बड़ा भारी
सत्याग्रह करने की तैयारियाँ की गयी थीं। सब क़िस्मत के खेल! बना-बनाया खेल
बिगड़ गया। खैर, उन पिछली बातों का क्या करना। अब उस इलाके का बन्दोबस्त
सरकार ने किया। बेचारे किसानों की मुसीबत, अच्छा बन्दोबस्त हुआ, 22 प्रतिशत
लगान बढ़ गया! बहुत कहा गया लेकिन सरकार कब मानती है। श्री बल्लभभाई
पटेल के नेतृत्व में काम शुरू हो गया और किसानों ने लगान देने से मना कर दिया।
अब ज़ब्ती अधिकारी और सारे ही अफ़सर बारदोली ताल्लुके की ओर इकट्ठा हुए
हैं। जो उनसे हो सकता है, लोगों को ग़लत रास्ते पर डालने के लिए कर रहे हैं।
जायदाद ज़ब्त की जा रही है, ज़मीनें ज़ब्त करने के हुक्म जारी हो रहे हैं। लेकिन
माल, सामान उठाने के लिए आदमी नहीं मिलते। इस समय काम वहाँ ज़ोरों पर
है, लेकिन एक मजे की बात यह है कि सारा काम बड़ी शान्ति से हो रहा है। वे
अफ़सर जो लोगों को तंग करने आये थे, उनके साथ बड़े प्यार का व्यवहार किया
जाता है। पहले उन्हें रोटी-पानी नहीं मिलता था, अब पटेल ने कहा कि उन्हें रोटी-
पानी ज़रूर दे दिया करो। एक दिन शराब की दुकान से चार टिन कुर्क किये गये,
लेकिन उठाने वाला कोई न मिला। जब अधिकारी ने कहा, 'बड़ी प्यास लगी है,
पानी तो दो,' तो झट एक सेवादार सत्याग्रही ने सोडे की बोतल लाकर पिलायी।
इस तरह काम बड़े ज़ोरों से, पूरी शान्ति से चल रहा है। बड़ी उम्मीद है कि सरकार
को अधिक झुकना पड़ेगा।
दूसरी जगह कानपुर है जहाँ सत्याग्रह होने वाला है। पिछले दिनों कानपुर में
हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। बाद में ताजीरी पुलिस बिठायी गयी। कुछ दिन हुए कि
कानपुर के कौंसिल सदस्य श्री गणेशशंकर जी विद्यार्थी सम्पादक 'प्रताप', कानपुर
को एक पत्र मजिस्ट्रेट से मिला कि अपने दफ़्तर के सभी कर्मचारियों की सूची
और उनका वेतन या पद लिखकर भेजें, क्योंकि तारी ताजीरी टैक्स वसूल किया
जाना है। लेकिन विद्यार्थी जी ने लिख भेजा कि मैं कोई टैक्स देने को तैयार नहीं
हूँ और न ही इस काम में कोई सहायता ही करूँगा, क्योंकि दंगा पुलिस ने करवाया
था। हमें उसका दण्ड नहीं मिलना चाहिए। लोगों ने विद्यार्थी जी से पूछा कि हम
254 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्या करें? आपने कहा कि मुसीबत आयेगी, नुक़सान अधिक होगा, लेकिन यह
अत्याचारी टैक्स नहीं देना चाहिए। जलसे हुए। 7000 व्यक्तियों ने टैक्स न देने के
काग़ज़ों पर हस्ताक्षर कर सरकार को भेज दिये। तैयारियाँ हो रही हैं।
तीसरी जगह मेरठ है। वहाँ भी बन्दोबस्त हुआ और लगान बढ़ गया। वहाँ भी
सत्याग्रह की घोषणा कर दी गयी है।
पंजाब में भी कुछ ऐसी ही बातें नज़र आ रही हैं। शेखूपुर और लाहौर ज़िलों
में ओले गिरने से फ़सलें नष्ट हो गयी थीं। अनाज कुछ भी नहीं हुआ, फिर लगान
कैसे दिया जाये? लेकिन यहाँ के सयाने-सयाने आदमी और ही तरह की बातें करते
हैं – “कांग्रेस के ‘बदनाम’ आदमी उन किसानों में भाषण न दें, कहीं सरकार
नाराज़ न हो जाये!” ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह याद रखना
चाहिए कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अंग्रेज़ पैसे के पीर और उम्मीद यह
की जाये कि वे लगान अपनेआप माफ़ कर देंगे। यह भ्रम अभी कब तक चलेगा?
हड़तालें
उधर सत्याग्रह की धूम है और इधर हड़तालों का भी कुछ कम ज़ोर नहीं। बड़ी
खुशी इस बात की है कि देश में फिर प्राण जगे हैं और पहले-पहल ही किसानों
और श्रमिकों का युद्ध छिड़ा है। इस बात का भी आने वाले बड़े भारी आन्दोलन
पर असर रहेगा। वास्तव में तो यही लोग हैं कि जिन्हें आज़ादी की ज़रूरत है।
किसान और मज़दूर रोटी चाहते हैं और उनकी रोटी का सवाल तब तक हल नहीं
हो सकता जब तक यहाँ पूर्ण आज़ादी न मिल जाये। वे गोलमेज कॉन्फ्रेंस या अन्य
ऐसी किसी बात पर रुक नहीं सकते। खैर।
आजकल लिलुआ रेलवे वर्कशाप, टाटा की जमशेदपुर मिलों, जमशेदपुर शहर
के भंगियों और बम्बई की कपड़ा-मिलों में हड़ताल हो गयी है। वास्तव में तो
मोटी-मोटी शिकायतें सबकी एक-सी होती हैं। वेतन कम, काम ज़्यादा और
व्यवहार बुरा। इस स्थिति में ग़रीब मज़दूर जैसे-तैसे गुज़ारा करते हैं, लेकिन आख़िर
असहनीय हो जाता है। आज बम्बई में डेढ़-दो लाख व्यक्ति हड़ताल किये बैठे हैं।
सिर्फ़ एक मिल चलती है। बात यह कि नये हथकरघे आये हैं, जिनमें एक आदमी
को दो हथकरघों पर काम करना पड़ता है और मेहनत ज़्यादा करनी पड़ती है। यही
काम करने वालों का वेतन ख़ासतौर से बढ़ाने, बाक़ी आम मज़दूरों का वेतन बढ़ाने
और 8 घण्टे से अधिक काम न ले सकने और कुछ व्यवहार सम्बन्धी शर्तें पेश
की गयी हैं। इस समय हड़ताल का बड़ा ज़ोर है। जमशेदपुर मिल के श्रमिकों की
भी कुछ ऐसी ही माँगें हैं। वहाँ भी हड़ताल बढ़ती जा रही है। भंगी अपनी हड़ताल
किये हुए हैं और शहर की नाक में दम हुआ है। सबसे अधिक सेवा करने वाले
भाइयों को हम भंगी-भंगी कहकर पास न फटकने दें और उनकी ग़रीबी का लाभ
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 255

उठाकर थोड़े-से पैसे देकर काम कराते रहें और बेगार भी खूब घसीटें। ख़ूब!
आख़िर उन्हें भी उठना ही था। वे तो लोगों को, विशेषतः शहरों में, दो दिन में सीधे
रास्ते पर ला सकते हैं। उनका उठना बड़ी खुशी की बात है। लिलुआ वर्कशाप से
कुछ आदमी निकाल दिये गये थे और वेतन के भी कुछ झंझट थे, इसलिए हड़ताल
हो गयी। बाद में एलान हो गया कि कई हज़ार व्यक्तियों का काम बिल्कुल ही
बन्द कर दिया जायेगा और हड़ताल ख़त्म होने पर भी उन्हें काम में नहीं लिया
जायेगा। इससे बड़ी सनसनी फैली। लेकिन हड़ताल ज़ोरों पर है। श्री स्प्रैट आदि
सज्जन खूब काम कर रहे हैं। लोगों को चाहिए कि वे उनकी हर तरह से सहायता
करें और उनकी हड़ताल तुड़वाने की जो तैयारी हो रही है, वह बन्द करायी जाये।
हम चाहते हैं कि सभी किसान और मज़दूर संगठित हों और अपने अधिकारों के
लिए यत्न करें।

256 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक बँटवारे
की राजनीति तेज़ कर दी। इसके असर से 1924 में कोहाट में भयानक हिन्दू-मुस्लिम
दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस
चली। इन्हें समाप्त करने की ज़रूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं
ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये।
इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार
प्रस्तुत किये। भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा।
भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के
अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर
शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यक़ीन न हो तो लाहौर के ताज़ा दंगे ही देख
लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार
सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की
गयी कि फ़लाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फ़लाँ आदमी हिन्दू है या सिख
है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा
मारे जाने के लिए काफ़ी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही
उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का
ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नज़र आता है। इन
“धर्मों” ने हिन्दुस्तान का बेड़ागर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि ये धार्मिक
दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नज़रों में भारत को बदनाम
कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते
हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग़ ठण्डा
रखता है, बाक़ी सबके सब धर्म के ये नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रोब को
क़ायम रखने के लिए डण्डे-लाठियाँ, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और
आपस में सर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाक़ी बचे कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं
और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन “धर्मजनों” पर
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 257

अंग्रेज़ी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग़ का कीड़ा ठिकाने पर
आ जाता है।
जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों
का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली।
वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा उठाया हुआ था और जो
“समान राष्ट्रीयता” और “स्वराज-स्वराज” के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही
या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले
हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है, और साम्प्रदायिकता की
ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है
कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं,
वे अख़बार वाले हैं।
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज
बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक
देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं।
एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय
अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल व दिमाग़
ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं।
अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना,
साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता
का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान
दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल
उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति
देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्रता की झलक सामने दिखायी देती थी
और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना-मात्र बन गया है। बस यही तीसरा
लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। वही नौकरशाही – जिसके
अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी – आज अपनी जड़ें
इतनी मज़बूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही
जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी
आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर
258 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

अविश्वास-सा हो गया, जिससे आजकल के बहुत-से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे
चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल ज़रूर
होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी
कारण से तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज
हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक
दशा में सुधार से ही हो सकता है, क्योंकि भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा
इतनी ख़राब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित
करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख
देता है। सच है, मरता क्या न करता।
लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि
सरकार विदेशी है और यह लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों
को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाये,
चैन की साँस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब
मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन
पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे
चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति,
रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम
धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और
सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुक़सान
कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक
स्वतन्त्रता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि ज़ार के समय वहाँ
भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं, वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पताँग
करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक़्शा ही
बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा
जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। ज़ार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही ख़राब थी,
इसलिए सब दंगे-फ़साद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी
है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है, इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की
ख़बर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन
कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ
दंगों में ट्रेड यूनियनों के मज़दूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 259

गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारख़ानों आदि में
उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना
थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग-चेतना का यही सुन्दर
रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब
वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे
हैं और उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नज़र
से – हिन्दू, मुसलमान या सिख-रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इन्सान समझते
हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता
है कि भारत का भविष्य सुनहला है और भारतवासियों को इन दंगों आदि को
देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि
ऐसा वातावरण ही न बने, ताकि दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते
थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं। न
ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम
नहीं करने देता। इसीलिए ग़दर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें
सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं, जो धर्म को राजनीति से
अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम
इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठा हो
सकते हैं। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख़याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर ज़रूर
विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा
लेंगे।
260 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पुलिस की कमीनी चालें
पुलिस के लोग किस तरह नौजवानों को फँसाने और बरगलाने का काम करते
हैं, इस सम्बन्ध में यह लेख जून, 1928 'किरती' में छपा था। – स.
कुछ दिनों से पंजाब में बड़ी सनसनी फैली हुई है। एक अजीब कहानी का पता
चला है। पुलिस की एक अजीब करतूत का भण्डाफोड़ हुआ है। अब चूँकि
भण्डाफोड़ हो ही गया है इसलिए यह कहानी मज़ेदार लगती है, लेकिन दुर्भाग्य
से यदि भण्डाफोड़ न हुआ होता तो उसका परिणाम यह होना था कि कई नौजवान
फाँसी पर लटक गये होते और कइयों को कालापानी हो गया होता। भण्डाफोड़
लाहौर के अख़बार ट्रिब्यून (The Tribune) ने किया है।
कहानी यों है कि अप्रैल, 1927 में लाहौर स्टेशन पर एक बंगाली और एक
मेरठ निवासी नौजवान पकड़े गये। बंगाली के पास से पिस्तौल और मेरठ वाले के
पास से तेज़ाब मिला। कुछ दिन हवालात में रखने के बाद पहले तो मेरठ निवासी
नौजवान जिसका नाम मोहन सिंह रंक था, छोड़ दिया गया और बंगाली पर मुक़दमा
चलाया गया। कुछ दिनों बाद बंगाली को भी जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत
पाँच सौ की हुई थी। पेशी वाले दिन वह हाज़िर न हुआ, फिर भी उसकी जमानत
ज़ब्त नहीं की गयी। उसे वारण्ट निकालकर मेरठ से गिरफ़्तार कर लाया गया और
मि. हीरालाल फैलूक्स ने उसे पाँच साल की क़ैद का दण्ड दिया। लाहौर के राष्ट्रीय
कार्यकर्ताओं को उससे हमदर्दी पैदा हुई। उसके लिए अपील का प्रबन्ध किया गया।
अपील अभी पेश भी नहीं हुई थी कि वह छूटकर घर चला गया। सब लोग हैरान।
उड़ती-उड़ती बात यह सुनी जा रही थी कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का भाड़े का टट्टू
था। लेकिन निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
अब कुछ दिन पहले उसके उन दिनों के लिखे हुए कुछ पत्र 'ट्रिब्यून' में छपे
हैं। एक पत्र तो मेरठ के पुलिस कप्तान के नाम है और एक लाहौर के पुलिस
कप्तान के नाम और एक ऐसा है जिसमें उसने अपना सारा हाल लिखा है। उसने
लिखा है कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का एक जासूस है और कई बरसों से पुलिस
का काम कर रहा है। पुलिस को पता चला कि एक और आदमी 'एन' नाम का
मैनपुरी का रहने वाला है। जिसके पास दो पिस्तौलें हैं। के.सी. बनर्जी को, जोकि
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 261